लघुकथा - निशानियाँ

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निशानियाँ गीता दुबे गृहस्थ जीवन शांतिमय और खुशहाल रहे तो व्यक्ति आसमान छूने तक की उम्मीद रखता है. ऐसी ही बात थी प्रोफ़ेसर अरविन्द चौधरी के ...

निशानियाँ

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गीता दुबे

गृहस्थ जीवन शांतिमय और खुशहाल रहे तो व्यक्ति आसमान छूने तक की उम्मीद रखता है. ऐसी ही बात थी प्रोफ़ेसर अरविन्द चौधरी के साथ,उनकी जीवन संगिनी न सिर्फ सुंदरता की प्रतिमूर्ति थीं बल्कि उनमें समझदारी भी कम न थी. वह एक शांत और जिम्मेवार स्त्री थीं, उन्होंने पति को हमेशा घर की जिम्मेदारियों से मुक्त रखा और शायद यही वजह थी कि अरविन्द चौधरी शहर के शिक्षा समाज में एक हस्ती थे. उन्होनें महिलाओं के लिए एक कॉलेज खोल रखा था. उनका एक बेटा था- शेखर, शेखर को संस्कार तो विरासत में मिली ही थी वह मेधावी भी था. पढ़-लिखकर वह इंजीनियर बन गया. अरविन्द चौधरी और सुधा को जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी. अब तक की उनकी जिंदगी काफी सुगम और सहज रही थी, उन्हें बस एक ही इच्छा थी बेटे की शादी एक सुसंस्कृत और पढ़ी-लिखी लड़की से हो जाए ताकि बची जिंदगी भी इसी तरह शांतिपूर्ण बीत जाए. बेटे के लिए रिश्ते आने लगे, एक जगह रिश्ता जंच गया. हजारीबाग की एस. पी. की बेटी नेहा उन्हें पसंद आ गई.

विवाह धूम-धाम से संपन्न हो गया. बहू के आ जाने से घर की रौनक और बढ़ गई, पति के साथ-साथ सास- ससुर भी काफी खुश रहने लगे, सबसे ज्यादा खुश तो सास थीं, उन्होंने सोचा घर- गृहस्थी की जिम्मेवारी बहू को सौंपकर मुक्त हो जाऊँगी. सास- ससुर ने बहू के आते ही उसपर अपना सारा प्यार न्योछावर कर दिया, उन्होंने नेहा को कभी बहू के रूप में देखा ही नहीं, बेटी समझते थे और बेटी ही कहकर पुकारते भी थे. उन्होंने मन ही मन यह मान लिया था कि नेहा भी उन्हें माता-पिता ही समझती है लेकिन नेहा के साथ ऐसी बात नहीं थी, उसने जब भी अपने शादी-शुदा जिंदगी की कल्पना की तो उसमें अपने अलावा पति और बच्चे को ही शामिल किया. सास-ससुर या किसी और रिश्तेदार की तो कहीं जगह ही नहीं थी. वह पश्चिमी सभ्यता की बुरी तरह गुलाम थी, स्वतंत्र रहना, स्वतंत्र सोचना उसका स्वभाव था, उसमें किसी भी तरह की बाधा या किसी का हस्तक्षेप वह नापसंद करती और अपनी स्वतंत्रता के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती थी.

    एक दिन अरविन्द चौधरी ने अपने एक मित्र को भोजन पर आमंत्रित किया. उन्होंने नेहा से कहा कि ‘नेहा बेटी कल मैंने कल अपने एक मित्र को खाने पर आमंत्रित किया है, कल दोपहर का भोजन जरा समय से तैयार कर देना’ यह सुनते ही नेहा ने तुरंत पलटकर कहा –‘पापा जी अपने मित्र को आमंत्रित करने के पहले कम से कम एक बार मुझसे पूछ लिया होता कि कल मेरी क्या इन्गेजमेंट्स है? मैं कोई नौकरानी हूँ क्या कि मेरे आते ही मित्रों को निमंत्रण देने लगे? कल मेरी किटी-पार्टी है.. मैं घर पर नहीं रहूंगी’. यह सुनकर अरविन्द चौधरी और पत्नी सुधा स्तब्ध रह गए. इसी तरह के अपमानों का सामना करना धीरे- धीरे उनकी आदत बन गई. सास ने तो चाबी देकर सोचा था कि घर- गृहस्थी के भार से मुक्त हो जाऊँगी लेकिन जिम्मेदारी सौंपते ही नेहा उन्हीं पर शिकंजे कसने लगी. शेखर उसे उस रूप में स्वीकार कर चूका था. इसी बीच नेहा ने एक बेटी को जन्म दिया, बेटी का नाम उसने अंजलि रखा.घर का माहौल कुछ बदला लेकिन के भार ने नेहा को और स्वार्थी बना दिया था.

धीरे-धीरे समय बीतता गया, अंजलि बचपन से किशोरावस्था में कदम रखने लगी. वह अपने दादा-दादी का काफी ख्याल रखती थी. दादा दादी के जिंदगी में खुशी लौटने लगी थी लेकिन यह खुशी भी ज्यादा दिनों कि नहीं रही. अचानक एक दिन रात के भोजन के बाद सुधा के पेट में बहुत तेज दर्द होने लगा, असह्य पीड़ा थी, वह दर्द से छटपटाने लगी. किसी तरह अरविन्द चौधरी एवं बेटा शेखर रात बीतने की प्रतीक्षा करने लगे लेकिन नेहा एक बार भी देखने नहीं आई, वह रोज की तरह अपना कमरा बंद कर निश्चिन्त सो रही थी. सुबह होते ही अरविन्द चौधरी सुधा को लेकर अस्पताल पहुंचे. डॉक्टरों ने जांच की और बताया कि इनकी छोटी आँत में कैंसर का घाव है जो पुरे पेट में फैल चूका है. लास्ट स्टेज है. सुनते ही अरविन्द चौधरी का शरीर जैसे जम गया हो. इस सच को स्वीकारने में उन्हें कुछ वक्त लगा, सोचने लगे अब क्या करूँ, किससे कहूँ? घर गए लेकिन बेटे बहू से कुछ भी नहीं कहा. पैसों का इंतजाम कर दूसरे ही दिन सुधा को लेकर मुंबई कैंसर अस्पताल के लिए रवाना हो गए, उन्होंने आस न छोड़ी थी, उन्हें लगा हो सकता है यहाँ कुछ बेहतर इलाज हो और सुधा ठीक हो जाए लेकिन वहाँ जाना भी व्यर्थ ही रहा, डॉक्टरों ने वहाँ भी जवाब दे दिया. हर पल बिस्तर पर पड़ी सुधा अपनी मौत को पति की आँखों में देखती रही और एक दिन उन्हें अकेला छोड़कर इस संसार को अलविदा कह दिया.

  आज सुधा की चौथी बरसी है, हरेक साल सुधा की बरसी पर अरविन्द चौधरी गरीबों को खाना खिलाते हैं. वह इसी तैयारी में लगे थे कि अचानक न जाने क्यों उन्होंने सोचा कि आज पहले सुधा की चार साल से बंद पड़ी आलमारी की सफाई कर लूँ! उन्होंने आलमारी खोली और एक-एक साडी उठाकर देखने लगे, पुरानी यादें बिलकुल ताजा हो आईं, वे सुधा की मौजूदगी को महसूस करने लगे, उनकीं आखें भर आईं. उन्होंने गहनों का डब्बा खोला और सारी बातें याद आने लगीं – ये कर्णफूल मैंने उसे शादी की पहली साल-गिरह पर दिया था..... किस तरह संभालकर रखा है उसने..... अपनी यादों में ऐसे खो गए कि उन्हें यह आभास ही नहीं रहा कि अंजलि कब से खड़ी होकर कभी अपने दादाजी को और कभी उन साड़ियों को देख रही थी.

अचानक अंजलि ने एक गुलाबी रंग की साड़ी जिसमें सितारे जड़े हुए थे, उठा लिया और एक चन्द्रघट ले लिया और उसे पहनकर अपने दादाजी के सामने आई, उस साड़ी और उस चंद्र्घट में वह काफी खूबसूरत लग रही थी. उसे देखकर अरविन्द चौधरी सोचने लगे कि यह साड़ी तो सुधा ने कभी पहनी ही न थी, फिर उन्हें धीरे- धीरे याद आया कि बहू की शादी से कुछ दिन पहले सुधा यह साड़ी और यह चंद्रहार खरीद लाई थी और कहा था कि बहू इसे पहनकर काफी खुश होगी लेकिन शायद बहू के व्यवहार ने सुधा को उसे देने नहीं दिया और वह आलमारी की सजावट बन कर रह गई थी. नेहा ने जब अंजलि को साड़ी और चंद्रहार पहने देखा तो उसकी आखें टिक गईं, वह अपने ससुर जी के पास गई और बड़े ही नर्म आवाज में कहा- पापा जी, माँ के पास तो काफी सुन्दर-सुन्दर  बेशकीमती साड़ियां और गहने थे, अब ये सारी साड़ियां और गहने मुझे दे दीजिए, मैं इन्हें पहनूंगी भी और काफी हिफाजत से रखूंगी भी. यह सुनकर प्रोफेसर अरविन्द चौधरी कुछ देर तक तो खामोश रहे फिर कुछ सोचने के बाद उन्होंने कहा—ये साड़ियां और ये गहने मैं तुम्हें कभी नहीं दे सकता, तुमने आते ही जिसका तिरस्कार करना शुरू कर दिया, आज उसी की चीज मांगने आई हो! जरा भी शर्म नहीं आई तुम्हें मांगते हुए. ये गहने और ये साड़ियां, तो सुधा की निशानियाँ हैं, मेरी अमानत हैं, इसे मेरे ही पास रहने दो, ये मेरी अतीत हैं यादें हैं.         

जी के पास गई और बड़े ही नर्म आवाज में कहा- पापा जी, माँ के पास तो काफी सुन्दर-सुन्दर  बेशकीमती साड़ियां और गहने थे, अब ये सारी साड़ियां और गहने मुझे दे दीजिए, मैं इन्हें पहनूंगी भी और काफी हिफाजत से रखूंगी भी. यह सुनकर प्रोफेसर अरविन्द चौधरी कुछ देर तक तो खामोश रहे फिर कुछ सोचने के बाद उन्होंने कहा—ये साड़ियां और ये गहने मैं तुम्हें कभी नहीं दे सकता, तुमने आते ही जिसका तिरस्कार करना शुरू कर दिया, आज उसी की चीज मांगने आई हो! जरा भी शर्म नहीं आई तुम्हें मांगते हुए. ये गहने और ये साड़ियां, तो सुधा की निशानियाँ हैं, मेरी अमानत हैं, इसे मेरे ही पास रहने दो, ये मेरी अतीत हैं यादें हैं.

                                               गीता दुबे 

                                              जमशेदपुर         

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रचनाकार: लघुकथा - निशानियाँ
लघुकथा - निशानियाँ
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रचनाकार
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