शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

हिन्दी के नाम पर सैर-सपाटा

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डॉ. रामवृक्ष सिंह

यदि हमसे कोई पूछे कि धर्म-प्रचार, भाषा-प्रचार, पार्टी-प्रचार में सबसे गंभीर कार्य कौन-सा है? यानी किस कार्य को लोग सबसे गंभीरता-पूर्वक संपन्न करते हैं? तो हम कहेंगे पार्टी-प्रचार। राजनीतिक पार्टियों वाले लोग अपनी पार्टी का प्रचार बड़ी शिद्दत से करते हैं। वे हर अवसर पर, हर जगह अपनी पार्टी का झंडा बुलंद करने में जुटे रहते हैं और ऐसा करना का कोई भी मौका नहीं गँवाते। 1 मई 15 के अमर उजाला में फोटो के साथ एक खबर है। खबर है कि उप्र के मुमं ने एक महिला को मुआवज़े का चेक देकर पूछा कि क्या आप जानती हैं कि यह मुआवजा कौन-सी पार्टी दे रही है? महिला ने उत्तर दिया- हम नहीं जानते। मुमं ने पूछा- क्या आप मुझे जानती हैं? महिला ने कहा- हम नहीं जानते। मुमं की राजनीतिक आकांक्षा यहाँ साफ झलकती है, और महिला की निस्पृहता भी। जिसका पति अभी-अभी मरा हो, जिसकी दुनिया ही उजड़ गई हो, उससे यह कैसा बेतुका सवाल? खैर... सवाल बेतुका है, किन्तु हमारी प्रपत्ति सिद्ध हो गई। अपनी पार्टी और अपने प्रचार का कोई भी मौका राजनेता लोग छोड़ते नहीं। हमारे राजनेताओं का बस चले तो मुर्दों के कफन, बच्चों के डायपर और महिलाओं के सैनिटरी पैड पर भी अपनी पार्टी का प्रचार छपवा दें।

इसके बाद नम्बर आता है धर्म-प्रचारकों का। धर्मों, मतों और सम्प्रदायों का नाम न लें तब भी समझने वाले समझ जाएँगे कि दुनिया में किस धर्म के प्रचारक कितनी तत्परता से अपने धर्म, मत और सम्प्रदाय का प्रचार करते हैं। जहाँ मौका मिलता है वे अपना कमंडल, लोटा, माला, कंठी लिए हाजिर हो जाते हैं। अपने-अपने धर्म-प्रचार के लिए वे तमाम तरह की हिकमतें करते हैं। स्कूल-कॉलेज खोलते हैं, अस्पताल-डिस्पेंसरी चलाते हैं, इमदाद बाँटते हैं। तरह-तरह के सेवा-कार्य चलाते हैं या चलाने का पाखंड रचते हैं। खैर, ये तो प्रचार के ऐसे तरीके हैं, जिससे मानवता को किसी न किसी रूप में लाभ होता है। ऐसे धर्म-प्रचारक कहीं न कहीं समाज की सेवा भी करते हैं और धीरे-धीरे लोगों के दिल में उतरते चले जाते हैं।

इनके विपरीत कुछ धर्म-प्रचारक ऐसे भी होते हैं जो बस कोरी बातें ही करते हैं। यदि वे एकान्त में बातें करते तो भी गनीमत थी। दुःख तो यह देखकर होता है कि वे बाकायदा बड़े-बड़े पंडाल बनवाकर हजारों की संख्या में श्रोता-श्रद्धालुओं की भीड़ जुटा लेते हैं और उन्हें अपनी बातों में उलझाए रखते हैं। दिनों-दिन, महीनों-सालों यही सब चलता रहता है। इससे समाज में एक प्रकार की निठल्लागिरी पैदा होती है। आलस्य को बढ़ावा मिलता है। अलबत्ता पर्यटन को ज़रूर प्रोत्साहन मिल जाता है। रेलवे, परिवहन निगम आदि पर यात्रियों का दबाव भी बढ़ता है।

पीछे एक फिल्म का संवाद सुना- मुझपर एक अहसान करो कि मुझपर कोई अहसान मत करो। हमारे समाज की यह बड़ी भारी दिक्कत है। मुझे पता नहीं चलता कि मेरी ज़रूरत क्या है। किन्तु मेरे जो खैर-ख्वाह हैं, उन्हें मुझसे भी पहले पता चल जाता है कि मुझे किस चीज़ की ज़रूरत है। इस दृष्टि से वे सच्चे मायनों में अंतर्यामी हैं। धर्म-प्रचारकों और बाबा लोगों के साथ भी यही बात सच है। और यही हाल नेताओं तथा नए-नए उत्पाद बनाने वालों का है।

अपने देश में बहुत-से महकमे ऐसे हैं जिनका काम तरह-तरह के उत्पादों व सेवाओं की खपत बढ़ाना है। अपने यहाँ हिन्दी भी एक ऐसा ही उत्पाद है। देश के विभिन्न विभागों में हिन्दी अधिकारी नियुक्त हैं, जो तरह-तरह की हिन्दी तैयार करते हैं। इस हिन्दी को देश के सरकारी विभागों में खपाने के लिए संसद से लेकर सड़क तक तरह-तरह की व्यवस्थाएं की गई हैं। संसदीय समिति और सरकारी विभागों के साथ-साथ बहुत से गैर-सरकारी संगठन भी हिन्दी की खपत बढ़ाने के लिए एकजुट होकर कोशिशें किए जा रहे हैं।

हिन्दी की खपत वृद्धि के लिए ये संगठन यहाँ-वहाँ बैठकें, सभाएं, सेमिनार और संगोष्ठियाँ आयोजित करते हैं। इन सभी कार्यक्रमों में घूम-फिरकर प्रायः वही पुराने चेहरे दिखाई देते हैं। इस एकरसता से बचने के लिए आयोजक कई टोटके करते हैं। वे इनके नाम बदलते हैं, बैनर बदलते हैं और कार्यक्रम का स्थान भी बदल देते हैं। कोई-कोई संगठन तो इन कार्यक्रमों को विदेशों में यानी न्यूयॉर्क, लंदन और दक्षिण अफ्रीका तक में आयोजित करा चुके हैं। उन्हें लगता है कि हिन्दी नामक उत्पाद को बेचने के लिए देश में ही प्रयास किया जाना पर्याप्त नहीं है। जैसे न्यूटन ने कहा कि मुझे पृथ्वी के बाहर एक बिन्दु दे दो, फिर देखो मैं कैसे पृथ्वी को पटक देता हूँ। वही हालत हिन्दी की है। हमारे हिन्दी प्रचारक कहते हैं कि भारत में चाहे हिन्दी की मिट्टी पलीद हो रही है, किन्तु बाहर यदि उसने पाँव जमा लिए, या उसका परचम यदि विदेशी धरती पर लहरा दिया तो भारत में वह निश्चय ही स्थापित हो जाएगी।

हिन्दी की खपत बढ़ाने के लिए केवल बैठकें, सभा-संगोष्ठियाँ ही नहीं होतीं। विभिन्न समितियाँ और पदाधिकारी समय-समय पर सरकारी कार्यालयों में जा-जाकर बड़े बड़े अधिकारियों से मिलते हैं और उन्हें समझाते हैं कि ‘देखिए साहब हिन्दी नाम का यह बहुत बढ़िया प्रोडक्ट बाज़ार में आया है। यह बहुत सुन्दर है और इसे इस्तेमाल में लाना आसान है। आप इसे एक बार इस्तेमाल तो करके देखिए। फिर आप इसके मुरीद हो जाएँगे और अगली बार फिर अपने रिटेलर से कहेंगे कि यार, भइए, वह पहले वाली खेप बहुत अच्छी थी, हिन्दी की वैसी ही खेप फिर से लाकर दो।‘ पर बड़े अधिकारी वास्तव में बड़े हैं। वे हिन्दी के प्रचारकों-प्रसारकों के सामने तो हाँ में हाँ मिला देते हैं, किन्तु उनके बाहर जाते ही फिर से अपने पुराने ढर्रे पर आ जाते हैं और हिन्दी का बंडल बाहर फेंककर फिर से उसी पुराने अंग्रेजी के बंडल को गले लगा लेते हैं।

यह बात हिन्दी के प्रचार-प्रसार से जुड़ी समितियाँ और पदाधिकारी भी बखूबी जानते-समझते हैं। लेकिन वे यह कैसे मानें और कहें कि हिन्दी नामक उत्पाद अब बाज़ार में बिक नहीं रहा। यदि वे ऐसा कह दें तो उनके उत्पाद की किरकिरी हो जाए और उत्पाद को बाज़ार में उतारनेवाली कंपनी उन्हें निकाल बाहर करे। इसलिए उनका हित इसी में है कि उत्पाद की ज्यादा से ज्यादा खपत अपने घर में करें, यानी खुद ही ज्यादा से ज्यादा उत्पाद का इस्तेमाल करें और समग्र बिक्री के झूठे आँकड़े पेश करते रहें।

सुना है इस बार हिन्दी की बिक्री बढ़ाने के लिए भोपाल में ऐसा ही एक आयोजन होने जा रहा है। बिक्री सह प्रदर्शनी। बहुत पहले सत्तर के दशक में ऐसा ही एक बिक्री सह प्रदर्शनी वाला कार्यक्रम नागपुर में भी हुआ था। उसके लगभग चालीस वर्ष बाद वैसा ही कार्यक्रम भोपाल में करने की ज़रूरत पड़ रही है। इससे और कुछ चाहे प्रमाणित होता हो या न होता हो, किन्तु यह तो पता लग ही रहा है कि उत्पाद बाज़ार में चल नहीं रहा है। यदि चल रहा होता तो उसको धक्का देकर आगे बढ़ाने के लिए बार-बार हइया-हइया न करना पड़ता। कई बार तो लगता है कि इन आयोजनों का हेतु हिन्दी ही है या कुछ और? कहीं ऐसा तो नहीं कि हिन्दी की ओट में भाई लोग खाली-पीली घुमक्कड़ी का आनन्द लेने के लिए हिन्दी का नाम भुना रहे हों।

ऐसी शंका इसलिए होती है, क्योंकि देवनागरी के तथाकथित माननीकरण और टंकण-यंत्रानुकूलन की प्रक्रिया में उसमें जो न्यूनताएं भर दी गईं, पंचम वर्ण की जो छुट्टी कर दी गई, उसकी वापसी के ज़रिए हिन्दी को फिर से उच्चारणानुकूल लेखबद्ध करने की सुविधा युनीकोड ने मुहैया करा दी है। कोई माई का लाल इस मुद्दे पर नहीं सोच रहा। इन सम्मेलनों में भी ऐसी कोई चर्चा नहीं होती जिससे हिन्दी को प्रौद्योगिकी के अनुरूप बनाया जा सके। केवल टाइम पास के लिए सम्मेलन करने का क्या लाभ?

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(डॉ. रामवृक्ष सिंह)

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