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दुर्लभ पत्रों में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

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प्रमोद भार्गव     पाश्चात्य इतिहास लेखकों की स्वार्थपरक और कूटनीतिक विचारधारा से कदमताल मिलाकर चलने वाले कुछ भारतीय इतिहास लेखकों के चलते आ...


प्रमोद भार्गव


    पाश्चात्य इतिहास लेखकों की स्वार्थपरक और कूटनीतिक विचारधारा से कदमताल मिलाकर चलने वाले कुछ भारतीय इतिहास लेखकों के चलते आज भी इतिहास की कुछ पुस्तकों और ज्यादातर पाठ्य-पुस्तकों में यह मान्यता चली आ रही है कि 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजी मान्यता के खिलाफ बर्बरतापूर्ण संघर्ष था। यह संग्राम तत्कालीन ब्रितानी हुकूमत से अपदस्थ राजा-महाराजाओं,जमींदारों तथा कुछ विद्रोही सैनिकों तक सीमित था। जबकि इसी संग्राम को विद्रोह की संज्ञा देने वाले इतिहास लेखक यह निर्विवाद रूप से स्वीकारते हैं कि उस समय के शक्तिसंपन्न राज-घराने ग्वालियर,हैदराबाद,कश्मीर,पंजाब और नेपाल के नरेशों तथा भोपाल की बेगमों ने फिरंगी सत्ता की मदद नहीं की होती तो भारत 1857 में ही दासता की गुंजलक से मुक्त हो गया होता ? अंग्रेजी-सत्ता के लोह-कवच बनने वाले इन सामंतों को अंग्रेजों ने स्वामिभक्त कहकर दुलारा भी था


    प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक तात्या टोपे के बलिदान दिवस 18 अप्रैल को प्रतिवर्ष शिवपुरी में दो दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े पत्रों एवं हथियारों की एक प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। इन पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि इस संग्राम से खास ही नहीं आम आदमी भी जुड़ा हुआ था। मूल रूप में ये पत्र भोपाल में राजकीय अभिलेखागर में सुरक्षित हैं। दुर्लभ होने के कारण पत्रों की छाया प्रतियां ही प्रदर्शनी में लायी जाती हैं। सत्तर के दशक में इन पत्रों के संग्रह का प्रकाशन डॉ परशुराम शुक्ल 'विरही' के सम्पदाकत्व में नगर पालिका परिषद,शिवपुरी द्वारा प्रकाशित किया गया था,लेकिन अब इस शोधपरक दुर्लभ पुस्तक की प्रतियां उपलब्ध नहीं हैं।

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    '1857 की क्रांति' शीर्षक से प्रकाशित इस किताब में इस संग्राम से संबंधित कुछ पत्र संग्रहीत हैं। ये पत्र महारानी लक्ष्मीबाई,रानी लड़ई दुलैया,राजा बखतवली सिंह,राजा मर्दनसिंह,राजा रतन सिंह और उस क्रांति के महान योद्धा,संगठक एवं अप्रतिम सेनानायक तात्या टोपे द्वारा लिखे गए हैं। इन पत्रों की भावना से यह स्पष्ट होता है कि प्रथम स्वंतत्रता संग्राम का विस्तार दूर-दराज के ग्रामीण अंचालों तक हो रहा था। स्वतंत्रता की इच्छा से आम व्यकित क्रांति के इस महायज्ञ में अपने अस्तित्व की समिधा डालने को त्तपर हो रहे थे।


किताब की भूमिका के अनुसार,1857 के स्वतंत्रता-संग्राम से संबंधित इन पत्रों की प्राप्ति का इतिहास भी रोचक है। आजादी की पहली लड़ाई जब चरमोत्कर्ष पर थी,तब तात्या टोपे अपनी फौज के साथ ओरछा रियासत के गांव आष्ठौन में थे। अंग्रेजों को यह खबर लग गई और अंग्रेजी फौज ने यकायक तात्या टोपे के डेरे पर हमला बोल दिया। उस समय तात्या मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं थे। लिहाजा,ऊहापोह की स्थिति में तात्या अपना कुछ बहुमूल्य सामान यथास्थान छोड़ नौ दो ग्यारह हो गए।


    उस दौरान ओरछा के दीवान नत्थे खां थे। तात्या द्वारा जल्दबाजी में छोड़े गए सामान की पोटली नत्थे खां के विश्वसनीय सिपाही ने उन्हें लाकर दी। इस सामान में एक बस्ता था। जिसमें जरूरी कागजात और चिट्ठी पत्री थीं। इसी सामान में एक तलवार और एक उच्च कोटी की गुप्ती भी थी। नत्थे खां के यहां कोई पुत्र नहीं था,इसीलिए यह धरोहर उनके दामाद को मिली। दामाद के यहां भी कोई संतान न थी,लिहाजा तात्या के सामान के वारिस उनके दामाद अब्दुल मजीद फौजदार बने,जो टीकमगढ़ के निवासी थे।


    स्वतंत्र भारत में 1976 में टीकमगढ़ के राजा नरेंद्र सिंह जूदेव को इन पत्रों की खबर अब्दुल मजीद के पास होने की लगी। नरेंद्र सिंह उस समय मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री थे। उन्होंने इन पत्रों के ऐतिहासिक महत्व को समझते हुए तात्या की धरोहर को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की। इन पत्रों की वास्तविकता की पुष्टि इतिहासकार दत्तात्रेय वामन पोद्धार से भी करायी। पोद्धार ने पत्रों के मूल होने का सत्यापन करते हुए इन्हें ऐतिहासिक महत्व के दुर्लभ दस्तावेज निरुपित किया। झांसी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार डॉ वृन्दावनलाल वर्मा ने भी इन्हें मुल-पत्र बताते हुए सुनिश्चित किया कि पत्रों के साथ मिला हुआ सामान,तलवार तथा गुप्ती भी तात्या के ही है। डॉ वर्मा ने यह भी तय किया कि जिस स्थान और जिस कालखंड में इस साम्रगी का उपलब्ध होना बताया जा रहा है,उस समय वहां तात्या के अलावा अन्य किसी सेनानायक ने पड़ाव नहीं डाला था।

    तात्या के बस्ते से कुल 225 पत्र प्राप्त हुए थे,जो देवनागरी एवं फारसी लिपी में थे। हिंदी पत्रों की भाषा ठेठ बुंदेली है। इन पत्रों में 125 हिंदी में और 130 उर्दु में लिखे गए हैं। तात्या की तलवार और गुप्ती भी अनूठी है। तलवार सुनहरी नक्काशी में मूठ वाली है,जो मोती बंदर किस्म की बतायी गई है। इस तलवार की म्यान पर दो कुंदों में चार अंगुल लंबे बाण के अग्रभग जैसे पैने हथियार हैं। इन हथियारों पर हाथी दांत की बनी शेर के मुंह की आकृतियां जड़ी हुई हैं। इसी तरह जो गुप्ती प्राप्त हुई है वह विचित्र है। गुप्ती की मूठ सोने की है। इसके सिरे पर एक चूड़ीदार डिबिया लगी हुई है,जिसमें इत्र-फुलेल रखने की व्यवस्था है। तात्या की यह अमूल्य धरोहर अब राजकीय अभिलेखागार भोपाल का गौरव बढ़ा रही है।


    पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम किस गहराई से आम जनता का संग्राम बनता जा रहा था और आदमी किस दीवानेपन में राष्ट्र की बलिवेदी पर आत्मोत्सर्ग के संस्कारों में ढल रहा था। समर के इस अछूते अध्याय की बानगी इन पत्रों में टृष्टव्य है-
    तात्या टोपे के नाम लिखे पत्र में राजा बखतवली लिखते हैं,'एजेंट हैम्लिटन ने गोरी फौज को लेकर राहतगढ़ पर आक्रमण किया है। खुरई,बानपुर की हुई लड़ाई में मानपुर के करीब 700 और अंग्रेजों के करीब 500 सैनिक मारे गए। अंग्रेजों ने बलपूर्वक पन्ना,बिजावर,टेहरी,चरखारी और छतरपुर के राजाओं को अपनी  ओर मिला लिया है। अंग्रेज फौज से मुकाबला करने के लिए सहायता भेजी गई।' तात्या के नाम लिखे अन्य पत्र में महाराजा रतनसिंह लिखते हैं, 'हमने तीन लाख रुपया जमा करा दिया है,मगर हमसे कौलनामा किसी पंडित को भेजकर लिखा लिया जाए। हमारी इज्जत रखी जाए। अब हम फौज सहित कूच करते हैं। हमारी ओर से किसी बात पर तकरार नहीं होगी'।


    तात्या के नाम लिखे पत्र में श्रीराम शुक्ल और गंगाराम लिखते हैं 'सिरौली के घाट पर अंग्रेज कैप्टन और नवाब बांदा की भीड़ रोकने के लिए सेना की सहायता एवं तोप चाहिए। चांदपुर के थानेदार भी दो सौ बंदूक लेकर हमारे साथ हैं।' एक अन्य पत्र में मनीराम और गंगाराम ने तात्या को लिखा है,'सिरौली,चुखरा,भौंरा,चांदपुर और गाजीपुर के जींदार अंग्रेजों से मोर्चा लेने को तैयार हैं। अंग्रेजों द्वारा गोली चलाने पर वे धावा बोलेंगे। गोरी पलटन को कालपी न पहुंचने देने के लिए कम्पू का बंदोबस्त भी किया जाए।' तात्या को लिखे पत्र में महाराज कुमार गणेश जूदेव ने तात्या को अपने डेरे पर बुलाया तथा लड़ाई में ठाकुरों के साथ होने का हवाला दिया,जिसमें कुंवर बुधसी,क्षमा जूदेव के नामों का उल्लेख है। उन्होंने लिखा है,'इनके सबके मन साफ हैं और मैं बीच में हूं।' तात्या को मूरतीसिंह,शिवप्रसाद और गौरीशंकर अवस्थी लिखते हैं, 'हमीरपुर व सिरौली को मदद के लिए दो तोपें,एक कंपनी तथा राजा लोगों की 500 फौज जल्दी भेजें। गोरे सिरोली के उस पार पांच तोपे लगाकर गोलाबारी कर रहे हैं।'


    तात्या को एक पत्र में जानकारी दी है कि 'करीब एक सौ अंग्रेज अधिकारी व सिपाही ग्वालियर के किले में घुस गए हैं और इन्हें बेदखल करने के लिए हजारों लोग किले के अंदर पहुंच गए हैं।' तात्या की जीत पर एक पत्र में जैतपुर के फौजदार सवाई माधेसिंह ने खुशी जाहिर की है। रानी लड़ई दुलैया द्वारा राजा बखतवली सिंह के नाम लिखे पत्र में कहा गया है,'पन्ना की जो फौज हटा-दमोह में थी,उसने नदी पार करके यहां के इलाके पर तोपें चला दी हैं। फतेहपुर को जब्त करने का विचार है,जबलपुर में गुरबियों की फौज अंग्रेजों से बिगड़ गई है। पलटन अब हटा खाली करना चाहती है। कई जगह लड़ाई चल रही है,इसीलिए पचास-साठ मद बारूद,शोरा और गन्धक की जरूरत है।' तात्या को लिखे पत्र में रानी लड़ई दुलैया ने सूचित किया है, 'पेशवा के पास उन्होंने कुछ लोग भेजे हैं और वे पेशवा के सूबा जलालपुर में ठहरे हुए हैं।' महारानी लक्ष्मीबाई ने रानी लड़ई दूलैया को एक पत्र लिखकर याद ताजा करायी है, 'दोनों ओर अच्छे संबंधों की परंपरा रही है,इसीलिए आपकी फौज की ओर से कोई वारदात नहीं होनी चाहिए।' तात्या को लिखे एक पत्र में राजा मर्दनसिंह ने लिखा है,'फौज समेत फौरन आएं। बुंदेलखंड के राजा अंग्रेजों से मिल गए हैं। अंग्रेज बानपुर,शाहगाढ़ और झांसी पर कब्जा करने की योजना बना रहे हैं।'


    1857 में ही हमीरपुर से निकलने वाले 'हमीर'नामक एक समाचार पत्र में पत्रकार जलील अहमद ने खबर छापी है कि 'तात्या टोपे की कोठी में दो षड्यंत्रकारी,जो बंदूकधारी थे,मोजा रमेली खालपुर में तात्या टोपे की हत्या की साजिश रचते हुए पकड़े गए। इन्हें तात्या टोपे के सामने पेश किया गया।' तात्या के नाम लिखे पत्र में मनफूल सुकूल ने जानकारी दी है, 'गोरों ने मुनादी पिटवाई है कि विद्रोहियों को जो कोई रसद-मदद देगा,उसे बच्चों समेत फांसी पर लटका दिया जाएगा।'


    ओरछा के दीवान नत्थे खां ने एक विशेष पत्र हरकारे द्वारा भेजकर रानी झांसी को सूचित किया कि 'मोर्चा बंदी की तैयारी की जाए।' पंडित मोहनलाल ज्योतिषी ने तात्या को लिखे एक पत्र के साथ अतीन्द्रिय शक्तियों द्वारा रक्षा किए जाने के लिए एक तंत्र भी भेजा। इस पत्र में उल्लेख है, 'हम फकीर साहब के साथ बैठकर दो जंत्र तैयार कर आपके पास भेज रहे हैं। जो छोटा जंत्र है,वह आप बांध लें और बड़ा जंत्र निशान पर बांध देना। ईश्वर रक्षा करेगा।'


इन पत्रों से यह उजागर होता है कि भारतियों के अतः करण में दास्ता से मुक्ति के लिए जोश और अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश पैदा हो गया था। उस समय आम आदमी ने अपने राष्ट्रीय धर्म का अहसास किया और अपना वर्चस्व न्यौछावर करने को त्तपर हुआ। 1857 के इन बलिदानियों ने ही राष्ट्रीय चरित्र की अवधारणा को अभिव्यक्ति दी। यह संग्राम हिंदू-मुस्लिम एकता का अद्वितीय उदाहरण था।


    इन पत्रों के अलावा बुंदेलखंड और उससे जुड़े अंचलों में आज भी रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे द्वारा भारत से अंग्रेजों की बेदखली के लिए किए गए प्रयासों की किंवदंतियां लोक गीतों में प्रचलित हैं। बताते हैं,सर ह्यूरोज ने 22 मई 1858 को गोलावली की लड़ाई में राव साहब और झांसी की रानी की मिली-जुली फौज को हरा दिया था। तब ये दोनों भागकर करैरा और सुरवाया के जंगलों में होते हुए गोपालपुर पहुंचे। ग्वालियर से दक्षिण और पश्चिम में करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर घने वनप्रांतर में बसा है गोपालपुर। तत्या यहीं इन विभूतियों से जा मिले और मुक्ति के इन मतवालों ने ग्वालियर पर कब्जा करने की योजना बनाई। नष्ट हो चुके अस्त्र-शस्त्रों और साधनों की पूर्ति कर पाने का भी यही एक रास्ता था। आज भी गोपालपुर की सौंधी मिट्टी में जीने वाले बुजुर्गों के होठों पर इस प्रसंग के छिड़ते ही बरबस यह गीत उभर आता है......


'मिट्टी और पत्थर से
उसने अपनी सेना गढ़ी।
केवल लकड़ियों से उसने तलवारें बनाई।
पहाड़ को उसने घोड़े का रूप दिया।
और रानी ग्वालिरा की ओर बढ़ी।


    इतिहास की वही लिपिबद्धता सार्थक और शाश्वत होती है जो बीते हुए को उपलब्ध साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर यथावत् प्रस्तुत करती है। अपनी-अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अनेक देशों ने राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाते हुए राष्ट्र के इतिहास का पुनर्लेखन कराया,लेकिन हमारा देश स्वतंत्रता प्रप्ति के 68 साल बीत जाने के बाद भी आंग्ल विचार और आंग्ल इतिहासकारों द्वारा लिखे हुए इतिहास को अनमोल थाती मानते हुए राम की खड़ाऊं की तरह सिर पर लादे घूम रहा है। यह सोच का नहीं वरन् खेद और अपमान का विषय है। आत्महीनता के इस बोध से उभरने के लिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित जो भी साक्ष्य,सहित्य और किंवदंतियां यत्र-तत्र फैले हैं,उन्हें सहेजकर भारतीय इतिहास की घरोहर बनाना चाहिए। जिससे आम भारतीय वास्तविक इतिहास से परिचत होकर आत्मगौरव का अनुभव कर सकें।

 


प्रमोद भार्गव
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,339,बाल कलम,25,बाल दिवस,3,बालकथा,62,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,10,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,240,लघुकथा,1215,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1995,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,700,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,782,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,75,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,196,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: दुर्लभ पत्रों में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
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