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मानव कल्याण के सफल सृजग-गोस्वामी तुलसीदास

तुलसीदास

22 अगस्त जयंती पर विशेष
मानव कल्याण के सफल सृजग-गोस्वामी तुलसीदास
० साहित्यकारों और कवियों के प्रेरणास्त्रोत

 

डॉ. सूर्यकांत मिश्रा


महाकवि तुलसीदास ने भारतीय संस्कृति का जो बीजारोपण किया है, उसी के चलते हमारे राष्ट्र में संपूर्ण विश्व मे अपनी अलग पहचान बनाई है। गहराई से विचार किया जाए तो जब गोस्वामी जी ने जन्म लिया तब हम गुलामी की जंजीरों में छटपटाते हुए उससे निकलने का प्रयास कर रहे थे। हमारा देश उस वक्त विदेशी शासकों से आक्रांत था। विदेशी संस्कृतियां हम पर अपना अधिकार करना चाह रही थी। देश को सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विचारधाराओं के एक धागे में पिराने वाले व्यक्तित्व का पूर्णता अभाव महसूस किया जा रहा था। न हमारे सामने अच्छे आदर्शों की सोच थी और न ही उद्देश्य तय दिखाई पड़ रहे थे। निम्न वर्ग अशिक्षा के साये में निर्धनता का दास बना हुआ था। लोगों में अकर्मण्यता घर करते जा रही थी। ऐसे समय में तुलसीदास जी के जन्म ने मानो हमारी सांस्कृतिक एवं धार्मिक भावनाओं को वटवृक्ष का रूप देने संकल्प शक्ति का संचार कर दिखाया।


आज से लगभग 473 वर्ष पूर्व सवंत 1599 में जन्में गोस्वामी तुलसीदास जी ने न केवल संस्कृति और धर्म को मजबूती प्रदान की, वरन उनकी साहित्यिक रचनाओं ने देश में एक नहीं अनेक साहित्यकार पैदा कर दिखायें। हम गोस्वामी तुलसीदास जी को महज धर्म शास्त्र का ज्ञाता कहकर  संबोधित करें तो साहित्य के साथ राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र की उपेक्षा मानी जा सकती है। उन्होंने अपने लेखन में सभी क्षेत्रों के आदर्शों का समेटते हुए सर्वांगीण कमजोरियों पर ध्यान आकृष्ट किया है। गोस्वामी जी ने एक स्थान पर लिखा है-
किरति भनित भूरि भल सोई, सुरसरि सम सब कह हित होई।


अर्थात यश, कविता और वैभव वही श्रेष्ठ है जिसमें गंगा के सामान सब का कल्याण हो। बिना संकोच के यह कहा जा सकता है कि तुलसी साहित्य मानवीय समाज के हर वर्ग के लिए उपयोगी होने के साथ ही अति महत्वपूर्ण है। गोस्वामी जी की सबसे सुंदर साहित्य रचना मैं रामचरित मानस को मानता हूं। कारण यह कि रामचरित मानस महज किसी धर्म के लिए की गई रचना नहीं बल्कि मानव कल्याण के लिए की गई रचना है। भगवान राम का चरित्र निमित्त मात्र है। परिवारों में आदर्श की स्थापना से लेकर सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन रामचरित मानस की सबसे अलग विशेषता है। तुलसीदास जी रचित अन्य ग्रंथों में भी भक्ति, नीति, दर्शन, धर्म, कला आदि का समन्वय यह सोचने विवश कर देता है कि वास्तव में तुलसीदास जी असाधारण कवि थे। उन्हें मानस में विश्व धर्म की स्थाना करने वाला अकेला कवि माना जा सकता है।


साहित्यकार समाज के गर्भ में पलता है, उसे वहीं से अपने साहित्यिक विकास का मार्ग ढूंढना होता है। साहित्य सृजन की प्रेरणा ग्रहण करते हुए ही एक काव्य, रस, छंद, अलंकार और गद्य की समझ रखने वाला मुकाम स्थापित कर दिखाता है। सामाजिक बुराईयों के चलते ही गोस्वामी जी जन्म के साथ ही घर से बेदखल कर दिये गये, किंतु उन्होंने अपनी जिजिविषा को मरने नहीं दिया और महाकवि तक की सफर हर प्रकार की कठिनाई का सामना करते हुए उन्होंने पी ही लिया। समाज में व्याप्त कुरीतियां, व्यमन्स्य और भ्रष्टाचार के प्रति भी हमारे कवियों और साहित्यकारों की लेखनी ने एक सही खाका तैयार करके मैदान प्रदान किया है। इसलिए कहा गया है कि साहित्य अतीत से प्रेरणा ग्रहण करता है, वर्तमान को चित्रित करता है और भविष्य का मार्गदर्शन करता है। इस परिप्रेक्ष्य में तुलसीकृत ग्रंथों में अपनी सार्थकता सिद्ध कर दिखाई है। संस्कृत में प्रसिद्ध सूत्र वाक्य है-
हितेन सह इति सृष्टिमह तस्यभावःसाहित्यम्।।


अर्थात साहित्य का मूल तत्व सबका हित साधन है। मानव स्वभाव से ही क्रियाशील प्राणी रहा है, साथ ही मन में उठने वाले भावों का चित्रण ही उसकी अनिवार्य आवश्यकता मानी जा सकती है। एक साहित्यकार अथवा कवि की यही भावनाएं जब लेखनीबद्ध होकर भाषा रूप में प्रकट होकर समाज के हाथ में पहुंचती है, तब वही बदलाव के रूप में उच्च साहित्य से बलवति की जाती है। यही कारण है कि कहा जाता है साहित्य उच्च कोटि के सामाजिक मूल्यों को न सिर्फ गढ़ता है, बल्कि उन्हें समाज में स्थापित कर अपनी क्षमता सिद्ध कर दिखाता है। तुलसीदास जी ने समाज को अंधकार से निकालने और धूंधली किरण से पूर्ण उजाले की ओर ले जाने अपने साहित्य में दिशा निर्देश दिये। पराधीन और पराश्रित रहने वालों को तुलसीदास जी ने सावधान करते हुए कहा है-
पराधीन सपनेहू सुख नाहि, करि विचारि देखहू मनमाही।


अर्थात पराधीन और दूसरों पर आश्रित रहने वाला सपने में भी सुख की कल्पना न करें। आलस्य ही मनुष्य के पतन का मुख्य कारण भी होता है। ऐसे ही आलसियों पर निशान साखते हुए गोस्वामी जी ने पुनः लिखा है-
ते परत्र दुख पाबहीं, सिर धुन-धुन पछिताहिं।
कालहिं, कर्महिं, ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाहिं।।


अर्थात आलसी और अर्कमण्य लोगों द्वारा ईश्वर पर मिथ्या दोषारोपण किया जाता है और वे ही दुख पाते है, तथा बाद में पछताते है। ऐसे ही विचारों को मनुष्य जाति को उबारने के विचार से गोस्वामी जी ने अपनी सुप्रसिद्ध रचना रामचरित मानस में लिखा है-
जहां सुमति तहं संपति नाना।
जहां कुमति तहं विपति निदाना।


अर्थात हृदय की शुद्धता और विचारों की समानता ही धन-धान्य, सुख-संपत्ति, यश-गौरव आदि की कुंजी होती है, और लोग स्वयं वहां खींचे चले आते है। साथ ही विचारों की मलीनता अनेक विपत्तियों की जननी होती है। गोस्वामी जी के ऐसे ही सुंदर विचारों को बाद में अप्रत्यक्ष रूप से आत्मसात करते हुए अंग्रेजों ने ‘युनिटी इज स्ट्रेंथ’ जैसे शब्दों में सजा दिया। इसे ही संस्कृत में ‘संघे शक्तिः कलियुगेः’ से लेखनीबद्ध किया गया है। जिसका अर्थ है हर प्रकार के अर्जन में सुमति ही बड़ी बलवान होती है।

गोस्वामी तुलसीदास जी की साहित्यिक यात्रा की चर्चा करते समय रामचरित मानस और धर्म की विवेचना न की जाए तो यात्रा पूरी नहीं हो सकती। रामचरित मानस का महत्व भारतीय संदर्भ में ही नहीं वरन विदेशी विद्वानों ने भी इसकी प्रासंगिकता तो स्वीकार किया है। यही कारण है कि गोस्वामी जी की सुंदरकृति की उन्होंने अपनी भाषा में अनुवाद भी किया। यह एक ऐसा अनमोल रत्न है, जिसे पा लेने और समझ लेने से मनुष्य की और कुछ पाने की अभिलाषा स्वतः ही समाप्त हो जाती है। गोस्वामी जी ने रामचरित मानस में शाश्वत धर्म को विश्व धर्म से जोड़ते हुए धर्म और अधर्म को शब्दों में पिरोया है। गोस्वामी जी लिखते है-
परहित सरिस धरम नहीं भाई।
पर पीड़ा सम नहीं अधिमाई।।


गोस्वामी जी मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के अनन्य भक्त थे। बावजूद इसके वे सच्चे समाज सुधारक और लोकनायक भी थे। उन्होने राम के पात्र को सामने रखकर जनता को आत्म कल्याण और आत्मरक्षा के अमोघ मंत्र प्रदान किये, अनेक प्रकार के चरित्र चित्रण से आचरणों की शिक्षा प्रदान की और उनकी इसी साहित्यिक सेवा ने मानव जीवन को उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर दिखाया।

 



                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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