'स्वार्थ के वायरस' एक पाठक की नजर में

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  शशिकांत सिंह 'शशि' व्यंग्य लेखन तलवार की धार पर चलने का नाम है। यह कला भी है और कौशल भी। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह इसका अपना...

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शशिकांत सिंह 'शशि'

व्यंग्य लेखन तलवार की धार पर चलने का नाम है। यह कला भी है और कौशल भी। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह इसका अपना कोई बना-बनाया फार्मेट नहीं है। लेखक अपनी सुविधा से कहानी, कविता, आलेख इत्यादि में व्यंग्य का इस्तेमाल करता चलता है। संभवतः इसीलिए परसाई व्यंग्य को स्प्रीट कहते थे। जरूरी है कि लेखक को अपनी मंजिल और रास्ते की जानकारी हो। मंजिल का अर्थ है कि लेखक को यह अच्छी तरह पता हो कि कहना क्या है ? वह बिना भटके अपनी बात कहे तो पाठक को भी सुविधा होती है। रास्ते का आशय है कला से। व्यंग्य में लक्षणा और व्यंजना जैसी भाषाई शक्तियों के साथ-साथ दाल में नमक की तरह हास्य को भी संतुलित करना होता है। हास्य की मात्रा बढ़ गई तो व्यंग्य हास्यास्पद हो जायेगा यदि कम रह गई तो व्यंग्य गरिष्ठ हो जायेगा। यानी अन्य विधाओं की अपेक्षा व्यंग्य अधिक कौशल की मांग करता है। यह पाठक से सीधे संवाद भी है। बावजूद इसके आजकल व्यंग्य लेखन एक फैशन का रूप ले चुका है।

वीरेन्द्र सरल हिन्दी व्यंग्य के उभरते हुये युवा व्यंग्य लेखक हैं। 'स्वार्थ के वायरस' उनका दूसरा संकलन है । उनका पहला संकलन 'कार्यालय तेरी अकथ कहानी' में आलोचकों ने काफी संभावनायें देखी थीं। दूसरे संकलन तक आते-आते सरल कला और कथ्य दोनों की पहचान हो गई है। लेखक के तौर पर अपना मुहावरा तो गढ़ना ही पड़ता है। सरल जानते हैं कि व्यंग्य लेखक को तराजू पर तौलने वालों की कमी नहीं है। आलोच्य संकलन स्वार्थ का वायरस में कुल 29 रचनाएं संग्रहित हैं। इनमें कथा, आलेख और रिपोर्ताज तीनों फार्मेट का प्रयोग लेखक अपनी सुविधा से करता है। निश्चित रूप से विषय के अनुसार फार्मेट लेना पड़ता है।

अपनी बात में ही लेखक स्पष्ट करता है कि -' मेरे व्यंग्य का उद्येश्य न किसी व्यक्ति पर निशाना साधना है और न ही किसी की भावना को आहत करना।' स्पष्ट है कि विसंगतियों पर ही प्रहार करना लेखक का ध्येय है। सरल के व्यंग्य में व्यंजना और लक्षणा दोनों का सुंदर प्रयोग किया गया है। यही कारण है कि प्रख्यात व्यंग्यकार श्री गिरीश पंकज जी कहते हैं कि वे वीरेन्द्र की रचनात्मकता को देखकर आश्वस्त होते हैं। उन्हें सरल के व्यंग्य सामाजिक परिवर्त्तन के दिशा में उठाये गये कदम लगते है। वास्तव में व्यंग्य का काम ही यही है। आइये देखें कि सामाजिक परिवर्त्तन की दिशा में सरल के व्यंग्य कितने सटीक हैं।

व्यंग्य 'मूर्तियों की पीड़ा' में शहर भर की मूर्तियां मीटिंग कर रही हैं। अध्यक्ष मूर्ति कहती है- अरे! देश की दशा देखकर हम तो वहां रो भी नहीं सकते। दिल में दर्द छिपाकर मुस्कराना पड़ता है। इससे तो अच्छा है हटाने देा हमें, किसी कोने में स्थापित होकर कम से कम जी भरकर रो तो सकते हैं।' क्या यह दर्द केवल मूर्तियों का है? यह दर्द हर हिन्दुस्तानी का है जिसे सरल शब्द दे रहे हैं। फोटो खिचवाने की बीमारी में आजकल के फेसबुकियों पर करारा कटाक्ष है। एक नौजवान इसलिए मर गया क्योंकि उसकी फोटो पर लाइक और कामेंन्टस नहीं मिले।

रावण की पीड़ा में लेखक ने आजकल के ढ़ोंगी साधुओं की पोल खोली है। रावण साधु बनकर सीता हरण करने आ तो गया पर साधु बनने के बाद रावण बनने का मंत्र भूल गया है। साधु भेष में उसे दुराचार करते ग्लानि हो रही है। लेखक का कौशल यहीं प्रखर होता है। रावण को लज्जा आ रही है कि साधु भेष में गलत काम नहीं करना चाहिए लेकिन आजकल के साधुओं को लज्जा नहीं आ रही। सड़क पर मछली पालन एक सशक्त व्यंग्य है जिसमें लेखक ने पूरे सिस्टम को कसौटी पर कसा है। इस व्यंग्य की भाषा खासकर अपनी ओर आकृष्ट करती है।- उसकी बांछे वैसे ही खिल गईं जैसे किसी मतदाता को देख किसी प्रत्याशी की खिल जाती है।' व्यंजना का प्रयोग भी सुंदर है-' -'' सराकरी संपत्ति आपकी अपनी संपत्ति है-यह बात आम लोगों के लिए लागू नहीं होती।ये स्लोगन खास लोगों के लिए है।'' स्वार्थ के वायरस' व्यंग्य में देवलोक में हड़कंप मचा है क्योंकि आदमी को जितना मर्जी ठोक बजाकर धरती पर भेजा जाये वह गलत काम करने लगता है। अंत में पता चलता है कि उसके अंदर एक वायरस आ गया है जिसे स्वार्थ का वायरस कहते हैं। सरल के व्यंग्य लेख अपनी दिशा जानते हैं। उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि प्रहार कहां और कितना करना है। एक सर्जन की तरह अपनी कलम का प्रयोग करना ही इस लेखक की सफलता है।

व्यंग्य संतुलन की मांग करता है। क्या लिखना है ? यह लेखक को मालूम होना ही चाहिए साथ ही उसे यह अच्छी तरह ज्ञात होना चाहिए कि क्या नहीं लिखना है। धरमवीर भारती कहते थे कि ड्राफ्टिंग से ज्यादा क्राफ्टिंग का महत्व है। राजेन्द यादव के शब्दों में कहें तो अपने लिखे हुये को आप कितनी बेरहमी से छांट सकते हैं-इसीसे आप बड़े लेखक बनते है। सरलजी को इस क्ष़ेत्र में काम करने की जरूरत है। उनके कुछ आलेखों में भटकाव अधिक है। महंगाई को सुंदरी की उपमा देकर उसके पीछे जाना और अंत में उससे तमाचा खाकर अक्ल आना। आलेख को हल्का करता है। साथ ही यह भी कि आधे से अधिक पढ़ लिये जाने के बाद भी पाठक उल़झा रहेगा कि लेखक कहना क्या चाहता हैं।

चूंकि सरल एक कवि भी हैं तो कभी-कभी भाषा मोह उनके व्यंग्य को अधिक काव्यात्मक बना देता हैं। 'सरकारी छत पर जल संग्रहण' में आरंभ इतना काव्यात्मक है कि यह खूबी और खामी दोनों का रूप ले लेता है। बानगी देखिये-' वह सरकारी भवन एकदम नया-नवेला था।दूर से किसी बड़े रईस के दामाद की तरह इठलाता हुआ नजर आता था।उसकी ऊंचाई महंगाई की तरह थी। छत भ्रष्टाचार की तरह विस्तृत था। खंभे घोटालों की तरह मजबूती से तनकर खड़े थे।'' अब पाठक को ही तय करने दें कि इसे किस रूप में लेगा। ये तो सामान्य सी बातें हैं कि जो किसी भी लेखक के संग्रह में संभव है। सभी लेख एक समान वजन के नहीं हो सकते। अंत में बात केवल इतनी कि वीरेन्द्र अच्छे अच्छों से अच्छा लिख रहे हैं

 

पुस्तक- स्वार्थ के वायरस

प्रकाशन- अयन प्रकाशन, 1-20 महरौलीरोड नई दिल्ली

कीमत- 320.00

लेखक से संपर्क- saralvirendra@rediffmail.com

 

समीक्षक -

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र

Skantsingh28@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: 'स्वार्थ के वायरस' एक पाठक की नजर में
'स्वार्थ के वायरस' एक पाठक की नजर में
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