बुधवार, 23 सितंबर 2015

आर्थिक स्तर पर आरक्षण वंचितों की आवश्यकता

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हरीश कुमार

बिहार के चुनाव नजदीक है ,और जब चुनाव नजदीक होते है तो मुद्दे उछाल उछल कर बाहर निकलते है। कश्मीर के चुनाव थे तो कश्मीरी पंडितों की बात चली और चुनाव समाप्त होते ही मीडिया और नेताओं की जुबान से गायब हो गयी। अब आरक्षण का मामला उठा है। नया नहीं है ,पुराण है पर फिर भी नए नए समुदायों द्वारा आरक्षण मांगे जाने पर ताजा तरीन हो जाता है और उस पर राजनीति होने शुरू हो जाती है। जाट गुर्जर ,मराठा ,पटेल,मीणा रोज नए नए पिछड़ेपन और शोषण के मुद्दे उठा कर आरक्षण के लिए आन्दोलनरत है। ज्योतिबा फुले ,राजा राम मोहन रॉय ,विनोबा भावे ,भीम रॉय आंबेडकर आदि काफी समय से सामाजिक विषमताओं और भेड़ों के खिलाफ आवाज उठाते रहे। इस का परिणाम है की आज सभी क्षेत्रों में पछड़ी जातियों का विकास और सुधर हुआ है। आजादी के बाद भी प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने सामाजिक तौर पर पछड़ी जातियों के लिए एक मंडल कमीशन स्थापित किया। जिसमें यह रिपोर्ट पेश की गयी की इन जातियों के विकास के लिए आरक्षण की नीति अपनायी जाये। कमीशन के मुताबिक लगभग सैंतीस सौ जातियों को पिछड़ा कहा गया। पर इसी दौरान सरकार टूट गयी और इस कमीशन के असली संस्थापक १९९० में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी. उसने २७ फीसदी आरक्षण का ऐलान पछड़ी जातियों के लिए किया। २००८ में इस कमीशन को उच्च शिक्षा केन्द्रों में भी लागू कर दिया गया। मंडल का विस्तार हुआ पर समाज में पछड़ी हुई जातियों का आर्थिक स्टार बाद से बदतर होता गया। इससे कोई वर्ग या जाति नहीं बची। बेरोजगारी और महंगाई जाति देखकर नहीं आती। वास्तव में मंडल कमीशन ने जाति के पिछड़ेपन को तो देखा पर आर्थिक पिछड़ेपन को अपना मापदंड नहीं बना सका। परिणाम स्वरुप एक के बाद एक कितने ही आंदोलन आरक्षण को लेकर उठे और अब आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग उठने लगी है जो जायज और सैद्धांतिक भी है।

आज के इस बाजारवादी और उदारवादी अर्थव्यवस्था के समय सामाजिक पिछड़ेपन से कही अधिक आर्थिक पिछड़ापन भारतीय और विश्व समाज में एक बड़ा मुद्दा है। सरकारी नौकरियों की लगातार होती कमी और बढ़ती महंगाई के बीच रोजगार के धंधे किसी एक विशेष जाति तक सीमित नहीं रहे है। जिसे जो ठीक लग रहा है वो बाजार में बेच रहा है। किसान ,मजदूर ,मिस्त्री ,नौकरीपेशा ,दुकानदार ,सब्जी बेचने वाला या ठेला लगाने वाला अब क्रय विक्रय करते समय जाति या छुआ छूत नहीं मानते। लगभग सभी इंसानों की एक प्राथमिक आवश्यकता रोटी कपडा और मकान जुटाने के लिए रोज संघर्षरत रहते हैं। शहद ब्याह के मामले सबके निजी है पर सम्पन्न्ताओं ने वहां भी कुछ दीवारें तोड़ी है। आनर किलिंग तो हर जाति में है यहाँ तक कि गोत्र विवाद भी एक ही जाति के बीच का मसला बन कर उभरा है। हर रोजगार और सरकारी गैर सरकारी विभाग या राजनीति में सभी जातियों के लोग उच्च निम्न पदों पर आसीन है। परन्तु फिर भी एक तबका या वर्ग आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों का है जो किसी विशेष जाति से सम्बंधित नहीं है वरन सारी जातियों से सम्बंधित है। आज गाँव के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अधिकतर गरीब परिवारों से आते है और इनमें हर जाती या समुदाय के बच्चे शामिल है। हम समानता के अधिकार का पाठ उन्हें पढ़ते है। संतों महात्माओं की वाणी में भेदभाव को मिटाने का उपदेश सुनते है पर वास्तव में उन्हें बचपन से ही स्कूल का दाखिला फार्म भरवाते समय उनकी उनकी विशेष जाती का बोध भी करवाते रहते है ,और ये कारवां स्कूल के दाखिले से लेकर रोजगार प्राप्ति के हर आवेदन पत्र को भरने तक चलता रहता है। दाखिला फीस से लेकर आवेदन पत्र तक एक जाति को अमीर और एक जाति के सभी लोगों को गरीब मान लिया जाता है। इतना ही नहीं नौकरियों में तरक्की के दौरान फिर जाति का लाभ एक को मिलता है और दूसरा ठगा सा रह जाता है। क्या योग्यता और अयोग्यता किसी विशेष जाति को देखकर आती है। योग्य तो कोई भी हो सकता है हम कब तक अपने पूर्वाग्रहों या अपने वोट बैंक के लिए एक नए सामाजिक शोषण को चलाते रहेंगे।

जातिगत पिछड़ेपन के लिए यदि किसी का सामाजिक शोषण हो रहा है तो उस पर सख्त क़ानून या कार्यवाही की जरूरत है। आरक्षण से यदि इसमें कोई लाभ मिलना होता तो आज भी आये दिन इतनी घटनायें जातिगत और सामुदायिक वर्गों में न होती। अर्थ एक बड़ा नियंत्रक बन चूका है हमारे जीवन का और अब भारत ग्लोबल विश्व का एक हिस्सा है। जब आदिम समाज आधुनिक हो गया है या हो रहा है तो हम कब तक अपनी पूर्व विषमताओं का रोदन करते रहेंगे। हमें हर वंचित को ऊपर उठाने के लिए और उसे आर्थिक तौर पर सशक्त बनाने के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की नीति को लाना होगा ,फिर चाहे वो किसी भी समुदाय या जाति का हो। योग्यता को उचित अवसर मिलना ही चाहिए।

मगर जो बात एक आम आदमी और सभी अर्थशास्त्रियों को समझ आ रही है उसे हमारे मौकापरस्त राजनीतिज्ञ नहीं समझ पा रहे या नहीं समझना चाहते। उन्हें जातियों के बीच राजनीति का खेल खेलने में मजा आने लगा है। एक तरफ हम नव उदारवाद और विकास के वैश्विक स्टार की बात कर रहे है और दूसरी तरफ हमारी राजनीति जाति,धर्म और समुदाय के विरोध खड़े कर गरीबों और वंचितों से उनके हक़ छीन रही है। आज देश के युवाओं के सामने रोजगार एक बड़ी चुनौती है। बेरोजगारी बढ़ रही है ,योग्यताएं सड़कों पर बेकार घूम रही है। झुग्गी झोपड़ियां और अच्छे जीवन स्तर की एक बड़ी खाई समाज में अमीर और गरीब के बीच है और सच मानिये इन पर किसी विशेष जाती का अधिकार नहीं। इनमें सब शामिल है। सभी समुदाय और सभी वर्ग जो आज भी आर्थिक तौर पर पिछड़े है ,आरक्षण के इस मौजूदा स्वरुप से उनकी हालत में कोई सुधर आने वाला नहीं है। आरक्षण का लाभ केवल कुछ चुनिंदा लोग ही बार बार प्राप्त कर रहे है जिसे अर्थ शास्त्र की भाषा में' मलाईदार परत' कहा गया है। वास्तव में मौजूदा आरक्षण भी शोषण का एक हथियार बन गया है। राज्य सरकार हर वर्ष कितनी नौकरियों के विज्ञापन देती है उसमें आवेदन फीस को लेकर कोई समानता नहीं रखी जाती। एक विशेष वर्ग को बहुत कम और दूसरे को उससे चौगुनी फीस भरने के लिए लिख दिया जाता है जैसे चौगुनी फीस भरने वाले वर्ग में सभी धन्ना सेठ के परिवारों से है और बाकी सब झुग्गी झोपडी वाले। आज यदि कोई पछड़ी या अनुसूचित जाती का व्यक्ति कितने भी उच्च पद पर आसीन है उसके वंशजों को पूरे आरक्षण लाभ मिल रहे है जबकि आरक्षण का मतलब तो केवल वंचितों के उद्धार तक सीमित था ,और दूसरी तरफ एक गरीब मजदूर या एक आम आदमी अपनी सारी योग्यताओं और गरीबी के बावजूद आरक्षण के कारण शोषण का शिकार हो जाता है क्योंकि उसकी जाति अनारक्षित है।

आज सभी वंचितों ,गरीबों ,नौजवानों और बुद्धिजीवियों को चाहिए कि राजनीति की इस अवसरवादी नीति को बदलने के लिए आवाज़ उठाये और हर गरीब तथा आर्थिक तौर पर पिछड़े व्यक्ति तक सरकार की विकासशील नीतियों को पहुंचने के लिए राजनीतिक दबाव बनायें। दुनिया भर के मजदूरों को इकठ्ठा होने का सन्देश किसी जाति विशेष के लिए नहीं था। अब आरक्षण की नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता है और जातिगत आरक्षण के स्थान पर आर्थिक स्तर का माप दंड लागू करने की नीति पूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ मानने का समय है

- डा हरीश कुमार

गोबिंद कालोनी ,गली न २ ,

बरनाला (पंजाब )

9463839801

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