नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

हास्य-व्यंग्य : प्रगति

image

-हरिशंकर गजानंद प्रासाद देवांगन

बहुत पहले की बात है। आदमी और कुत्ते के बीच, ताकतवार सिद्ध होने की प्रतियोगिता शुरू हुई। एक दिन, कुत्ते ने आदमी को काट लिया। आदमी मर गया। पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गयी। कुत्ते ने, ताकत की पहली जंग जीत ली।

कुछ अरसे बाद, कुत्ता फिर भिड़ गया आदमी से। आदमी भी मारा गया, कुत्ता भी। पूरा देश, आदमी की प्रगति से खुश हुआ – आदमी और कुत्ते की बराबरी सुनकर। इसी दिन से, आदमी को कभी कभी कुत्ता कहा जाने लगा।

एक दिन बहुत जश्न मनाते हुए देखा गया लोगों को। पता लगा कि कुत्ते ने आदमी को काट दिया, और कुत्ता मर गया। इतनी प्रगति को मनुष्य ने, उत्सव के रूप में मनाया। यह वो समय था, जब कुत्ते को, मनुष्य की चाकरी करने के लिए, मजबूर होना पड़ा।

समय गुजरता रहा, प्रगति होती रही। अब कुत्ता भी, डरने लगा था, आदमियों से। एक बार जीत का स्वाद चख चुका मनुष्य, कुत्ते से भिड़ने की जुगत में रहता था हमेशा। वह दिन भी आ गया। परेशान कुत्ते ने, आखिर एक इंसान को काट ही लिया। पर यह क्या ? न कुत्ता मरा, न आदमी। पूरी दुनिया में, खलबली मच गयी। मनुष्य की प्रगति पर प्रश्नचिन्ह लग गया। वैज्ञानिकों के लिए, शोध का विषय हो गया यह। उनका दावा था, या तो काटने वाला जीव कुत्ता नहीं होगा, या उससे भिड़ने वाला, आदमी नहीं होगा। क्योंकि मनुष्य को काटने वाला कोई भी जीव, जिंदा रह ही नहीं सकता।

इसी समय पहली बार मनुष्य और कुत्ते की दोस्ती हुई, अब कुत्ते और आदमी, एक ही बिस्तर में सोने लगे। अब कुत्ता, पैरों के नीचे से, सीधे गोद में पहुंच गया। प्रतियोगिता आज भी चल रही है, पर यह सिर्फ दोस्ताना है, इसमें कभी आदमी जीतता है कभी कुत्ता। सोचने पर विवश हैं लोग, यह कैसी प्रगति ?

हरिशंकर गजानंद प्रासाद देवांगन, छुरा

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.