शनिवार, 12 सितंबर 2015

न देखें-दिखाएं, न सुनें-सुनाएँ

  image

डॉ0 दीपक आचार्य

 

दुनिया बहुत बड़ी है और उसी के अनुरूप सब कुछ विराट ही विराट सर्वत्र दृश्यमान हो रहा है, सुनाई भी दे रहा है और प्रत्येक क्षण बीतता हुआ नित नवीन परिवर्तन करता और रचता जा रहा है।

इंसान इस पूरे विश्व की वह छोटी सी इकाई है जिसकी आयु, क्षमता और सब कुछ सीमित ही है, किसी न किसी सीमा में बंधा हुआ है जहाँ कोई सीमा तक पाँव पसार लेता है, कोई कुछ फीट और मीटरों तक चिपका रहता है और बहुत सारे अपने ही अपने दड़बों में ऎसे घुसे रहते हैं कि इनके लिए यही परिधियां पूरी जिन्दगी संसार के रूप में अनुभवित होती है।

चाहे हम किसी भी प्रकार से सीमाओं में बंधे रहें या मर्यादाओं को त्यागकर उन्मुक्त जिन्दगी जीने के आदी हो जाएं, हमारा इन सभी सीमाओं से मुक्त होता है।

यह चंचल मन हजार घोड़ों और पक्षियों की तरह पूरे वेग से कहीं भी आने-जाने के लिए मुक्त होता है। इसे कोई रोक नहीं सकता, सिवाय इंसान अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्पों की स्थिरता के।

संसार के एकाध फीसदी इंसानों को छोड़ दिया जाए तो हम सभी बहुसंख्य लोग उस श्रेणी में आते हैं जहाँ हम पूरी दुनिया को जानने को उतावले रहते हैं, दुनिया का इतिहास और भविष्य के संकेत सब कुछ को जानने की तीव्र जिज्ञासा हम मनुष्यों में इतनी अधिक बनी रहती है कि हम हमेशा हर पल इसी उधेड़बुन में रहते हैं कि हमारे आस-पास से लेकर संसार भर में क्या कुछ हो रहा है, इसकी पल-पल की हमें खबर रहे।

अपनी जिज्ञासाओं को पाने के लिए हम बहुत सारे लोगों, यंत्रों और खोजी किस्म के प्राणियों की तलाश में लगे रहते हैं। हमारे अपने जीवन का अधिकांश समय सुनने-सुनाने, देखने-दिखाने में व्यतीत हो जाता है। जगह-जगह बहुत बड़ी संख्या में जमा होकर घण्टों कभी इधर और कभी उधर गपियाते, डेरों, पार्कों, पेढ़ियों, मन्दिरों, छत्रियों और फुटपाथों आदि सभी स्थानों पर आसन जमाए गप्पे हाँकने वालों से पूरी दुनिया भरी पड़ी है। 

अपने सारे नित्य कर्मों, दैनिक कर्तव्यों और घर-परिवार, समाज तथा देश के दायित्वों से मुँह फिराकर चर्चाओं में रमे रहने, एक बात को सुनकर उसमें तड़का लगाकर दूसरों को परोसने का जो शगल हमारी पीढ़ी में है वह इस बात का परिचायक ही है कि हमें काम करना पसन्द नहीं है, हमें बातें करना और सुनना, उनमें तड़का लगाकर दूसरों को परोसना ज्यादा पसन्द है।

पता नहीं इन चर्चाओं में हमें क्या आनंद आता है। अधिकांश लोगों की जिन्दगी को देखें तो इन सभी में न्यूनाधिक रूप से बोलने और सुनने तथा आगे से आगे परोसने में अनिर्वचनीय आनंद रस की प्राप्ति होती है।

हम अपने बारे में भले चर्चा न करें, अपने घर-परिवार के सदस्यों से कुछ भी बोलचाल न करें, अपने मोहल्लों और कॉलोनियो में गूंगे के रूप में भले प्रसिद्ध हों, अपनी मण्डली में हमारी स्थिति सर्वाधिक बोलने और सुनने-सुनाने वालों में मानी जाती है।

दिन-रात हम अपनी और अपनों के बारे में कोई चर्चा भले न करें, दुनिया के हर कोने और तमाम प्रकार के लोगों के बारे में चर्चाएं करना नहीं भूलते। फिर जो लोग घण्टों बैठकर अखबारों और पत्रिकाओं को चाटने का सामर्थ्य रखते हैं, टीवी के सामने बैठकर पूरी दुनिया का लेखा-जोखा अपने दिमाग में रखते हैं, उन लोगों का सान्निध्य वैश्विक ज्ञान-विज्ञान का प्राकट्य करता है।

इन लोगों के पास बोलने और सुनाने के लिए इतना अधिक होता है कि नॉन स्टॉप घण्टों तक दूसरों के कान पका सकते हैं। ऎसे लोग भी हमारे आस-पास से लेकर दूर-दराज तक खूब हैं। फिर जब से मोबाइल आया है तब से एसएमएस, फेसबुक, व्हाट्सअप और दूसरे माध्यमों का एक ही उपयोग रह गया है।

सामग्री प्राप्त करना और दूसरों को पहुंचाते रहना।  इसमें हमारे काम की सामग्री कितनी है, तो पता चलेगा कि अधिकांश सामग्री का आगे से आगे अग्रेषण होता रहता है और उस सामग्री का हमारे दैनिक जीवन में कोई खास महत्व कभी नहीं होगा। इसके बगैर हमारी जिन्दगी और अच्छी तरह से चलती रही है और चल सकती है।

अपनी सीमित आयु और क्षमताओं को देखें, हर समय का भरपूर उपयोग करें और उन्हीं बातों या विचारों के प्रति जिज्ञासा बनाए रखें जिनका हमारे अपनी जिन्दगी के लिए, घर-परिवार, समाज और देश के लिए कोई उपयोग हो। फालतू के ज्ञान का संग्रहण दिमागी विस्फोट और उन्माद अवस्था को जन्म देता है औेर इसका थोड़ा बहुत असर आजकल के इंसान में देखा जाने लगा है।

जो अपने काम की बातें हैं, अपने काम आ सकती हैं, उन्हीं के बारे में जानने, सोचने और समझने का प्रयास करें और किसी एक विशिष्ट क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को चरमोत्कर्ष तक विकसित करें ताकि संसार के लिए अन्यतम विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में अपनी पहचान कायम कर सकें।

जीवन में आशातीत सफलता पाने की कामना रखने वाले लोगों को आत्मानुशासन और आत्मसंयम की आराधना करने की आवश्यकता है। यह आत्म संयम ही हमारे जीवन को सँवार सकता है।

---000---

- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------