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इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में भीष्म साहनी की जन्म शताब्दी पर आयोजन

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नई दिल्ली। भीष्म साहनी ने इतिहास और समय के भीतर बन रहे इंसान और इस बनने के तनाव - संघर्ष की दिशा को अपनी रचनाओं का विषय बनाया है। उनका साहित्य पढ़ने पर लगता है कि जीवन बहुत बड़ा बहुत विविध है और लेखक बहुत छोटा। भीष्म जी के लेखन की आँख का इतना बड़ा गुण है कि वो हर जगह सृजनशीलता के बिंदु देख लेते हैं। सुप्रसिद्ध आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में मूर्धन्य कथाकार भीष्म साहनी की जन्म शताब्दी पर एक दिवसीय आयोजन में कहा कि भीष्म जी पढ़ाकू व्यक्ति थे जिन्हें लेखन की दुनिया में डिटेल्स का मास्टर कहा जाना चाहिए। उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'मय्यादास की माड़ी' के संदर्भ में डॉ त्रिपाठी ने कहा कि परम्परा से प्राप्त ज्ञान को आधुनिक जादुई यथार्थवाद की शैली में प्रस्तुत कर असल में साहनी ने पंजाब के जीवन का सच्चा और व्यापक चित्र प्रस्तुत किया है। डॉ त्रिपाठी ने बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में उनके सान्निध्य में व्यतीत दिनों के अनेक संस्मरण भी सुनाए। 

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इससे पहले उदघाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कला -संस्कृति केंद्र से जुड़े विद्यार्थियों ने भीष्म साहनी की लोकप्रिय कहानी 'चीफ की दावत' का मंचन किया। जिसमें पंजाबी गीतों के नवाचार के साथ विद्यार्थियों का ताजगीभरा अभिनय प्रभावशाली था। निर्देशन कर रहे परामर्शदाता अनूप त्रिवेदी ने इस कहानी के मंचन से संबंधित अनुभव सुनाए। उदघाटन कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो ए के त्यागी ने कहा कि साहित्य - संस्कृति से लगाव रखकर ही हमारा सही विकास हो सकता है। विश्वविद्यालय के मानविकी और सामाजिक विज्ञान अधिष्ठाता प्रो अनूप बेनीवाल ने अतिथियों का स्वागत किया। संकाय की अंग्रेजी शोध पत्रिका 'इंद्रप्रस्थ' के नए अंक का लोकार्पण कुलपति और अतिथियों ने किया। 

आयोजन में साहित्य संस्कृति की पत्रिका 'उद्भावना ' के संपादक अजय कुमार ने अपनी पत्रिका के प्रकाशन में भीष्म साहनी की दिलचस्पी का उल्लेख करते हुए कहा कि जो लोग समझते हैं कि भीष्म जी का लेखन सामाजिक बदलाव के लिए नहीं हैं उन्हें भीष्म जी के लेखन को ध्यान से समझना चाहिए। अजेय कुमार ने भीष्म जी के संगठनकर्ता व्यक्तित्त्व को रेखांकित करते हुए उन्हें स्वातंत्र्योत्तर भारत में प्रगतिशील आंदोलन का अग्रणी बताया। उन्होंने भीष्म साहनी के प्रसिद्ध उपन्यास 'तमस' के महत्त्व पर भी विचार व्यक्त किए। भीष्म साहनी के लेखन पर हिन्दू कालेज के प्राध्यापक डॉ पल्लव ने कहा कि  'पाली', 'माता विमाता' और 'वांग्चू' जैसी कहानियाँ सभी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ मनुष्यता का जयगान करती हैं। वे जानते थे कि कोई राष्ट्र अपने भीतरी झगड़ों और अविश्वास को खत्म किए बगैर आगे नहीं बढ़ सकता इसीलिए उन्हें साम्प्रदायिकता एक बड़ी समस्या लगती थी और दंगे मनुष्यता के प्रति जघन्य अपराध।

डॉ पल्लव ने भीष्म जी की आत्मकथा 'आज के अतीत' हिन्दी भाषा में लिखी गई बहुत थोड़ी श्रेष्ठ आत्मकथाओं में बताते हुए कहा कि इसकी विशेषता यह है कि यहाँ लेखक स्थितियों और घटनाओं का विवरण देता गया है और मूल्य निर्णय का अधिकार पाठकों को दे देता है। डॉ पल्लव ने कहा कि ऊँचे नैतिक मूल्यों और सदाचारी स्वभाव के कारण बड़े लेखक होने के साथ भीष्म साहनी बड़े मनुष्य भी थे। उनकी जन्म शताब्दी आजादी के आंदोलन से निकले ऐसे सेनानी की शताब्दी है जो जीवन भर अपने देश और समाज के प्रति गहरे प्रेम के कारण सृजनशील रहा। युवा कथाकार राजीव कुमार ने 'चीफ की दावत' को नयी कहानी आंदोलन की श्रेष्ठ उपलब्धि बताया। 

आयोजन में सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट के सौजन्य से भीष्म साहनी की जन्म शताब्दी चित्र और पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाईं गई। आयोजन में बड़ी संस्ख्या में विद्यार्थी, शिक्षक और शोध छात्र उपस्थित थे। 

 

आशुतोष मोहन 

आचार्य अंग्रेजी विभाग 

गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय 

द्वारका , नई दिल्ली

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