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दीपक आचार्य का आलेख - दोष न दें विभीषण को

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आज चिरंजीवियों में जिस महापुरुष का नाम सबसे कम लोग लेते हैं वे हैं विभीषण महाराज। अन्य सभी चिरंजीवियों अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, कृपाचार्य, परशुराम एवं मार्कण्डेय का कहीं न कहीं जिक्र आता ही है।

लेकिन सारे गुणों, सत्य, धर्म और नैतिक आदर्शों के बावजूद केवल राक्षस कुल में जन्म लेने मात्र और लंका त्याग की वजह से विभीषण नाम रखना और उनका नाम लेने से लोग कतराते हैं।

और तो और कुटुम्बी विरोधियों को विभीषण की संज्ञा से नवाजते हुए यहां तक कहा जाता है - घर का भेदी लंका ढाये। 

विभीषण ने रावण को सद्मार्ग पर आने की सीख दी, कुमार्ग से बचने के लिए बार-बार चेताया भी। लंका त्याग कर भगवान राम की शरण प्राप्त की, राक्षसी वातावरण को समाप्त किया और राक्षसराज रावण के उन्मूलन का मार्ग सुझाते हुए लंका को असुरों से मुक्त कराया।

यह सब कुछ विभीषण ने सत्य, धर्म और नीति का अनुगमन करते हुए किया, फिर भी लोग विभीषण का नाम लेने से कतराते हैं और उनका नाम नकारात्मक अर्थ में लेते हुए हीनता भाव दर्शाते हैं।

विभीषण के साथ हमारा यह दुस्साहसपूर्ण अन्याय है जबकि आज के माहौल में हम सब उस युग में जी रहे हैं जहां हम सारे के सारे अपने आपको मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अनुयायी कहते हैं, दिन और रात में जाने कितनी  बार राम-राम करते रहते हैं, राम के नाम की दुहाई और सौगंध देकर जाने कैसे-कैसे काम करवा डालते हैं, अपने आपको रामभक्त कहते हुए राम के नाम पर हम सारे के सारे क्या कुछ नहीं करते आ रहे हैं, फिर भी रामराज्य स्थापित नहीं कर पाए हैं।

यहां तक कि राम के नाम पर एक डग भी आगे नहीं बढ़ा सके हैं। विभीषण ने जिन हालातों में रहकर आत्मग्लानि और दुःखी होकर अपने आपको रावण से अलग कर लंका का साथ छोड़ा, लगभग उसी तरह के हालात आज भी सर्वत्र व्याप्त हैं।

उन दिनों केवल रावण और मेघनाद, कुंभकर्ण एक-एक ही थे। आज अनगिनत रावण छाए हुए हैं और इन रावणों के बदमिजाज और स्वेच्छाचारी मेघनादों एवं शूर्पणखाओं की भी जबर्दस्त धमाल है।

रावणों के दूर-दूर के कुटुम्बी भी कुंभकर्ण बने हुए वो सब कुछ कर रहे हैं जिसे करने में कुंभकर्ण को भी लाज-शरम का अनुभव होता। ये कुंभकर्ण पूरी दुनिया को निगल जाने की क्षमता रखते हैं।

लंका जैसे माहौल में आज कितने विभीषण होंगे, आसानी से गिने जा सकते हैं। और रावण-मेघनाद-कुंभकर्ण और इनकी राक्षसी सेना के यौद्धा-महायौद्धाओं की संख्या को तो कोई गिन ही नहीं सकता।

विभीषण ने धर्म स्थापना के लिए सब कुछ किया और रामराज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। विभीषण महाराज ने ऎसा कोई कर्म नहीं किया जिसकी वजह से उन्हें लंका ढाने वाला घर का भेदी कहा जाए।

आज लंका ढाने वाले सब जगह मौजूद हैं जिन्हें अपने स्वार्थों से ही सरोकार है। अपनी चवन्नियां चलाने के लिए आसुरी कर्म और सर्व स्वीकार्यता की किसी भी हद तक जा सकते हैं।

सदियों से रावण को जलाकर मारते आ रहे हैं लेकिन रावण हैं कि मरते नहीं बल्कि बढ़ते ही चले जाते हैं। आज सभी स्थानों पर बहुत सारे लोग ऎसे हैं जिनके कुकर्मों की वजह से उन्हें स्थानीय लोग रावण की संज्ञा देते हैं और भगवान से यही प्रार्थना करते रहते हैं कि इन व्यभिचारी रावणों का अंत करें, इनके मेघनादों, कुंभकरणों और राक्षसों का खात्मा करें।

देश का शायद ही कोई गाँव-कस्बा या शहर ऎसा होगा जहां कोई न कोई ऎसा होता ही है जिससे परेशान लोग उसे रावण कहते हैं। फिर आजकल तो सभी स्थानों पर बहुत सारे रावण और लंकाई राक्षसों जैसे लोग विद्यमान हैं जिनसे लोग त्रस्त हैं।

इन्हीं के साथ उन लोगों का भी साम्राज्य बढ़ता जा रहा है जो विभीषण ने भी नहीं किया। ये लोग जिन डेरों, गलियारों और बाड़ों में रहते है।, जिन थालियों में खाते हैं, जिन टंकियों का पानी पीते हैं, जिन आश्रयदाताओं के साये में पलते हैं उन्हें ही बरबाद करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते।

इन लोगों को सिर्फ दो-तीन घण्टे की छूट दे दी जाए तो वे अपने कर्मस्थलों और आश्रय स्थलों के सारे साजो सामान से लेकर दीवारों, दरवाजों और खिड़कियों तक को उठा ले जाएं, अपने बाड़ों का कोई चिह्न तक बाद में नहीं बचे।

बहुत सारे लोग हैं जिनकी पूरी की पूरी जिन्दगी बाड़ों और गलियारों के सामान और सुविधाओं पर पल ती हुई खत्म हो जाती है और जिन्दगी भर हराम की कमाई तथा परायी सामग्री और संसाधनों का उपयोग करते रहते हैं। फिर कोई गारंटी नहीं कि ये सामान उन बाड़ों को वापस लौटे ही लौटे, जहां से लाया गया है।

विभीषण को दोष देने वाले तथा घर का भेदी लंका ढाने जैसी बातें करने वाले लोग उन्हें क्या कहेंगे जो अपने आश्रय, बसेरों और रोजी-रोटी देने वाले बाड़ों को ही बरबाद करने में लगे रहते हैं। यहां बाड़ खेत को खाय की बजाय खेत ही बाड़ को खा रहे हैं।

विभीषण को दोष देने से कुछ नहीं होन वाला क्योंकि अब हमारे बीच ऎसे-ऎसे महान लोग हैं जो रावण युग में होते तो अकेले पलायन नहीं करते बल्कि पूरी की पूरी लंका को उजाड़ कर अपने-अपने दड़बों में जा घुसते और अपनी प्रतिष्ठा तथा वैभव का डंका बजाते रहते।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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