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पुस्तक समीक्षा - किनारे की चट्टान

अपने समय की संवेदनशील अभिव्यक्ति : किनारे की चट्टान

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समीक्षक : एम.एम.चन्द्रा

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नई कविता के भविष्य के विषय में सुनकर मन जितना आशंकित है, उससे कहीं ज्यादा यह उम्मीद बंधाता है कि मनुष्यता को बचाने के लिए कविता अपना कार्य हमेशा करती रही है और आगे भी करती रहेगी. शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि मनुष्यता को बचाने की आखिरी उम्मीद कविता है. इसी परम्परा के कवि पवन चौहान का प्रथम काव्य संग्रह ‘किनारे की चट्टान’ उन उम्मीदों को जिन्दा रखने की लिए याद किया जाएगा.

कविता कहाँ जन्म लेती है? कैसे जन्म लेती है? क्यों जन्म लेती है? यहाँ तक कि किसके लिए जन्म लेती है? जैसे प्रश्नों का जवाब देने की कोशिश पवन चौहान की कवितायें करती हैं, जो गाँव, पहाड़, जंगल, मनुष्य, उसके सपने और अपने समयकाल की संवेदनशील अभिव्यक्ति को कलमबद्ध करती है. लेखक चाहे किसी भी दौर में, किसी भी ठिकाने, किसी भी किनारे पर बैठा हो उसकी नजरों से कुछ नहीं बच सकता–

     किनारे पर बैठा कवि देखता है सब

      लहरों का उन्माद... चट्टान की सहनशीलता

      समुद्र से टकराने का हौसला

      उसकी दृढ़ता, आत्मविश्वास

      वह भी होना चाहता है चट्टान

      किनारे वाली चट्टान

कवि का कर्म बस लिखना है. कवि कविता के लिए, कला कला के लिए होनी चाहिए. लेकिन पवन चौहान इस दार्शनिक उक्ति को चुनौती देते हैं. वे अपने अंतर्मन को धिक्कारते हैं, अपने को समय को झकझोरते हैं, अपनी कविताओं से, अपने शब्दों से यहाँ तक कि अपने आप से निरंतर संघर्ष करते हैं और अपनी स्वतंत्र कल्पनाओं को परवाज देते हैं.

      मुझे नहीं पड़े रहना है

      किसी अँधेरे कोने में अनजान सा...

      नहीं जीना है मुझे

      कागज के बंद लिफाफों के अंदर

      घुट-घुट कर

      नहीं जकड़े रहना है मुझे

      निर्बल रूढियों में

      बस ! बहुत हुआ

      अब मुझे स्वतंत्रता चाहिए

      घूँघट से झांकते अनगिनत चेहरों से...

      स्थिर जल में गिरती बूँद की तरह

      अब मैं फैलाव चाहता हूँ

लेखक ने प्रेम प्रवाह की धारा को समयकाल परिस्थितियों में  कभी कम नहीं होने दिया. लेखक किसी एक से प्रेम नहीं करता बल्कि उन सभी से प्रेम करता है जिनसे उसका तनिक भी नाता है. वह जितना प्रेम अपने पिता, बेटी, माँ से करता है, उतना ही प्रेम वह चिम्मू (शहतूत के पेड़) से करता है-

      आज तोड़ रहा हूँ दोनों पेड़ों के पक्के चिम्मू

      और सम्भाल कर रख रहा हूँ उन्हें

      छोटे सी गत्ते की पेटी में...

      भिजवाऊंगा बेटी को रंग-बिरंगे चिम्मू

      ढेर सारा प्यार

लेखक अपनी कविताओं से बड़ा बनता है, और कविता बड़ी बनती है उसकी गहराई और विस्तार से. ‘सेब का पेड़’ कविता जिस पीड़ा को चिन्हित करती है. वह केवल उस अकेली माँ की पीड़ा नहीं वरन उन सभी माँ-बाप की पीड़ा है जिनके बच्चे विदेशों में जाकर बस गए हैं और माँ-बाप उनके इन्तजार में मर जाते हैं -

     बेटे के विदेश में बसने के बाद

      रखती रही वह इसके फल सहेजकर

      हर वर्ष

एक आस लगाये

      वह आएगा इस वर्ष

      जरूर लौटेगा वह

      ममता की छाँव तले

मनुष्य से मनुष्यता तक, संकुचित विचारों से समृद्ध विचारों तक, न्यूनतम से उच्चतम

तक, जमीन से आसमान तक, पहाड़ों से पठार तक की यात्रा में परिपक्वता की आवश्यकता होती है. परिपक्वता चाहे किसी भी क्षेत्र की हो, उसके अनुभव का अपना महत्व है जिसे लेखक सहजता से स्वीकार करता है-

      अभी सीख नहीं पाया मैं

      कच्ची मिट्टी से पक्के बर्तन बनाना...

      खोजना होगा उन अनगिनत रास्तों में से एक ...

      जोड़ने होंगे नये शब्द रचना में...

      तभी दे पाऊंगा मैं रूप मृतिका को

जब कभी भी समाज में तानाशाही जन्म लेती है तो जैसे प्रतिरोध की संस्कृति खत्म सी होने लगती है. तानाशाही का गुणगान होने लगता है. चारों तरफ ख़ामोशी, अंधकार एक खास तरह की चुप्पी देखने को मिलती है. लेकिन इतिहास गवाह है, तानाशाह के साथ स्वतंत्र चिन्तन, नई कल्पनायें, संभावनाएं जन्म लेती हैं. इसीलिए लेखक को यकीन है-

      फूटेगी कल्पना की नन्हीं-सी कोंपल

      और जन्म होगा किसी नये सृजन का

      शायद तभी ढीली हो पायेगी

      शहन्शाह की मजबूत बेड़ियों की जकडन

      और मिल पायेगी

      इस खामोश लम्बे रास्ते में

      बोलती कोई पगडण्डी

जीवन चारों दिशाओं में फैला हुआ है, लेखक को सौन्दर्यबोध देखना आना चाहिए. लेखक पवन चौहान पहाड़ी जीवन के सौन्दर्यबोध को, उसकी जीवंत जिजीविषा को अपनी लेखनी से और भी अधिक जीवंत बना देता है-

     नीलू की माँ खुश है

      इस बार भर गया है जंगल

      काफल के दानों से

हर पेड़ हो गया सुर्ख लाल

इस बार खूब होगी आमदनी

जुटा लेगी वह इस बार

अपनी जरूरत का हर सामान

वैश्वीकरण की बयार ने पहाडी विस्थापन और शोषण को और अधिक बढ़ा दिया है जिसका दर्द चारों दिशाओं में फ़ैल रहा है. कुछ लोग इस विस्थापन से बहुत नाम कमा रहे हैं लेकिन पहाड़ का जीवन वैसा का वैसा ही बना हुआ है. इसीलिए लेखक ने पहाड़ी जीवन की चर्चा कर नाम कमाने वालों को भी धिक्कारा है-

     घर में बैठ

      पहाड़ पर चर्चा करने वालों...

      उस वक्त डरे, सहमे, बेबस

      दर्द से सराबोर

      शिथिल, बौने से हो जाते हैं

      तुम्हारे शब्द

      और दम तोड़ते नजर आते हैं

      उस पहाड़ की तरह

      जो काट लिया जाता है

      कुछ स्वार्थों के लिए

पवन चौहान एक तरफ पहाड़ी जीवन दर्शन का सौंदर्यबोध अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हैं. वहीं आधुनिक शहरी जीवन की बेबसी, कुंठा, हताशा, निराशा और भागमभाग जीवन शैली का भी उतना ही सटीक एवं यथार्थ वर्णन करते हुए शहरी मानसिकता में आ रहे बदलावों को गहरी दृष्टि से देखते हैं -  

     स्वार्थ की कसौटी पर डोलते रिश्ते  

      बिकते सपने, मरते सपने..

      चारों तरफ फैली हुई

      भावनाओं, आकांक्षाओं की इंसानियत की लाशें

      उन्हें रौंदते हुए अनगिनत कदम...

      दफन होती असंख्य चीखें...

      सनसनाती तलवारें, दनदनाती गोलियां

      आ जाओ तुम भी पगडंडी छोड़

      खुली सड़कों पर

      मैं विश्वास दिलाता हूँ

      देर नहीं लगेगी तुम्हें बनने में शहरी

      मेरी तरह

जहाँ जीवन है, वहाँ उम्मीद है. जहाँ उम्मीद है, वहाँ सपने है. जहाँ सपने हैं, वहाँ उन सपनों को पाने की जद्दोजहद है. जहाँ जद्दोजहद है, वहाँ उन सपनों, कल्पनाओं, आकांक्षाओं को जमीन पर लाने की उम्मीद अभी बाकी है.

      सोच को मिलेगी परवाज कभी

      उम्मीद है ...

      कदम नापेंगे नये विस्तृत रास्ते

      शब्द स्वतंत्र होंगे और कानों में गूंजेगी

      एक नई प्यारी मीठी-सी धुन

पवन चौहान की कविताएँ पहाड़ का दर्द ही बयान नहीं करती बल्कि यकीन, उम्मीद और नई सुबह लाने की अपनी आकांक्षाओं को पाठक के सामने लाती है . लेखक व उसकी कविता अपना पक्ष चुनती है, जनता का पक्ष, नई सुबह का पक्ष, उजाले का पक्ष, नई सम्भावनाओं का पक्ष.

किनारे की चट्टान : पवन चौहान | बोधि प्रकाशन | कीमत 70 रुपये |

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