रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

सत्यनारायण पटेल की कहानी - ढम्म..ढम्म..ढम्म..

image

ढम्म..ढम्म..ढम्म ! नगाड़े की तरह बजता डर। देश । प्रदेश । शहर । गली । घर । धरती और आसमान में भी ! टीवी, रेड़ियो, अख़बार, वेबसाइट, ब्लॉग, फेसबुक, व्हॉट्स एप्प, हाइक, और टेलीग्राम तक पर गूँज रहा- ढम्म..ढम्म.. ढम्म..! धूज रहा- थर्र..थर्र..थर्र..! मन का जल। आत्मा का तल । नैतिक बल । नगाड़े के चमड़े की तरह- थर्र..थर्र..थर्र..। हवा में बारुदी गंध ! गर्माहट ! चील का शोर ! गिद्ध की हँसी ! रक्षक के ठहाके ! सेवक के कहकहे ! शायद उन्हें नज़र आ रहा ! माँस का विशाल खेत ! देश ! प्रदेश ! शहर ! घर ! जनता ! मैं…! मैं भी माँस का एक टुकड़ा ! किसी भीमकाय गिद्ध की चोंच भर माँस ! इससे ज़्यादा  क्या  मेरी हैसियत ! ढम्म..ढम्म..ढम्म !

मैं चोंच भर माँस बनने से नकारना चाहता हूँ । मैं नैतिकता के आँगन में साहस रोपना चाहता हूँ । मगर जबान डर के मारे जा दुबकी बत्तीस पहरेदारों के बीच ! आँखें फैलकर, फटकर चिड़ियों के अँडे-सी फूटी । ढीले मचान की तरह हिल रहा मेरा छः फीट का कँकाल ! घर की दीवारें काँपती, खिरती, बिखरने लगी। किवाड़ के पल्ले हिलने लगे। मेरे जबड़ों की तरह ज़ोर-ज़ोर से। फिर हिलना भड़भड़ाने लगा। ज़ोर-ज़ोर से । और ज़ोर से । और ज़ोर से । भड़ाsभड़-भड़ाsभड़ । भsड़-भsड़-भsड़-भsड़-भsड़। किवाड़ के कुन्दे, चिटकनी, साँकल, कब्ज़े, टूटने-छिटकने लगे ! पल्ले फट्ट गये ! मेरे कपड़ों की तरह ! फिर पहले छत पँखा गिरा मेरे सिर पर ! लगा कि तिरंगे का चक्र आ गिरा मेरी चेतना के भाल पर ! चरखे की चरमराहट किसी बेबस बूढ़े की कराह-सी बहती मेरे कानों में !

मेरे ईमान का मकान जोजरा और जरजर होने लगा ! अभी-अभी छत का बड़ा भारी चकता गिरा मुझ पर, कफ़न की तरह ! और फिर लगा एक ज़ोर का झटका ! मैं आ गिरा विशाल कफ़न की तरह फैले आसमान के नीचे ! इस सब के बावजूद मेरी जबान साबुत ! डरी दुबकी ही सही, लेकिन बत्तीस पहरेदारों के बीच सुरक्षित ! कुछ कहने को आतुर ! अपनी बर्बादी का क़िस्सा सुनाने को उत्सुक ! और अभी.. बस अभी मैंने मुँह खोला । जबान पर क़िस्से का पहला शब्द गेंहूँ के ज्वारे की तरह अंकुरित हुआ ही कि घप्प ! हाय रे मेरी क़िस्मत, जैसे घर के डांडे से फूटी ! पाला जिसको मैंने, अपने मुँह का निवाला खिला। हाँ उसी ने घोंपा ! मेरी जबान के बीचोंबीच भाला ! और बुरे वक़्त में जिस पड़ोसी की मदद की थी मैंने, उसी ने भाले पर फहराया केसरिया झण्डा !

मेरी भीतर की साँस भीतर, बाहर की साँस बाहर ! हवा में मेरे घायल शब्दों के ख़ून की गँध फैल गयी ! एक क्षण को लगा कि मुझे उत्तर कोरिया के शासक ‘ किम ’ के आदम खोर कुत्तों ने घेर लिया है ! बस.. मेरी बोटी-बोटी, हड्डी-हड्डी चबाने ही वाले हैं ! लेकिन दूसरे क्षण लगा कि नहीं, किम के कुत्ते नहीं ! ये तो मेरे अपने देशी रक्षक हैं ! सेवक हैं ! भक्त हैं ! देश भक्त हैं ! दोस्त हैं ! भाई हैं ! बंधु हैं ! और फिर मैंने सुनी शोर्य भरी, आसमान कँपाती आवाज़, बल्कि नारा- जsजैss सियाराम ! हर-हर महादेव !

पर चूँकि मैं एक लोकताँत्रिक देश का नागरिक हूँ ! मुझे अपनी बात कहने का हक़ है ! मैं कहने की कोशिश करता हूँ। मैं रक्षकों की रक्षा में जाने से नकारता हूँ ! मैं सेवकों की सेवा लेने से मुकरता हूँ ! मुझे उनकी रक्षा में, सेवा में ख़तरा महसूस होता है ! मगर एक टोली का लीडर कुछ क़दम मेरी तरफ़ बढ़ता है ! अपनी काली टोपी को ठीक करते कहता है- क्षमा करना नागरिक ! हम तुम्हें बख़्श नहीं सकते ! हम बाध्य हैं ! तुम्हारी रक्षा, सेवा करना हमारा धर्म है !   

घायल जबान से टपकते शब्दों के ख़ून से मेरी कमीज लाल हो रही ! मैं ख़ून को पोंछता हूँ ! आँसुओं से अपने हाथ धोता हूँ ! तभी एक कृषकाय बूढ़ा ! जाने कहाँ से घिसटता हुआ मेरे पास आता है ! मुझे समझाता है कि तुम नींद में हो ! सपने में हो ! या मुगालते में हो ! तुम किस लोकतंत्र की बात कर रहे हो ! बात कहने का कौन-सा हक़ है ! तुम्हें मालूम नहीं, अब निजाम बदल गया है ! डीक्सनरी के शब्दों के अर्थ भी मंगलयान की गति को पदाते हुए बदल रहे हैं !  अब सेवक का मतलब राजा ! प्रधान सेवक का मतलब महाराजा ! रक्षक का मतलब भक्षक ! प्रधान रक्षक का मतलब महाभक्षक ! जनता का मतलब कीड़े, मकौड़े, माँस के लोथड़े !

मैं अर्धबेहोशी के किनारे पर पड़ा सुन रहा हूँ ! लेकिन बूढ़े की आवाज़ चीलों के शोर में, गिद्धों की हँसी में दबती जा रही है। मैं आँखों पर पड़े आँसुओं के पर्दे पीछे से धुँधला-धुँधला ही सही, पर देख रहा हूँ ! मेरे इर्द-गिर्द ! तेज़ी से इश्तहारों का जंगल उग रहा है ! हवा में उनकी ख़ुशी की ख़बर बह रही है ! वे गर्व से कुप्पा हैं ! जुलूस निकल रहा है ! अरे नहीं, जुलूस नहीं, अनुशासित पथ संचलन कहो ! देखो.. उनके हाथों में कैसी जँच रही है- तलवार, लट्ठ, भाला और बंदूक ! लोकतंत्र के नथुनों में खाकी चड्ढी, काली टोपी के मैल की ख़ुशबू भर रही है ! नगाड़ा बज रहा अनवरत- ढम्म..ढम्म..ढम्म..! भाssरत माता की जsय ! भाssरत माता की जsय ! भाssरत माता की जsय ! ढम्म..ढम्म..ढम्म..!

मेरी अर्धबेहोशी क़ायम है ! कराह और बढ़ रही है ! और मैं सुन रहा हूँ- भाssरत माँ की…! भाssरत की माँ की ! भाssरत की माँ की ..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च.. ढम्म… ढम्म… ढम्म…! जs जैssय सियाराम…! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! जs जैssय सियाराम..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..!  ढsम्म..ढsम्म.. ढsम्म..!

मैं आख़िरी प्रयास करता हूँ ! यूँ समझ लो कि चेतना का, उर्जा का एक-एक कतरा बटोरता हूँ ! अर्थी की तरह सजती धरती पर चीख़ता हूँ- बचाssव.., बचाssव.. ! मेरा देश ! मेरा प्रदेश ! मेरा शहर ! मेरा गाँव ! गली ! घर ! हवा ! पानी ! जंगल ! ज़मीन ! बीज ! पहाड़ ! खदान ! गीत ! संगीत ! धर्म ! सँस्कृति ! साहित्य,  नैतिकता ! मर्यादा ! इंसानियत ! अरे ख़ुद को बचाव ! बचाssव.., बचाssव.. ! ढम्म… ढम्म… ढम्म…! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! जsजैयss सियाराम..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! ढम्म… ढम्म… ढम्म…! ढsम्म..ढsम्म.. ढsम्म..!

रास्ता रुका है ! स्कूल के बच्चों की वेन रुकी है ! शुद्ध हवा रुकी है ! गर्भवती को अस्पताल ले जाती गाड़ी रुकी है ! बच्चों की किलकारी रुकी है ! देश का भविष्य रुका है ! गुज़रे पथ संचलन तो आगे बढ़े सभी ! पर अभी तो शुरु ही हुआ ! जाने कितने बरस लम्बा होगा ! ढम्म..ढम्म..ढम्म..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! जs जैssय सियाराम..! ढsम्म..ढsम्म.. ढsम्म..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! ढssम्म.. ढssम्म.. ढssम्म ! ढsम्म..ढsम्म.. ढsम्म..।  ढम्म..ढम्म..ढम्म..!
000

image   

सत्यनारायण पटेल
  09826091605

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget