मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

सत्यनारायण पटेल की कहानी - ढम्म..ढम्म..ढम्म..

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ढम्म..ढम्म..ढम्म ! नगाड़े की तरह बजता डर। देश । प्रदेश । शहर । गली । घर । धरती और आसमान में भी ! टीवी, रेड़ियो, अख़बार, वेबसाइट, ब्लॉग, फेसबुक, व्हॉट्स एप्प, हाइक, और टेलीग्राम तक पर गूँज रहा- ढम्म..ढम्म.. ढम्म..! धूज रहा- थर्र..थर्र..थर्र..! मन का जल। आत्मा का तल । नैतिक बल । नगाड़े के चमड़े की तरह- थर्र..थर्र..थर्र..। हवा में बारुदी गंध ! गर्माहट ! चील का शोर ! गिद्ध की हँसी ! रक्षक के ठहाके ! सेवक के कहकहे ! शायद उन्हें नज़र आ रहा ! माँस का विशाल खेत ! देश ! प्रदेश ! शहर ! घर ! जनता ! मैं…! मैं भी माँस का एक टुकड़ा ! किसी भीमकाय गिद्ध की चोंच भर माँस ! इससे ज़्यादा  क्या  मेरी हैसियत ! ढम्म..ढम्म..ढम्म !

मैं चोंच भर माँस बनने से नकारना चाहता हूँ । मैं नैतिकता के आँगन में साहस रोपना चाहता हूँ । मगर जबान डर के मारे जा दुबकी बत्तीस पहरेदारों के बीच ! आँखें फैलकर, फटकर चिड़ियों के अँडे-सी फूटी । ढीले मचान की तरह हिल रहा मेरा छः फीट का कँकाल ! घर की दीवारें काँपती, खिरती, बिखरने लगी। किवाड़ के पल्ले हिलने लगे। मेरे जबड़ों की तरह ज़ोर-ज़ोर से। फिर हिलना भड़भड़ाने लगा। ज़ोर-ज़ोर से । और ज़ोर से । और ज़ोर से । भड़ाsभड़-भड़ाsभड़ । भsड़-भsड़-भsड़-भsड़-भsड़। किवाड़ के कुन्दे, चिटकनी, साँकल, कब्ज़े, टूटने-छिटकने लगे ! पल्ले फट्ट गये ! मेरे कपड़ों की तरह ! फिर पहले छत पँखा गिरा मेरे सिर पर ! लगा कि तिरंगे का चक्र आ गिरा मेरी चेतना के भाल पर ! चरखे की चरमराहट किसी बेबस बूढ़े की कराह-सी बहती मेरे कानों में !

मेरे ईमान का मकान जोजरा और जरजर होने लगा ! अभी-अभी छत का बड़ा भारी चकता गिरा मुझ पर, कफ़न की तरह ! और फिर लगा एक ज़ोर का झटका ! मैं आ गिरा विशाल कफ़न की तरह फैले आसमान के नीचे ! इस सब के बावजूद मेरी जबान साबुत ! डरी दुबकी ही सही, लेकिन बत्तीस पहरेदारों के बीच सुरक्षित ! कुछ कहने को आतुर ! अपनी बर्बादी का क़िस्सा सुनाने को उत्सुक ! और अभी.. बस अभी मैंने मुँह खोला । जबान पर क़िस्से का पहला शब्द गेंहूँ के ज्वारे की तरह अंकुरित हुआ ही कि घप्प ! हाय रे मेरी क़िस्मत, जैसे घर के डांडे से फूटी ! पाला जिसको मैंने, अपने मुँह का निवाला खिला। हाँ उसी ने घोंपा ! मेरी जबान के बीचोंबीच भाला ! और बुरे वक़्त में जिस पड़ोसी की मदद की थी मैंने, उसी ने भाले पर फहराया केसरिया झण्डा !

मेरी भीतर की साँस भीतर, बाहर की साँस बाहर ! हवा में मेरे घायल शब्दों के ख़ून की गँध फैल गयी ! एक क्षण को लगा कि मुझे उत्तर कोरिया के शासक ‘ किम ’ के आदम खोर कुत्तों ने घेर लिया है ! बस.. मेरी बोटी-बोटी, हड्डी-हड्डी चबाने ही वाले हैं ! लेकिन दूसरे क्षण लगा कि नहीं, किम के कुत्ते नहीं ! ये तो मेरे अपने देशी रक्षक हैं ! सेवक हैं ! भक्त हैं ! देश भक्त हैं ! दोस्त हैं ! भाई हैं ! बंधु हैं ! और फिर मैंने सुनी शोर्य भरी, आसमान कँपाती आवाज़, बल्कि नारा- जsजैss सियाराम ! हर-हर महादेव !

पर चूँकि मैं एक लोकताँत्रिक देश का नागरिक हूँ ! मुझे अपनी बात कहने का हक़ है ! मैं कहने की कोशिश करता हूँ। मैं रक्षकों की रक्षा में जाने से नकारता हूँ ! मैं सेवकों की सेवा लेने से मुकरता हूँ ! मुझे उनकी रक्षा में, सेवा में ख़तरा महसूस होता है ! मगर एक टोली का लीडर कुछ क़दम मेरी तरफ़ बढ़ता है ! अपनी काली टोपी को ठीक करते कहता है- क्षमा करना नागरिक ! हम तुम्हें बख़्श नहीं सकते ! हम बाध्य हैं ! तुम्हारी रक्षा, सेवा करना हमारा धर्म है !   

घायल जबान से टपकते शब्दों के ख़ून से मेरी कमीज लाल हो रही ! मैं ख़ून को पोंछता हूँ ! आँसुओं से अपने हाथ धोता हूँ ! तभी एक कृषकाय बूढ़ा ! जाने कहाँ से घिसटता हुआ मेरे पास आता है ! मुझे समझाता है कि तुम नींद में हो ! सपने में हो ! या मुगालते में हो ! तुम किस लोकतंत्र की बात कर रहे हो ! बात कहने का कौन-सा हक़ है ! तुम्हें मालूम नहीं, अब निजाम बदल गया है ! डीक्सनरी के शब्दों के अर्थ भी मंगलयान की गति को पदाते हुए बदल रहे हैं !  अब सेवक का मतलब राजा ! प्रधान सेवक का मतलब महाराजा ! रक्षक का मतलब भक्षक ! प्रधान रक्षक का मतलब महाभक्षक ! जनता का मतलब कीड़े, मकौड़े, माँस के लोथड़े !

मैं अर्धबेहोशी के किनारे पर पड़ा सुन रहा हूँ ! लेकिन बूढ़े की आवाज़ चीलों के शोर में, गिद्धों की हँसी में दबती जा रही है। मैं आँखों पर पड़े आँसुओं के पर्दे पीछे से धुँधला-धुँधला ही सही, पर देख रहा हूँ ! मेरे इर्द-गिर्द ! तेज़ी से इश्तहारों का जंगल उग रहा है ! हवा में उनकी ख़ुशी की ख़बर बह रही है ! वे गर्व से कुप्पा हैं ! जुलूस निकल रहा है ! अरे नहीं, जुलूस नहीं, अनुशासित पथ संचलन कहो ! देखो.. उनके हाथों में कैसी जँच रही है- तलवार, लट्ठ, भाला और बंदूक ! लोकतंत्र के नथुनों में खाकी चड्ढी, काली टोपी के मैल की ख़ुशबू भर रही है ! नगाड़ा बज रहा अनवरत- ढम्म..ढम्म..ढम्म..! भाssरत माता की जsय ! भाssरत माता की जsय ! भाssरत माता की जsय ! ढम्म..ढम्म..ढम्म..!

मेरी अर्धबेहोशी क़ायम है ! कराह और बढ़ रही है ! और मैं सुन रहा हूँ- भाssरत माँ की…! भाssरत की माँ की ! भाssरत की माँ की ..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च.. ढम्म… ढम्म… ढम्म…! जs जैssय सियाराम…! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! जs जैssय सियाराम..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..!  ढsम्म..ढsम्म.. ढsम्म..!

मैं आख़िरी प्रयास करता हूँ ! यूँ समझ लो कि चेतना का, उर्जा का एक-एक कतरा बटोरता हूँ ! अर्थी की तरह सजती धरती पर चीख़ता हूँ- बचाssव.., बचाssव.. ! मेरा देश ! मेरा प्रदेश ! मेरा शहर ! मेरा गाँव ! गली ! घर ! हवा ! पानी ! जंगल ! ज़मीन ! बीज ! पहाड़ ! खदान ! गीत ! संगीत ! धर्म ! सँस्कृति ! साहित्य,  नैतिकता ! मर्यादा ! इंसानियत ! अरे ख़ुद को बचाव ! बचाssव.., बचाssव.. ! ढम्म… ढम्म… ढम्म…! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! जsजैयss सियाराम..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! ढम्म… ढम्म… ढम्म…! ढsम्म..ढsम्म.. ढsम्म..!

रास्ता रुका है ! स्कूल के बच्चों की वेन रुकी है ! शुद्ध हवा रुकी है ! गर्भवती को अस्पताल ले जाती गाड़ी रुकी है ! बच्चों की किलकारी रुकी है ! देश का भविष्य रुका है ! गुज़रे पथ संचलन तो आगे बढ़े सभी ! पर अभी तो शुरु ही हुआ ! जाने कितने बरस लम्बा होगा ! ढम्म..ढम्म..ढम्म..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! जs जैssय सियाराम..! ढsम्म..ढsम्म.. ढsम्म..! ख़च्च..ख़च्च..ख़च्च..! ढssम्म.. ढssम्म.. ढssम्म ! ढsम्म..ढsम्म.. ढsम्म..।  ढम्म..ढम्म..ढम्म..!
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सत्यनारायण पटेल
  09826091605

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