सोमवार, 21 दिसंबर 2015

प्रदीप कुमार साह की कहानी - प्रारब्ध

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कौआ अपना आहार (चुग्गा) भरपेट लेकर (चुगकर) सन्तुष्ट हो गया. वह कृतज्ञता और प्रसन्नतावश उन्मुक्त कंठ से ईश्वर का आह्लादित स्वर में आभार और धन्यवाद व्यक्त करने लगा. शायद अपने बोली में ईश्वर से वह प्रार्थना भी कर रहा था जो ईश-स्तुति कबीरदास जी करते थे कि- "साईं इतना दीजिये, जामें (जिसमें) कुटुंब समाय. मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय."

वास्तव में जब प्राणी-मात्र अपने सहज जीवन यापन योग्य वांछित वस्तु अथवा उपलब्धि प्राप्त कर लेते हैं और अधिकाधिक उपलब्धि पाने की कामना उनके मन को व्यग्र नहीं कर सकते, तब उनका मन स्वत: सन्तुष्टि अनुभव करता है और उनका मन प्रसन्न तथा प्रफुल्लित हो जाते हैं. जब किसी सज्जन के मन प्रसन्न हो तब ईश आभार और स्तुति करने से उसे कौन रोक सकता है.

यद्यपि प्राणी-मात्र के गुण से मनुष्य, चूहे, चींटियाँ और मधुमक्खियों के गुण सर्वथा अपवाद हैं. उनके मन कदापि सन्तुष्टि अनुभव नहीं करते, जिसका कारण है लोभादिक विकारों से उनकी बुद्धि और चेतना जड़ हो जाना. वह अपने समुदाय में अज्ञानतावश अधिकाधिक उपलब्धि पाने के प्रयास को स्वाभाविक उपलब्धियों की आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत करते हैं, इस तरह उनके 'भटकाऊ' आदर्श और लक्ष्य स्थापित हो जाते हैं.

इससे उनकी इच्छाएँ-अपेक्षाएँ सहज जीवन जीने हेतु उपयुक्त स्वाभाविक आवश्यकताओं से काफी अधिक और असहज हो जाते हैं जो श्रुतिनुसार प्रतिक्षण प्रत्येक आवश्यकता-पूर्ति के साथ वट-वृक्ष के शाखाओं एवं जटाओं की भाँति उत्तरोत्तर बढ़ते जाते हैं. फिर आवश्यकता से अधिकाधिक संग्रहित उपलब्धियों के संरक्षण में अपना मूल्यवान जीवन ऊर्जा खर्च कर देते हैं.

वह अधिकाधिक संग्रहित उपलब्धियाँ उन्हें अधिक सुख तो शायद ही देते हों किन्तु उन्हें मानसिक दवाब और क्लेश निश्चय ही प्राप्त होते हैं. प्रत्येक शरीरधारी के जीवन,आयु, सफलता और धर्म-कर्म उसके स्वास्थ्य पर आश्रित हैं. सम्पूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य उसके शारीरिक और मानसिक अवस्था अर्थात स्वास्थ्य के समन्वय पर आश्रित हैं. अच्छे स्वास्थ्य हेतु अच्छा आहार आवश्यक हैं और मन का आहार है-प्रसन्नता-सुख प्राप्ति के अहसास. श्रुतिनुसार 'सन्तोषम् परम सुखम्' अथवा 'जब आवत संतोष धन, सब धन धूल समान' इत्यादि-इत्यादि हैं...किन्तु संतोष पाना कोई हौआ थोड़े न है.

खैर, कौआ एक आँख बंदकर ईश-स्तुति में बिल्कुल तन्मय था. इतना कि मित्र तोता के आगमन की उसे भनक तक न हुई. आज तोते के प्राण के लाले पड़ गये थे, उसने भाग कर अपने प्राण रक्षा किये. प्राण रक्षा पश्चात् आशा-भरोसा पाने और आपबीती बताकर मन हल्का करने के उद्देश्य से अपने मित्र के पास आया, किंतु यहाँ कौआ खुद ही विचारों में कहीं खोया मस्त-व्यस्त था. बिल्कुल निरंतर चिंतित जीवन जीते किंतु मुख से सदैव गौरव गान उच्चारने में व्यस्त आधुनिक सभ्य और मतलबी मनुष्य समुदाय के भाँति.

अधिक श्रम से तोते की सांसें उखड़ रही थी, धड़कन तेज हो गई थी और भूख से व्याकुलता अलग ही थी. मित्र से आशा-भरोसा पाना भी धूमिल मालूम हो रहा था. कौऐ के व्यवहार से वह मन ही मन दु:खी और नाराज हो रहा था. किंतु उसने संयम बनाये रखा, कौआ से कुछ कहा नहीं. बस अपने साँसों पर नियंत्रण पाने की चेष्टा करने लगा. तभी कौऐ की नजर अपने मित्र पर पड़ा.

कौआ चौंक कर तोता से पूछा," मित्र तुम कब आये?"

कौआ की बात सुनकर तोता खीझ गया किंतु चुप ही रहा. वास्तव में समझदार प्राणी ना तो अधिक बोलते हैं और ना जल्दी से संयम का त्याग ही करते हैं. कौआ भी कम समझदार थोड़े न होता है. वह भी चुप होकर तोते को देखकर वस्तु-स्थिति का अंदाज करने लगा. वस्तु-स्थिति का अंदाज कर कौआ तोते से बोला,"क्या बात है मित्र कि तुम्हें इतनी घबराहट और व्याकुलता हो रही है? तुम बेहद भूखे भी मालूम होते हो. भूखे रहकर अपनी क्या हालत बना रखे हैं ?"

कौऐ की प्रेम भरी बातें सुनकर तोते के दिल का कड़वाहट मिट गया. वह बोला," कुछ मत पूछो मित्र. मालूम होता है कि आज से अपना प्रारब्ध ही उलटे लिख गये."

"मित्र यह तुम मनुष्य के भाँति प्रारब्ध-प्रारब्ध का कैसा रट लगा रहे हो? प्रारब्ध तो उस हेतु होता है जब कर्म के अनुरूप अधिक उपलब्धि अथवा कर्मफल की आशा की जाती है अथवा संतोष का अभाव होता है. सच-सच कह दो की तुम्हारी क्या समस्या है." कौआ अपनी बातोँ पर जोर देकर बोला.

कौआ का थोड़ा-सा प्रेम पाकर तोते के व्याकुलता के बाँध टूट गये. तोता कहने लगा,"फिर क्या कहूँ मित्र, फल मेरा प्रिय आहार है किंतु आज मनुष्य के लोभ का दुष्परिणाम हमें भी भुगतने होते हैं. पूरे साल के इंतजार के बाद यह आम्रफल का मौसम आता है. किंतु ये मनुष्य उसे पकने से पहले ही सारे के सारे तोड़ लेते हैं."

थोड़ा ठहर कर तोता दुःखी मन से पुनः बताने लगा,"काफी दिनों के तलाश पर आज सुबह एक पके हुए लाल-लाल आम्र फल नजर आया. मैं मजे से उसे खाता की कुछ भूखे लँगूर वहाँ आ गए और उसे लपक लिये. मैं उससे वापस फल लपकना चाहा तो वे मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ गये और मुझे भागकर निज प्राण रक्षा करने पड़े. इसे प्रारब्ध न समझूं तो क्या कहूँ?"

तोते की आपबीती सुनकर कौआ को दुःख हुआ. वह मित्र ही क्या जो मित्र के दुःख से दुःखी न हो? फिर घनिष्ट मित्र के संबंध में यह भी कहे गये हैं कि वे पहाड़ से निज दुःख धूल और मित्र के राई से दुःख भी बड़े समझते हैं. किंतु वह संयत स्वर में तोता से बोला,"मित्र, संसार में प्राणी-मात्र को अवसर और विपत्ति प्राप्त होते हैं. विपत्ति प्राणी को सतर्क,सहनशील और कर्मठ बनाते हैं तथा सुख का मूल हैं.अतः सुख प्राप्ति और आगे की रणनीति हेतु बीती हुई बातें अपनी भूल सुधार तक ही सीमित रखनी चाहिये. मैंने एक बगीचे में कुछ पके फल देखें हैं. वहाँ चलकर भोजन कर तृप्त हो लो."

तोता खीझ कर बोला,"मित्र मैंने कह दिया न की आज के दिन मेरा प्रारब्ध मेरे साथ नहीं हैं. फिर मलूकदास जी की बातें भूल गये कि अजगर करे न चाकरी, पंक्षी करे न काम. दास मलूका कह गये, सब का दाता राम."

"मित्र, सब के दाता राम हैं इसे तो मैं बिल्कुल भी नहीं नकारता. किंतु रामसत्ता स्वीकार करें और रामाज्ञा कि "कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करिहि सो तस फल चाखा" न मानें यह कितना उचित है? फिर मलूकदास मनुष्य थे और मनुष्य के असहज वृत्ति के मद्देनजर भाष्य किये.उन्हें पक्षियों के जीवन के संबंध में क्या पता? बिना काम किये (तलाशे)तो पंक्षी भी आहार प्राप्त नहीं कर सकते. कहते हैं न कि जिन ढूंढा तिन्ह पाइए, गहरे पानी पैठ."

थोड़ा ठहर कर कौआ पुनः बोला,"यदि तुम्हारा जी अबभी नहीं मानता तो विचार कर जरा यह तो बताओ कि यदि प्रारब्ध है तो उसके निर्माण करने वाले ईश्वर-सत्ता क्या नहीं हैं? यदि ईश्वर और उनकी सत्ता हैं तो क्या अब वह दयालु नहीं रह गये? फिर उनका आज्ञा पालन क्यों नहीं? फिर धर्म-कर्म,पश्चाताप अथवा सही समय का इंतजार भी प्राणयुक्त शरीर ही कर सकता है."

तोता कौआ की बात मानकर उसके साथ निर्दिष्ट स्थान गया. वहाँ पके हुए स्वादिष्ट फल थे. स्वादिष्ट फल खाकर तोता तृप्त हुआ और परम् दयालु ईश्वर के धन्यवाद किया.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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