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प्राची - दिसंबर 2015 - सीमेंट की पुतली / कहानी / रशीदा हिजाब

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रशीदा हिजाब

(जन्मः 21 अक्टूबर 1942, शिकारपुर में.)

सिंध यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त करके जामशारो से पीएच.डी और बाद में त्नजहमते न्दपअमतेपजलए ।उमतपबं से पोस्ट डॉक्टरेट हासिल की. 1976 में गवर्नमेंट कॉलेज हैदराबाद में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुईं और फिर 1991 से गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज हैदराबाद में प्रधानाचार्य रहीं. सन् 1999 में डायरेक्टर कॉलेज हैदराबाद, 1999 में इंटरमीडिएट और सेकेंडरी एजूकेशन हैदराबाद की चेयरपर्सन नियुक्त हुईं. सन् 1973 में न्यूयार्क अमेरिका की ओर से डमतपज ब्मतजपपिबंजम और कई सम्मानों से सम्मानित. सन् 1986 में ‘ईवान शफाकत’ की ओर से एकेडेमिक अवार्ड मिला.

सीमेंट की पुतली

रशीदा हिजाब

सुबह की सीटी बज रही थी. वह बच्चे को वहीं फेंककर खिड़की के पास जा खड़ी हुई. यह उसकी दिनचर्या थी. सुबह, शाम, रात, जिस वक्त भी सीटी बजती थी, वह जाकर खिड़की पर खड़ी होती. इस बात पर रात भी उसने सेठ साहिब के कितने तमाचे खाए थे, पर वह आज फिर खिड़की पर खड़ी थी. ऐसा करने पर वह मजबूर थी.

सुबह की सीटी काम पर चढ़ने की सीटी थी और मजदूर जल्दी-जल्दी, लंबे डग लेकर चलते, फैक्टरी के विशाल इमारत में दाखिल हो रहे थे, पर मजदूर औरतें तनावमुक्त कदमों से आहिस्ते-आहिस्ते उनके पीछे हंसती, हिलती-डुलती आ रही थी. फैक्ट्री की औरतों को सेठ साहब ने काफी सुविधाएं दे रखी थी. वह काफी अरसा विदेश में रहकर आया था, औरतों के हकों से अच्छी तरह वाकिफ था. जितनी नफरत और उपेक्षा उसे मर्द मजदूरों से होती थी, उतनी ही औरतों से मुहब्बत और नर्मदिली बरतने की बुरी लत थी.

चंचल शोख मजदूर शोर के समूह के आखिर में जेबू थी. जेबू का उदास चेहरा देखकर चुप न रह सकी, उसकी आंखें भर आईं.

छुट्टी की सीटी बज रही थी. वह फैक्टरी के बड़े गेट पर खड़ी जेबू का इंतजार कर रही थी. जेबू को पीछे से आते देख वह गुस्से में कहने लगी-

‘अल्ला, जेबी कितना इंतजार करवाया है. कितनी देर से खड़ी हूं. बाकी तो सब चले गए.’

‘अरे शम्मी, क्या बताऊं, उस दुर्जन काने के पास गई थी.’

‘रे-रे! मैनेजर साहब की शान में इतनी गुस्ताखी. कह दूं मैनेजर को?’

‘अरे छोड़ो, चल तो अब चलें. सूरज ढल रहा है. बच्चे रोते होंगे.’

सूर्य अस्त हो गया था. धीरे-धीरे अंधेरा बढ़ रहा था. वे दोनों तेज कदमों से गांव की तरफ जा रहे थे.

‘जेबू’, तुम मैनेजर के पास क्यों गई थीं? उसने अचानक सवाल किया.

जेबू ने उसके चेहरे की ओर जतन से देखा, पर अंधेरे के कारण कुछ समझ न पाई.

‘हम मैनेजर के पास क्यों जाते हैं?’ जेबू ने लापरवाही के साथ कहा. उसने कुछ भी नहीं कहा.

कुछ देर बाद जेबू ने कहा, ‘सफू को कितने दिन से बुखार है. उतर ही नहीं रहा. कल डॉक्टर ने कहा, मुद्दे का बुखार है. इस बुखार की दवाइयां भी तो बहुत महंगी हैं’

‘ये निकम्में बुखार भी मैनेजर और सेठ की तरह अंधे हैं. भला इन मलिन झोपड़ियों में उनके लिए क्या रखा है. ऐश ही करना है तो उन बंगलों में जाएं. यहां तो यही जवार की रोटी और लस्सी मिलती है. अपने आप मुंह फीका करके भाग जाएगा.’

‘तुम पागल हो शम्मी, इसलिए ऐसा कह रही हो. मुझे न तो दिन में आराम है, न रात को करार. जाने क्या होगा मेरे यतीम बच्चे का?’

जेबो ने मैली चुनरी के कोने से अपनी आंखें पोछीं. ‘अल्हा खुश रहेगा. हां बता, मैनेजर ने पैसे दिए तुझे?’

‘ये दो रुपये हाथ में रखे. कितना गिड़गिड़ाई, पर अल्लाह ने तो उनकी दिल सीमेंट के पत्थर की बनाई है. जिस पर छींट भी पड़े तो भी असर नहीं होता.’ उदास स्वर में जेबू ने जवाब दिया.

‘जेबी, ये मेरे पास दस रुपये हैं, तुम रख दो.’ दुपट्टे के कोने में बंधी गांठ से मैला नोट निकालकर जेबू को देते हुए कहा.

जेबू ने कुछ कहना चाहा तो उसने कहा-‘खबरदार जेबी, कुछ न कहना. शफी तुम्हारा बेटा है तो मेरा भी भांजा है. शफू से कहना कि मैं रात को आकर उसे ‘लाल बादशाह’ वाली बात बताऊंगी. अब जाती हूं, बाबा रास्ता देखते होंगे.’

वे दोनों अंधेरे में अलग-अलग रास्तों पर मुड़ गईं.

सीमेंट की फैक्टरी में काम करते उसे पांचवां साल पूरा हो रहा था. वह जब पहले फैक्ट्ररी में आई थी, तब तेरह-चौदह सालों की दुबली-पतली बालिका थी. पर इन पांच सालों में वह काफी विकसित हुई थी. पांच साल पहले वाली दुबली-पतली शम्मी में जमीन-आसमान का फर्क था. बहुत सुन्दर तो न थी, पर फिर भी एक बार उसे देखने के बाद दूसरी बार उसे देखने की ख्वाहिश कोई भी दबा नहीं पाता था. शैतान भी बहुत ज्यादा थी. काम वाली टोलियों में एक वही थी, जिसकी आंखें चमकती थीं और अधर मुस्कराते थे. उन दुख-भरे इंसानों की टोली में एक वही तो थी, जो जिंदगी की लहर बनकर उन्हें जिंदा रखती.

फैक्टरी उसे अपना घर लगती. कभी-कभी जब उसे काम न होता तो वह यहां-वहां फिरती रहती थी. पत्थर से लेकर सीमेंट बनने तक वह हर बात से परिचित थी. एक दिन जब वह सूची के मुताबिक सीमेंट की छोटी-छोटी बोरियां गिन रही थी तो एक बस में से लड़के-लड़कियों का समूह वहां उतरा. ऐनक पहने दो मर्द उन्हें वहां की एक-एक चीज दिखा रहे थे और अंग्रेजी में बतिया रहे थे.

वह पल-भर के लिए उन परियों के लश्कर को देखकर हैरत में डूब गई थी. तब ही होश-हवास में आई, जब एक लड़के ने उसके पास खड़े दूसरे लड़के से कहा-

‘अरे यार! इस सीमेंट की फैक्टरी में कंवल के फूल कहां से आए?’

‘कंवल के नहीं, सीमेंट के कहो! माथा पटकोगी तो माथा फट जाएगा, पर इन फूलों पर कोई भी असर नहीं होगा.’ दूसरे ने टेड़ी नजर से उसकी ओर देखते हुए कहा.

वह हैरान थी. शहर में काम करते उसे पांच साल हुए थे. इस अरसे में वह काफी होशियार हो गई थी और गांव वालों की तरह ‘टेंशन’ ‘टैक्स’ ‘डॉक्टर’ वगैरह ऐसे शब्दों को यूं तो न कहती थी, पर बावजूद इसके इतनी होशियार नहीं हुई थी कि इस तरह के वाक्य समझ सके.

लड़के आगे बढ़ गए. उनके पास ही ‘गिलां’ गुनियां रख रही थी. वह जाते हुए लड़कियों और लड़कों को देखते हुए कहने लगी, ‘चाची गिलां ये कौन थे?’

‘अरे तुझे मालूम नहीं है? सच में, जबसे तू यहां आई है, ये सिर्फ एक बार आए हैं. वो भी तब, जब उस दिन तू फैक्टरी में नहीं आई थी.’

‘ठीक है, पर हैं कौन ?’ उसने गिलां की बातों में रुचि न लेते हुए पूछा.

‘हां, बताती हूं. ये कॉलेज के लड़के और लड़कियां हैं और दो लोग जो इनके आगे थे, वे उनके मास्टर हैं. यहां यह देखने आए हैं कि सीमेंट कैसे बनता है?’

‘यह देखकर क्या करेंगे? किताबों में सीमेंट का क्या काम? वाह चाची, मुझे पागल बना रही हो. तीन सिंधी किताब तो मैंने भी मास्टर याकूब से पढ़ी हैं.’

‘तो फिर मेरी मां, सच कहती हूं. मुझे भी इन्हीं लड़कों ने ही बताया था. ये लो. लौट रहे हैं. तुम खुद पूछ लो.’

‘ऊं हूं, मुझे क्या गरज पड़ी है.’ उसे उन लड़कों की बातें ध्यान में आ गईं.

वे सब आकर उसके पास खड़े हुए. एक मास्टर किसी लड़की से पूछ रहा था कि पत्थर से सीमेंट बनाने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है?

वह दिल ही दिल में खिल उठी. इतनी फैशनयाफ्ता लड़की को यह भी पता नहीं. उसे तो हर बात की खबर है-

कहां से पत्थर बड़े-बड़े नालों के जरिये ऊपर चढ़ता है. कैसे पककर अलग-अलग खानों की मशीनों से गुजरकर, सीमेंट के गोल टुकड़ों का आकार अख्तियार करता है. उन्हें कैसे फिर चूरा करके सीमेंट की शक्ल दी जाती है. वह दिल ही दिल में खुद को उन लड़कियों से ज्यादा जानकार पा रही थी.

बस में चढ़ते समय एक-दो लड़कियों ने कपड़ों और बालों को रूमाल से साफ करते हुए कहा-‘तौबा! भाड़ में जाए ऐसी रसायनविज्ञान की जानकारी, हमारे तो कपड़ों और बालों का सत्यानाश हो गया है.’

उसने सुना, कोई और लड़की उनसे कह रही थी, ‘तुम्हें थोड़ा-सा सीमेंट लगा है तो चिल्ला रही हो. वहां देखो!’ उसने ऊपर की ओर देखा. सभी लड़कियां उन्हें देख रही थीं.

‘कमाल है, उनके तो चेहरे नजर नहीं आ रहे हैं. सिर्फ सीमेंट ही सीमेंट है.’

‘जैसे सीमेंट की पुतलियां.’ किसी लड़की की आवाज थी. एक तेज आवाज के साथ बस गेट के बाहर निकल गई. उसके कानों में उस अनजान लड़की के शब्द गूंज रहे थे-‘जैसे सीमेंट की पुतलियां.’

उसने यहां-वहां काम करती औरतों को देखा और आखिर में उसकी नजरें अपने आप पर जम गईं.

हाथ, बाहें, कपड़े सब सीमेंट से लदे हुए. उसने धीरे-

धीरे अपने हाथ, चेहरे और गर्दन पर फेरे तो वहां भी सीमेंट की कचकच महसूस हुई. उसने सोचा-‘सच में हम सीमेंट की पुतलियां हैं. कहीं मन पर भी यह गर्द न चढ़ जाए.’

उसने नाखूनों से बांह का सीमेंट खरोंचकर देखा तो भूरे रंग के नीचे काफी साफ चमड़ी दिखाई दी. अपने हिस्से के बोेरे रखकर वह बाहर निकल आई. उसका काम खत्म हो गया था. आज वह नल पर खड़ी, देर तक अपना मुंह धोने लगी. हर बार वह बांहें धोते हुए देख रही थी.

जेबू कितनी देर से उसकी ये हरकतें देख रही थी. जब छठीं बार उसने अपनी बांहें मलते हुए धोईं तो वह आगे बढ़ गई. हाथ से उसकी ठुड्डी को पकड़कर, वह उसकी आंखों में घूरने लगी.

‘क्या कर रही हो, शम्मी?’

‘कुछ नहीं, सीमेंट साफ कर रही हूं.’

‘क्यों?’

‘क्यों? अरे! बदन को सीमेंट का पूरा लेप लग गया है. साफ नहीं करूं क्या?’

‘बिना शक साफ करो. मैं तुम्हें मना नहीं कर रही. पर इतना जरूर कहूंगी कि यह सीमेंट का लेप सभी पर चढ़ा हुआ है. किसी के तन पर तो किसी के मन पर.’ शम्मी खामोशी से स्टोर रूम की ओर चली गई. वह कुछ यूं ही गुमसुम बैठी जेबू को देखती रही. फिर न जाने उसे क्या सूझा, उसने सीमेंट के ढेर से मुट्ठी भरकर अपने साफ धुले हाथों और मुंह पर मल दी. क्षण-भर में उसकी सफेद चमड़ी फिर से सुरमई हो गई. सीमेंट के जर्रे उसकी आंखों में चुभने लगे, उसकी आंखों से पानी बह रहा था.

दूसरे दिन जब वह बोरियों के काम में व्यस्त थी, तब जेबू ने उसके सीमेंट से लेपे मुंह को देखा और हंसते हुए कहने ेलगी-‘अरे शम्मी, सच में ये तो बताओ, कल तुम्हें कौन-सा भूत चढ़ा था?’

‘कल? यूं ही बस ऐसे ही.’

‘फिर भी?

ट्रन! ट्रन! उसने साइकिल की घंटी सुनी, और बाहर भागी. साइकिल पर वही सफेद पोशाक वाला नौजवान जा रहा था. साइकिल ने दो-तीन घंटियां बजाई और सर...सर...करती उसकी बगल से निकल गई. साइकिल सवार ने उसे एक बार भी नहीं देखा, पर वह खुद वहां तब तक खड़ी रही, जब तक साइकिल उसकी नजरों से ओझल न हो गई.

‘च...च...! बहुत खराब है. एक बार भी नहीं देखा.’ जेबू उसके चेहरे की ओर देखते हुए हंसने लगी.

उसने कुछ नहीं कहा, ‘जेबू से कुछ छुपाना व्यर्थ था. यह सच है कि वह मुकर्रर बात पर उस अनजान साइकिल की घंटी सुनकर किसी जादुई खिंचाव के तहत बाहर खिंची आती थी और तब तक खड़ी होती थी, जब तक साइकिल और उसका दिलफरेब सवार दोनों गायब नहीं हो जाते. उसने खामोश पुजारिन को आंख उठाकर देखा भी नहीं था. अपने ही ख्यालों में गुमसुम चला जाता था. कितनी तमन्ना थी उसे, काश! सिर्फ एक बार ही सही, वह उसे आंख उठाकर देखे. रोज वह इस आस में बाहर आती और नाकामी हमेशा उसका स्वागत करती थी.

‘शम्मी!’ जेबू ने रस्सी पर कपड़े फैलाते, शम्मी को आवाज दी. फैक्टरी बंद थी. शम्मी, जेबू के बीमार बेटे को गोद में थामें हुए थी और जेबू कपड़े धो रही थी.

‘हूं!’ उसने बच्चे को प्यार करते हुए कहा-‘क्या है?’

‘मैं कह रही थी कि सईद है तो बहुत अच्छा आदमी पर,’

‘सईद कौन?’ उसने हैरानी से पूछा.

‘अरे वही तुम्हारा साइकिल वाला, और कौन है. उसका नाम सईद है. कितना अच्छा नाम है.’

वह धीरे-धीरे होंठों में मंद ध्वनि से बड़बड़़ाने लगी-

‘स...इ...अ...द! सईद...स...’

‘अच्छा यह नाटक बाद में करना. पहले मेरी बात सुन,’

‘हां सुनाओ!’ उसने खुशी से चहकते हुए कहा.

फैक्टरी में काम करने से पहले, मैं और शेफू के पिता इंजीनियर साहब के बंगले में काम करते थे. वहीं पर सईद भी रहता था.’

‘क्यों भला?’

‘सईद इंजीनियर साहब के ऑफिस में काम करता था. बिचारा गरीब मानस था. घर भी नहीं था. इसीलिए इंजीनियर साहब उसे अपने पास तक एक कोठी दे दी, पर सुन शम्मी. सईद कितना भी गरीब क्यों न हो, एक सीमेंट ढोने वाली पुजारन की माला कबूल कभी नहीं करेगा.’

वह चुप हो गई. पहली बार उसे अहसास हुआ कि उसकी हैसियत क्या थी. उस दिन के बाद उसने साइकिल की घंटी सुनते हुए भी बाहर निकलना बंद कर दिया.

पर...उसके पांव उसके बस में न थे. दिल पर अख्त्यार किसे था? उसका दिल आज भी चाहता था कि वह दौड़कर जाए, अपने अनजान महबूब की राह में रुककर रास्ते के तिनके और पत्थर चुन ले, ताकि उसे साइकिल आगे बढ़ाने में कोई तकलीफ न हो. पर हमेशा उसे जेबू के शब्द याद आते थे. ‘सईद कितना भी गरीब क्यों न हो, एक सीमेंट ढोने वाली पुजारन की माला कबूल कभी नहीं करेगा.’

‘मैं कहती हूं मैं नहीं दूंगी...कभी भी नहीं दूंगी.’

‘वाह! यह भी कोई बात है. हम गरीब आदमी कहां से लाएं इतने ढेर रुपये, कि खुद भी खाएं, आपको भी दें, नहीं दूंगी मैं.’

‘अगर नहीं दोगी तो आज से अपनी नौकरी पर से हाथ उठा लो-जाओ, जाकर अजीज से अपने बाकी पैसे लो और गांव की राह पकड़ो.’

‘पर मैनेजर साहब, आप समझते क्यों नहीं?’

जेबू ने हांठों को दांतों से कुतरते कहा-‘मैं बेवा हूं, मेरा बेटा बीमार है और मेरे पास सिर्फ दो रुपये हैं. अगर वो भी आपको दे दूंगी तो मेरे बेटे की दवा कहां से आएगी? क्या सेठ साहब के बेटे की पार्टी मेरे बेटे कर जान से भी कीमती है?’

‘ये सब मैं नहीं जानता! तुम्हें पैसे देने होंगे, तुम्हें पैसे देने होंगे, दूसरी सूरत में वो रास्ता पड़ा है.’

जेबू कुछ वक्त मैनेजर को खामोश नजरों से घूरती रही. फिर उसने दो रुपये पल्लू से खोलकर मैनेजर के फैले हुए हाथ पर रखे. उस हाथ पर, जिसकी लालच कभी खत्म होने वाली न थी, जिसे हर वक्त कड़क नोटों और ठन-ठन करते सिक्कों के छुहाव की जरूरत रहती थी.

‘जेबू,’ उसने जेबू की बांह पकड़ते कहा.

‘हूं’

‘पैसे दिए?’

‘हां!’

‘कौन है यह जमाल?’

‘सेठ साहब का बड़ा बेटा.’

‘फिर हम गरीबों को पेट काटकर...’

‘चुप, चुप शम्मी! यह दावत तो फैक्टरी के मजदूरों की तरफ से उनके सत्कार में दे रहे हैं और जमाल सेठ ने मेहरबानी फरमाकर इस दावत को कबूल किया है.’

आहिस्ते-आहिस्ते कदम उठाते हुए जेबू चली गई. उसकी आंखों में नफरत और घृणा उभरने लगी.

सभी के पांव-तले जमीन खिसक गई, जब जमाल सेठ की तरफ से ऐलान हुआ कि मजदूरों की मजूरी तीस प्रतिशत घटाई गई है.

उस खबर को घोषित करने वाला मैनेजर था, जिसकी तनख्वाह में सौ रुपया महीना इजाफा किया गया था. मैनेजर का चेहरा रोज से कुछ ज्यादा रोशन था और वह खुश नजर आ रहा था, हालांकि इस खबर का ऐलान बकायदा जमाल सेठ की तरफ से खुद किया गया था. वह फिर भी बड़ी नजाकत के साथ एक-एक को यह खुशखबरी सुना रहा था. सुनने वालों की आखों के आगे

अंधेरा और कानों में सू...सू...होने लगी थी और वह तारीक चेहरों को एक जीत भरी मुस्कराहट के साथ देखता रहा. एक के बाद एक को यह खबर देते हुए कभी नफरत भरी आवाज में कहता. ‘हां हां बेटे, बड़े सेठ के साथ जोर आजमा लिया, जमाल सेठ के साथ टक्कर लेकर देखो तो जानूं.’

औरतों की हालत सबके विपरीत थी. कितनी सीमेंट की बोरियां गिर पड़ीं, कहां रखनी है किसी को सुध ही न रही. ये तो ऊपर वालों की मेहरबानी थी, जिनके होश गुम हो गए थे और उनकी ओर से ज्यादा बोरियां आनी बंद हो गई, वर्ना वे सब शायद सीमेंट की बोरियों के तले दब जाती.

जेबू के तसव्वुर में सिर्फ उसका बेटा दूध के लिए रोता नजर आया. साढ़े तीन आने का एक पाव दूध वह कैसे लेगी. जब उसे सिर्फ एक रुपया मिलेगा. सात आने सेर आटा, भाजी, उसके सिवाय...उसका शफू, उसका बीमार बेटा! उसे अपनी हर सोच में एक ही तसव्वुर रहा, जिसमें उसे शफू की नंगी लाश दिखाई दे रही थी, जैसे वह अपनी अधखुली आंखें फाड़कर उससे कह रहा हो-‘अम्मा मुझे कफन भी नहीं दोगी. अम्मा-अम्मा मैं बीमार हूं. मुझे दवा लाकर दो...मुझे भूख लगी है मुझे कफन दो मैं नंगा हूं अम्मा.’

और वह जो इतने समय से चुप बैठी थी. शफू की खामोशी सदा सुनकर, आगे की ओर सरकती आई और जोर से अपना माथा पथरीली दीवार से टकराया. उसके बाद उसे होश न रहा.

फैक्टरी में दो दिन हड़ताल रही. मगर जमाल सेठ को रत्ती मात्र भी परवाह न थी. उसके पास एक फैक्ट्ररी नहीं थी और भी दो-चार मिलें थीं. उसकी लारियां और मोटरें सारे मुल्क में चलती थीं. उसे चालीस-पचास हजार रुपये के नुकसान की कहां परवाह थी?

पर उनके लिए, जिनका गुजर रोज की कमाई पर था, एक-एक पल बरस की तरह गुजर रहा था. पहले दिन तो अगले दिन के बचे-खुचे पर गुजरान किया गया. मगर सुबह से सभी की नजर शहर वाले रास्ते पर जमीं थी. हालांकि हर एक-दूसरे को यही दिखाने की कोशिश में व्यस्त था कि उसे कोई परवाह नहीं है. कोई आए न आए, पर परछाइयां ढलीं, अंधेरा छाने लगा. मैनेजर तो क्या, सेठ का चपरासी भी वह खुशखबरी लेकर नहीं आया कि उनकी, जिनकी नौकरियां खारिज की गई हैं, वे सुबह आकर अपने काम पर लग जाएं. घर में रखे हुए दाने भी खत्म हो गए थे. उन्हें अपना जोश और गैरत बच्चों की भूखी आंखों में दफन करनी पड़ी.

और दूसरे दिन जब उसके पिता, सेठ से समस्या के समाधान के बारे में बातचीत करने गया तो सेठ की बात सुनकर वह दंग रह गया. सेठ ने उससे कहा कि वह न फकत उनकी नौकरी कायम रखेगा, पर मुनासिब इजाफा भी घोषित करेगा...उसके लिए उसे शम्मी उसके हवाले करनी पड़ेगी. सीमेंट ढोने वाली एक मामूली मजदूरन, जिसकी नस-नस में उसकी फैक्टरी का सीमेंट भरा हुआ था!

शम्मी का बाप सेठ की बात सुनकर हंस पड़़ा. यह सेठ भी कितना मूर्ख है. भला इतनी मामूली बात के लिए इतना हंगामा करने की क्या जरूरत थी? अगर वो ऐसे भी उससे बेटी मांगता तो क्या वह इन्कार करता? आखिर सेठ में क्या बुराई है? शक्ल-सूरत तो मर्दों की देखी नहीं जाती. वैसे भी जमाल सेठ तो और कई सेठों से बेहतर था. उसका पेट आम सेठों की तरह निकला हुआ नहीं था और खोपड़ी पर एक-दो दर्जन बाल भी थे. जिन्हें वह बहुत ही सावधानी से उम्दा किस्म का तेल लगाकर संवारता था, वर्ना अक्सर वे नादान सीधे खड़े हो जाते थे. रही उम्र्र की बात, तो यह किस बला का नाम है? उम्र दर हकीकत व्यक्तित्व का नाम है और व्यक्तित्व के लिहाज से जमाल सेठ बिल्कुल जवान था. उसका बाप हंसता हुआ सेठ के कमरे से निकला. जब उसने यह खबर सुनी, तो उसके जेहन में अनगिनत साइकिल की घंटियां बजीं और फिर गहरी खामोशी छा गई.

सेठ की पत्नी थी. पर इस बात की खबर सिवाय सेठ की बड़ी बेगम और चंद अजीज रिश्तेदारों और नौकरों के सिवाय किसी को भी नहीं थी.

उसकी हैसियत उस घर में उस पुराने खिलौने जैसी थी, जो अनगिनत पुरानी चीजों के नीचे दब गया हो. किसी का दिल करे तो लेकर खेले और फिर कोने में ढकेल दे.

कुछ अरसा वह अपने तन्हा खामोश कमरे में साइकिल की घंटी की आवाज सुनती रही. पर फिर हर तरफ गहरी उदासी छा गई. सेठ के सितम और लापरवाह बर्ताव के कारण वह लगभग बिस्तरे में दाखिल हो गई थी. वह नर्म बिस्तर में होते हुए भी अपने हर अंग-अंग में पीड़ा महसूस करती. वह सोचती-काश सेठ उसे अपनी पत्नी समझता.’ वह पत्नी की मौजूदगी में उस सीमेंट की पुतली को अपना आत्मीय मित्र बनाए? वह तो सिर्फ पत्नी थी और बस!

बड़े सेठ ने अपनी सारी जायदाद सेठ जमाल और उसके छोटे भाई को बांटकर दे दी. सीमेंट फैक्टरी जमाल के छोटे भाई को मिली थी और वह रात में अपने भाई से अपने अधिकार लेने आया था. रात जब वह बड़ी बेगम के सर में मालिश करके लौट रही थी तो जमाल सेठ के कमरे से बातों की आवाज सुनकर वह खड़ी हो गई. कमाल कह रहा था-‘दादा, आप यह फैक्टरी ले लो. मुझे शहर वाली कपड़े की मिल दे दो. मैं इस छोटे से गांव में रह नहीं पाऊंगा. यहां कोई लुत्फ ही नहीं है जीने में. ताजुब होता है, आप जाने कैसे रह रहे हैं?’

‘अरे तुम यहां कुछ वक्त रहकर तो देखो. फिर निकलने को दिल नहीं स्वीकारेगा.’ यह जमाल जेठ की आवाज थी.

‘यह भला कैसे’

‘बस, देखते रहना. यहां चीनी की गुड़िया नहीं है. पर सीमेंट की अनेक पुतलियां हैं.’

‘हूं’!

‘कल तुम्हारे लिए भी कोई ढूंढनी पड़ेगी.’

उससे अधिक वह सुन नहीं पाई. उसे चक्कर आया और वह जमीन पर गिर पड़ी.

जब उसे होश आया तो वह अपने कमरे में थी. कामवाली लड़की ने दूध का गिलास उसे देते हुए पूछा-‘साहब कहते हैं कि हम सुबह शहर जा रहे हैं, तुम चाहो तो अपने बाप के पास चली जाना.’

उसने नफरत की निगाह से कामवाली की ओर देखते हुए कहाः ‘सेठ से कहना कि चली जाऊंगी.’

पर फिर जाने क्या सोचकर बेगम साहिबा ने कहलवा भेजा कि वह भी अपना सामान बटोर ले. उसे भी शहर चलना है. उसने न जाने क्या फैसला किया था. पर अचानक उसकी नजर अपनी बेटी पर पड़ी. सेठ ने मार-पीट के सिवा यह जालिम छोकरी भी उसे बख्शी थी. जालिम इसलिए कि वह अपनी सुंदर सूरत की बदौलत उस पर जुल्म कर रही थी. अगर वह यहां रही तो उसकी बेटी भी सीमेंट की पुतली बन जाएगी. और उसे यह किसी भी सूरत में गवारा न था.

आज फैक्टरी में उसका आखिरी दिन था. सात सालों का साथ आज छूट रहा था. शादी के बाद उसकी किसी के साथ दिलचस्पी न रही थी. न बाप के साथ, न गांव से, न और मजदूर औरतों से.कभी-कभी जेबू उसे याद आती थी, पर उसने जेबू से भी कभी मिलने की कोशिश नहीं की थी.

शाम का वक्त जब फैक्टरी की चिमनियों से निकलते

धुएं से घिर जाता था, तो वह एक अनजान तरफ से आती साइकिल की घंटी पर जाग जाती और उसका जर्द चेहरा थोड़ा-सा गुलाबी हो जाता था.

‘धो...ओ...’

दुपहर हो गई थी और मजदूरों को खाना खाने की छुट्टी मिली थी. उसने घुटन-भरी सांस ली. हंसते, खामोश, चिंतन करते सभी मजदूर फैक्टरी से निकल रहे थे और उनके पीछे शोख, तेज-तर्रार मजदूर औरतें टोलियां बनाकर निकल रही थीं. जब वे उसके कमरे की खिड़की के पास से गुजरने लगीं तो वह झुककर गौर से एक-एक का चेहरा देखने लगी. शायद कमाल के लिए कोई नई सीमेंट की पुतली दिख जाए!

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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