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प्राची - नवंबर 2015 - हिंदी रंगमंच के निर्माण में राजस्थानी नाटककारों का योगदान / आलेख / सोहन वैष्णव

नाटक साहित्य की मुकम्मल विधा है. नाटक में श्रव्य और दृश्य दोनों प्रकार के काव्यों का समावेश होने तथा इसके चाक्षु प्रभाव के कारण इसमें जीवन की सर्वाधिक सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करने की संभावनाएं रहती हैं. यदि नाटक में यथार्थ जीवन के स्पंदन नहीं हों तो उसे नाटक कहना बेमानी होगी. नाटक की उपयोगिता सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है, क्योंकि साहित्य की यह विधि विभिन्न रुचियों के लोगों को आनंद प्रदान करती है. भरतमुनि ने इसी कारण नाटक के दो प्रमुख उद्देश्य माने थे- हितोपदेश और मनोविनोद. इस दृष्टि से नाटक एक प्रभावशाली प्रचार और विचार माध्यम है. यह तो निर्विवाद है कि नाटक आलेख नहीं; अपितु अभिव्यक्ति-संप्रेषण और संवाद का एक सशक्त, सामूहिक और मंच सापेक्ष कला माध्यम है. समकालीन हिंदी नाटक और रंगमच की अनेक उपलब्धियां है. ‘‘नाटक परिवेश को एक अहम् नाटकीय भूमिका प्रदान कराता है तथा प्रान्तीय और भाषायी संकीर्ण सीमाओं को तोड़कर एक समग्र भारतीय रंगमंच के स्वरूप का निर्माण करता है.’’1

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो नयी चेतना आयी उससे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बदलाव आए. इस बदलाव का प्रभाव रचनाकारों पर भी पड़ा, तब ही नाटक और रंगमंच का उन्मेश हुआ. नाटक का रंगमंच के साथ पूर्ण जुड़ाव अनिवार्य हुआ, तभी नाटक पाठ्य-वस्तु की सीमा से बाहर आ पाए. अंग्रेजी विद्वान प्रो. वॉटर केर का मानना है कि ‘‘जनता की भीड़ को प्रभावित करने वाले लोकप्रिय नाटकों की परम्परा से ही महान् रंगमंच का विकास होता है. यूनानी नाटककारों के साथ, मोलियर और शेक्सपियर के साथ यही बात रही. आजकल के नाटक कभी-कभी बुद्धिजीवियों को तो प्रभावित करते हैं, लेकिन आम जनता को कदाचित् ही प्रभावित कर पाते हैं.’’2

बदलते समय के साथ नाटकों के स्वरूप में पर्याप्त बदलाव आया हैं. इस परिवर्तन को हम सन् 1959 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना से देख सकते हैं. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का प्रमुख लक्ष्य भारत की शास्त्रीय और लोक-नाट्य-परंपरा के

अध्ययन पर बल देते हुए आधुनिक नाट्य तक पहुंचना था, ताकि एक समग्र रंगदृष्टि का विकास हो सके. इब्राहिम अल्काजी के इस विद्यालय के निदेशक बनने के साथ ही हिन्दी रंगमंच की दिशा निर्धारित हो गई. ‘‘साठोतरी हिन्दी नाट्य लेखन में प्रयोगशीलता’’ पुस्तक की भूमिका में वरिष्ठ आलोचक डॉ. नवल किशोर का कथन है कि ‘‘नाटक का प्रस्तुतीकरण नाटक से अभिन्न होते हुए भी एक स्वायत्त कला है. आज के नाटककार और मंच-कलाकार सहकर्मी होकर ही नाटक को प्रदर्शनीय बनाते हैं. फिर भी यह विवाद निरन्तर बना हुआ है कि नाटक की रचना में अंतर्वस्तु प्रमुख है अथवा मंचीय रूप शिल्प या दोनों का समन्वय.’’

हिन्दी में सन् 1960 के बाद लगभग बीस वर्षों की

अवधि में नाट्य-लेखन एवं रंगमंच की विशेष सक्रियता रही. इसी काल में अनेक वैचारिक एवं प्रयोगशील प्रवृत्तिया सामने आईं. इसी दौर में राजस्थान में भी कुछ ऐसे क्षमतावान नाटककारों का उदय हुआ, जिन्होंने इस उत्कर्ष में उल्लेखनीय योगदान दिया. ऐसे नाटककारों मे मणिमधुकर, हमीदुल्ला, नंदकिशोर आचार्य, भानुभारती एवं स्वयं प्रकाश प्रमुख हैं. ये सभी साठोत्तरी नाटककार हैं और इनकी गणना इस दौर के प्रथम पंक्ति के नाटककारों में होती है. इनके नाटकों का मंचन राजस्थान या केवल हिन्दी भाषा तक सीमित नहीं रहा, इनका अन्तर्भारतीय भाषा-मंचों पर भी प्रदर्शन हुआ है.

नाटकों की आरंभिक स्थिति के बारे में प्रख्यात नाट्य समीक्षक श्री नेमिचंद जैन का मानना है कि ‘‘नाटक को हिन्दी में सबसे कमजोर और पिछड़ी हुई विधा माना जाता रहा है और यह किसी हद तक सच भी है. 1947 से पहले आधुनिक नाटक प्रायः सौ बरस के दौर में भी भारतेंदु हरिश्चन्द्र और जयशंकर प्रसाद को छोड़कर कोई भी ऐसा नाटककार नहीं हुआ जिनके कृतित्व को गंभीरतापूर्वक उल्लेखनीय माना जा सके.’’3

हिन्दी नाट्य साहित्य की विकास यात्रा में राजस्थान के साहित्य का अपना विशेष महत्त्व है. संस्कृत कॉलेज के छात्रों व आचार्यों द्वारा 1931 में मानप्रकाश रंगमंच पर भवभूति के नाटक ‘‘उत्तर रामचरितम्’’ के मंचन में चन्द्रकेतु की भूमिका में वेद विज्ञानी पं. मोतीलाल शास्त्री ने अभिनय किया. राजस्थान के नाट्य साहित्य को एक ठोस धरातल प्रदान करने वाले नाटककार शंभूदयाल सक्सेना को इस सदी के पूर्वार्द्ध का प्रतिनिधि नाटककार कहा जा सकता है. पौराणिक प्रसंगों को आधार बनाकर नाटक रचने वालों में शंभूदयाल सक्सेना का नाम अग्रणी रहा. आपके छोटे-छोटे अभिनय नाटकों में ‘‘मातृप्रेम’’, ‘स्वयंवर सभा’’, ‘‘सीताहरण’’, ‘‘पंपापथ’’ आदि प्रमुख हैं. सक्सेनाजी के नाटकों की पृष्ठभूमि में पारसी रंगमंच, लोकनाट्य परम्परा, रम्मत, ख्याल, तमाशा, रामलीला, रासलीला, नौटंकी आदि भी रहे हैं.

राजस्थान के पुराने नाटककारों में शंभूदयाल सक्सेनाजी के अलावा देवीलाल सामर, औंकारनाथ दिनकर, विटठ्लदास कोठारी, सरनाम सिंह शर्मा ‘‘अरुण’’, यादवेंद्र शर्मा ‘‘चन्द्र’’, पं. जनार्दनराय नागर इत्यादि नाटकों की रचना करते रहे हैं.

स्वातन्ष्योत्तर नाटक-साहित्य का आकलन करने पर यह सामने आता है कि नई प्रतिभाओं में डॉ. रामगोपाल शर्मा ‘‘दिनेश’’, रामचरण महेन्द्र, मनोहर प्रभाकर, दयाकृष्ण विजय, भगवानदत्त गोस्वामी, हरिराम आचार्य, गोविंद लाल माथुर आदि ने अपनी नाट्य रचनाओं से देश की परिवर्तित आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों से जनता को अवगत कराया. मोतीलाल मेनारिया ने अपनी पुस्तक ‘‘राजस्थानी भाषा और साहित्य’’ में लिखा है कि उदयपुर में श्री देवीलाल सामर ने नाटकों को स्टेज करने के लिए राजस्थान के रंगमंच का पुनरुत्थान किया. राजस्थान में नाटक की परम्परा को उत्तरोत्तर विकसित करने के लिए नाटकीय संस्था ‘‘लोक कला मण्डल’’ की स्थापना की.

राजस्थान के साठोत्तरी नाटककारों में मणि मधुकर का प्रमुख स्थान है. इनके प्रमुख नाटकों में रसगन्धर्व, बुलबुल सराय, दुलारी बाई, खेला पालपुर, इकतारे की आंख प्रमुख है. आज की विसंगतियों को जनभाषा में उजागर करने और कथ्य एवं शिल्प की विशिष्टता के कारण मणिमधुकर का नाम पर्याप्त चर्चित रहा है. मधुकर जी मूलतः राजनीतिक सामाजिक चेतना के नाटककार हैं. मधुकर जी के विसंगतियों के तत्वों से पूर्ण एवं प्रभावित नाटक ‘दुलारीबाई’ से एक संवाद उद्धृत है-

कल्लू कहता है- ‘‘राजा का काम है रियाया पर जुल्म ढाना, भूखों को सताना, मजदूरों पर कोड़े बरसाना. अगर कोई मुंह से चूं निकालने की हिम्मत करे तो काट ली जाय उसकी जुबान...’’4

प्रयोगधर्मी नाटककार हमीदुल्ला राजस्थान के वरिष्ठ नाटककार होने के साथ रंगमंच के सिद्धहस्त कलाकार भी हैं. हमीदुल्ला की एक विशेषता है कि वे अपने नाटक को पहले लिखकर नहीं, वरन् खेलकर पूर्ण करते हैं. इनके प्रमुख नाटकों में- दरिंदे, हरबार, समय संदर्भ, ख्याल भारमली, जैमती प्रमुख हैं. हमीदुल्ला के नाटकों में यह भी पाया गया है कि मिथकीय चरित्र आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत हुए हैं. इनके नाटकों में ऐसे मिथकीय पात्रों का सृजन भी हुआ है जो अपने अस्तित्व की तलाश में हर चुनौती स्वीकार करते हैं. हमीदुल्ला ने रंगमंचीय नाट्य लेखन से लेकर लोक नाट्य और एब्सर्ड नाटक तक अपने लेखन क्षेत्र को फैलाया है. हमीदुल्ला जी ने ‘दरिंदे’ नाटक में बताया है कि हमारे आज के कर्णधार स्वयं दरिंदे और शूद्र हैं. सर्वत्र आतंकपूर्ण वातावरण है. इस नाटक में ‘‘आज के सभ्य और विकसित कहलाने वाले मानव पर सशक्त व्यंग्य है.’’5

राजस्थान के हिंदी नाट्य लेखन में नन्दकिशोर आचार्य का भी महत्वपूर्ण स्थान है. रंगमंच की दृष्टि से इनके सभी नाटक सफल रहे हैं. अज्ञेय द्वारा संपादित चौथे सप्तक के कवि, लेखक तथा नाटककार नंदकिशोर आचार्य के ‘नाटक नये मनोविश्लेषण के साथ प्रसंग के नये आयाम उजागर करते हैं. स्वाधीनता के बाद पनपी अव्यवस्था के विरोध का चित्रण भी आपके नाटकों में मिलता है. इनके प्रमुख नाटकों में देहान्तर, गुलाम बादशाह, पागलघर, जूते, हस्तिनापुर, किमिदम यक्षम प्रमुख हैं. इनके नाटकों में भाषा, कथ्य, शिल्प सभी में कसावट और कलात्मकता उन्हें रंगमंचीय बनाती है.

उदयपुर के नाटककार भानुभारती प्रख्यात रंगकर्मी हैं.भानुभारती हिन्दी के उन गिन-चुने नाट्य निर्देशकों में से हैं; जिन्होंने बहुत कम समय में अपने काम और दृष्टि की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर कायम करने में सफलता पाई है. भारती जी ने चीनी कथाकार लू शुन की कहानी ‘आ-क्यू की सच्ची कहानी’ का प्रदर्शन आलेख ‘चन्द्रमा सिंह उर्फ चमकू’ के रूप में तैयार किया और किजिमा हाजिमे की जापानी कहानी पर आधारित ‘कथा कही एक जले पेड़ ने’ नामक नाट्य रूपान्तरण किया. भानुजी ने आदिवासी रंगमण्डल के साथ ‘पशुगायत्री’ और ‘अमरबीज’ नाट्यलेख विकसित किये जो बहुत प्रसिद्ध और चर्चित रहे. इन आलेखों में नाटककार ने बतौर निर्देशक भीलों के आनुष्ठानिक नाट्य शैली ‘गवरी’ के तत्वों का प्रदर्शन किया है.

स्वयं प्रकाश नाटककार से ज्यादा कहानीकार के रूप में प्रसिद्ध हैं, किन्तु स्वयं प्रकाश जी का प्रयोगात्मक नाटक ‘‘फीजिक्स’’ बहुत चर्चित रहा है. स्वयं प्रकाश रंग-विधान के नये प्रयोगों से मनुष्य के आंतरिक संकट की प्रस्तुति करते हैं. ‘फीजिक्स’ में आज के युग की सच्चाई को प्रतीकात्मक पात्रों के माध्यम से समझाने का सार्थक प्रयास किया गया है.

राजस्थान के एक अन्य महत्वपूर्ण नाटककार हैं- स्व. रिजवान जहीर उस्मान. जिनका नाम इस चर्चा में न लेना बेमानी होगी. सहज एवं सरल स्वभाव के तथा दिखने में उस्मान साहब किसी मस्तमौला तथा फक्कड़ बाबा से कम नहीं थे. जीवन के अंतिम वर्षों में उस्मान साहब अपनी शारीरिक बीमारी के चलते काफी परेशान रहे, परन्तु उस वक्त भी आपने अपने रंगकर्म को सक्रिय रखा.

‘अनहदनाद’ नाटक आपने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में लिखा. उस्मान साहब ने ‘अपराध मनोविज्ञान को लेकर’ अपने नाटकों का लेखन किया. इनके प्रमुख नाटकों में ‘‘लोमड़ियां’’, ‘‘सुन लड़की दबे पांव आते हैं सभी मौसम’’, ‘‘नमस्कार आज शुक्रवार है’’, ‘‘कल्पना पिशाच’’, ‘‘सराय यतीमों का डेरा’’, ‘‘गला काटने वाले का गला’’ तथा ‘‘आखेट कथा’’ महत्त्वपूर्ण तथा मंचोपयोगी नाटक हैं. उस्मान साहब के नाटकों का वातावरण हर बार भयावह होने के कारण अपराधों व उनके उपकरणों और यहा तक कि प्रतीकों की पुनरावृत्ति के कारण एक ही श्रृंखला के नाटक कहे जा सकते हैं.’’6

अभिनेयता उस्मान जी के नाटकों के केन्द्र में हैं. राजस्थान साहित्य अकादमी ने भी इनके अनेक नाटकों को समय-समय पर प्रकाशित किया है. इनके निधन के कुछ समय पश्चात् अकादमी ने इनके एक महत्त्वपूर्ण रंगमंचीय नाटक ‘‘आखेट कथा’’ को प्रकाशित किया है. इस नाटक के कुछ संवाद यहां प्रस्तुत करना उस्मान साहब का सम्मान करना होगा -

लड़की- बहुत जहरीला सांप था. देखो, इसकी लाश नीली पड़ गई है.

वह- सांप की वजह से तुम्हारे दिमाग से भेड़िये का डर निकल गया. यह बात अच्छी हुई, क्यों?

लड़की- अब रात हो रही है. मुझे घर जाना है.

वह- बाहर भेड़िया है और बारिश होने वाली है.

लड़की- मुझे जाना पड़ेगा.

वह- तुम्हें भेड़िया खा जाएगा.

लड़की- अ...आप...मेरे साथ चलो. मुझे आबादी तक छोड़ दो.

वह- मैं आबादी की तरफ नहीं जा सकता, मैं हत्यारा हूं. पुलिस मेरी तलाश में है.

लड़की- तुम्हारा... आप ... आपका नशा खत्म हो गया. तब तो यहां से बाहर निकलोगे ना?

वह - चुपचाप बैठ जाओ, मुझे सोचने दो.

(खामोशी! अन्तराल! अचानक दरवाजा भड़ाक से भारी आवाज करता हुआ खुल जाता है. लड़की चीखती है. सफेद सांप दरवाजे के बीचों-बीच कुण्डली मारे बैठा है. अंधेरा)7

डॉ. राजानन्द भटनागर प्रयोगधर्मी नाटककार हैं. इनके प्रमुख नाटकों में ‘‘गणगौर’’, ‘‘गुफा’’, ‘‘बोल मेरी मछली कितना पानी’, ‘‘बाद के बाद’’ तथा ‘‘सदियों से सदियों तक’’, ‘‘जोगमाया’’ तथा ‘‘अश्वत्थामा’’ मुख्य हैं. इनके नाटकों में लोकरंग कथ्य को बल प्रदान करते हैं तो यथार्थपरक मनोवैज्ञानिक दृष्टि प्रतीकों के माध्यम से नाटक को सशक्त रूप से रंगमंचीय बनाती है.

प्रसिद्ध रंगकर्मी सरताज नारायण माथुर ने भी राजस्थान में मंचीय नाटकों की कमी को पूरा करने का सार्थक प्रयास किया. अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष में नारी की स्थिति को परखने और उसे समाज में समता दिलाने का प्रयास माथुर जी ने ‘‘उजली दस्तक’’ में किया है. ‘‘अभिशप्त’’ नाटक महाभारत में कर्ण की कथा-प्रसंग पर आधारित है तथा ‘‘मानव मन मंथन’’ नाटक समसामयिक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, विश्व युद्ध, आन्तरिक जन-जीवन में दखल और आतंकवाद को रेखांकित करता है.

यादवेन्द्र शर्मा ‘‘चन्द्र’’ मुख्य रूप से उपन्यासकार और कहानीकार के रूप में जाने जाते हैं, परन्तु इनका ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लिखा गया नाटक ‘‘जय चित्तौड़’’ है, जिसमें मंच की दृष्टि से प्रयोगशीलता को देखा जा सकता है. इस नाटक में समय परिवर्तन को दर्शाने के लिए नाटककार ने रंग दीपक की युक्ति का अच्छा प्रयोग किया है.

राजस्थान में रंगमंच की स्थिति ज्यादा खराब नहीं है, लेकिन अनेक कोशिशों के बावजूद भी उन्नत नहीं हो पाई है. रंगमंच को लेकर भानु भारती का कहना है- ‘‘हिन्दी रंगमंच में राजस्थान का योगदान महत्वपूर्ण रहा है. कोटा, जयपुर, अलवर, उदयपुर, बीकानेर आदि शहरों में रंगमंचीय गतिविधियां काफी रही हैं. श्री गणपत लाल डांगी, श्री गंगाप्रसाद माथुर और श्री नंदलाल शर्मा ने रेडियो नाटक के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है. रेडियो ने भी राजस्थान में रंगमंच को सक्रिय करने में भूमिका निभाई है’’8

वर्तमान में राजस्थान में रंगमंच के क्षेत्र में किसी हद तक सुधार आया है. उदाहरणार्थ ‘‘राजस्थान विश्वविद्यालय’’ में ‘‘नाट्य विभाग’’ खुल गया, ‘‘संगीत नाटक अकादमी’’ (जोधपुर), ‘‘जवाहर कला केन्द्र’’ (जयपुर), ‘‘पश्चिमी सांस्कृतिक केन्द्र’’ (उदयपुर) अस्तित्व में आए.

वर्तमान में राजस्थान में कई युवा नाट्य लेखक एवं नाट्य निर्देशक भी हैं, जिन्होंने अपने रंगकर्म से एक नई पहचान बनाई है. युवा नाटककारों में संदीप लैलै (जयपुर), गणेश शंकर (बीकानेर), लईक हुसैन (उदयपुर), हुसैनी बोहरा (उदयपुर) आदि प्रमुख हैं. लईक हुसैन, पश्चिमी सांस्कृतिक केन्द्र से जुड़े हुए हैं तथा नाट्य लेखन एवं नाट्य निर्देशन में सक्रिय हैं. हुसैनी बोहरा का ‘‘जिम्मेदारी’’ नाम से एक नाट्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है. इस संग्रह के सभी नाटक समसामयिक विसंगतियों को लेकर लिखे गए हैं. इसके साथ ही इन्होंने अनेक बाल-नाटकों का लेखन भी किया है.

राजस्थान में पाश्चात्य प्रभाव से हटकर नाटककारों ने लोकधर्मी नाट्य परम्परा के उपयोग पर बल दिया. इस संदर्भ में श्री देवीलाल सामर का मानना है कि ‘‘लोकनाट्य किसी के द्वारा रचा भी नहीं जाता. न उसके संवाद या गीत ही कोई लिखता है और न उसका कोई पूर्वाभ्यास ही होता है. फिर भी रंगमंच पर वह नाटक अपनी प्रबल प्रस्तुतीकरण, वेशभूषा का निर्धारण, गान, नाच के प्रकार, ढोलक, नक्काड़े की ताल किसी लम्बी परंपरा से ही सबको याद रहती है.’’9 राजस्थान के रंगकर्मियों ने मौलिक नाट्य कृतियों के अलावा अनूदित कृतियां भी यहां के रंगमंच को दी हैं. राजस्थान में आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक उपकरणों से समृद्ध और संश्लिष्ट रंगमंच का विकास अब होने लगा है.

संदर्भः-

1. किशोर ब्रजराज- हिंदी नाटक और रंगमंच

2. पाणेरी डॉ. मलय- साठोत्तरी हिंदी नाट्य लेखन में प्रयोगशीलता

3. नेमिचंद जैन- रंगदर्शन, अक्षय प्रकाशन, दिल्ली

4. दुलारीबाई, मणि मधुकर, पृष्ठ 64

5. स्वातंष्योतर हिंदी नाटक- डॉ. सुदर्शन मजीठिया, पृष्ठ 104

6. पाणेरी डॉ. मलय- साठोत्तरी हिंदी नाट्य लेखन में प्रयोगशीलता

7. मधुमती, प्रधान सम्पादक- वेदव्यास, अप्रेल 2013, पृष्ठ 96

8. पाणेरी डॉ. मलय- साठोत्तरी हिंदी नाट्य लेखन में प्रयोगशीलता, पृष्ठ 220

9. पाणेरी डॉ. मलय- साठोत्तरी हिंदी नाट्य लेखन में प्रयोगशीलता, पृष्ठ 224

 

संम्पर्कः 181, उतरी आयड़, रूप वाटिका,

सुथारवाड़ा, उदयपुर 313001

मोः 919799828291

एम.ए, एम.फिल, नेट, सेट, पीएच.डी- शोधरत (हिन्दी)

सम्प्रति- अतिथि व्याख्याता, हिन्दी,

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)

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