प्राची - दिसंबर 2015 - जिन्दगी और टेबल टॉक / कहानी / शरजील

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शरजील

(जन्मः 13 दिसंबर 1938, नवाबशाह जिला)

हैदराबाद में आर्ट टीचर के तौर पर स्थापित रहे. अब वे सेवानिवृत हुए हैं. 1970 में उन्होंने लिखना शुरू किया. उनका कहानी संग्रह, पल पत्ते झड़ने के बाद!’ और नज्मों का संग्रह ‘छोलियूं’ प्रकाशित हैं.

उनकी एक और पहचान चित्रकार के रूप में भी है. उन्होंने चित्रकार के रूप में अनेक पुस्तकों के कवर पृष्ठ और स्केच भी बनाए हैं. इस समय वे हैदराबाद जिला काउंसिल के फ्लैट नम्बर बी-2-1 में रह रहे हैं.

जिन्दगी और टेबल टॉक

शरजील

गातार तीन सालों से तुमने कुछ भी नहीं लिखा है. इतनी चुप्पी क्यों साध ली है? क्या तुम्हारा विश्वास अब जात से भी निकल चुका है?

उसने कुर्सी पर बैठे-बैठे ही करवट ली और फिर दोनों हाथों की उंगलियां बालों में उलझाते हुए ऊपर की ओर अपनी आंखें उस पर टिकाईं फिर नीचे करते हुए कहा-‘‘मैंने लिखना नहीं छोड़ा है. वह छोड़ भी कैसे सकता हूं?’’

‘‘मैंने तो बीते तीन सालों में तुम्हारी एक भी रचना नहीं पढ़ी. बहुत इन्तजार किया तुम्हारी लिखी हुई कृतियों को पढ़ने के लिये-पता नहीं तुमने कौन सी, और किसकी पत्रिकाओं के लिये लिखा है.’’

‘‘मैंने सिर्फ डायरियों में लिखा है और वे मरने के बाद छपती हैं.’’

‘‘बीते तीन सालों में दुर्भाग्य की कोई भी कयामत तुमसे कुछ भी नहीं लिखवा पाई, बड़ी हैरत की बात है.’’

‘‘कयामतें अब हमारी जात पर गुजरते अपना प्रभाव खो बैठी हैं.’’

‘‘तो फिर भीतर की दुनिया से निकलकर बाहर की दुनिया में क्यों नहीं आते?’’

‘‘बाहर की दुनिया!’’

‘‘हां, बाहर की दुनिया.’’

उसने सिगरेट सुलगाया. क्षण के लिये सिगरेट को दो उंगलियों में फिराता रहा. आंखें टेबल के शीशे के नीचे पड़ी ऑफिस के स्टॉफ के साथ खिंची तस्वीर पर टिकी हुई थी. कुछ सोच रहा था या कोई जवाब नहीं जोड़ पा रहा था. फिर रिक्त आंखें उठाकर उसकी ओर निहारा था, जैसे कोई गुनाह करते हुए पकड़ा गया हो, या भागने के लिये रास्ता ढूंढ़ रहा हो. फिर गला साफ करते हुए कहा-‘‘बाहर की दुनिया बहुत कठिन है, बहुत छिट-पुट, विरोधाभास की शिकार बनी हुई.उसे समेटने के लिये आज से सात साल पहले अपनी कलम को अरब के पेट्रोल की तरह इस्तेमाल किया था और सीधा जेल चला गया था.’’

‘‘यह खबर मैंने अखबारों में पढ़ी थी. हां, फिर क्या हुआ?’’

‘‘कुछ भी नहीं, स्टूडैंट्स ने आपस में चंदा इकट्ठा करके एक वकील किया था और जमानत भी उनमें से एक के पिता ने करवाई थी. आठ महीने सस्पेंड रहा. गुनाह साबित न हो पाने की सूरत में केस खारिज किया गया.’’

‘‘और फिर तुमने बाहर की दुनिया के लिये लिखना छोड़ दिया.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है, हां इस तरह की जिरह से कतराता हूं.’’

‘‘तुम्हें इस तरह की जहनी और जिस्मानी तकलीफ लेने के लिये पछतावे का अहसास तो नहीं हुआ है.’’

‘‘नहीं’’

‘‘नौकरी कैसी चल रही है?’’

‘‘बस ठीक है’’

‘‘सुना था तुम्हें प्रमोशन मिलना था?’’

‘‘हां, पर फिर स्कॉलरशिप के लिये एन.ओ.सी. भी नहीं मिला और प्रमोशन भी रोका गया!’’

‘‘तुम्हें दुख तो हुआ होगा.’’

‘‘दुख हुआ था, दुख है. वैसे भी आदमी जो कुछ सही समझ कर अपने जहन के साथ करता है, फिर आगे चलकर उन्हीं बातों और कामों को खुद ही रोकता है. पर मैंने कम से कम अपनी ऐसी किसी बात और अमल को आज तक खारिज नहीं किया. फिर भी अगर उस अमल को कायम नहीं रख पाया हूं, तो ऐसे हालातों से समझौता भी नहीं किया है.’’

‘‘अभी तक अकेले हो?’’

‘‘हां’’

‘‘उसका क्या हुआ?’’

‘‘किसका...?’’

‘‘जिस पर नॉवल लिखा था?!’’

‘‘जहनी तौर पर नाबालिग और सामान्य-सी साधारण सोच रखने वालों में से थी.’’

‘‘तो फिर नॉवल कैसे लिखा?’’

‘‘उसकी आदर्शवादी आंखों में हकीकतों के दुःख और सुख भरने के लिये!’’

‘‘उसने ऐसी बातों को महसूस किया था?’’

‘‘तभी तो फिर नहीं मिली है’’

‘‘कितना समय हुआ है?’’

‘‘छः महीने के करीब.’’

‘‘समझते हो कि वह आएगी?’’

‘‘हकीकत कड़वी होती है. इसलिये आदर्शवादी आदमी भरोसे के काबिल नहीं होते.’’

‘‘तुम भी तो अपनी उम्र में अदर्शवादी रहे हो समाज से लेकर जीवन साथी तक.’’

‘‘मैं इन्कार भी तो नहीं करता!’’

‘‘तो फिर यह भरोसा न लगने वाली तोहमत तुम पर भी लग सकती है!’’

‘‘ऐसी तोहमतों की वजह से तो कुछ हासिल नहीं कर पाया हूं.’’

‘‘तो फिर उस पर, क्या नाम बताया था?’’

‘‘पिरह!’’

‘‘हां, फिर पिरह पर ऐसा दोष थोप देने का क्या सबब है?’’

‘‘दोष थोपने की बात नहीं है. फर्क सिर्फ सोचों के अलग-अलग होने की वजह से ख्वाहिशों का था. मिलकर रहना बेमतलब, एक दूसरे की हालातों और आदतों को बर्दाश्त करते हुए आहिस्ते-आहिस्ते एक दूसरे के परित्याग के जज्बे को अच्छे से और अच्छा बनाना होता है. कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जो सामाजिक हैसियत और राष्ट्रीय चेतना के सिवा अधूरी और जटिल साबित होती हैं जैसे पिरह ने कौम की बुनियादी चेतना तो ध्यान में रखी, पर जीवन साथी के बारे में वर्गीकरण की शिकार हो गई. उसे राष्ट्रीयता और आजाद खयाली के जज्बे ने कितने ही अजीम अदीबों और शाइरों से मिला. उनमें से एक मैं हूं.’’

‘‘वह तुम्हें कब मिली थी?’’

‘‘मैं समझता हूं लगभग तीन साल पहले.’’

‘‘तुम्हें पहली मुलाकात में ही प्रभवित किया था उसने?’’

‘‘किसी हद तक!’’

‘‘फिर उस सिलसिले को तुमने बढ़ाया या उसने?’’

‘‘दोनों ने मिलकर. उसने पहला खत पहली मुलाकात के बाद तुरन्त ही लिखा और फिर बिना विलम्ब किये इक दूजे को लिखते रहे, जिस में उसने तीन हैसियतों से सीढ़ी-दर-सीढ़ी कदम बढ़ाए-पहला रजामंदी, फिर दोस्ती और फिर प्यार!’’

‘‘तुमने उस नॉवल को कब लिखा?’’

‘‘तीसरे साल के मध्य में, जो उसे सालगिरह के मौके पर दिया.’’

‘‘तुमने उसे ‘प्रपोज’ करके गलती तो नहीं की?’’

‘‘नहीं!’’

‘‘फिर इन्कार और छोड़ जाने का सबब?’’

‘‘उसने इन्कार नहीं किया था. बस! यही कहा कि मेरा एक दोस्त मुझसे इतनी मुहब्बत करता है कि वह कहता है कि अगर तुम किसी और से शादी करोगी तो मैं तुम दोनों को मारकर, खुद को भी खत्म कर दूंगा.’’

‘‘और तुमने उसके उत्तर में कुछ भी न कहा होगा.’’

‘‘नहीं, बाकी उससे पहले दो तीन मुलाकातों में इतना जरूर कहा था कि तुम इतनी तो सुन्दर और लुभावनी हो कि तुम्हें भगा ले जाने को जी चाहता है.’’

‘‘ऐसी बात पर उसकी कोई खास प्रतिक्रिया?’’

‘‘वह सिर्फ आंखें मिलाकर मुस्करा देती थी.’’

‘‘तुम जैसे मर्दो को औरत के भीतर की मनोस्थिति की कभी भी जानकारी नहीं हो सकती. सिर्फ खूबसूरत लफ्ज जोड़कर गुफ्तगू कर सकते हो.’’

वह फिर दूसरी बार अटक गया था, जैसे चलते चलते उसके सामने धरती दो भागों में बंट गई हो और वह दूसरी तरफ पहुंचने के लिये परेशान हो गया हो. उसकी उंगलियों में आधा बचा हुआ सिगरेट घूम रहा था, जो उसने मरोड़ कर ऐश-ट्रे में डाला और पैकेट से दूसरा सिगरेट निकाल कर सुलगाया और फिर कॉल-बेल पर उंगली रख दी. उसी वक्त ऑफिस का दरवाजा खुला.

‘‘जी हुजूर’’

‘‘तुम क्या पियोगी?’’

‘‘जो तुम पिओगे.’’

‘‘बाबा, चाय तैयार कर लो.’’

कुछ समय वह टेबल पर पड़े कागजों को पलटता रहा. ‘‘सामी, वैसे तुम बहुत अच्छे आदमी हो, और प्यारे भी. मुझे तुम्हारी यह मासूमियत और ‘अनाड़ीपन’ वाली अदा अच्छी भी लगती है. पर तुम्हारी नीरस तन्हाई को देखकर दिल भी दुखता है. मैं समझती हूं कि तुमने अनजाने में ही सही, पर पिरह को जरूर कोई दुख पहुंचाया होगा. नहीं तो तीन सालों वाला ऐसा रिश्ता किसी भी सूरत में बेकार या जड़हीन नहीं हो सकता.’’

‘‘शायद ऐसा ही है!’’

‘‘शायद नहीं, ईमान से कहो. कभी तो हार भी मान लिया करो. मैं भी तुम्हें अपनी जात के हवाले से कुछ न कुछ समझ सकी हूं. ऐसा क्यों करते हो? तन्हाइयों से अगर तुम इतना ही प्यार करते हो तो फिर दरवाजों को बंद क्यों नहीं कर लेते? ऐसे हर आने जाने वाले को दिल में जगह देकर फिर सुन्दर अल्फाज से क्यों अलविदा कहते हो? कम से कम जो तुम्हें चाहते हैं, उनके साथ तो ऐसे मत किया करो. उन्हें तो अपने भीतर के किसी न किसी कोने में स्थान दे दिया करो!’’

उसे राही के ऐसे जुमलों से, एक ही वक्त में लगातार तमाचों की बरसात के साथ-साथ अपनेपन और हमदर्दी वाला भरपूर स्नेह भी मिला. उसकी झुकी हुई गर्दन फिर एक बार ऊपर उठी. राही की आंखों में आंखें टिकानी चाहीं. उस वक्त राही की गर्दन झुकी हुई थी, वजह दुख! कुछ ही पलों के बाद जब राही ने गर्दन ऊपर उठाई तो उसे उसकी आंखें नम सी लगीं.

‘‘राही, इन्सानी जिंदगी के लिये क्या-क्या आवश्यक है. कभी न खत्म होने वाली एक लिस्ट है ख्वाहिशों की, जो धरती से लेकर आसमान तक फैली हुई है. उस पर अगर मैं ‘लॉजिक’ से राय दूंगा तो तुम्हें दुख होगा. प्लीज राही. इन आंसुओं को यूं व्यर्थ न करो, तुम्हारे पास अभी सबकुछ है. हर वह चीज जिसकी हर लड़की ख्वाबों में ख्वाहिश करती है. फिर पति भले बड़ी उम्र के हों, तो क्या हुआ? अगर औरत यह सब कुछ अपने आने वाले कल को सुरक्षित करने के लिये करती है, तो फिर प्यार से खाली दिल को भी अगर चाहे तो सोने के सिक्कों से भर दं. फिर क्यों उनकी आंखें ऐसे इन्सानों के सामने भर आती हैं जिनको वो छोड़कर चली जाती हैं?’’

उसने जैसे हिम्मत करके धरती के दोनों भागों को मिला दिया, पर उसे ऐसी बात राही के सामने करते हुए दुख के साथ खुदगर्जी भी महसूस हुई. उसी पल खुद को संभालते हुए कहा-‘‘राही, तुम्हें, पिरह की तस्वीरें पसंद थीं न? सच, वह फोटोग्राफ्स से भी ज्यादा आकर्षक और प्यारी है. मैं समझता हूं कि वह जरूर आएगी. वैसे मैंने उसे कभी सुन्दर शब्दों में ‘गुड बाई’ नहीं कहा है. बस उसे एक खत लिखा था कि मैं भूतकाल को भूल जाने के काबिल समझता हूं और मुस्तकबिल जो देखा नहीं जा सकता, उसकी ओर उम्मीद भरी नजरों से नहीं देखता. बाकी बचा वर्तमान, इसलिए जब चौबीस घंटों में अगर चार-पांच ठहाके लगाने को मिल जाते हैं तो जिन्दगी को जीने का सबब मिल जाता है. मैं समझ नहीं रहा, पर यकीन से कह सकता हूं कि उसे ऐसे आदमी की तलाश न थी, जो वर्तमान से तो प्यार करता है, मगर आने वाले कल से नहीं, और शायद उसने खुद को घड़ी पल के लिये माजी समझा हो, जो मुझ जैसे आदमी के लिये भूल जाने के योग्य है...’’

इतने में दरवाजा खुला. दरबान बाबा चाय लेकर आया. सामी चाय बना रहा था और राही उसके खामोश और कुछ उदास चेहरे को देख रही थी. राही के सामने चाय रखते हुए उसने फिर से बात का सिलसिला जारी रखा.

तुम्हें पता है कि जहां हम रहते हैं, वहां के साठ प्रतिशत लोगों का ख्याल है कि यहां दौलत कमाने के लिये रिश्वत, घोटाले, तस्करी और ऐसे कई तरह के काम किये जाते हैं. आठ प्रतिशत जनता का ख्याल है कि किस्मत भी आदमी को अमीर बनाती है. जब कि छः प्रतिशत का कहना है कि ऊंची तालीम से भी आदमी दौलत और इज्जत कमा सकते हैं. तुम्हें पता है कि मैं मुहब्बत से लेकर समाजों और इन्कलाबों तक आदर्शवादी रहा हूं. बाकी मेरे वर्तमान के लिये चाहत वाली बात पिरह ने शायद गलत समझी है. मैं इस बात से बिलकुल सहमत नहीं हूं कि कोई इन्सान दुनिया को फानी समझकर जिन्दगी की देन को जीने की तमन्ना से किनारा करे, सब कुछ त्याग दे. और ऐसा बिलकुल भी नहीं है. यहां बड़े शहरों में आधे से ज्यादा आबादी किराये के मकानों में रही तो क्या हो पाएगा? यहां कितने आदमियों और बच्चों के भविष्य सकुशल और सलामत हैं, कौन उनकी गारन्टी देगा?’’

उसी वक्त ऑफिस का दरवाजा खुला. दरबान ने सामी से कहा-‘‘हुजूर, बाहर मैडम की गाड़ी आई है.’’

ऐसा कहकर वह दरवाजे के बाहर चला गया. राही ने सर ऊपर करके सामी की ओर देखा. उसे ऐसे लगा जैसे सामी किसी लम्बी दौड़ दौड़ते हुए आधे में ही थककर हार मान बैठा हो.

‘‘अच्छा, मैं चलती हूं!’’

ऐसा कहकर उसने टेबल से पर्स उठाया और जाने के लिये खड़ी हुई. सामी चाहकर भी राही को बाहर तक छोड़ने नहीं गया. वह वहीं टेबल और कुर्सी के बीच में अटका सा खड़ा रहा. उसके कानों में काफी देर तक ‘खुदा हाफिज’ के मंद होते हुए शब्द, उदास धुन की तरह बजते रहे.

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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