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प्राची - नवंबर 2015 - लक्ष्मीनारायण लाल की कहानी : गुलबदन

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घरोहर कहानी -

गुलबदन

लक्ष्मीनारायण लाल

 

 

हां वह बस्ती जिला का गांव जलालपुर, कहां यह साढ़े-आठ सौ मील दूर कलिकत्ता. और कलिकत्ते में भी हावड़ा से इतनी दूर सेकरइल का यह चटकल, जूट मिल की यह घनघोर मजदूर बस्ती.

गोवरधन ने सुबह-ही-सुबह देखा, सामने साक्षात वही गुलबदन आ खड़ी है. गोवरधन को पहले तो परतीत न हुआ. वह नीचे से ऊपर तक उसे घूर-घूर कर एकटक देखता रहा. लेकिन जब उसने गुलबदनी की वह तलवार छाप बोली सुनी, और मुंह पर हाथ रखकर वह ही-ही, ही-ही वाली बेमतलब की हंसी, तब गोवरधन सिर से पांव तक कांप गया.

हे भगवान! दइउ का कोप. यह तो यही गुलबदनी है साली. वही ससुरी गुलबदनी. हे राम.

लकड़ी, माटी और नारियल के पत्तों और पुवाल से बनी हुई वह झोपड़ी. झप्प से आकर गुलबदनी वहां बैठ गयी. मुंह पर हाथ रखकर, और गोवरधन पर मारू नजर चलाती हुई, वह फिर हंसने लगी. गोवरधन चुप. होश-हवास मानों गायब. उसकी नजर में हुगली के किनारे दबी हुई घास-पात की वे असंख्य झोपड़ियां, उनमें जानवर की तरह रहने वाले वे मजदूर, उनके भयानक चेहरे, सब कौंध गये. ‘‘हे हो! हे हो!’’ कहकर, गुलबदनी अपने पति गोवरधन को संबोधित करने लगी.

गोवरधन क्या बोले? अब कहां भाग कर जाय? गुलबदनी झोपड़ी के दरवाजे पर बाकायदा बैठ गयी है. और वह हंस-हंस कर बताने लगी है, कि वह किस तरह से यहां आयी है. अलगू चमार, हावड़ा स्टेशन का कुली, अपने मुलुक गया था. उसी के साथ जबरदस्ती बेटिकट वह यहां चली आयी. गांव-गढ़ी में सब राजी-खुशी है. मुलुक में बड़ी महंगाई है. कहीं कोई रोजी-मंजूरी नहीं.

‘‘हे हो, तुंहका कौनो, मोह-माया नाहीं बाय का?’’ गुलबदन यह सवाल करके, फिर चुप हो गयी.

गोवरधन ने तब देखा, उसके आस-पास बहुत-से लोग आ खड़े हुए हैं. कई औरतें और बच्चे, सब प्रश्न भरी आंखें लिये, वहां मौजूद हैं. सब गोवरधन से सवाल-जवाब कर रहे हैं.

गोवरधन के जवाब के पहले गुलबदनी सब को फटाफट बता रही है, कि वह गोवरधन की मेहरारू है. असली ब्याहता मेहरारू. कोई भगाई, घर बैठी नहीं.

बेहया की तरह सब बताती हुई गुलबदनी ने जान-बूझ कर अपने सिर से साड़ी का रंगीन आंचल जरा सा एक तरफ खिसका दिया है, ताकि सब देख लें उसकी मांग का चटक घनघोर सिंदूर. माथे पर बड़ी सी लाल टिकुली-लकालक. आंखों में कजरौटा मार्का काजल है और दांतों में मीसी. सब कुछ झकाझोर.

गोवरधन सब से बातें करता हुआ, अपनी झोपड़ी से जरा दूर चला गया. लौटा, तो देखा, कि गुलबदनी झोपड़ी के भीतर से चावल-दाल और बटलोई बाहर निकाल कर, चूल्हे में आग जला रही है. और वह कुछ गुनगुना भी रही है ऐसे, कि जैसे वह कितने ही दिनों में यहां की घर-गृहस्थी चला रही थी.

एक दिन गोवरधन पागल भालू की तरह गुलबदनी पर फाट पड़ा...कमर पर लात के प्रहार से उसे वहीं नंगी जमीन पर लिटा दिया.

गोवरधन झोपड़ी के सामने चटाई बिछाकर बैठ गया. गुलबदनी ने तब उसके सामने अपनी गठरी खोली. फटे-पुराने कपड़ों का एक छोटा-सा चबैना, और एक कोने में बंधे हुए सिर्फ सात आने पैसे.

‘‘लेव हो भूजा चबैना चबाव न.’’

गुलबदनी ने बरबस गोवरधन की बांह में हल्के-से चिकोटी काट ली. और फिर उसकी वही ही-ही वाली हंसी.

गोवरधन मारे गुस्से के जलकर खाक हो रहा था. आज यह परदेश न होता, अपना वही गांव-टोला होता, तो वह गुलबदनी को बताता. मारे डंडों के उसकी पीठ रंग देता. ससुरी की इतनी हिम्मत, कि यहां परदेश में भी न मरने दिया? इतना बड़ा दीदा इस कंटाइन का, कि यहां तक इस तरह चढ़ आयी? मारे गुस्से के गोवरधन ने पूछा-‘‘क्योें, रे, यहां क्यों आयी?’’

‘‘हे हो, तुंहसे मिलने.’’

‘‘कि मुझे भूंजने?

‘‘हे हो मरदवा सामी, ई कैसन भाखा बोलत हयो?’’ गोवरधन ने एक भद्दी-सी गाली दी.

इस पर गुलबदनी हंस पड़ी. गोवरधन के गुस्से में इससे और आग लगी. उसने एकसुर में कई गालियां दीं गुलबदनी को.

फिर गुलबदनी की वह तलवार चल पड़ी. उसने भी गोवरधन को कई गालियां दीं, धीरे से नहीं, जैसे कि गोवरधन अब तक दे रहा था, बल्कि पूरी आवाज में. और जहां उसकी गाली खत्म हुई, वहां से उसने अपना पैंतरा बदलकर, झोपड़ियों के आस-पास खड़े हुए तमाम स्त्री-पुरुषों और बाल-बच्चों को सुनाते हुए कहा-‘‘आवै न मेरी सौत. कहां है वह? मैं उसी को देखने तो यहां आयी हूं. मुझे किसी का डर थोड़े न है. मैं कच्चा मास खा जाऊंगी उसका, जो हमरे बीच में बोलेगा, हां. हम ई सही-सही सब का यही बरे बताय देई थै, हां. हम कौनों ‘ओढ़ारी’- भगाई नाहीं न. हमार नाम है गुलबदना...

गुलबदना! गुलबदना!

किस औरत को गोवरधन ने एक दिन यह नाम दिया था? गुलबदन! तब गोवरधन का गौना नहीं आया था. महज उसने सुन रखा था, कि उसकी पत्नी बहुत सुन्दर है. ब्याह तो उसका बचपन में ही हुआ था, जब वह मुश्किल से पांच-बरस का रहा होगा.

गोवरधन रासधारी के नाच का नचनियां था. सुन्दर पतला-सा लड़का. यही सत्तरह-अठारह साल की अवस्था. गोरा बदन. लम्बी-लम्बी आंखें. जिस गांव में वह नाचने जाता था, वहां वह जुलुम ढाता था. लड़कियां उसे रूमाल भेंट करती. रुपये-पैसे के कितने-कितने इनाम उसे मिलते. नाचता, तो लगता कि बिजली थिरक रही है. गाता, तो लगता कि कोयल कूक रही है.

तभी उसका गौना हुआ था. घूंघट काढ़ कर उसकी दूल्हन उसके घर आयी थी-पैरों में कड़ा-छड़ा, छमछमाती हुई. उन्हीं अनदेखे क्षणों में गोवरधन ने उसे गुलबदन नाम दिया था. वहीं गुलबदन कुछ ही दिनों में सहसा अपने असली रूप में उसके सामने प्रगट हुई थी. काली-कलूटी, अत्यन्त कर्कशा. बात-बात में गोवरधन से झड़प. गाली-गलौज. तभी गोवरधन का कोमल मन हाहाकार करके टूटा था. तभी एक दिन जब उसने

गोवरधन की विधवा मां का गाली दी थी, तब पहली बार

गोवरधन ने गुलबदन पर हाथ उठाया था. तब से वह क्रूर अमानवीय इतिहास चालू हुआ था. गुलबदन की जहर उगलती हुई बोल, बान मारती हुई उसकी दारुन हंसी. और गोवरधन की वह मार.

गोवरधन एक दिन गुलबदनी को लेकर अपने पूरे घर से अलग हो गया. गुलबदन ने तब पहले बच्चे को जन्म दिया. पर बात-बात में उस अबोध बच्चे को टूट-सराप. और उस बच्चे की मौत. फिर गुलबदन को नाम मिला-चुड़ैल. फिर दूसरे बच्चे का जन्म. इस बार लड़की. गोवरधन ने उस बच्ची का नाम रखा फूलगेंदा. जितना ही गोवरधन अपनी उस बच्ची को प्यार देता, मां उतना ही बच्ची से डाह करती. अपनी करनी पर मां जिस दिन मारी जाती, उसका बदला वह उसी नन्हीं बच्ची से उतारती. और इस तरह एक दिन वह बच्ची भी उन दोनों के बीच से सदा के लिये चली गयी.

तभी गोवरधन बहुत टूटा गुलबदन से. उसने एक दिन बहुत मारा गुलबदन को. और उसे घसीटकर वह एक दिन उसके मायके कर आया, उसके मां-बाप को जवाब देकर, कि वह अब इसे अपने घर नहीं रखेगा.

किन्तु इधर गोवरधन अपने घर लौटा, कि पीछे-पीछे वही गुलबदन फिर उसके सामने हाजिर. गोवरधन उदास हो गया. वह गांव-घर उसे काटने लगा. उसने नाचना-गाना छोड़ दिया. औरत से नाता-रिश्ता खत्म. उसने गुलबदन से साफ कह दिया, कि वह उसके घर से निकल कर कहीं भी चली जाय. किसी के भी घर जाकर बैठ जाय. कागज पर यह सब पूरी बात लिखकर, और उस पर अपना दस्तखत करके, गोवरधन ने उसके हाथ में पकड़ा दिया.

कागज को फाड़कर, वह उसी घर में अचल बैठी रही. मौन-चुपचाप.

गांव में थे एक पुलपुल बाबा. उन्होंने गोवरधन को उस औरत से मुक्ति का एक रास्ता सुझाया. बताया, कि इस औरत को अपने घर से बाहर निकालकर, तुम कुछ दिनों के लिये कहीं परदेश चले जाओ.

गोवरधन ने तभी पहली बार अपना प्यारा मुलुक छोड़ा था. कलकत्ते का यही चटकल. यही सकरइल का प्रेमचन्द जूट मिल. और यही अंधेरी चाल. यही जीवन.

और वह गुलबदनी अपने घर के बंद दरवाजे पर पांच दिनों तक बिना अन्न के पड़ी रही. न घर, न अन्न.

उसके नैहर के लोग उसे वहां से ले जाने के लिये आये, पर गुलबदनी अपने उस घर के सामने से टस-से-मस न हुई. ठीक उसी तरह जैसे वही गुलबदनी आज यहां साढ़े आठ सौ मील की दूरी तै करके आ बैठी है. गोवरधन उसे देखना नहीं चाह रहा था. पर वह जैसे उसकी आंखो में चुड़ैल की तरह हंस रही है. तवे पर रोटी सेंकती हुई, गुलबदनी बड़े मजे से ओंठों पर हंसी लिए हुए, गुनगुना रही है.

‘‘झिरझिर-झिरझिर नदी बहत है

झिरझिर बहत बयार,

हे हो हम तुहंसे पूछी

तोहरे जोबना कै कौन सिंगार...’

गाने का यह टुकड़ा गोवरधन का है. उसके उस मशहूर गीत का, जब वह नचनियां था, और जब वह पूर्वी गायन के बीच में यह लटका देता था. एक सवाल. एक जवाब. इसी दौर में जब वह थिरक कर नाचता था, और उस पर रुमाल, रुपये पैसों की वर्षा होती थी. वर्षों बाद वह गुलबदनी खूब जान-बूझ कर उसी गीत-राग को यहां इस तरह छेड़ रही है. इसीलिये वह ससुरी यहां आयी है.

‘झुरझुर-झुरझुर नदी बहत है’ गोवरधन की आंखों में आज आग बरस रही है. चटकल की उस दुनिया में नई हाटी में, सकरइल के लोगों के बीच. पीछे भागीरथी का अथाह शांत जल है. सामने नारियल और केला बगान. गोवरधन इस सब के बीच मौन चुपचाप बैठा है. और उसकी आंखों से आग बरस रही है. आज न उसे भागीरथी का उतना अथाह जल छू रहा है, न सामने की इतनी अपार हरीतिमा, न उस पर से बह कर आती हुई वह शीतल बयार.

गोवरधन ने घूर कर गुलबदनी को देखा. उस समय वह रोटी बनाना खत्म करके, चूल्हे पर से दाल की बटलोई उतार रही थी. और उसका खुला कंठ, बाहरी ओर पीठ पसीने से भीग उठी थी.

क्वार के दिन हैं. तब भी क्वार के ही दिन थे जब पूरे तीन वर्ष बाद गोवरधन अपने मुलुक लौटा था, यह सोचकर कि गुलबदनी अब तक जरूर कहीं बह-बिलाय गयी होगी. तीन वर्ष. उस बीच न कोई चीठी, न पाती, न रुपया, न खर्च.

गोवरधन ठीक दोपहर के वक्त तब पहली बार अपने गांव लौटा था. गुलबदनी बंद दरवाजे के बाहर ओसार में फटी कथरी पर लेटी पड़ी थी. भूख प्यास से टूटी और जर्जरित. साड़ी उसकी फटकर तार-तार हो गयी थी. बदन पर झुलवा तक न था.

गोवरधन को याद आ रहा है. उसने तब एक लात मार कर उसे जगाया था. गुलबदनी ने उठ कर तब जिस तरह करुणा आंखों से अपने पति को देखा था, उसे याद करके गोवरधन आज भी सिहर उठता है.

गोवरधन ने उसे गालियां देते हुए कहा था-‘‘क्यों, रे ससुरी, तुझे आज तक और कोई मरद नहीं मिला न? कौन पूछेगा तुझ ससुर को?’’

तब पहली बार गुलबदनी भोकार छोड़ कर रोयी थी. और उसने अपना मुंह पीटा डाला था. उस तीन वर्ष के लम्बे समय में गुलबदनी किस तरह अपने पति के उस बंद दरवाजे पर भिखारी की तरह पड़ी रह गयी थी, इसकी बाबत उसने एक शब्द भी गोवरधन से नहीं कहा. हां, उसका कमजोर शरीर और वे धंसी हुई आंखें उस पूरी कथा को जरूर कह रही थीं.

‘‘बेहया! बेशरम! चांडालिन कहीं की!’’

‘‘कोई भी पुरुष तुझे नहीं मिला न!’’

गुलबदनी चुपचाप अपने पति का वह मुंह निहारती रह गयी थी.

आज इस चटकल की अंधेरी बस्ती में गोवरधन उसी गुलबदनी का बेशरम कठोर मुंह निहार कर क्रोध से जल-भुन कर खाक हो रहा है.

गोवरधन सोच रहा है-अब वह इस गुलबदनी से भागकर कहां जायगा? किस दुनिया में...?

चटकल का पहला भोंपू बजने लगा. गोवरधन बेजान-सा वहीं बैठा रहा-जैसे वह भागीरथी के तट पर किसी शमशान भूमि पर बैठा हो. किसी चिता के सामने.

गुलबदनी आकर गोवरधन की दायीं बांह में बड़े जोर से गुदगुदाने लगी. गोवरधन अपनी झोपड़ी में पति का हाथ पकड़ कर वह बोली-‘‘हे, हो, का मुंह बनाये हया?’’

गोवरधन ने पूछा-‘‘बोल, तू यहां क्यों आयी? तेरी मंशा क्या है? बोल, साफ-साफ बता पहले.’’

गुलबदनी हंस कर बोली-‘‘चलो उठके पहले खाना खाइ लो.

‘‘नहीं, पहले बता तू.’’

‘‘चली आयी, बस. और क्या कहूं?’’

छप्पर के नीचे झूलते हुए एक तृन को लेकर, गुलबदनी ने उसे अपने दांतों तले दबा लिया. उसकी दोनों आंखों में आंसू उमड़ आये. तृन दांत के तले कई खंडों में टूट गया.

गोवरधन ने उत्तर की आशा में उसके उसी मुंह की ओर देखा. सारा मुंह आंसुओं से भीगने लगा था. गोवरधन इस त्रियाचरित्र को खूब जानता है. उसने तड़ातड़ उसी भीगे मुंह पर मारना शुरू किया. और जब वह थक गया तो वहीं जमीन पर औंधें मुंह लेटकर, वह खुद रोने लगा-चोट खाये हुए निर्दोष शिशु की तरह.

चटकल का दूसरा भोंपू बजा. मजदूर लोग अपनी-अपनी झोपड़ियों में से निकल कर, चटकल की ओर जाने लगे.

गुलबदनी झोपड़ी से बाहर चूल्हे के पास आकर, खड़ी हो गयी. आसमान में एक चील्ह मड़रा रही थी-ठीक उसी के चूल्हे के ऊपर. आस-पास की झोपड़ियों पर कई कौए आकर बैठ गये थे.

थाली में झटपट भोजन परोस कर, वह गोवरधन के पास गयी. उसके सामने थाली रख कर, चुपचाप पंखा झलने लगी.

न जाने क्या सोचकर, गोवरधन ने थोड़ा सा भोजन किया, और कंधे पर अंगोछा रखकर, तेजी से वह बाहर निकल गया. चटकल की ओर. गुलबदनी झोपड़ी के सामने खड़ी, बहुत देर तक उसी दिशा में देखती रही. भोजन करके, वह झोपड़ी में बेखबर सो गयी. पिछली दो रातों की वह जगी थी.

उसकी नींद तब टूटी, जब उसकी झोपड़ी के सामने चार कुत्तों की भयानक लड़ाई छिड़ी. बाहर निकल कर, उसने कुत्तों को मार भगाया. उसी समय बगल के घर से एक औरत आयी, और गुलबदन के साथ वहीं बैठकर बातें करने लगी.

वह औरत भागलपुर की थी. जात की धोबिन. यहां सुखदेव चमार के साथ घर बैठी है. औरत मरद में बड़ा परेम है. गुलबदन ने देखा, औरत के बदन पर अच्छे कपड़े हैं, तन पर कई सोने के गहने. मुंह में पान.

गुलबदन एकटक उस औरत को ललचायी हुई नजर से देखती रही, और अपनी बताती रही- ‘‘मुझे ये जरा भी नहीं चाहते. चाहते हैं, कि मैं इनके रास्ते से हट जाऊं. ये सुन्दर हैं. मैं इनके जोग नहीं हूं. बताओ, इसमें मेरा क्या कसूर? कहते हैं, दुनिया में किसी भी और मरद का हाथ पकड़ लो तुम. बताओ मैं इन्हें छोड़ कर किसी और मरद का हाथ पकडूं?’’

झोपड़ी के सामने से उस दिन की धूप मिटने लगी थी. चटकल में भोंपू बज उठा था. गुलबदनी रो-रोकर उस अपरिचित औरत से अपनी व्यथा गा रही थी. ‘‘एक बार तीन साल तक मुझे तज कर यहां परदेश चले आये थे. मैं फिर भी कहीं नहीं गयी. क्या करूं, बड़ा मोह लगता है मुझे इनसे. तीन साल बाद मुलुक गये. और फिर मुझे घर से निकालकर यहां चले आये. तब से आज पक्के दो साल बीत गये. पापी जी न माना. पैर उठाये मैं आज यहां चली आयी.’’

‘‘अच्छा किया.’’ उस औरत ने गुलबदन को तसल्ली दी.

चटकल से सारे मजदूर अपने-अपने घर आकर झोपड़ियों के सामने बैठ चुके थे. अभी सूरज नहीं डूबा था.

कुछ फासले पर दायीं ओर एक जलपोखर था. चटकल से आकर एक तरफ कुछ नौजवान मजदूर उसी पोखर में मछली फंसाने के लिये कंटिया लगाये बैठे थे. दूसरी ओर औरतें बरतन मल रही थीं. गुलबदनी अपने बर्तन लिये, उसी पोखर के किनारे आयी.

अपनी आदत से मजबूर, पोंखर के किनारे बरतन रखते ही, वह एक औरत से लड़ बैठी.

पोखर के उस पार जो मनचले लोग मछली के शिकार के लिऐ बैठे थे, उनमें से एक की आवाज आयी-‘‘बच के भइया! गोवरधन रैदास की मुर्रा के सामने, नाहीं तो अपने बहिन के दूध पी आवो न!’’

और गुलबदन की वही निश्छल हंसी, जिससे न जाने कब का वह गंदला पोखर एक छन में जैसे नये पानी से भर गया. उसमें एक छोर से दूसरे छोर तक लहरें फैल गयीं.

मजाक करने वाला वह जाति का अहार था. देवरिया जिले का. गोवरधन का परिचित, हमजोली. उसी चटकल में एक साथ काम करने वाला. जैरतन नाम था उसका. मजा लेने के लिए वह उस पार से इधर चला आया. बोला-‘‘भौजी, सुनो. हमरो मुलुक उधरै है-जिला देवरिया, गांव अहिराना. आज से तू हमार भौजी, हम तोहार देवर!’’

गुलबदन ही-ही कर के हंस पड़ी.

जैरतन से अस्कमात गुलबदन की आंख लड़ गयी. एक अद्भुत चितवन, और उस चितवन में एक तेज धार, जो आर-पार बेध गयी.

गुलबदन बर्तन मांज-धो चुकी. पर वह जैरतन को देखती हुई, हंसती चली जा रही थी. और उस हंसी के झोंके से उसका भरा-पूरा शरीर कांप-कांप उठता था.

जैरतन उस गदराई हंसी में डूब गया.

गुलबदनी बर्तन उठाये हुए, अपनी झोपड़ी की ओर बढ़ी. आंचल उड़ाती हुई, उसी शोख हंसी को हवा में लुटाती हुई.

जैरतन के मुंह से सिर्फ यही निकला-‘‘हे भगवान’’.

वह ठगा-सा वहीं पोखर के किनारे खड़ा रह गया. उसका जी बेतरह धुकपुकाने लगा. उसका तन-मन मानो किसी ज्वार के धक्के से बहुत दूर तक बह गया.

झोपड़ी के सामने आकर, गुलबदनी ने आसमान की ओर देखा. न जाने कहां से सूने आकाश के पूर्वी कोने में बरसने वाला भरा बादल उठा आया था. सहसा हवा चली.

उसी समय गोवरधन आया.

गुलबदनी चूल्हा जलाकर, उस पर चाय बनाने लगी. उसी समय वह जैरतन वहां आया. गोवरधन ने उसे अपने पास बैठा लिया.

‘‘गोवरधन भाई, देखो न, भौजी तो लाख रुपये की है. मरदवा तू नाहीं. ऐसन मेहरारू के छोड़िकै तू कैसे यहां-वहां परदेश मा तीन-तीन साल पड़ा रहत हो.?’’

गोवरधन अपनी कड़वी मुस्कान चबाकर बोला-‘‘उजड्ड गंवार साली. उल्लू कहीं की! इहौ कोनौ मेहरारू है भला?’’

‘‘अरे!’’

जैरतन सकपका गया. इस बीच उसके साथ गुलबदनी की आंखें कई बार मिलीं.

गोवरधन बोला-‘‘देखो न, जैरतन, ई साली आज यहां भी फाट पड़ी. मैंने तो, भगवान कसम, इसे छः साल पहले ही छोड़ दिया है. इससे मेरा कोई संबंध नहीं. इसे कब का मैंने जवाब दे दिया है, कि तू कोई और घर कर ले. दुनिया में किसी भी मर्द के संग यह चली जाय. मुला इसे चाहेगा कौन?’’

गुलबदनी इस पर गोवरधन को गाली दे सकती थी, उससे झड़प सकती थी, पर आश्चर्य कि उस छन वह बिल्कुल खामोश रह गयी. जैसे वह वहां मौजूद ही न हो. जैरतन के मुंह पर ताज्जुब की रेखायें उभरी थीं. गुलबदनी गर्दन टेढ़ी कर, उसे मुख को कभी-कभी देख लेती थी!

बर्तन को आंचल से पकड़े हुए, दोनों चाय उसने मर्दों के हाथ में दे दिये. और खुद आंचल उड़ाती हुई, वह कभी झोपड़ी में जाती, कभी बाहर चूल्हे के पास आकर बैठ जाती.

लगातार कई दिनों से आसमान में उजले-उजले बादल छाये रहते. जैरतन बीच-बीच में चटकल के काम पर न जाता. वह थोड़ी देर अपनी झोपड़ी में बीमारी के बहाने पड़ा रहता, फिर पोखर पर जा बैठता. फिर वह गुलबदनी के दरवाजे पर सोपारी-कत्था खाने के लिये आता. और वह हरदम गुलबदनी की हंसी के नशे में डूब-डूब जाता. उस हंसी से हुगली, सकरइल और चटकल के ऊपर छाये हुए धवल बादल रंग से शराबोर हो उठते, भागीरथी का जल हिल उठता.

जैरतन ने मन ही मन दुहराया-‘नाम देखो कैसा है, गुलबदन! जैसा शरीर, वैसा नाम. शरीर के रंग से क्या होता है? शरीर तो गजब का है. चारों ओर उसमें फूल खिले हैं. गोवरधन सब झूठ बकता है. वह मेहरा है, मेहरा! नचनियां था न साला. नमकहराम!.कैसी हंसी है गुलबदन की. गोवरधन कहता है-‘‘इसे हंसी की बीमारी है.’’ झुट्ठा कहीं का.’

जैरतन को गुलबदनी ने आर-पार बेध दिया है. आठों पहर अपलक तिरछे नयनों की चितवन.

और एक दिन अकस्मात इसी चितवन को गोवरधन ने देख लिया. उसमें घृणा, क्रोध, कौतुहल, सारे आकर एक साथ जागे. अपनी पूरी जिन्दगी में उसने कभी भी ऐसा नहीं अनुभव किया था.

वह अपना घूमता हुआ सिर थाम कर बैठ गया. ‘हे भगवान, ई क्या है. ई कैसी विपत्ति?’

आंखों की वह चितवन कभी गोवरधन को चटकल के उस कारखाने में डंसने लगती, कभी एकाएक उसकी झोपड़ी के

अंधेरे में, कभी पोखर के तट पर, कभी भागीरथी के चुने मैदान में और कभी नारियल तथा केला बगान में. गुलबदनी और जैरतन के वह हंसते हुए मुखड़े उसे हरदम झांक-झांक जाते. ‘जा रे ससुरी गुलबदनी, तूने यह क्या किया? और यह तुझे क्या हो गया, रे ससुरा गोवरधन? यही तो ससुरा तू कब से चाह रहा था न? पर अब क्या हो गया रे? मूरख...दोखी!’

गोवरधन शांति से एक छन भी कहीं नहीं बैठ जाता था. उसे हरदम लगता था, कि उसके चारों ओर वही साली गुलबदनी उसी जैरतन को अपने गुलाबी आंचल से फूल मार कर रही है. विजयिनी आंखों से चकित कटाक्ष कर रही है. और वही व्यंग्य भरा ठहाका!

एक दिन गोवरधन पागल भालू की तरह गुलबदनी पर फाट पड़ा, और उसके बालों का झोंटा पकड़ कर, खींचता हुआ वह अपनी झोपड़ी में ले आया. कमर पर लात के प्रहार से उसे वहीं नंगी जमीन पर लिटा दिया. उसी हंसले वाले मुख पर थप्पड़ों की बौछार. उसी गदराये हुंए शरीर पर लात और डंडे की बेरहम मार.

सहसा गुलबदनी उसे झाड़कर खड़ी हो गयी, काली नागिन की तरह फन काढ़ कर. वह रोयी हुई आग. उसकी लपट उस झोपड़ी में कौंध गयी. उसने जीभ लपलपाकर, दोनों हाथों से गोवरधन का गला पकड़ लिया.

‘‘बोल, मार डालूं तुझे?’’

गुलबदनी के हाथ कांपने लगे. वह घृणा से दूर हटकर, झोपड़ी के एक कोने में जा खड़ी हुई. गोवरधन चुपचाप खड़ा था. दोनों मूर्तिवत्, खामोश.

चटकल का पहला भोंपू बजा. दूसरा. फिर तीसरा. गरदन टेढ़ी करके, गुलबदनी ने धीमें से कहा-‘‘ये हो, तुम्हीं तो पिछले छः सात साल से कहते थे, कि मैं इस दुनिया में किसी भी और मरद के संग भाग-बिड़र जाऊं. बोलो, जवाब दो मुझे.’’

गोवरधन निरुत्तर था. वह भाग कर झोपड़ी के बाहर चला आया. बड़ी देर तक वह अकेले वहीं नंगी खाट पर पड़ा रहा. झोपड़ी के भीतर से गुलबदन की निःशब्द रुलाई उभर-उभर कर गोवरधन को काट रही थी.

दिन का खाना गोवरधन ने अपने हाथ से बनाया. दाल, भात, रोटी, आलू-बैगन, की मसालेदार तरकारी.

चमचमाती धुली थाली में गरम-गरम भोजन परोसकर, गोवरधन भीतर झोपड़ी में ले गया. गुलबदन आंखें मूंदे चटाई पर पड़ी थी. उसे जगाया, और बहुत धीमे से बोला-‘‘झटपट खाले, हां. चलो, आज तुझे कलिकत्ता शहर घुमा लाऊं.’’

गुलबदन ने मान के स्वर में कहा-‘‘ये हो, मैं कहीं नहीं जाऊंगी.’’

और उन भरी आंखों से जब उसने गोवरधन को देखा, तो उस झोपड़ी में लगा, कि कोई गाते-गाते सहसा रो उठा है. भागीरथी के अथाह जल में कोई बहुत बड़ी मछली तड़पी है.

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