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संविधान अब केवल नाम के लिए∙∙∙/ आलेख / सूर्यकांत मिश्रा

गणतंत्र दिवस पर विशेष

संविधान अब केवल नाम के लिए∙∙∙

ऐसा माना जाता है कि पूरी दुनिया में जनतंत्र से पूर्व राजतंत्र का जन्म हुआ। राजतंत्र ही मनुष्य की प्रकृति के अनुकूल है, जबकि जनतंत्र विकसित व्यक्ति और समाज की आवश्यकता का परिणाम है। जैसे जैसे मनुष्य ने विकास किया और उसका समाज बनता गया, वैसे वैसे उसे अपनी सुरक्षा और कानून की जरूरत महसूस होने लगी। परिणाम स्वरूप देश को नियम और कानून की परिधि में बांधते हुए स्वतंत्रता के तुरंत बाद देश ने अपना संविधान बनाया। इस बात की गारंटी दी गयी कि देश में कानून से बढ़कर कोई नहीं होगा। अपराध पर सभी को कानून के मुताबिक सजा का भागीदार होना होगा। हम अपने गणतंत्र का सम्मान किन अर्थों पर कर रहे है, इसे बताने की शायद जरूरत नहीं होगी। ‘गण’ अर्थात देश की जनता और ‘तंत्र’ अर्थात कानून-देखा जाए तो यह नियम अब सामान्य जनता पर ही लागू हो रहा है। खास लोगों के लिए गणतंत्र के मायने कोई महत्त्व नहीं रखते। जेल में रहकर राजनीति के कर्णधार वीआईपी सुविधा के हकदार बना दिये गये है और छोटी सी गलती पर जेल में निरूद्ध कैदी शौच तक की सुविधा से वंचित हो रहे है। क्या यही है हमारा गणतंत्र? आज यह बड़ा सवाल है कि आखिर हम देश की जनता को क्या संदेश देना चाहते है?

सबके लिए समान कानून की उड़ रही धज्जियां

देश में सब के लिए समान कानून बनाया गया है। कानून की नजर में कोई गरीब, अमीर या लखपति, करोड़पति और अरबपति मायने नहीं रखता, किंतु वर्तमान कानून किस पर किस तरीके से लागू हो रहा है, यह भी चिंतन का विषय हो गया है। देश की संसद और विधानसभाओं में बैठकर कानून बनाने वालों ने ही कानून को अपनी ऊंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया है। एक सामान्य जन द्वारा किये गये लेन देन के भ्रष्टाचार को बड़ी गंभीरता से लेते हुए उसे सलाखों के पीछे पहुंचाया जा रहा है। देश की राजनीति में अपना दबदबा रखने वाले बड़े नेताओं से लेकर नेताओं की चमचागिरी करने वालों का बड़े से बड़ा अपराध भी कानून को ठेंगा दिखाने से पीछे नहीं रह रहा है। तब हम किस तरह यह मान सकते है कि देश में सभी के लिए समान कानून लागू है? कोई मवेशियों का करोड़ों का चारा पचा जाता है तो कोई करोड़ों लीटर डामर पी जाता है, तब भी सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसके ठीक विपरीत उचित मूल्य की दुकान से कुछ किलो शक्कर या केरोसीन की कालाबाजारी पर दुकान संचालक की दुकान छिन जाने के साथ उसे जेल का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या हमने अपने संविधान के 65 वर्षों में यही प्रगति की है? संविधान का सम्मान करने के स्थान पर उसे तार तार कर उपलब्ध अनुच्छेदों की मर्यादा भंग करने का दुःसाहस करने वाले देश के कर्णधारों को अब तक सबक क्यों नहीं सिखाया गया? इस सवाल का जवाब मांगते-मांगते कई लोग इस दुनिया से ही विदा हो चुके है, किंतु मनमानी अपनी चरम पर पहुंच रही है।

‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, कहां हो रहा सार्थक

नयी सरकार ने नये संकल्पों के साथ बिगड़ते हुए लिंगानुपात को पटरी पर लाने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसा सुंदर सपना संजोया और उसे फलीभूत करने करोड़ों रूपये विज्ञापन पर खर्च किये। सवाल यह उठता है कि बेटी बचाने के लिए कौन से सख्त कदम उठाये गये? आज भी भ्रूण हत्याएं रोज समाचार पत्रों की सुर्खियों में स्थान पा रही है। गैर कानूनी रूप से गर्भपात कराने वाले चिकित्सक और नर्सिंग होम पर कार्यवाही न होना भी राजनैतिक संरक्षण के रूप में सामने आ रहा है। अपने भाग्य से इस धरती पर पैदा होने वाली बेटियों का पोषण आहार तक छीना जा रहा है। ‘रेडी टू ईट फुड योजना’ अपने उद्देश्यों से भटकी हुई है। महिला समूहों द्वारा दी गयी जवाबदारी भी भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है। शासन द्वारा बेटियों के लालन-पालन से लेकर अन्य प्रकार की योजनाओं का फंड भी जवाबदार अधिकारी डकार रहे है और कानून वहीं के वहीं पड़ा हुआ है। कन्या महाविद्यालय की शिक्षा व्यवस्था पढ़ाने वालों की कमी से लेकर पुस्तकों के अभाव तक स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है। कानून में संशोधन करते हुए नयी-नयी योजनाओं को लागू कर देने भर से देश का भला नहीं होगा। उसके क्रियान्वयन पर कड़ी नजर ही कुछ सुकून भरा परिणाम दे सकती है।

‘तंत्र’ को ‘गण’ से ही लग रहा ग्रहण

देश के ‘तंत्र’ को ग्रहण लगाने का काम देश के ‘गण’ अर्थात जनता द्वारा ही किया जा रहा है। हम सभी जानते है कि भ्रष्टाचार की जड़ें हमारे द्वारा ही मजबूत की गयी है। हमारे छोटे से काम को पूरा कराने के लिए हम खुद ही संबंधित अधिकारी या बाबू को रूपयों की लालच देकर ‘तंत्र’ की बखिया उधेड़ रहे है। ऐसे कोई कारण नहीं कि वैध रूप से करायेे जाने वाले किसी काम के लिए हमें गलत कदम उठाने पड़े। शासकीय कार्यालयों में किसी काम के लिए दिया गया आवेदन समय सीमा के अंदर स्वयं ही प्रक्रिया में लिया जाना आचरण संहिता में शामिल है। बावजूद इसके हम स्वयं समय सीमा का उल्लंघन करते हुए भ्रष्टाचार की जड़े मजबूत कर रहे है। अब जबकि हमारे हाथ में अनेक नये कानूनों का डंडा है, फिर भी हम अपना आचरण नहीं सुधार पा रहे है। किसी भी प्रकार के कार्य में रूकावट का कारण हम सूचना का अधिकार कानून द्वारा आसानी से पा सकते है। फिर भी हम देश के भ्रष्ट लोगों की करतूतों को सामने लाने में भय खा रहे है। ऐसे में संविधान में सम्मिलित अनुच्छेदों का पालन किन अंशों में हो पाएगा इसे हम बखूबी समझ सकते है। हम अपने ‘तंत्र’ अथवा विधान को अक्षुण्ण रखने संकल्पित हो जाएं तो ‘गणतंत्र’ के आदर्शों का एक अच्छा मार्ग पूरे समाज के सामने ला सकते है। भ्रष्टाचार और कामचोरी की मोटी होती दीवारों पर छेद करने का संकल्प उसे ढहाने तक विस्तृत कर हम अपने संविधान की रक्षा कर सकते है।

असहिष्णुता कहकर संविधान का किया अपमान

हमारे संविधान में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि यह एक धर्म निरपेक्ष राज्य है। यही हमारे देश का मूल आधार भी है। भारतीय संविधान में सभी भारतीय नागरिकों के अधिकार और स्वत्व की रक्षा का वचन दिया गया है। इसमें लोकतंत्रात्मक परंपराओं के निर्वाह की पूर्ण रूप से व्यवस्था की गयी है। इन सारी विशेषताओं के चलते ही भारतीय संविधान धर्म निरपेक्षता की अडिग शिला पर दृढ़ता से टिका हुआ है। बावजूद इन सबके देश के भीतर असहिष्णुता जैसे शब्द का बीजारोपण कर कतिपय लोगों ने संविधान का अपमान किया है। हमारे संविधान के साथ ही भारतीय संस्कृति का मुख्य उद्देश्य ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाएं’ है। पूरे विश्व में ऐसा देश नहीं या ऐसा संविधान नहीं जो भाईचारे और सर्वधर्म की रक्षा का संकल्प समेटे हो। वास्तव में गणतंत्र पर्व के रूप में 26 जनवरी एक महिमामयी तिथि है। इसमें भारतीय जनता के त्याग, तपस्या और बलिदानों की अमर कहानी हर पीढ़ी को ऊर्जा प्रदान करती देखी जा सकती है। जिस देश में जाति और धर्म इंसानों से बढ़कर नहीं, उस देश पर लांछन लगाना देश के प्रति गद्दारी से कम नहीं माना जाना चाहिए। 26 जनवरी अथवा गणतंत्र पर्व की मान मर्यादा के लिए आवश्यक है कि हम पारस्परिक भेदभाव का त्याग कर सहयोग और एकता पर विश्वास करें। अज्ञान के अंधकार से निकलकर ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर हो। कोई ऐसा काम न करे कि हमारी पीढ़ी उसने लिए हमें क्षमा न करे सके।

                                                                                    

  (डॉ∙ सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो∙ नंबर 94255-59291

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