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शब्दवेध: शब्दों के संसार मेँ सत्तर साल - एक कृतित्व कथा / आत्मकथा / अरविंद कुमार

शब्दवेध: शब्दों के संसार मेँ सत्तर साल - एक कृतित्व कथा

लेखक: अरविंद कुमार

प्रकाशक: अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 11००65

संपर्क.. मीता लाल @ ०9810016568  / lallmeeta@gmail.com

मूल्य: रु. 799. 00

संक्षिप्त परिचय

शब्दवेध एक ऐसे किशोर की प्रेरक आत्मकथा है जो 'जीवन के दरिया में थपेड़े खाता, लहरों के संग उठता गिरता, हिचकोले खाता, रौ के साथ अनसोचे बहता चलता बेहद हलका फलका तिनका था. जिस के जीवन के फैसले दूसरे ले रहे थे. लेकिन हर बदलती लहर के साथ हाथ पैर मारता डूबने से बचता रहा... और मन ही मन सपने बनता रहा. ' और धीरे धीरे अपनी जिजीविषा और ज्ञानेच्छा के सहारे शाम के समय पढ़ता, आगे बढ़ता एक के बाद एक लक्ष्य की पूर्ति करता हिंदी पत्रकारिता के शिखर तक जा पहुँचा. यहाँ तक कि जो आधुनिक भारत का पहला हिंदी थिसारस समांतर कोश बना कर शब्दऋषि के नाम से जाना जाने लगा.

यह एक ऐसी किताब है जो हर नौजवान को कुछ करने के लिए उत्साहित करेगी, हर हिंदीप्रेमी को कछ नया पढ़ने को देगी, पुरातन से नवीनतम भारतीय संस्कृति को आज के ग्लोकुलित विश्व की पृष्ठभूमि मेँ समझने मेँ मदद करेगी.

गहन से गहन विषय को सहज पठनीय प्रवाहशील भाषा मैं वर्णित करने वाली अरविंद कुमार की शब्दवेध एक ओर तो गतिशीलता का उपमान है, तो दूसरी ओर हर विषय पर जानकारी से परिपूर्ण है: कोशकारिता, पत्रकारिता, हिंदी भाषा, साहित्य और सिनेमा जैसे विविध क्षेत्रों में पिछले सत्तर सालों का विहंगम पैनोरमा और दृश्यावली.

शब्दवेध की सामग्री को 1 पूर्वपीठिका, 2 समांतर सृजन गाथा, 3 तदुपरांत, 4 कोशकारिता, 5 सचूना प्रौद्योगिकी, 6 हिंदी, 7 अनुवाद, 8 साहित्य, 9 सिनेमा नामक नौ संभागों मैं संकलित किया गया है. पूर्वपीठिका में हिंदी का पहला थिसारस बनाने के संकल्प और दिल्ली पहँच कर उस महाप्रयास में पूरी तरह जुट जाने तक अरविंद के मन की उन स्थितियों का जिक्र है जिन से वह गुजरे, तो दूसरे, तीसरे और चौथे संभाग मेँ समांतर कोश के बाद उन के अनेक कोशों के निर्माण और कोशों की सामाजिकता का विशेषण इस किताब का मुख्य विषय है.

समांतर सृजन गाथा में अरविंद समांतर कोश की रचना की प्रक्रिया, समस्याओं और समाधानों का परिचय देते हैं तो तदुपरांत संभाग उन के अन्य कोशों की गाथा है.

कोशकारिता हमें ले जाता है वेदकालीन कोशों से बरास्ता अमर कोश, रोजेट के थिसारस और समांतर कोश के विश्वेषणात्मक अध्ययन तक. साथ ही पढ़ते हैँ कोशों के सामाजिक पक्ष और दायित्व पर सकारथ चर्चा, आधुनिक कोशाकिरता में सूचना प्रौद्योगिकी का महत्वपूर्ण योगदान, भारत मेँ कोशकारिता की दशा और दिशा की स्थिति.

आज की हिंदी किस तरह किन दिशाओं में जा रही है, आजादी से ले कर अब तक हिंदी के माने और विश्व के संदर्भ मेँ उस के विकास की कथा और भविष्य. पिछले सत्तर सालों मेँ हिंदी पत्रकारिता किस तरह बदली, हिंदी में सशक्त संप्रेषण के क्षेत्र मेँ क्या झंडे गाढ़े आदि विषय पर सामग्री परोसता है हिंदी संभाग.

अनुवाद और साहित्य संभाग अपने में बेहद काम की सामग्री समोए हैं: शुरूआत होती है अनुवाद मेँ कोशों और थिसारसों की भूमिका से, तो आज की दुनिया मेँ तत्काल अनुवाद की महती आवश्यकता तथा उस दिशा मेँ दुनिया भर किए जा रहे प्रयासों का ब्योरा आज हर जागरूक भाषाकर्मी के लिए अधुनातम जानकारी पेश करता है.

इंग्लैंड के राजकवि जान डाइडन ने काव्यानवाद की कला मेँ जो अनुकरणीय मानक स्थापित किए थे, वे आज भी समीचीन हैं: इस कसौटी पर खरा उतरने में अरविंद ने जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा उन के विवरण के साथ ही, वह पेश करते हैँ शैक्सपीयर के नाटक जूलियस सीजर और गोएथे के महाकाव्यात्मक जर्मन नाटक फाउस्ट एक त्रासदी के अपने काव्यानुवार्दों से उद्धरण.

साथ ही धर्मवीर भारती के काव्य नाटक अंधा युग के मंचनों की विस्तृत समीक्षा के साथ ही उन के जैनेंद्र जी से घनिष्ठ संस्मरण अपने आप मेँ संग्रहणीय हैं.

शब्दवेक्ष का अंतिम संभाग है सिनेमा. यह अंतिम तो है, लेकिन महत्व मेँ किसी से कम नहीं. यहाँ मिलती है राज कपूर और जनकवि गीतकार शैलेंद्र के संस्मरणों के बहाने फिल्म कला की अंतरंग जानकारी. माधुरी की सामाजिक समीक्षा के जरिए हम जानते हैँ किस तरह अरविंद साहित्य और सिनेमा के बीच पुल बना रहे थे.

माधुरी मेँ सब से लोकप्रिय लेखमाला थी हिंदी फिल्म इतिहास के शिलालेख. यह स्वयं अरविंद लिखते थे और इस के द्वारा उन्होंने ने एक नई साहित्यिक विधा को जन्म दिया था. यह किसी फिल्म की कोरी कहानी न हो कर यह उस का दृश्य प्रति दृश्य और शौट बाई शौट समीक्षात्मक पुनरावलोकन होता था. किसी फिल्म के द्वारा क्या सामाजिक संदेश दिया जा रहा है - यह उन की कलम से उभर कर आता था. पहले तो अरविंद बताते हैं कि यह शृंखला लिखने के लिए उन्होंने क्या विधि विधान बनाए, फिर नमूने के तौर पर पेश करते हैं कंदनलाल सहगल वाली क्लासिक फिल्म देवदास का पनरवलोकन. इस में हम पाते हैँ - पात्रों की मनोस्थिति, प्रतिक्रियाएँ, सामयिक

सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में सिनेमेटोग्राफी द्वारा प्रेषित संदेश, गीत, संगीत की बारीकियाँ. इस से पहले किसी ने किसी फिल्म का इतना गंभीर लेकिन रोचक अध्ययन नहीं किया.

कुल मिला कर शब्दवेथ इस नए साल मेँ हिंदी को और पाठक को मिला संुदर उपहार है.

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