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गाडरवारा परिक्षेत्र की जैव विविधता की संकटापन्न स्थिति / आलेख / सुशील कुमार शर्मा

हमारे आसपास का जीवन ही जैव विविधता है। जैव विविधता में हमारा पर्यावरण ,प्राकृतिक समुदाय एवं रहवासी समुदाय शामिल हैं ,संक्षेप में अगर हम जैव विविधता को परिभाषित करें तो "जैव विविधता जीने के वह तरीके हैं जिनमे प्रजातियां एक दूसरे से एवं अपने पर्यावरण से व्यवहार करतीं हैं। "प्रत्येक पर्यावरण तंत्र की अपनी जैव विविधता होती है एवं उसके व्यवहार भी अलग होते हैं। मसलन गाडरवारा परिक्षेत्र की जैव विविधता दिल्ली परिक्षेत्र से अलग होगी। जैव विविधता की दो प्रमुख अवधारणा हैं (1 ) अनुवांशिक विविधता (2 )पारिस्थितिक विविधता

  एक ही प्रजाति के विभिन्न सदस्यों के मध्य एवं विभिन्न प्रजातियों के मध्यपाई जाने वाली अनुवांशिक परिवर्तिता अनुवांशिक विविधता कहलाती है,तथा किसी जैविक समुदाय में पायी जाने वाली प्रजातियों की संख्या पारिस्थितिक विविधता कहलाती है। जैव विविधता के सिद्धांत के अंतर्गत परमाणु से लेकर पर्यावरण के सम्पूर्ण कारक जैसे मानव,जीनो टाइप ,जनसँख्या एवं प्रजातियां सम्मिलित हैं।

प्रजातियों की जनसंख्या में मनुष्य ,पालतू जानवर ,जंगली जीवन शामिल हैं। सभी जीवित प्रजातियों का जीवन चक्र क्रमिक बदलाव के दौर से गुजरता है। मनुष्य एवं जंगली जीवन की मुख्य जीवन आधार आवश्यकताएं एक जैसी हैं हवा ,पानी ,भोजन ,एवं वृद्धि। 

पौधे मनुष्य के लिए ही नहीं वरन सभी जीवित प्रजातियों के प्राणाधार हैं। हमारी दैनिक जीवनचर्या पौधों पर ही निर्भर है। हम जो भी भोजन करते हैं वो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पौधों से ही प्राप्त होता है। जंगली जीवन अपने भोजन एवं रहवास के लिए पौधों पर ही निर्भर हैं। पौधे जल चक्र को नियमित करते हैं एवं पानी के शुद्धिकरण में सहायक होते हैं। वे स्वेद (Transpiration ) अभिक्रिया द्वारा जमीन के पानी को वातावरण में पहुंचाते हैं  एवं प्रकाशसंश्लेषण की क्रिया के द्वारा भोजन बनाते समय ऑक्सीजन को वातावरण में प्रवाहित करते हैं जो की हमारी प्राण वायु है। 

ऊर्जा सभी पर्यावरण तंत्रों के लिए जरूरी है। ऊर्जा के बिना जीवन अपने अस्तित्व में नहीं रह सकता। हरे पौधे बगैर किसी जीवित वस्तु की सहायता के अपने भोजन का निर्माण करते हैं इस कारण उनको पोषक या उत्पादक (Producer ) कहा जाता है। जबकि जंतु अपने भोजन या ऊर्जा के लिए पौधों एवं अन्य जंतुओं पर निर्भर रहना पड़ता है इसलिए उन्हें उपभोक्ता (consumer ) कहा जाता है। किसी भी पर्यावरण तंत्र को व्यवस्थित करने में इन सभी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी भी पर्यावरण तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह उस तंत्र की प्रजातियों के भोजन करने एवं भोजन बनने से ही होता है।

गाडरवारा परिक्षेत्र की जैव विविधता को खतरा पहुचाने वाले कारक :-

जैव विविधता का संतुलन  अब प्राकृतिक कारणों की तुलना में मानव निर्मित कारणों से ज्यादा बिगड़ रहा है। पहले भूमि का उपयोग रहवास और कृषि कार्यों के लिए होता था, लेकिन अब शहरीकरण ,औद्योगीकरण और बढ़ती आबादी के दबाव भी जैव विविधता को संकट में डाल रहे हैं। जमीन का खनन करके जहां उसे छलनी बनाया जा रहा है, वहीं जंगलों का विनाश करके जमीन को बंजर बनाए जाने का सिलसिला जारी है। जमीन की सतह पर ज्यादा फसल उपजाने का दबाव है तो भू-गर्भ से जल, तेल व गैसों के अंधा धुंध दोहन के हालात भी भूमि पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। कुछ प्रमुख कारण  जिससे गाडरवारा परिक्षेत्र की जैव विविधता खतरे में हैं निम्न हैं। 

1. हमारी बदलती जीवन शैली एवं अंधाधुंध विकास की जिजीविषा : प्रकृति के विनाश, जनसंख्या वृद्धि, विकास की अंधाधुंध दौड़ तथा अन्य विभिन्न सामाजिक आर्थिक कारणों ने गाडरवारा परिक्षेत्र की जैव विविधता को संकटापन्न स्थितियों में ला खड़ा किया है।एक समय था जा पूरा परिक्षेत्र सघन वनों से घिरा हुआ था। हमारे घरों में हिरन ,चीतल ,सियार ,सेई ,गुलबाघ आदि का घुस आना सामान्य बात होती थी लेकिन अब जनसँख्या का फैलाव चारों ओर होने से जैव विविधता को बहुत नुकसान हुआ है। जंगल साफ हो चुके हैं ,जंगली जानवर अपने रहवासी क्षेत्रों से पलायन कर रहे हैं एवं  विलुप्तीकरण की कगार पर हैं। 

नालों का गन्दा पानी नदियों में जाकर नदी के जंतुओं एवं वनस्पतियों को नष्ट कर रहा है। रेत खनन से शक्कर ,दुधि ,नर्मदा एवं सीतारेवा नदियां के अंदर की जैव विविधता संकट में है। यहाँ के पक्षी गौरैया ,बुलबुल ,बटेर ,तीतर ,कठफुड़वा सब  विलुप्त होते जा रहे हैं। यंहा के स्थानीय फूल एवं वनस्पतियों का दिनोदिन ह्रास हो रहा है। 

2.औद्योगीकरण :-पिछले 10 वर्षों में इस परिक्षेत्र में तेजी से औद्योगीकरण हुआ है। सोयाबीन संयंत्र ,BLA कोयला खदान एवं पवार संयंत्र तथा वर्तमान में NTPC संयंत्र जो की एशिया का सबसे बड़ा संयंत्र माना जा रहा है। इन सब ने औद्योगिक विकास  के नाम पर परिक्षेत्र की जैव विवधता को नष्ट कर दिया है। कोयला खनन के लिए गोटीटोरिया के जंगलों को साफ कर दिया गया वहां रहने वाले हिरन ,शेर चीतल ,जंगली भैंसा एवं अन्य जंगली जंतुओं एवं वनस्पतियों को नष्ट कर दिया गया। जैव विविधता से भरा ये जंगल औद्योगिक विकास की भेंट चढ़ गया। 

3. फसल चक्र की अनियमिततायें :- पहले इस क्षेत्र की प्रमुख फसलें चना ,गेहूं ,ज्वार ,बाज़रा ,तिली एवं मटर हुआ करती थीं। फसलों की इस विविधता के कारण पर्यावरण संतुलन बना रहता था। पशु पक्षियों के भोजन की व्यवस्था इस फसल चक्र पर आधारित होती थी। किन्तु अधिक उपज एवं कसनी को लाभ का धंधा बनाने के कारण  इस क्षेत्र के किसान सोयाबीन ,गन्ना एवं धान को प्रमुख फसलों के रूप में उपजाने लगे इस कारण से जंतु एवं पक्षीयों के भोजन की व्यवस्था भंग हो गई तथा वे इस क्षेत्र को छोड़ कर पलायन कर गए। 

4 . औद्योगिक प्रदूषण :- सोयाबीन संयंत्र ,BLA कोयला खदान एवं पवार संयंत्र से निकलने वाले धुएं एवं गैसों के कारण आसपास के रहवासी क्षेत्रों ,फसलों एवं जीवजंतुओं को बुरी तरह से प्रभावित किया है। हवा के प्रदुषण से रहवासी क्षेत्रों के मनुष्यों में विभिन्न बिमारियों का फैलाव हुआ है आसपास के पेड़ पौधे नष्ट हो गए  एवं पक्षी पलायन कर गए हैं। गोटिटोरिया के जंगल में बहुत से औषधीय पौधे जैसे दुधि ,सफ़ेद मूसली ,शतावरी ,मीठी तुलसी ,आंवला ,मुलेठी आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते थे लेकिन कोयला खनन एवं NTPC की स्थापना ने उन जंगलों का सफाया कर दिया एवं बहुमूल्य औषधीय वनस्पति नष्ट होने की कगार पर है। 

5.शहरीकरण :-औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित होने के कारण  इस खतरा की जनसँख्या में बेतहाशा वृद्धि हुए है पिछले  पांच वर्षों में क्षेत्र की जनसँख्या में करीब  डेढ़ गुना वृद्धि होने के कारण शहरीकरण की प्रक्रिया बहुत तेजी से विकसित हुई है। गाडरवारा परिक्षेत्र की भूमि जहाँ  खेत खलिहान जैव विवधता का सरंक्षण करते थे आज वहां नव विकसित कालोनियां खडी हैं। इस शहरीकरण का प्रभाव सबसे ज्यादा जैव विविधता पर पड़ा है।   

6. ग्लोबल वार्मिंग :-ग्लोबल वार्मिंग जैव विविधता के लिए बहुत बड़ा खतरा उभर कर सामने आया है। इससे हमारा पर्यावरण तंत्र दूषित हो रहा है। वर्ष 2000 से 2012 तक क्षेत्र के औसत तापमान में करीब 1.5 से 2.5 डिग्री की औसत वृद्धि हुई है। तापमान में वृद्धि के कारन कुछ वनस्पतियाँ नष्ट हो गईं एवं कुछ पक्षियों की प्रजातियां या तो क्षेत्र छोड़ कर चली गईं या विलुप्त हो गईं। ऐसा माना जाता है कि ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने से प्रजातियों के विलुप्तीकरण का खतरा बढ़ जायेगा।

जैव विविधता का संरक्षण कैसें करें :-जैव विविधता का संरक्षण ज्यादा मुश्किल काम नहीं हैं। बहुत सी छोटी छोटी बातें हम अपने दैनिक आचरण में लेकर जैव विविधता के संरक्षण में अपना योगदान दे सकते हैं एवं जागरूकता का प्रयास कर सकते हैं।  

➤जब आप पौधा का रोपण कर रहें हो तो स्थानीय वनस्पतियों को प्रमुखता दें।

➤अगर आप गैर स्थानीय जंतुओं को पालतू बना रहे हो तो उन्हें जंगल में कतई न छोड़े।

➤स्थानीय फूलों एवं वनस्पतियों को नुकसान न पहुंचाएं।

➤जंगली जानवरों को घर का भोजन न दें।

➤ सुखी नदियों एवं जंगलों में निर्धारित सीमा से आगे वहां न ले जाएँ।

➤परम्परागत फसल चक्र के अनुसार ही खेती करें।

➤औद्योगिक संयंत्रों के आसपास सघन वृक्षारोपण करावें।

➤नदियों में गारद,गंदगी ,पूजा के फूल ,गंदे नालों का पानी इत्यादि न डालें।

➤पॉलिथीन का प्रयोग वर्जित करें।

➤बच हुआ भोजन तेल इत्यादि नालियों में प्रवाहित न करें।

➤कीटनाशकों का प्रयोग कम से कम करें। 

  सामाजिक स्तर ,औद्योगिक स्तर एवं व्यक्तिगत स्तर पर जैव विविधता के संरक्षण के लिए जागरूकता आंदोलन की आवश्यकता है। जिसमे व्यक्ति ,समाज एवं औद्योगिक इकाइयों को यह सुनिश्चित करना होगा की जैव विविधता को बचाने के लिए व्यवहारिक स्तर पर कौन कौन से उपाय व्यवहार में लाये जाएँ। 

  सुशील कुमार शर्मा

           ( वरिष्ठ अध्यापक)

         गाडरवारा

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