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मैला आँचल का यथार्थ / यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय

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यद्यपि 1952 में नागार्जुन ने 'बलचनमा' लिखकर आँचलिक उपन्यासों की फसल बो दी थी, परंतु आलोचकों का दृष्टिकोण निजी होता है । अतः अधिकां...

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यद्यपि 1952 में नागार्जुन ने 'बलचनमा' लिखकर आँचलिक उपन्यासों की फसल बो दी थी, परंतु आलोचकों का दृष्टिकोण निजी होता है । अतः अधिकांश आलोचकों ने 'रेणु' द्वारा विरचित 'मैला आँचल' (1954) को ही हिन्दी का प्रथम आँचलिक उपन्यास माना है । जबकि 'बलचनमा' में भी आँचलिकता का कम रंग नहीं है । ''प्रश्न हो सकता है कि प्रेमचंद्र ने भी ग्रामकथाएँ ली हैं, उन्हें भी आँचलिक क्यों न कहा जाए ? प्रेमचंद के उपन्यासों में गाँव के निवासियों की कथाएँ तो हैं, पर जिन उपन्यासों को ग्रामाँचल के उपन्यास कहा जाता है, उनमें गाँव की धरती, खेत-खलिहान, नदी-नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल-बैल, भाषा, गीत, त्योहार इत्यादि इनके बीच रहने वाले व्यक्तियों के साथ समवेत रूप में वाणी पाते हैं । तात्पर्य यह है कि उपन्यास के पात्रों के साथ उनका परिवेश भी बोलता है ।''1 रेणु ने अपने उपन्यासों में गामाँचल को जो प्रधानता दी है, उसके आधार पर वे अन्य लेखकों से उपयुक्त तत्वों में निश्चित ही शीर्षस्थ ठहरते हैं, अतः 'मैला आँचल' को हिन्दी का प्रथम प्रथम आँचलिक उपन्यास मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।

अपने दौर में आँचलिक उपन्यास भी खूब डट कर लिखे गये । अच्छे-अच्छे महानगरीय लेखक भी अपने कैनबास में ग्रामाँचल का चित्र खींचे बगैर नहीं रह सके । उन्होंने इस आँचलिक लेखन को एक आंदोलन का रूप देकर लोक-जीवन के प्रति लुप्त-प्रायः आकर्षण को नए सिरे से जीवित किया । अछूते अंचलों के प्रति लेखकों की दृष्टि जाने के परिणाम स्वरूप उपन्यास की रचना वस्तु का विस्तार हुआ और देश के अनेक अछूते और अपरिचित भू-भागों से हमारा परिचय हुआ । उन अंचलों के खण्ड-खण्ड जीवन के द्वारा हमारी जातीय पहचान सघन और समृद्ध हुई । अंचलों से संबंधित लोकगीत, लोकभाषा और उससे जुड़े अछूते बिम्बों-प्रतीकों ने भाषा की सर्जनात्मक क्षमताओं के नए द्वार खोले । रंग, लय और ध्वनियों के महत्व के पुनराविष्कार द्वारा उपन्यास की इतिवृत्तात्मकता को तोड़ने की कोशिश भी की गई । एक संक्षिप्त कलावधि में ही इस आंदोलन ने हिन्दी उपन्यास को बहुत कुछ ऐसा दिया जो पहले नहीं था और जिसकी अनुगूंज और प्रभाव उस पर, किसी न किसी रूप में अभी भी देखे जा सकते हैं ।

छोटे-छोटे अपरिचित अंचलों की यह खोज ही आँचलिकता का मूल कारण बनकर सामने आई । छोटे से अंचल को, जैसा कि 'मैला आँचल' के संदर्भ में 'रेणु' ने कहा, ''सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतीक मानकर यह छोटे से गोले शीशे में पूरा ताजमहल दिखाने वाला आग्रह था ।''2 अपने उपन्यास की अंतर्वस्तु की ओर संकेत करते हुए जब रेणु उसमें शूल और धूल तथा कीचड़ और चंदन एवं सुन्दरता और कुरूपता एक साथ और एक जगह ही सब कुछ होने की बात करते हैं, तो वस्तुतः वे अंचल की संपूर्णता की ही बात कर रहे होते हैं ।'' इस अंचल के सम्पूर्ण अंतर्बाह्य व्यक्तित्व को वे सम्पूर्ण निष्ठा के साथ उद्घाटित करने की बात भी करते हैं । यह निष्ठा ही वस्तुतः अपने लिए चुन गए अंचल से लेखक को एक रागात्मक और आत्मीय सूत्र से जोड़ती है । यह रागात्मकता उत्कट रूप धारण करने पर उस अंचल के प्रति एक रोमानी भावावेश में भी बदलती दिखाई देती है.........................उस अंचल के नतृत्व शास्त्रीय वैशिष्ट्य से लेकर उसका भौगोलिक परिवेश, सांस्.ति एवं लोक-तात्विक चरित्र, वेश-भूषा, राग-रंग, उत्सव-त्यौहार आदि सब कुछ अपनी समग्रता और जीवंतता में उपस्थित रहता है ।''3

आँचलिक उपन्यासों में 'मैला आँचल' सिरमौर है क्योंकि इस उपन्यास से हिन्दी उपन्यासों में एक नई बसह की शुरूआत हुई । एक ओर लोगों ने इसमें लगभग एक हजार वर्ष बाद नए सिरे से विद्यापति की प्रगाढ़, रागचेतना को पाया, वहीं दूसरी ओर लोगों ने उसे प्रेमचन्द्र की परम्परा में रखकर उसका मूल्यांकन करते हुए यह सवाल उठाया कि प्रेमचंद ने जिस प्रकार भारतीय किसान के जीवन का प्रतिनिधि चित्र अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किया, रेणु को भी क्या उसी परम्परा में रखकर देखा जा सकता है ? रेणु नेपाली क्रांति की सक्रिय राजनीति से हिन्दी में आए थे । भारतीय राजनीति में वे जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के साथ काम कर चुके थे । लेकिन साहित्य में दलगत राजनीति के प्रति वे एक निरपेक्ष दृष्टि अपनाते दिखाई देते हैं, जिसका लाभ अधिकतर उन लोगों ने लिया जो साहित्य को राजनीति से मुक्त और निरपेक्ष बनाए रखकर साहित्य और कलंा की स्वायत्तता की हिमायत करते थे ।

आधुनिकतावादी उपकरणों के सन्निवेश से गाँव का वातावरण अपने-आप बदलने लगता है । इस बदलाव में ही अवसरवादी कांग्रेसियों (स्वतंत्रता के बाद अधिकांश कांग्रेस अवसरवादी हो चुके थे) के नकाब उतार के युवा पीढ़ी के संघर्षों को जिस ढंग से चित्रित किया गया है, वह रेणु की ऐतिहासिक धारा की पहचान का सूचक है । 'मैला आँचल' का कथ्य एक भारतीय अंचल के नग्न यथार्थ से जुड़ा हुआ है । यह यथार्थ समसामयिक और एकदेशीय भी है तथा शाश्वत और भूमंडलीय भी । गरीबी और गुलामी, अशिक्षा और अंधविश्वास, शोषण और दमन, महामारी और अकाल, जातिवाद और नस्लवाद जैसी चीजें मानव इतिहास में कोई नई नहीं है और भविष्य में भी न रहेंगी, यह बहुत निश्चिय के साथ नहीं कहा जा सकता । इन्हें समाप्त करने के प्रयत्न भी होते हैं, पर सफलता अब तक नहीं मिल सकी । इस संबंध में साहित्य की भूमि यह होती है कि वह इस यथार्थ के प्रति चेतना की लौ जगाए रखे, ताकि अनुकूल समय आने पर स्थिति में बदलाव भी हो सके । उपन्यास इस काम को जितने प्रभावी ढंग से कर सकता है उतना कोई अन्य साहित्यिक विधा नहीं कर सकतजी । हिन्दी में प्रेमचंद्र ने इस यथार्थ के अनेक पहलुओं को अपने उपन्यासों में उजागकर किया था । यही काम उनकी मृत्यु के लगभग एक दशक के बाद नागार्जुन ने अपने उपन्यासों के द्वारा किया इसी परंपरा में रेणु भी आते हैं जिन्होंने अपने प्रथम उपन्यास 'मैला आँचल' में इस यथार्थ को एक नए अवलोकन बिन्दु और नई संवेदना के साथ प्रस्तुत किया ।

'मैला आँचल'' की कथावस्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के दो एक वर्ष पहले से लेकर उसके लगभग एक वर्ष बाद तक की है । जो महज तीन या चार वर्षों की कथावस्तु ठहरती है, परंतु इसका मुख्य कथानक स्वतंत्रता प्राप्ति के ईद-गिर्द की घूमता रहता है । इसका कथ्य देश भी बिहार के पूर्णिया जिले के एक अत्यंत पिछड़े गाँव मेरीगंज से जुड़ा हुआ है । इसके अलावा अन्य कथावस्तु भी हैं, जो मेरीगंज के आस-पास के इलाके से जुड़ी हुई है, जिस प्रकार कोई किसान बाजार करने के लिए कस्बे के हाट में जाता है और शाम होने पर गांव लौट आता है। ''मेरी गंज एक बड़ा गाँव है, बारहों बरन के लोग रहते हैं । गांव के पूरब एक धारा है, जिसे कमला नदी कहते हैं । बरसात में कमला भर जाती है । बाकी मौसम में बड़े-बड़े गड्डों में पानी जमा रहता है- मछलियों और कमल के फूलों से भरे हुए गड्ढ़े । पौष पूर्णिमा के दिन इन्हीं गड्ढों में कोशी स्नान के लिए सुबह से शाम तक भीड़ लगी रहती है ।'' 4 मेरीगंज की सामाजिक, आर्थिक संरचना की बनावटी भी साफ-साफ दिखाई देती है, गाँव में तीन जातियों के लोगों की प्रमुखता हैः कायस्थ, राजपूतों और यादच। तीनों जातियों के अलग-अलग टोले है। ब्राम्हाणों का भी अलग टोला है पर उनकी संख्या कम है। राजपूतों और कायस्थों में पुश्तैनी मनमुटाव ओर झगड़े होते आए है। इनके बीच ब्राम्हण, तीसरी शक्ति की भूमिका पूरी करते रहे है। कुछ दिनों से यादवों के दल ने भी जोर पकड़ा है। जनेऊ धारण कर उन्होंने अपने को यदुवंशी क्षत्रिय घोषित किया है, पर राजपूतों ने इसे मान्यता नहीं दी है। वे उन्हे 'ग्वार' भी कहते है। अभी भी वे गाँव की तीसरी शक्ति नहीं बन पाए है। गांव के अन्य जातियों के लोग सुविधानुसार इन्हीं दलों के साथ जुड़े है।

गाँव के थोड़ा बाहार एक टोला संथालों का है, जो मेरींगज का अंग है भी और नहं भी। जमींदरों और पुस्तैनी भूमिपतियोें से मिलकर उनकाा वहाँ की धरती पर केाई हक नहीं जमने दिया है। जिस जमीन पर उनके झोंपड़े हैं वह भी उनकी नहीं है।

मेरीजंग की सारी जमीन पर लगभग तीन व्यक्तियों का आधिपत्य है। कायस्थ टोली के विश्वनाथ प्रसाद मल्लिक राज्य पांरबंगा के तहसीलदार और एक हजार बीधे के काश्तकार है । शेष ग्रामीणों के पास अपनी जमीन नाममात्र की है। वे या तो खेतिहर मजदूर है या बटाईदार है। सारे मेरीगंज में केवल दस आदमी पढ़े-लिखे हैं। पढ़े -लिखे का अर्थ है। दस्तखत करने से लेकर तहसीलदार करने तक की पढाई। नए पढ़ने वालों की संख्या पंद्रह है।

यह मंरीजंग की सामाजिक-आर्थिक संरचना का बाहरी ढाँचा है इसके भीतर का सबसे तीखा संच, जिसे उजागर करना और पाठकों तक संवेदित करना उपन्यास का लक्ष्य है। बहुसंख्यक ग्रामीणों का आर्थिक विपन्न्ता, बदहाली, अत्यंत पिछड़ी, मानसिकता, अंधविश्वासग्रस्तता इत्यादि। रेणु ने इस सच का उद्घाटन डॉ. प्रशांत जैसे प्रबुद्ध पात्रों के स्वगतंिचतन या शहर में किसी के नाम लिखे गए पत्रों ओर विशेष रूप से पात्रों के स्चगतचितन या शहर में किसी के नाम लिखे गए पत्रों और विशेष रूप से पात्रों के कार्य व्यापारों के द्वारा किया है। डॉ. प्रशांत अपनी सहपाठी डॉ. ममता के पत्र में लिखता है।,'' यहाँ गड्ढों और तालाबोें में कमल के पत्ते भरे रहते है कहते है, फूलों के मौसम मे छोटी-छोटी गड़हियाँ की किस्म-किस्म के कमल और कमलिनी से भर जाती है।.................................. लेकिन यहाँ के लोगों को तुम लोटस इटर्स नहीं कह सकती हो।......................... गाँव के लोग बड़े सीधे दिखते है, सीधे का अर्थ यदि अनपढ ,आज्ञानी और अंधविश्वास हो तो वास्तव में सीधे है। जहाँ जक सांसारिक बुद्धि का सवाल है वे हमारे और तुम्हारें जैसे लोगों को दिन में पाँच बार ठग लेंगे और तारीफ यह है कि तुम ठगी जाकर भी उनकी सरलता पर मुग्ध होने के लिए मजबूर हो जाओगे।'' 7 इस कथन में गाँव के सामूहिक स्चभाव का अन्तर्विरोध बड़ी खूबसूरती के साथ व्यक्त किया गया है।

'मैला आँचल' का खम्हार 'गोदाम' के खलिहान से तनिक भी भिन्न नहीं है। 'गोदाम' की किसान भी अपने गाढ़े पसीने की कमाई से अन्न उपजाते है। पर वह उनके घरों में खुशी की लहर पैदा करने के लिए नहीं पहुँवता। सारी उपज खलिहान से ही महाजनों और साहूकारों की बखारों में, साल भर लिए हुए कर्ज की भुगतान के रूप मे चली जाती है। और फिर कर्ज का नया सिलसिला शुरू हो जाताहै। यह ब्रिटिश शासन में भूमिहीन किसानों के जीवन का कड़वा सच था, जो आजादी मिलने पर बिना किसी बदलाव के विद्यमान था। रेणु ने इस सच का चित्रण प्रेमचंद्र की तरह ही अनुभव की विश्वसनीयता और सवेदना की गहराई के साथ किया है। ''गोदान की तरह 'मेला-आँचल' में भी खेती से किसानों का अचिच्छिन भावनात्मक संबंध दिखाया गया गया है।''

गाँव में गरीबी सुरसा के मुहँ की भाँति फैली हुई है। जो अनेक ग्रामीणों को डकार चुकी है। हालात इनते पतले है। कि कोई रोग हो जाने पर ग्रामीणों के लिए दवा का प्रबधं करना मुश्किल हो जाता है। दो बूदों आई ड्रॉप के लिए पैसे न जुटा पाने के कारण लोगों का जीवन अंधकारमय हो जाता है। कई ग्रामीण कालाजार, मलेरिया, पिलही, पायरिया, गठिया इत्यादि रोगों से शिकार है बच्चे रोग से सही निदान और दवा के अभाव में देखते-देखते ऑख मूँद लेते है। और इसका इलजाम किसी डॉयन पर मढ़ दिया जाता है। अक्सर यह डायन गाँव की कोई गरीब, असहाय, बाँझ या विधवा औरत होती है। 'मैला आँचल' मे डायन संबंधी अंधविश्वास और उसके अमानवीय पहलू का बड़ा मार्मिक और रोमांचकारी अंकन हुआ है। गाँव वालों ने पारबती की मां को डायन घोषित कर रखा है। वह ग्रामीणों द्वारा सामाजिक बहिष्कार और अत्याचार की शिकार है। कालाजार के फैलने पर उसका दायित्व डायनों पर गढ़ दिया जाता है। डॉ. प्रशंात के अस्पताल मे साँप निकलता है। तो उसे पारबती की माँ की करतूत मान लिया जाता है। अंततः डायन होने के अपराध में पारबती की माँ की हत्या भी कर दी।

गाँव में अंधविश्वास अनेक रूपों में फैला हुआ है। पूरा मैरीगंज अंधविश्वासों में जी रहा होता है। अगर किसी को कोई साँप काट लेता हे। तो उसे प्रेतनी की करतूत बताया जाता है। मार्टिन साहब के खण्डहर को लेकर भी लोगों नें अंधविश्वास की कमी नहीं है कमला नदी को लेकर लोगों के बीच में अनेक मिथक ओर रूढ़ियाँ प्रचलित है। मलेरिया सेण्टर की दवाओं का निर्माण गाय के खून से होना बता कर तथा सूई भोंककर जहर देकर मार डालने की बात ब्राम्हाण समाज ने सतखण्डा पर चढ़कर जोर-जोर से लोेगों को बताकर अंधविश्वासोें को जो मजबूती दी है वह पाठक को निश्चित ही गुदगुदाती हुई एक असाध्य अज्ञानता में ले जाती है। '' गाँव का अनपढ़ और मूर्ख 'जोतिखी' अस्पताल के विरूद्ध तरह-तरह के कुप्रचार करता है। पारबती की माँ को डायन का खिताब देने वाला ज्योतिषी ही है। भूत-प्रेतों पर गाँव वालों के अटल विवास के साथ गाँव वालों को बताता है कि भूत भैंस पर सवार आदमी के पीछे-पीछे खैनी तम्बाकू मॉगता है उसके अनुसार डाकिन के पॉव उलटे होते हे और वह पेड़ की डाल से लटककर झूलती है।

गाँव अशिक्षा और अंधविश्वास के दलदल में आपादमस्तक ढूबा है। जिसके उसका निर्धन और अविकसित होना स्वाभाविक है, जिसका पूरा-पूरा फायदा गॉव की तहसीलदार, मुखिया या कोई दूसरा चालाक व्यक्ति लेता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। मेरीजंग के तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद, रामकिरपाल सिंह और खेलावन यादव ग्रामीणों की इस दयनीय और शोषित दशा का लाभ उठाकर गाँव की पूरी जमीन के मालिक बने हुए है और शेष ग्रामीण उनकी गुलामी करते हे। इस गरीब, अशिक्षा, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता आदि का कारण सादियों से चली आती सामंती और ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था है, जिसका लाभ समकालीन जमींदारों उनके कारिंदा तहसीलदारी, चतुर ब्राम्हण और कुछ भूमिधर किसान उठाते है।

रेणु प्रेमचन्द्र के सच्चे उत्तराधिकारी साबित हुए है एक ओर उन्होने ग्रामीणों की दयनीय और शोषित दशा का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया तो दूसरे ओर आजादी मिलने के कुछ पहले और उसके बाद किसानों में पैदा हुई अधिकार चेतना ओर संघर्ष प्रवृत्ति का अनूठा चित्रण किया। कालीचन इस संघर्ष -चेतना का नेतृत्व करता है।

स्वंतत्रता प्राप्ति के समय भारत के ग्रामीण अंचलों का यही सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक यथार्थ था जिसे उपन्यासकार ने अनुभव जगत् की प्रामाणिकता, सूक्ष्म पर्यवेक्षण और गरीब संवदेना के साथ प्रस्तुत किया है। गाँधीजी जी ने अपने सत्याग्रहों से स्वंतत्रता की नींव बहुत पहले रख दी थी, जिसका प्रभाव धीरे-धीरे भारत के गाँवों में भी दिखने लगा था। बावनदास, चुन्नी गोसाई , बालदेव आदि 'सुराजी' बन जाते है, जेल जाते है और तरह-तरह की तकलीफों का सामने करते है। परंतु स्वंतत्रता प्राप्ति के बाद इस राजनीति का घिनौना चेहरा सामने आने लगता है। ''बालदेव मेरीजंग लौट आता है। और अपने ':सुराजी' जीवन के अनुभवों की पूँजी पर जीने लगता है। राशनिंग होने पर सुराजी होने की कीमत के रूप में उसे कपड़ा, तेल ओर चीनी की पुर्जी काटने का काम मिल जाता है और धीरे-धीरे उसका चारित्रिक पतन होने लगता है। राजनीतिक अधिकार मिलते ही स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों का किस तरह-चारित्रिक पतन होता है। इसे बालदेव का वरित्र पूरी तरह के उद्घाटित करता है। शहर के कांग्रेसी नेता गाँव में बालदेव के प्रभाव का फायदा उठाते है।.................................... थोड़े ही दिनों में जब माँव में बालदेव का प्रभाव घट जाता है। तो जिला स्तर के नेता उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते है।''10 कांग्रेस में पनपते भ्रष्टाचार और उसकी जनविरोधी नीतियों के विरोध में साम्यवादी ओर समाजवादी पार्टियाँ उभरती है। उपन्यासकार ने बड़ी कुशलता से मरीजंग को अखिल भारतीय राजनीति मंच का लघु रूप बना दिया है।

ं''मैला आँचला' का केन्द्रीय कथ्य एक पूरे ग्रामाँचल का समग्र यथार्थ है। यह आँचलिकता की पहचान होती है कि जिसमें कथा का कोई केन्द्रीय पात्र या नायक प्रधान न होकर नायक के रूप में समग्र गाँव ही नायकत्व प्रदर्शित करता है । 'मैला आँचल' में रेणुजी ने मैरींजंग को नायकत्व की समग्रता प्रदान करने की पूरी कोशिश की है और इसमें वह पूर्णरूप से सफल भी हुए है।

आँचलिकता किसी एक तत्व में प्रदश्रित नहीं की जा सकती इसी कारण रचनाकार को कथावस्तु में अनेक तत्वों का उद्घाटन करना पड़ता है। जिसके कारण उपन्यास किसी एक उद्देश्य को प्रदर्शित करने की बजाय अनेक निष्कर्षो को प्रदर्शित करता है '' मैला आँचल '' में मेरीजंग के राजनैतिक ,सामाजिक, भौगोलिक , आर्थिक , धर्मिक इत्यादि मुद्दों के अलावा अन्य ऐसी कई अनुछुए पहलुओं को भी उजागर किया है जिन पर लेखक कलम चलाने से कतराते है। उपन्यासकार ने दिखाया है कि एक ओर डॉ. प्रशात आर कमली में सात्विक प्रेम पल्लवित हो रहा है। तो दूसरी ओर मेरीजंग में विद्यमान मठों पर रहने वाले मंहतों का चारित्रिक पतन होता जा रहा है मठ वेश्यावृत्ति के चकले बन गये है। वहां की सेविकाऍ महंतों ओर संतों की रखैलें बन गई है। इस संदर्भ मे उपन्यासकार ने सेवादार, लरसिघदास , रामदास और नागाबाबा का जिस रूप में चित्रांकन किया है उसके अनुसार वे एक से बढ़कर एक भ्रष्ट ओर चरित्रहीन व्यक्ति सिद्ध होते है। सेवादार मुकद्दमा लड़कर लक्ष्मी पर अपना अधिकार जमाता है और वकील को वचन देता है कि वह उसको पढ़ा-लिखाकर उसका विवाह कर देगा। किन्तु लक्ष्मी को मठ पर लाकर उसकी बुद्धि पलट जाती है। और वह उसको अपनी दासिन- रखैलिन बना लेता है। यही नहीं अबोध लक्ष्मी के साथ उसके दुराचार का जिस प्रकार वर्णन कराया गया है, उससे सहज ही उसे नर-पशु ही नहीं दानव ही श्रेणी में स्थान दिया जा सकता है। उसका चेला रामदास भी अपने गुरू से कम नहीं है और वह भी लक्ष्मी की निरीहवस्था का अनुचित लाभ उठाता है। बाद में लक्ष्मी के साथ उसकी दाल न गलने पर वह रामपियारिया को अपनी दासिन-रखैलिन बनाकर ले जाता है। जो पाठक के हदय में मंठो और महंतों को प्रति घृणा जाग्रत करता है।

''मैला आँचल'' हिंदी उपन्यास के इतिहास में घटना है । भाषा और रूप विधान में नयापन तो है ही, आजादी के बाद के भारत के मिजाज को व्यक्त करने वाला यह पहला उपन्यास है- आजादी के बाद बदलते हुए गाँवों की तस्वीर और इसके बीच गाँधीवादी बाबनदास की शहादत ध्यान देने योग्य है ।'' नामवरसिंह का मानना है कि रेणु का आविर्भाव एक निश्चित ऐतिहासिक परिस्थिति का परिणाम है । मतलब यह है कि रेणु में किसानों या ग्रामीण जीवन का जो गहरा अनुभव है, वह उनके बीच रहकर पैदा हुआ तथा लेखकीय प्रतिभा का विकास निरंतर पढ़ने लिखने से ।'' रेणु हिन्दी के पहले बड़े कथाकार थे जिनकी जीविका का आधार कृषि था । वे खेती के दिनों में गाँव में रहकर एक कृषक का जीवन जीते थे और शेष समय पटना में रहकर एक लेखकीय जीवन बिताते थे । इसलिए उनके कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन के इतने विविध और प्रगाढ़ चित्र मिलते हैं । ...................................रेणु का विश्वास है कि 'घृणित-कदर्य -अश्लील पशुता पर मंगल कामना का जयघोष गूँजेगा' और एक दिन आँसू से भींगी हुई धरती पर प्रेम के पौधे लहलहाएँगे और 'मैला आँचल' रोती हुई भारत माता की आँखों में आँसू नहीं होंगे, अपितु अधरों पर मुस्कान होगी । ''12 उपन्यास के शीर्षक 'मैला आँचल' भी बहुत सटीक और प्रतीकात्मक है । रेणु ने 'मैला आँचल'' में इस मैले आँचलवाली ग्रामवासिनी भारत माता की दैन्य प्रतिमा को सजीव बना दिया है । पर साथ ही उन्होंने इस प्रतिमा के भीतर छिपे सौन्दर्य और सम्भावना को भी अनदेखा नहीं किया है । अतः अपनी छोटी-मोटी त्रुटियों के बाबजूद ''मैला आँचल'' एक श्रेष्ठ औपन्यासिक .ति है ।

''भारत माता ग्रामवासिनी ।

खेतों में फैला है श्यामला ।

धूल भरा मैला-सा आँचल ।

मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी ।

भारत माता ग्रामवासिनी ।''13

 

- : संदर्भ ग्रंथ सूची :-

1. हिन्दी साहित्य का इतिहास : डॉ.नगेन्द्र, पृ.697 मयूर पेपरवैक, नौएडा (उ0प्र0)

2. मैला आँचल : रेणु, भूमिका

3. हिंदी उपन्यास का विकास : मधुरेश, पृ. 139, सुमित प्रकाशन

4. मैला आँचल : रेणु पृ. 6

5. वही, पृ. 16

6. वही, पृ. 17

7. वही, पृ. 56

8. फणीश्वर नाथ रेणु और मैला आँचल : गोपालराय, पृ. 13

9. मैला आँचल, पृ. 12

10. हिंदी कथा साहित्य : एक दृष्टि : सत्यकेतु सां.त, पृ. 96, राधा.ष्ण प्रकाशन

11. कहना न होगा : नामवर सिंह, पृ. 223

12. रेणु का है अन्दाजे बयाँ और : भारत यायावर, पृ. 127, राजकमल प्रकाशन

13. ग्राम्याः सुमित्रानंदन पंत.

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'लेखक परिचय'

नाम- यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय

पिता- श्री मुरारी लाल उपाध्याय

जन्मतिथि- 06-06-1987

शिक्षा- M.A. (हिंदी) B.Ed., NET-JRF

संप्रति- अध्यापक

शा.उ.मा.वि., शेरपुर (भिण्ड) म0प्र0

पता- माहौर गली, कोरी मोहल्ला,

रामनगर, मुरैना (म0प्र0) - 476001

मोबाईल- 07489651919

शोधार्थी- जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर (म0प्र0)

''मैला आँचल का यथार्थ''

यदुनंदन प्रसाद उपाध्याय (शोधार्थी)

जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म0प्र0)

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रचनाकार: मैला आँचल का यथार्थ / यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय
मैला आँचल का यथार्थ / यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय
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