मैला आँचल का यथार्थ / यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय

SHARE:

यद्यपि 1952 में नागार्जुन ने 'बलचनमा' लिखकर आँचलिक उपन्यासों की फसल बो दी थी, परंतु आलोचकों का दृष्टिकोण निजी होता है । अतः अधिकां...

clip_image002

यद्यपि 1952 में नागार्जुन ने 'बलचनमा' लिखकर आँचलिक उपन्यासों की फसल बो दी थी, परंतु आलोचकों का दृष्टिकोण निजी होता है । अतः अधिकांश आलोचकों ने 'रेणु' द्वारा विरचित 'मैला आँचल' (1954) को ही हिन्दी का प्रथम आँचलिक उपन्यास माना है । जबकि 'बलचनमा' में भी आँचलिकता का कम रंग नहीं है । ''प्रश्न हो सकता है कि प्रेमचंद्र ने भी ग्रामकथाएँ ली हैं, उन्हें भी आँचलिक क्यों न कहा जाए ? प्रेमचंद के उपन्यासों में गाँव के निवासियों की कथाएँ तो हैं, पर जिन उपन्यासों को ग्रामाँचल के उपन्यास कहा जाता है, उनमें गाँव की धरती, खेत-खलिहान, नदी-नाले, डबरे, पशु-पक्षी, हल-बैल, भाषा, गीत, त्योहार इत्यादि इनके बीच रहने वाले व्यक्तियों के साथ समवेत रूप में वाणी पाते हैं । तात्पर्य यह है कि उपन्यास के पात्रों के साथ उनका परिवेश भी बोलता है ।''1 रेणु ने अपने उपन्यासों में गामाँचल को जो प्रधानता दी है, उसके आधार पर वे अन्य लेखकों से उपयुक्त तत्वों में निश्चित ही शीर्षस्थ ठहरते हैं, अतः 'मैला आँचल' को हिन्दी का प्रथम प्रथम आँचलिक उपन्यास मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।

अपने दौर में आँचलिक उपन्यास भी खूब डट कर लिखे गये । अच्छे-अच्छे महानगरीय लेखक भी अपने कैनबास में ग्रामाँचल का चित्र खींचे बगैर नहीं रह सके । उन्होंने इस आँचलिक लेखन को एक आंदोलन का रूप देकर लोक-जीवन के प्रति लुप्त-प्रायः आकर्षण को नए सिरे से जीवित किया । अछूते अंचलों के प्रति लेखकों की दृष्टि जाने के परिणाम स्वरूप उपन्यास की रचना वस्तु का विस्तार हुआ और देश के अनेक अछूते और अपरिचित भू-भागों से हमारा परिचय हुआ । उन अंचलों के खण्ड-खण्ड जीवन के द्वारा हमारी जातीय पहचान सघन और समृद्ध हुई । अंचलों से संबंधित लोकगीत, लोकभाषा और उससे जुड़े अछूते बिम्बों-प्रतीकों ने भाषा की सर्जनात्मक क्षमताओं के नए द्वार खोले । रंग, लय और ध्वनियों के महत्व के पुनराविष्कार द्वारा उपन्यास की इतिवृत्तात्मकता को तोड़ने की कोशिश भी की गई । एक संक्षिप्त कलावधि में ही इस आंदोलन ने हिन्दी उपन्यास को बहुत कुछ ऐसा दिया जो पहले नहीं था और जिसकी अनुगूंज और प्रभाव उस पर, किसी न किसी रूप में अभी भी देखे जा सकते हैं ।

छोटे-छोटे अपरिचित अंचलों की यह खोज ही आँचलिकता का मूल कारण बनकर सामने आई । छोटे से अंचल को, जैसा कि 'मैला आँचल' के संदर्भ में 'रेणु' ने कहा, ''सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतीक मानकर यह छोटे से गोले शीशे में पूरा ताजमहल दिखाने वाला आग्रह था ।''2 अपने उपन्यास की अंतर्वस्तु की ओर संकेत करते हुए जब रेणु उसमें शूल और धूल तथा कीचड़ और चंदन एवं सुन्दरता और कुरूपता एक साथ और एक जगह ही सब कुछ होने की बात करते हैं, तो वस्तुतः वे अंचल की संपूर्णता की ही बात कर रहे होते हैं ।'' इस अंचल के सम्पूर्ण अंतर्बाह्य व्यक्तित्व को वे सम्पूर्ण निष्ठा के साथ उद्घाटित करने की बात भी करते हैं । यह निष्ठा ही वस्तुतः अपने लिए चुन गए अंचल से लेखक को एक रागात्मक और आत्मीय सूत्र से जोड़ती है । यह रागात्मकता उत्कट रूप धारण करने पर उस अंचल के प्रति एक रोमानी भावावेश में भी बदलती दिखाई देती है.........................उस अंचल के नतृत्व शास्त्रीय वैशिष्ट्य से लेकर उसका भौगोलिक परिवेश, सांस्.ति एवं लोक-तात्विक चरित्र, वेश-भूषा, राग-रंग, उत्सव-त्यौहार आदि सब कुछ अपनी समग्रता और जीवंतता में उपस्थित रहता है ।''3

आँचलिक उपन्यासों में 'मैला आँचल' सिरमौर है क्योंकि इस उपन्यास से हिन्दी उपन्यासों में एक नई बसह की शुरूआत हुई । एक ओर लोगों ने इसमें लगभग एक हजार वर्ष बाद नए सिरे से विद्यापति की प्रगाढ़, रागचेतना को पाया, वहीं दूसरी ओर लोगों ने उसे प्रेमचन्द्र की परम्परा में रखकर उसका मूल्यांकन करते हुए यह सवाल उठाया कि प्रेमचंद ने जिस प्रकार भारतीय किसान के जीवन का प्रतिनिधि चित्र अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किया, रेणु को भी क्या उसी परम्परा में रखकर देखा जा सकता है ? रेणु नेपाली क्रांति की सक्रिय राजनीति से हिन्दी में आए थे । भारतीय राजनीति में वे जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के साथ काम कर चुके थे । लेकिन साहित्य में दलगत राजनीति के प्रति वे एक निरपेक्ष दृष्टि अपनाते दिखाई देते हैं, जिसका लाभ अधिकतर उन लोगों ने लिया जो साहित्य को राजनीति से मुक्त और निरपेक्ष बनाए रखकर साहित्य और कलंा की स्वायत्तता की हिमायत करते थे ।

आधुनिकतावादी उपकरणों के सन्निवेश से गाँव का वातावरण अपने-आप बदलने लगता है । इस बदलाव में ही अवसरवादी कांग्रेसियों (स्वतंत्रता के बाद अधिकांश कांग्रेस अवसरवादी हो चुके थे) के नकाब उतार के युवा पीढ़ी के संघर्षों को जिस ढंग से चित्रित किया गया है, वह रेणु की ऐतिहासिक धारा की पहचान का सूचक है । 'मैला आँचल' का कथ्य एक भारतीय अंचल के नग्न यथार्थ से जुड़ा हुआ है । यह यथार्थ समसामयिक और एकदेशीय भी है तथा शाश्वत और भूमंडलीय भी । गरीबी और गुलामी, अशिक्षा और अंधविश्वास, शोषण और दमन, महामारी और अकाल, जातिवाद और नस्लवाद जैसी चीजें मानव इतिहास में कोई नई नहीं है और भविष्य में भी न रहेंगी, यह बहुत निश्चिय के साथ नहीं कहा जा सकता । इन्हें समाप्त करने के प्रयत्न भी होते हैं, पर सफलता अब तक नहीं मिल सकी । इस संबंध में साहित्य की भूमि यह होती है कि वह इस यथार्थ के प्रति चेतना की लौ जगाए रखे, ताकि अनुकूल समय आने पर स्थिति में बदलाव भी हो सके । उपन्यास इस काम को जितने प्रभावी ढंग से कर सकता है उतना कोई अन्य साहित्यिक विधा नहीं कर सकतजी । हिन्दी में प्रेमचंद्र ने इस यथार्थ के अनेक पहलुओं को अपने उपन्यासों में उजागकर किया था । यही काम उनकी मृत्यु के लगभग एक दशक के बाद नागार्जुन ने अपने उपन्यासों के द्वारा किया इसी परंपरा में रेणु भी आते हैं जिन्होंने अपने प्रथम उपन्यास 'मैला आँचल' में इस यथार्थ को एक नए अवलोकन बिन्दु और नई संवेदना के साथ प्रस्तुत किया ।

'मैला आँचल'' की कथावस्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के दो एक वर्ष पहले से लेकर उसके लगभग एक वर्ष बाद तक की है । जो महज तीन या चार वर्षों की कथावस्तु ठहरती है, परंतु इसका मुख्य कथानक स्वतंत्रता प्राप्ति के ईद-गिर्द की घूमता रहता है । इसका कथ्य देश भी बिहार के पूर्णिया जिले के एक अत्यंत पिछड़े गाँव मेरीगंज से जुड़ा हुआ है । इसके अलावा अन्य कथावस्तु भी हैं, जो मेरीगंज के आस-पास के इलाके से जुड़ी हुई है, जिस प्रकार कोई किसान बाजार करने के लिए कस्बे के हाट में जाता है और शाम होने पर गांव लौट आता है। ''मेरी गंज एक बड़ा गाँव है, बारहों बरन के लोग रहते हैं । गांव के पूरब एक धारा है, जिसे कमला नदी कहते हैं । बरसात में कमला भर जाती है । बाकी मौसम में बड़े-बड़े गड्डों में पानी जमा रहता है- मछलियों और कमल के फूलों से भरे हुए गड्ढ़े । पौष पूर्णिमा के दिन इन्हीं गड्ढों में कोशी स्नान के लिए सुबह से शाम तक भीड़ लगी रहती है ।'' 4 मेरीगंज की सामाजिक, आर्थिक संरचना की बनावटी भी साफ-साफ दिखाई देती है, गाँव में तीन जातियों के लोगों की प्रमुखता हैः कायस्थ, राजपूतों और यादच। तीनों जातियों के अलग-अलग टोले है। ब्राम्हाणों का भी अलग टोला है पर उनकी संख्या कम है। राजपूतों और कायस्थों में पुश्तैनी मनमुटाव ओर झगड़े होते आए है। इनके बीच ब्राम्हण, तीसरी शक्ति की भूमिका पूरी करते रहे है। कुछ दिनों से यादवों के दल ने भी जोर पकड़ा है। जनेऊ धारण कर उन्होंने अपने को यदुवंशी क्षत्रिय घोषित किया है, पर राजपूतों ने इसे मान्यता नहीं दी है। वे उन्हे 'ग्वार' भी कहते है। अभी भी वे गाँव की तीसरी शक्ति नहीं बन पाए है। गांव के अन्य जातियों के लोग सुविधानुसार इन्हीं दलों के साथ जुड़े है।

गाँव के थोड़ा बाहार एक टोला संथालों का है, जो मेरींगज का अंग है भी और नहं भी। जमींदरों और पुस्तैनी भूमिपतियोें से मिलकर उनकाा वहाँ की धरती पर केाई हक नहीं जमने दिया है। जिस जमीन पर उनके झोंपड़े हैं वह भी उनकी नहीं है।

मेरीजंग की सारी जमीन पर लगभग तीन व्यक्तियों का आधिपत्य है। कायस्थ टोली के विश्वनाथ प्रसाद मल्लिक राज्य पांरबंगा के तहसीलदार और एक हजार बीधे के काश्तकार है । शेष ग्रामीणों के पास अपनी जमीन नाममात्र की है। वे या तो खेतिहर मजदूर है या बटाईदार है। सारे मेरीगंज में केवल दस आदमी पढ़े-लिखे हैं। पढ़े -लिखे का अर्थ है। दस्तखत करने से लेकर तहसीलदार करने तक की पढाई। नए पढ़ने वालों की संख्या पंद्रह है।

यह मंरीजंग की सामाजिक-आर्थिक संरचना का बाहरी ढाँचा है इसके भीतर का सबसे तीखा संच, जिसे उजागर करना और पाठकों तक संवेदित करना उपन्यास का लक्ष्य है। बहुसंख्यक ग्रामीणों का आर्थिक विपन्न्ता, बदहाली, अत्यंत पिछड़ी, मानसिकता, अंधविश्वासग्रस्तता इत्यादि। रेणु ने इस सच का उद्घाटन डॉ. प्रशांत जैसे प्रबुद्ध पात्रों के स्वगतंिचतन या शहर में किसी के नाम लिखे गए पत्रों ओर विशेष रूप से पात्रों के स्चगतचितन या शहर में किसी के नाम लिखे गए पत्रों और विशेष रूप से पात्रों के कार्य व्यापारों के द्वारा किया है। डॉ. प्रशांत अपनी सहपाठी डॉ. ममता के पत्र में लिखता है।,'' यहाँ गड्ढों और तालाबोें में कमल के पत्ते भरे रहते है कहते है, फूलों के मौसम मे छोटी-छोटी गड़हियाँ की किस्म-किस्म के कमल और कमलिनी से भर जाती है।.................................. लेकिन यहाँ के लोगों को तुम लोटस इटर्स नहीं कह सकती हो।......................... गाँव के लोग बड़े सीधे दिखते है, सीधे का अर्थ यदि अनपढ ,आज्ञानी और अंधविश्वास हो तो वास्तव में सीधे है। जहाँ जक सांसारिक बुद्धि का सवाल है वे हमारे और तुम्हारें जैसे लोगों को दिन में पाँच बार ठग लेंगे और तारीफ यह है कि तुम ठगी जाकर भी उनकी सरलता पर मुग्ध होने के लिए मजबूर हो जाओगे।'' 7 इस कथन में गाँव के सामूहिक स्चभाव का अन्तर्विरोध बड़ी खूबसूरती के साथ व्यक्त किया गया है।

'मैला आँचल' का खम्हार 'गोदाम' के खलिहान से तनिक भी भिन्न नहीं है। 'गोदाम' की किसान भी अपने गाढ़े पसीने की कमाई से अन्न उपजाते है। पर वह उनके घरों में खुशी की लहर पैदा करने के लिए नहीं पहुँवता। सारी उपज खलिहान से ही महाजनों और साहूकारों की बखारों में, साल भर लिए हुए कर्ज की भुगतान के रूप मे चली जाती है। और फिर कर्ज का नया सिलसिला शुरू हो जाताहै। यह ब्रिटिश शासन में भूमिहीन किसानों के जीवन का कड़वा सच था, जो आजादी मिलने पर बिना किसी बदलाव के विद्यमान था। रेणु ने इस सच का चित्रण प्रेमचंद्र की तरह ही अनुभव की विश्वसनीयता और सवेदना की गहराई के साथ किया है। ''गोदान की तरह 'मेला-आँचल' में भी खेती से किसानों का अचिच्छिन भावनात्मक संबंध दिखाया गया गया है।''

गाँव में गरीबी सुरसा के मुहँ की भाँति फैली हुई है। जो अनेक ग्रामीणों को डकार चुकी है। हालात इनते पतले है। कि कोई रोग हो जाने पर ग्रामीणों के लिए दवा का प्रबधं करना मुश्किल हो जाता है। दो बूदों आई ड्रॉप के लिए पैसे न जुटा पाने के कारण लोगों का जीवन अंधकारमय हो जाता है। कई ग्रामीण कालाजार, मलेरिया, पिलही, पायरिया, गठिया इत्यादि रोगों से शिकार है बच्चे रोग से सही निदान और दवा के अभाव में देखते-देखते ऑख मूँद लेते है। और इसका इलजाम किसी डॉयन पर मढ़ दिया जाता है। अक्सर यह डायन गाँव की कोई गरीब, असहाय, बाँझ या विधवा औरत होती है। 'मैला आँचल' मे डायन संबंधी अंधविश्वास और उसके अमानवीय पहलू का बड़ा मार्मिक और रोमांचकारी अंकन हुआ है। गाँव वालों ने पारबती की मां को डायन घोषित कर रखा है। वह ग्रामीणों द्वारा सामाजिक बहिष्कार और अत्याचार की शिकार है। कालाजार के फैलने पर उसका दायित्व डायनों पर गढ़ दिया जाता है। डॉ. प्रशंात के अस्पताल मे साँप निकलता है। तो उसे पारबती की माँ की करतूत मान लिया जाता है। अंततः डायन होने के अपराध में पारबती की माँ की हत्या भी कर दी।

गाँव में अंधविश्वास अनेक रूपों में फैला हुआ है। पूरा मैरीगंज अंधविश्वासों में जी रहा होता है। अगर किसी को कोई साँप काट लेता हे। तो उसे प्रेतनी की करतूत बताया जाता है। मार्टिन साहब के खण्डहर को लेकर भी लोगों नें अंधविश्वास की कमी नहीं है कमला नदी को लेकर लोगों के बीच में अनेक मिथक ओर रूढ़ियाँ प्रचलित है। मलेरिया सेण्टर की दवाओं का निर्माण गाय के खून से होना बता कर तथा सूई भोंककर जहर देकर मार डालने की बात ब्राम्हाण समाज ने सतखण्डा पर चढ़कर जोर-जोर से लोेगों को बताकर अंधविश्वासोें को जो मजबूती दी है वह पाठक को निश्चित ही गुदगुदाती हुई एक असाध्य अज्ञानता में ले जाती है। '' गाँव का अनपढ़ और मूर्ख 'जोतिखी' अस्पताल के विरूद्ध तरह-तरह के कुप्रचार करता है। पारबती की माँ को डायन का खिताब देने वाला ज्योतिषी ही है। भूत-प्रेतों पर गाँव वालों के अटल विवास के साथ गाँव वालों को बताता है कि भूत भैंस पर सवार आदमी के पीछे-पीछे खैनी तम्बाकू मॉगता है उसके अनुसार डाकिन के पॉव उलटे होते हे और वह पेड़ की डाल से लटककर झूलती है।

गाँव अशिक्षा और अंधविश्वास के दलदल में आपादमस्तक ढूबा है। जिसके उसका निर्धन और अविकसित होना स्वाभाविक है, जिसका पूरा-पूरा फायदा गॉव की तहसीलदार, मुखिया या कोई दूसरा चालाक व्यक्ति लेता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। मेरीजंग के तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद, रामकिरपाल सिंह और खेलावन यादव ग्रामीणों की इस दयनीय और शोषित दशा का लाभ उठाकर गाँव की पूरी जमीन के मालिक बने हुए है और शेष ग्रामीण उनकी गुलामी करते हे। इस गरीब, अशिक्षा, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता आदि का कारण सादियों से चली आती सामंती और ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था है, जिसका लाभ समकालीन जमींदारों उनके कारिंदा तहसीलदारी, चतुर ब्राम्हण और कुछ भूमिधर किसान उठाते है।

रेणु प्रेमचन्द्र के सच्चे उत्तराधिकारी साबित हुए है एक ओर उन्होने ग्रामीणों की दयनीय और शोषित दशा का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया तो दूसरे ओर आजादी मिलने के कुछ पहले और उसके बाद किसानों में पैदा हुई अधिकार चेतना ओर संघर्ष प्रवृत्ति का अनूठा चित्रण किया। कालीचन इस संघर्ष -चेतना का नेतृत्व करता है।

स्वंतत्रता प्राप्ति के समय भारत के ग्रामीण अंचलों का यही सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक यथार्थ था जिसे उपन्यासकार ने अनुभव जगत् की प्रामाणिकता, सूक्ष्म पर्यवेक्षण और गरीब संवदेना के साथ प्रस्तुत किया है। गाँधीजी जी ने अपने सत्याग्रहों से स्वंतत्रता की नींव बहुत पहले रख दी थी, जिसका प्रभाव धीरे-धीरे भारत के गाँवों में भी दिखने लगा था। बावनदास, चुन्नी गोसाई , बालदेव आदि 'सुराजी' बन जाते है, जेल जाते है और तरह-तरह की तकलीफों का सामने करते है। परंतु स्वंतत्रता प्राप्ति के बाद इस राजनीति का घिनौना चेहरा सामने आने लगता है। ''बालदेव मेरीजंग लौट आता है। और अपने ':सुराजी' जीवन के अनुभवों की पूँजी पर जीने लगता है। राशनिंग होने पर सुराजी होने की कीमत के रूप में उसे कपड़ा, तेल ओर चीनी की पुर्जी काटने का काम मिल जाता है और धीरे-धीरे उसका चारित्रिक पतन होने लगता है। राजनीतिक अधिकार मिलते ही स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों का किस तरह-चारित्रिक पतन होता है। इसे बालदेव का वरित्र पूरी तरह के उद्घाटित करता है। शहर के कांग्रेसी नेता गाँव में बालदेव के प्रभाव का फायदा उठाते है।.................................... थोड़े ही दिनों में जब माँव में बालदेव का प्रभाव घट जाता है। तो जिला स्तर के नेता उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते है।''10 कांग्रेस में पनपते भ्रष्टाचार और उसकी जनविरोधी नीतियों के विरोध में साम्यवादी ओर समाजवादी पार्टियाँ उभरती है। उपन्यासकार ने बड़ी कुशलता से मरीजंग को अखिल भारतीय राजनीति मंच का लघु रूप बना दिया है।

ं''मैला आँचला' का केन्द्रीय कथ्य एक पूरे ग्रामाँचल का समग्र यथार्थ है। यह आँचलिकता की पहचान होती है कि जिसमें कथा का कोई केन्द्रीय पात्र या नायक प्रधान न होकर नायक के रूप में समग्र गाँव ही नायकत्व प्रदर्शित करता है । 'मैला आँचल' में रेणुजी ने मैरींजंग को नायकत्व की समग्रता प्रदान करने की पूरी कोशिश की है और इसमें वह पूर्णरूप से सफल भी हुए है।

आँचलिकता किसी एक तत्व में प्रदश्रित नहीं की जा सकती इसी कारण रचनाकार को कथावस्तु में अनेक तत्वों का उद्घाटन करना पड़ता है। जिसके कारण उपन्यास किसी एक उद्देश्य को प्रदर्शित करने की बजाय अनेक निष्कर्षो को प्रदर्शित करता है '' मैला आँचल '' में मेरीजंग के राजनैतिक ,सामाजिक, भौगोलिक , आर्थिक , धर्मिक इत्यादि मुद्दों के अलावा अन्य ऐसी कई अनुछुए पहलुओं को भी उजागर किया है जिन पर लेखक कलम चलाने से कतराते है। उपन्यासकार ने दिखाया है कि एक ओर डॉ. प्रशात आर कमली में सात्विक प्रेम पल्लवित हो रहा है। तो दूसरी ओर मेरीजंग में विद्यमान मठों पर रहने वाले मंहतों का चारित्रिक पतन होता जा रहा है मठ वेश्यावृत्ति के चकले बन गये है। वहां की सेविकाऍ महंतों ओर संतों की रखैलें बन गई है। इस संदर्भ मे उपन्यासकार ने सेवादार, लरसिघदास , रामदास और नागाबाबा का जिस रूप में चित्रांकन किया है उसके अनुसार वे एक से बढ़कर एक भ्रष्ट ओर चरित्रहीन व्यक्ति सिद्ध होते है। सेवादार मुकद्दमा लड़कर लक्ष्मी पर अपना अधिकार जमाता है और वकील को वचन देता है कि वह उसको पढ़ा-लिखाकर उसका विवाह कर देगा। किन्तु लक्ष्मी को मठ पर लाकर उसकी बुद्धि पलट जाती है। और वह उसको अपनी दासिन- रखैलिन बना लेता है। यही नहीं अबोध लक्ष्मी के साथ उसके दुराचार का जिस प्रकार वर्णन कराया गया है, उससे सहज ही उसे नर-पशु ही नहीं दानव ही श्रेणी में स्थान दिया जा सकता है। उसका चेला रामदास भी अपने गुरू से कम नहीं है और वह भी लक्ष्मी की निरीहवस्था का अनुचित लाभ उठाता है। बाद में लक्ष्मी के साथ उसकी दाल न गलने पर वह रामपियारिया को अपनी दासिन-रखैलिन बनाकर ले जाता है। जो पाठक के हदय में मंठो और महंतों को प्रति घृणा जाग्रत करता है।

''मैला आँचल'' हिंदी उपन्यास के इतिहास में घटना है । भाषा और रूप विधान में नयापन तो है ही, आजादी के बाद के भारत के मिजाज को व्यक्त करने वाला यह पहला उपन्यास है- आजादी के बाद बदलते हुए गाँवों की तस्वीर और इसके बीच गाँधीवादी बाबनदास की शहादत ध्यान देने योग्य है ।'' नामवरसिंह का मानना है कि रेणु का आविर्भाव एक निश्चित ऐतिहासिक परिस्थिति का परिणाम है । मतलब यह है कि रेणु में किसानों या ग्रामीण जीवन का जो गहरा अनुभव है, वह उनके बीच रहकर पैदा हुआ तथा लेखकीय प्रतिभा का विकास निरंतर पढ़ने लिखने से ।'' रेणु हिन्दी के पहले बड़े कथाकार थे जिनकी जीविका का आधार कृषि था । वे खेती के दिनों में गाँव में रहकर एक कृषक का जीवन जीते थे और शेष समय पटना में रहकर एक लेखकीय जीवन बिताते थे । इसलिए उनके कथा साहित्य में ग्रामीण जीवन के इतने विविध और प्रगाढ़ चित्र मिलते हैं । ...................................रेणु का विश्वास है कि 'घृणित-कदर्य -अश्लील पशुता पर मंगल कामना का जयघोष गूँजेगा' और एक दिन आँसू से भींगी हुई धरती पर प्रेम के पौधे लहलहाएँगे और 'मैला आँचल' रोती हुई भारत माता की आँखों में आँसू नहीं होंगे, अपितु अधरों पर मुस्कान होगी । ''12 उपन्यास के शीर्षक 'मैला आँचल' भी बहुत सटीक और प्रतीकात्मक है । रेणु ने 'मैला आँचल'' में इस मैले आँचलवाली ग्रामवासिनी भारत माता की दैन्य प्रतिमा को सजीव बना दिया है । पर साथ ही उन्होंने इस प्रतिमा के भीतर छिपे सौन्दर्य और सम्भावना को भी अनदेखा नहीं किया है । अतः अपनी छोटी-मोटी त्रुटियों के बाबजूद ''मैला आँचल'' एक श्रेष्ठ औपन्यासिक .ति है ।

''भारत माता ग्रामवासिनी ।

खेतों में फैला है श्यामला ।

धूल भरा मैला-सा आँचल ।

मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी ।

भारत माता ग्रामवासिनी ।''13

 

- : संदर्भ ग्रंथ सूची :-

1. हिन्दी साहित्य का इतिहास : डॉ.नगेन्द्र, पृ.697 मयूर पेपरवैक, नौएडा (उ0प्र0)

2. मैला आँचल : रेणु, भूमिका

3. हिंदी उपन्यास का विकास : मधुरेश, पृ. 139, सुमित प्रकाशन

4. मैला आँचल : रेणु पृ. 6

5. वही, पृ. 16

6. वही, पृ. 17

7. वही, पृ. 56

8. फणीश्वर नाथ रेणु और मैला आँचल : गोपालराय, पृ. 13

9. मैला आँचल, पृ. 12

10. हिंदी कथा साहित्य : एक दृष्टि : सत्यकेतु सां.त, पृ. 96, राधा.ष्ण प्रकाशन

11. कहना न होगा : नामवर सिंह, पृ. 223

12. रेणु का है अन्दाजे बयाँ और : भारत यायावर, पृ. 127, राजकमल प्रकाशन

13. ग्राम्याः सुमित्रानंदन पंत.

---

'लेखक परिचय'

नाम- यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय

पिता- श्री मुरारी लाल उपाध्याय

जन्मतिथि- 06-06-1987

शिक्षा- M.A. (हिंदी) B.Ed., NET-JRF

संप्रति- अध्यापक

शा.उ.मा.वि., शेरपुर (भिण्ड) म0प्र0

पता- माहौर गली, कोरी मोहल्ला,

रामनगर, मुरैना (म0प्र0) - 476001

मोबाईल- 07489651919

शोधार्थी- जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर (म0प्र0)

''मैला आँचल का यथार्थ''

यदुनंदन प्रसाद उपाध्याय (शोधार्थी)

जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म0प्र0)

COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " एक थी चिरैया " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    जवाब देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: मैला आँचल का यथार्थ / यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय
मैला आँचल का यथार्थ / यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय
https://lh3.googleusercontent.com/-kOTCW-L_RWc/VrbT1iOenEI/AAAAAAAArRA/jU6oThUDLXU/clip_image002_thumb.jpg?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-kOTCW-L_RWc/VrbT1iOenEI/AAAAAAAArRA/jU6oThUDLXU/s72-c/clip_image002_thumb.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2016/02/blog-post_57.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2016/02/blog-post_57.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content