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वैलेंटाइन से पहले और बाद का प्रेम / डॉ गुणशेखर

                 मैं जिस प्रेम की बात करने जा रहा हूँ उसका वैलेंटाइन से उतना ही लेना देना-देना जितना मुझसे या किसी भी स्त्री-पुरुष से। यह 14 फरवरी से पहले भी मेरे भीतर था और बाद में भी है। इसे किसी दिन या व्यक्ति विशेष के खूँटे से बांधा नहीं जा सकता । यह किसी को किसी से जितना बांधता या बँधता है ,उससे अधिक उसे निर्बंध  रखने में विश्वास करता है। इसका काम और वासना से उतना ही लेना-देना है जितना कि किसी त्यागी संत की कुटिया में घुसकर शरण लेने वाले चोर का।   

                 प्रेम अपरिभाषेय तत्त्व है.इसे वासना से जोड़ना और घटाना दोनों बेवकूफ़ी भरे काम हैं.वासना और प्रेम को एक साथ बिठाना शेर और बकरी को एक घाट पर पानी पिलाना है.कामेच्छा और वासना भी अलग-अलग हैं.काम एक पुरुषार्थ है.इसके बिना न नारी पूर्ण है और न पुरुष.भगवान शिव ने इसीलिए अर्द्ध नारीश्वर रूप धारण किया था.राम और सीता का को एक दूसरे को देखना और सीता का इशारे से राम के विषय में अपनी सहेलियों से  पूछना प्रेम का स्फुरण है .इसका न काम  से कोई लेना-देना है और न वासना से.केवल पाने की इच्छा जगना प्रेम है.पाने के साथ-साथ रति कि इच्छा भी जगना काम है.इस रति की किसी भी तरह से प्राप्ति की प्रबल कामना वासना है.

              अपने मन से ऋषि के पास आई एक अप्सरा के रूप-यौवन पर वाश्वामित्र का मन ललचना काम-वासना का मिश्रित रूप तो है.लेकिन वासना का चरम रूप नहीं ही कहा जा सकता है,क्योंकि वे काम से पीड़ित नहीं हैं,प्रभावित हैं.जो काम से पीड़ित होता है और उत्तेजना में उसकी पूर्ति में लग जाता है उसे वासना माना जाना चाहिए. इसी उत्तेजना के कारण ही  पराशर ऋषि का मत्स्यगंधा के साथ संसर्ग करने के लिए कुहरा पैदा करना वासना का चरम उत्कर्ष है.

               स्त्री-पुरुष के मिलन की इच्छा काम का रूप है.यह काम संतति की प्राप्ति के साथ तृप्त होता हुआ मिलता है.यदि संतान प्राप्ति के बाद भी यह उत्तेजक रूप में  देखने को मिलता है तो निश्चय ही इस काम को वासना का अपरिमेय रूप मान  लेना चाहिए.

                प्रेम को काम और वासना से अलगाते हुए अवस्था भी एक मानदंड हो सकती है.किशोरावस्था से उपजा प्रेम ,प्रेम है काम या वासना का रूप नहीं.इसमें मिलन तक ही से संतुष्टि मिल जाती है.लेकिन यही मिलनेच्छा तरुणाई की देहरी लाँघते-लाँघते काम का रूप ले लेती है और अप्राप्यता की स्थिति में देह के नाश तक के निर्णय लेते हुए वासना में परिवर्तित होती हुई मिलती है.

              अभिभावक प्रायः यही भूल करते हैं कि वे उनके मन और देह की स्थिति और अवस्था को समझ ही  नहीं पाते हैं.यही भूल कभी-कभी अधैर्य शाली संतान तक को खो सकती है.इस मनोदशा को समझने के लिए उन्हें स्वयं के अतीत में यात्रा अवश्य करनी चाहिए.जो अभिभावक अपने वर्तमान  को अपने साथ और अतीत को संतान के साथ लेकर चलते हैं ,अपनी संतान के साथ उनके द्वंद्व कम होते हैं.द्वंद्व का कर्ण प्रायः काम और वासना होते हैं प्रेम नहीं.प्रेम तो उच्च और उदात्त  मूल्यों का धनी होता है.वह अपने प्रेमी के कारवाँ को अपनी छाती  पर से गुजर जाने देता है और उसकी पालकी के गर्दो -गुबार सहकर भी अपने प्रिय के कल्याण की ही सोचता हुआ -"कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे."के गीत गाता है.काम इससे थोड़ा स्वार्थी है .वह प्रिय की प्राप्ति के अभाव में "चाह में है और कोई,बांह में है और कोई 'के गीत गाकर  न तो स्वयं को प्रेम से संतुष्ट कर पाता  है और न सामने वाले को.काम में यह तड़पन है प्रेम में नहीं.प्रेम में प्रिय की प्राप्यता से अधिक उसकी सुरक्षा अधिक महत्त्व रखती है. वह कहीं भी रहे,सुरक्षित रहे.लेकिन काम चाहता कि वह केवल उसे और तुरंत मिले.वासना इससे और आगे है.वह चाहती है कि प्रिय तुरंत मिले और भोग के लिए तत्पर मिले.काम में मन का जो थोड़ा -बहुत रहता है,यहाँ यह भी मिट जाता है.इस तरह प्रेम और काम के निर्गुण रूप यहाँ देह के स्वरुप में सिमट जाते हैं.

  -डॉ.  गुणशेखर 
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