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प्राची - जनवरी 2016 - कहानी / भंवर / अजय

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कहानी

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अजय

जन्मः 3 अक्टूबर 1963, नालंदा (बिहार)

शिक्षाः स्नातक

कृतियांः सुबह होने तक (कविता संग्रह), सकरी के करगी (मडाही काव्य संग्रह)

हिन्दी और मडाही में कविता और कहानी लेखन. छिटपुट रचनाएं छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित

सम्पर्कः ऊर्जानगर- बी-82/162, गोड्डा (झारखण्ड)

मोः 09546296256

 

भंवर

अजय

पूरे दिन चिल्लाते उसका कंठ सूख गया. वह थका-हारा हल जुते बैल की तरह अपने घर लौट आना चाहता है, लेकिन आज का दिन तो काफी बदनसीब रहा. सांझ घिरे भी घंटों बीत गये. रात अब अपने काले साये से शहर को ढक रही है. लोगों की भीड़ अब कम हो गयी है. वह जेब में हाथ डालता है. धीरे-धीरे रुपयों की तलाशी लेता है...मात्र एक सौ बीस रुपये और कुछ सिक्के हैं. उसका हाथ जेब से वैसे ही बाहर आ गया, जैसे गर्म खिचड़ी छूकर अंगुली.

वह अपने सामान पर एक सरसरी नजर दौड़ाता है. सबकुछ तो वैसे ही पड़ा है. एक पैंट और एक फ्राक ही तो बिकी है. वही सबेरे-सबेरे की बोहनी थी. औने-पौने भाव में बेचनी पड़ी. ग्राहक का चेहरा याद कर मन कसैला हो उठा. निखट्टू सारा दिन बर्बाद कर दिया. दो-चार ग्राहक आये तो मोल-जोल करके आगे चल दिये. आखिर मेरे पास पर्याप्त पूंजी भी तो नहीं है. मनपसंद कपड़े दिखाने में खुद असमर्थ हूं. ग्राहक को क्या? जहां अच्छे मिलेंगे, वहीं खरीदेंगे.

एक बार फिर उसने बाजार को देखा, जैसे बगुला शांत एकाग्र भाव से मछली को देखता है. एक से बढ़ कर एक चमचमाती दुकानें...सामानों का अंबार लगा हुआ है. मोटे-मोटे सेठों को लोगों के हिसाब से फुर्सत नहीं. रुपयों की बरसात हो रही है. उस पार स्वर्ग, इस पार नर्क, ऊंचे लोग, मोटी पसंद, अगल-बगल दुकानों पर इक्का-दुक्का ग्राहक नजर आया. ग्राहक नहीं रहने पर समय बिताना भी मुश्किल होता है. अब दुकान समेट लेना होगा. उसने मन ही मन भगवान का स्मरण किया. उसकी आंखों में पत्नी और दो नन्हें बच्चों के मासूम चेहरे नाच-नाच उठे. उसका हृदय द्रवित हो गया. शरीर कंपकपा गया, रोम-रोग खड़ा हो गया. आज भी चूल्हा जलाने की कमाई नहीं हुई. हे भगवान! हे लक्ष्मी मां! किसी को रातों-रात धनवान बनाती हो, तो किसी को कड़ी मेहनत के बाद भी दो जून की रोटी नसीब नहीं?

उसने भारी मन से गट्ठर साइकिल पर रखा और घर का रास्ता लिया. घर लौटते उसके मन में कोई उत्साह नहीं था. साइकिल की रफ्तार भी धीमी थी. बहुत हताश-उदास साइकिल चलाते मन ही मन वेदना को झेलता रहा. जैसे-जैसे घर की दूरी घटती जा रही थी, उसके मन में बैठा हाहाकार तेज होता जा रहा था. रोज-रोज की किल्लत का कसता शिकंजा, फांसी का फंदा-सा कसता जा रहा था. उसकी सांस तेज हो गई थी. आंख निकली-निकली जान पड़ती थी. बाप रे बाप! इस महीने तो घर का खर्चा भी नहीं निकल पायेगा! एक ट्रक दहाड़ता हुआ उसके नजदीक से निकल गया. वह ट्रक से बाल-बाल बचा. उसने मन को स्थिर किया और गीत गुनगुनाया- ‘‘नाव कागज का गहरा है पानी, तुझे हर हाल में मुस्करा कर दुनियादारी पड़ेगी निभानी.’’

वह घर आया. सामान उतारा. साइकिल खड़ा किया. कपड़े बदले और हाथ मुंह धोकर बैठ गया. उसके दोनों बच्चे घुंघरू की तरह उससे लिपट गये. वह थकान और उदासी को भूल गया- ‘‘पापा, हमको भइया मारा.’’

‘‘नहीं पापा, यह झूठ बोलता है.’’

‘‘मम्मी से पूछो तो.’’

‘‘तुम्हीं तो पहले ढकेला.’’

‘‘तुम मुंह टेढ़ा करके नहीं इठलाया.’’

‘‘ढकेला तब न कुत्ता पर टंग गया, काट लेता तो?’’

‘‘काटा तो नहीं?’’

‘‘काटता तो उसको मारता.’’

नरेन्द्र को बच्चों की बातों पर हंसी आ गई. पत्नी गुमसुम मुंह ताकती रही. घर तो खाली घोंसले की तरह है, जहां दाना लेकर पक्षी आते हैं, वरना...

वह आज की स्थिति को फिर भांप गई. फिर भी हिम्मत कर पूछी- ‘‘क्या चाय दूं?’’

‘‘नहीं,’’ एक रूखा-सा जवाब नरेन्द्र ने दिया.

‘‘क्यों?’’ मुस्कुराने की कोशिश करते हुए पूछा.

‘‘मन नहीं है.’’ नरेन्द्र ने उदास मन से कहा.

सुनीता उठी और चूल्हे पर दो कप चाय रख दिया. उसने डिब्बे से किसी तरह थोड़ी-सी चाय-पत्ती निकाली और डाल दी. फिर तेज पत्ता. चीनी का डिब्बा पहले से खाली था. उसमें हाथ डाला तो जैसे उसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो. फौरन हाथ बाहर निकाल लिया और सोचने लगी. अब क्या करूं? उसने दुखी मन से थोड़ा नमक डाल कर चाय तैयार कर ली और एक कप उसकी तरफ बढ़ा कर दूसरा अपने होंठों से लगा लिया. नरेन्द्र पत्नी को भावना को समझता है. वह प्रेम से नमकीन चाय को मुंह से लगा लेता है.

वह आज एकदम मौन है. शांत और गंभीर है. भीतर ही भीतर वेदना घाव की तरह टीस रही है. क्या आज भी भूखे पेट सोना पड़ेगा? बच्चे भूखे पेट कैसे सो पायेंगे? उसका मन झल्ला उठा. सिर जैसे फट पड़ेगा. देह जैसे थका-बीमार लग रहा है. वह बेतरह कराह रहा है. भीतर ही भीतर घुट रहा है. लगा, जैसे शरीर की सारी ऊर्जा समाप्त हो गई है.

सुनीता उसके पास आती है. वह कंधे पर हाथ रख कर उसकी ठोढ़ी को हिलाते हुए कहती है- ‘‘इतनी छोटी-सी बात की इतनी चिंता? व्यापार में उतार-चढ़ाव तो होते ही रहता है. मर्द इतना चिंता करता है, आप क्या औरत हैं? कल आपके साथ मैं भी चलूंगी, नहीं तो कहीं और काम खोज लूंगी. दुनिया में एक से एक काम हैं.’’

‘‘चिंता न करो सुनीता, समय के युद्ध में मैं रोज हार रहा हूं.’’

‘‘आप अपने को हारा हुआ क्यों महसूस करते हैं. चंद दिनों की बात है. मुसीबत सारी जिंदगी के लिए थोड़े ही आती है. अंधियारी रात तो सवेरा लाने के लिए होती है.’’

‘‘मेरे आगे तो अंधेरा और घना होता जा रहा है. मैं

अंधेरों में डूबता चला जा रहा हूं. तूफान मेरी नौका को डुबो देना चाहता है. मैं जितना भी जोर लगता हूं, लहरों के भंवर उससे भी ज्यादा जोर से मुझे डुबो देना चाहते हैं. भीतर ही भीतर डूबते व्यक्ति सी बेचैनी महसूस करता हूं.’’

नरेन्द्र बोलता हुआ दोनों हाथों से सिर पकड़ कर नीचे झुका लेता है. अपने सिर पर हाथ फेरने लगता है. सुनीता बहुत सहज ढंग से जवाब देती है. ‘‘आप तो सोचते-सोचते लहरों में बह जाते हैं. आपकी नौका पर मैं भी सवार हूं. आप डार हैं तो मैं पतवार हूं. तूफानों से लड़कर निकलने का प्रयास करूंगी. अपने बच्चों को मझधार में डूबने के लिए थोड़े छोड़ दूंगी. आप अपने को असहाय, अकेला एकदम न समझें. मैं औरत ही नहीं मर्द भी हूं. ईश्वर हमारी सहायता जरूर करेंगे. रात के बाद निश्चय ही कल सवेरा होगा. दुख-चिंता करने से आदमी केवल कमजोर होता है.

बच्चे घर में ऊधम मचा रहे थे. अब वह घोड़ा और सिपाही के साथ बारात-बारात खेल रहे थे. रात के दस बज चुके थे. पड़ोस के घर से टी.वी. पर समाचार सुनाई पड़ रहे थे, ‘‘होटल के क्षेत्र में विदेशी कंपनियों में निवेश होने से लाखों लोगों को रोजगार मिलने की संभावनाएं हैं’’ और विज्ञापन शुरू हो जाता है...‘‘जी हां, मनभावन माइक्रोवेव ओवेन, जापानी टेक्नोलॉजी से बना, जल्द से जल्द प्राप्त करें.’’

नरेन्द्र इन बातों को सुनता है और सोचने लगता है, केवल जनता को ठगने की घोषणाएं. गरीब को कहीं कोई पूछनेवाला नहीं. बड़ों के विज्ञापन, पैसे वालों की पूजा. वह इस पूंजीवादी व्यवस्था पर पच्च से थूक देता है. उसे थकावट महसूस हो रही है और वह खाट बिछाकर लेट गया.

सुनीता बोली- ‘‘सोइएगा नहीं, खाना बनाती हूं.’’

वह सोच रही है, अब क्या करना चाहिए? पति को देख उसकी भी भूख गाया है, लेकिन दो अबोध बच्चे? बच्चे, ‘‘भूख लगी है, खाना दो’’ की रट लगा रहे थे.

सुनीता जानती थी, घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है. फिर भी मन के विश्वास के लिए इधर-उधर डिब्बे में अन्न खोजने लगी थी.

नरेन्द्र ने पत्नी को बुलाकर कहा, ‘‘जेब में बीस-पच्चीस रुपये हैं, आधा किलो आटा या चावल ले आओ.’’

चूल्हे पर चावल खदकने की गंध पाकर बच्चे मां के पास दौड़ कर आ गये. ‘‘कब बनेगा, भूख लगी है, जल्दी दो न!’’ वे उत्सव में उल्लास जैसे- माड़भात-माड़भात कह कर चिल्लाने लगे.

खाना बनते-बनते नरेन्द्र को नींद आने लगी.

अब इंतजार की घड़ी खत्म हो गई थी. खाना बनकर तैयार था.

बच्चों को खाना खिला कर वह नरेन्द्र से खाने का आग्रह करने लगी.

नींद से अलसाये नरेन्द्र ने कहा, ‘‘खाने का मन नहीं है.’’

सुनीता समझाते हुए उठाती है, ‘‘खा लीजिए! भूखे रहेंगे तो तबियत खराब होगी. गैस्ट्रिक फिर तंग करेगा और ऐसे समय में दवाई कहां से आयेगी? लेनी की देनी...पइसा न कौड़ी...’’

उसका मन हुआ कि कह दे, ‘इस जीवन से तो मरना अच्छा है’ लेकिन ऐसा कह कर सुनीता का दिल दुखाना नहीं चाहता था.

सुनीता को याद आ गयी, दो साल पहले की घटना...नरेन्द्र को जोरों से गैस्ट्रिक हुई थी. कुछ पचता नहीं था. उल्टी होती रहती थी, फिर बुखार आने लगा. कितनी दवाइयां खाईं तब ढेरों दिन बाद जाकर ठीक हुए. कितने पैसे खर्च हुए. कमजोरी के कारण बाचार नहीं जा पाते थे. घर की स्थिति उस समय भी ठीक नहीं थी. लाचार हो रुंधे कंठ से कह रहे थे, ‘मैं शहजादा नहीं तो क्या, तू मुमताज तो मेरे घर की हो.’

वह उठकर मांड़ भात खाने लगा था और सुनीता को भी खा लेने की जिद् कर रहा था. सुनीता बोली, ‘‘पहले आप खा लें. हमारे लिए एक कौर छोड़ दीजिएगा.’’ नरेन्द्र नहीं माना, हाथ पकड़ कर साथ बिठा लिया.

रात आधी से ज्यादा बीत रही है. नरेन्द्र स्वप्न देखता है...बाबा पूजा कर रहे हैं. वह गंगाजल, फूल, चंदन और पूजा का सामान पूजा घर में रख रहा है. बाबा पूजा करने के बाद चाय पीते हैं. संठी जलाकर बाबा की चाय बन रही है. पिताजी नौकरी से आये हैं. घर में खुशी का माहौल है. दालान पर लोग बैठे हैं, वे बतिया रहे हैं, ‘‘अमेरिका आज दुनिया का धनी देश है. रूस एक कम्यूनिष्ट देश है. वहां समाजवाद है. ऊंच-नीच नहीं है.’’ स्वप्न चलचित्र सा आगे बढ़ता है...वह बी.ए. पास कर गया है. रोजगार के लिए दौड़ रहा है. आज पटना में परीक्षा तो कल कोलकाता में साक्षात्कार. हर जगह किसी न किसी कारणवश असफल हो रहा है.

आंखें खुलती हैं. मन वितृष्णा से भर जाता है. सनसनाती हुई गुजर रही है रात! रह-रह कर कुत्ते भौंकते हैं. मन में अजीब किस्म का डर समाता है. शायद कहीं कोई रो रहा है. कोई अप्रिय घटना घटी है. वह सुनीता को टटोलता है. वह कुनमुनायी. उसके स्तनों पर से हाथ फिसलता है. एक नारी का मांसल गर्म शरीर! मन में कामवासना नहीं, ठंडा! उदास!! नरेन्द्र करवट कदल लेता है. मन में अनाप-शनाप बातें आ रही हैं. वह इसी सोच में सो गया. अर्द्ध-निंद्रा में स्वप्न फिर शुरू हो जाता है...पटना में बड़े भाई के पास रोजी-रोटी की जुगाड़ में आया है. खाने-रहने की कोई दिक्कत नहीं.

भाभी पप्पू को पीटते हुए कहती हैं, ‘‘पढ़ना-लिखना साढ़े बाइस, खाओ और ऐय्याशी करो.’’ लेकिन भाभी का ताना उसे बर्दाश्त नहीं होता. वह भाग कर घर आता है. खेती-बारी के काम में लग जाता है. मेहनत-मजदूरी, खाद-पानी और बचत...? वही ढाक के तीन पात. उसने तय किया, वह खेती में जान नहीं देगा. वह धनबाद गया- केशवचन्द साहू के पास नौकरी करने. बहुत ही ईमानदारी से काम करता है, परन्तु दुकान से चोरी करने का दोष लगता है. बेइज्जती, मार-पीट, गाली-गलौज् और अब फुटपाथ पर कपड़े बेचता है- बीस में एक पैंट-शर्ट. अपने बाबू के लिए, अपनी मुलिया के लिए. अब थोड़ी बची है.

तभी पुलिस अपना महीना लेने आ पहुंचती है, ‘‘महीना दो.’’

वह मुंह ताकता चुप है.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘अभी नहीं है सर! पैसा होने पर पहुंचा दूंगा!’’

पुलिसवाला कपड़ों के गट्ठर हाथ में लेकर कहता है, ‘‘बहुत देखी तेरी बहानेबाजी.’’

‘‘सर! बिक्री-बट्टा नहीं है.’’ वह हाथ जोड़कर कहता है.

बगलवाला दुकानदार मन ही मन खुश है. साला, बड़ा भाषण झाड़ता था. पुलिस ने पैर से उसे ढकेल दिया. सड़क पर वह चारों खाने चित्त है. पुलिस उसका कपड़ा लेकर आगे बढ़ रही है. वह हड़बड़ा के उठता है, और दौड़कर पैर में लिपट जाता है. वह रोते-रोते कहता है, ‘‘माफ कीजिए सर! माफ कीजिए हाकिम!’’

पुलिस उसकी जेब की तलाशी लेती है, एक सौ बीस रुपये और कुछ पैसे हैं. वह एक सौ ले लेता है. नरेन्द्र की जेब से एक सौ रुपये निकलना जैसे उसकी देह से आत्मा निकल कर पुलिस की जेब में चली गई. तभी उसकी नींद टूट जाती है. उसकी सांस तेज चल रही है. वह थका-हारा महसूस करता है.

एक नया सवेरा हुआ है. पक्षी चहचहाने लगे हैं. सूरज की लाल किरणें धरती पर मोती छितरा रही हैं. लेकिन वह शांत है, गहन अन्तर्द्वंद्व में डूबा हुआ है. अभी तक उदास खाट पर बैठा है. फिर उठा और बाहर आकर सूरज को हाथ जोड़कर प्रणाम किया. वह ईश्वर को याद करता है. मन को शांति देता है, लेकिन दूसरे ही क्षण यथार्थ का चिंतन उसे झकझोर देता है. वह क्या करे? चिंता में डूब जाता है. बाजार की बढ़ती स्पर्धा, सरकार से कोई सहयोग नहीं, वह उलझन के मकड़जाल में फंसता जा रहा है. तभी उसकी मुट्ठियां भिंच जाती हैं, और वह तन कर खड़ा हो जाता है.

आज फिर कुछ खाये-पिये बिना बाजार चला गया. सुनीता उठी तो गठरी और साइकिल नहीं देखी. वह बुदबुदायी, ‘‘एत्ते सबेरे, बिन खइले-पीयले.’’

घर में कुछ था भी तो नहीं. उसके जाने के बाद वह खूब रोयी. मन में चिंता थी. अब लाज-मर्यादा त्याग कर कुछ काम करना ही होगा. कोई अनुचित काम नहीं करेगी. बगल की पड़ोसन उसकी सहेली है. उसने चुपके से एक बार बीस रुपये दिये थे. ऐसे ही फांकों के दिन गुजर रहे थे. आज तीन साल हो गये, लौटा नहीं पा रही है. हालांकि वह उसकी वस्तुस्थिति को खूब समझती है. उसने कहा भी, ‘‘सुनीता, तुम मेरे पैसे की फिक्र मत करना. मैं कोई सेठानी नहीं हूं, गरीब हूं और अपनी सहेली का दुख समझती हूं. मैंने अपने पति से तेरे पैसे की बात कही थी. उन्होंने भी मांगने के लिए नहीं कहा, बल्कि कहा कि और हो सके तो मदद करना.’’

सुनीता अपना धर्म समझती है. कर्ज तो आखिर कर्ज होता है, लेकिन वह बेबस और लाचार है.

बच्चे भी जाग गये हैं. वे दोनों मां से चिपक कर बैठे हैं. सुनीता शून्य आकाश की ओर ताक रही है. मन में उद्वेग थम नहीं रहा है और दोनों बेटों का सिर सहला रही है. एक जवान औरत आखिर अनजान जगह में कहां जाय? साधारण पढ़ी-लिखी है. कपड़े सीना और घर-गृहस्थी की बातें जानती है. लेकिन विश्वसनीय आदमी...और वैसे काम तो है नहीं. यहां तो आदमी ही आदमी को काटने दौड़ता है.

नरेन्द्र की साइकिल शहर छोड़ गांव की ओर मुड़ गई है. शहर भगावे तो गांव दुलारे. इधर सुनीता बच्चों को समझा रही है, ‘‘सिटकनी लगाकर भीतर ही खेलना. हम थोड़ी देर में आते हैं.’’

‘‘आउ खाय ले,’’ छोटका ने पूछा.

‘‘उसी की जुगाड़ में जा रही हूं.’’ वह दूसरे पल सोचती है...जब मरना है तो डरना कैसा? हमें लड़ना होगा, उठना होगा और बच्चों को दिलासा दे काम की खोज में निकल पड़ती है.

अब भी एक इन्द्रधनुषी सपना उगा है. व्यतिक्रम में चांद-सूरज निकलता और डूबता है.

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