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प्राची - मार्च 2016 - कहानी - आग और समुद्र / सुल्तान जमील नसीम

धरोहर कहानी

पहली सरगोशी में शादां लरज उठी. ओंठ फड़फड़ाने लगे...नियाज फौज में मारा गया!

दूसरी सरगोशी सुनकर शादां की आंखों में पानी हिलकोरें ले-लेकर बाहर निकलने के लिए मचलने लगा, जिसको वह गांववालों के लिए लायी थी, कस्बेवालों के लिए लायी थी, बल्कि पूरे सूबे के लिए लायी थी...रामस्वरूप भी उस आग में भसम हो गया.

आग और समुद्र

सुल्तान जमील नसीम

ह मजार भी है और समाधि भी.

इस मजार पर गांव के मुसलमान हर गुरुवार को चिराग जलाते हैं, फातिहा पढ़ते हैं, चन्द दुआएं मांग कर और फूल बिखेर कर चले जाते हैं.

हर बुधवार को गांव के हिंदू यहां फूल लेकर आते हैं, गंगाजल चढ़ाते हैं और मन्नतें मांग कर लौट जाते हैं.

गांव भर में कोहराम मच गया. रामभरोसे ने रोते-रोते अपनी आंखें सुजा लीं और दुख के बोझ से अपना सर दीवार पर दे मारा. अब्दुल्ला पागल-सा हो गया, उसने अपने सर के बाल नोच लिये और गरेबान चाक कर डाला. और सारा गांव तो दुखी था ही.

लाला ने आज अपनी आंखों में तैरते हुए तकद्दुस से रामभरोसे और अब्दुल्ला के दरम्यान भड़कती हुई नफरत की आग बुझा दी, उनके दिलों को अपना ख्याल, अपना गम, अपनी बेपनाह मुहब्बत देकर नफरत के इस पौधे को उखाड़ फेंका, जो परवान चढ़ के जहरीले फल और फूल देता.

बंटवारे से पहले गांववाले एक-दूसरे से भाई-चारे की जंजीर से बंधे हुए थे. अगर उदयसिंह की फसल अच्छी हो गयी तो अल्लारखा अपने तीनों भाइयों को लेकर उसकी मदद को चल पड़ा, और अगर किसी साल रमजान खां लगान न दे सका तो धनीराम ने गांववालों से कह दिया, जो कुछ तुम दे सकते हो दे दो, बाकी कमी मैं पूरी कर दूंगा. मगर बंटवारे के बाद धनीराम हिन्दू हो गया था, वह क्यों मियां भाई रमजान खां के लिए चन्दे की अपील करता? अल्लारखा मोमिन था, वह एक काफिर उदयसिंह की फसल अच्छी हो जाने पर अपने भाइयों को लेकर उसकी मदद को क्यों जाता?

इस मुल्की बंटवारे के बाद हिन्दू-हिन्दू बन गया और मुसलमान-मुसलमान हो गया था. मगर सारे गांव में खाला की बात ही ऐसी थी, जो दयानन्द की बहन के सोहाग-गीत के बोल अपने हिलते हुए दांतों से उगलती रही और मुहम्मद दीन की स्वर्गीय बीवी को मैय्यत भी दे दी.

जब अल्लारखा ने दयानन्द की बहन के सोहाग गीत गाते सुना तो कहा-बुढ़ापे में ईमान खराब कर रही है.

और जब धनीराम को यह मालूम हुआ कि उन्होंने मुहम्मद दीन की स्वर्गीय पत्नी की मैय्यत को नहलाया है, तो गुस्से में बड़बड़ाया-यह बुढ़िया पाकिस्तान क्यों नहीं चली जाती? वहां जाकर मुसलमानों के मुर्दे नहलाये?

मगर खाला को न तो धनीराम की बातों से लगाव था और न वह अल्लारखा के कहने पर ध्यान देती थी. वह सारे गांव की खाला थी. जो कुछ करतीं अपने फर्ज समझ कर.

और यही बात जब उन्होंने अल्लारखा से कही, तो उसने जवाब दिया-खाला, तुम्हें तो नमाज पढ़ते नहीं देखा पहले तो वह फर्ज पूरा करो!

खाला ने मुस्कराकर कहा-पगले, नमाज आज फर्ज नहीं रही.

अल्लारखा ने यह सुनकर जमीन पर थूका, दोनों कान पकड़कर तौबा की और बोला-खाला, क्यों बुढ़ापे में कुफ्र बनती हो!

-शान है अल्लाह की, इस उम्र में काफिर कहलायी जा रही हूं!-खाला होंठों के नीचे बड़बड़ायीं और अपनी बैसाखी टेकती हुई आगे बढ़ गयीं.

उन तमाम बातों के बावजूद खाला की लोग इज्जत करते. उनकी रोबदार आंखों से खौफ खाते थे. वे जानते थे कि खाला की जबान में बहुत असर है, और खाला के दिल में बहुत दर्द है.

इस छोटे-से गांव में खाला ने उस वक्त जनम लिया, जब नहरे सूखी और कुएं औंधे और जमीन प्यासी थी. आसमान अंगारे बरसा रहा था. फसलें सूख गयी थीं. लोग गांव छोड़कर भाग रहे थे. जो किसी वजह से गांव नहीं छोड़ सके थे, वे दुआएं मांग रहे थे जिन्दगी की और ख्वाब देख रहे थे मौत के. छोटे-से गांव के मन्दिर में हर वक्त पूजा होने लगी, भजन गाये जाने लगे, रूठे श्याम को मनाया जाने लगा और सदा खाली रहनेवाली मस्जिद लोगों से भर गयी थी, वहां नमाजें कम पढ़ी जा रही थीं और अजाने ज्यादा देकर अपनी सोयी किस्मत को जगाया जा रहा था. नूर उन्हीं में शामिल था. गांव वह भी छोड़ देता, मगर उसकी बीवी की हालत इस काबिल नहीं थी कि सफर की मुसीबतें बर्दाश्त करती, इसीलिए वह कुछ दिनों के लिए ठहर गया.

और जिस सुबह नूर के यहां बच्ची पैदा हुई, उसी सुबह की शाम को सोयी हुई किस्मतें जाग उठीं, आसमान पर घनघोर घटाएं छा गयीं और जब बरसीं, तो नहरें लम्बी अंगड़ाइयां लेने लगीं, कुएं पानी से भर गये, जमीन तर हो गयी और किसान के दिल का कंवल खिल उठा.

उस वक्त नूर खुशी के मारे पागल-सा हो गया. उसने बीच खेत सबको बता दिया-लोगों! यह सब मेरी बच्ची लायी है.

लोग नूर की इस बात से मुस्करा दिये. उनके दिल में नूर के लिए इज्जत और उसकी बच्ची के लिए मुहब्बत पैदा हो गयी...और हर पांचवें साल आनेवाला सूखा मौसम फिर कभी नहीं आया. फूल खिलते रहे, कलियां मुस्करातीं रहीं, खेत लहराते रहे, आसमान खुश होकर अपना खजाना लुटाता रहा, फिजा गुनगुनाती रही और यों ही नूर की बच्ची शादां जवान हो गयी.

लोगों ने देखा कि गांव की हसीन जवान लड़कियां, सांवली-सलोनी शादां से लग्गा नहीं खातीं, जिसकी भीनी-भीनी आंखों में चिराग-से जल रहे हैं और यही जलते हुए चिराग देखनेवालों की नजरों को चकाचौंध कर रही हैं. गांववाले अगर शादां को नजर भरके देख लेते, तो फौरन ही नजरें झुका लेते. उनका दिल इस तरह धड़कने लगता, जैसे उन्होंने कोई बड़ी बेअदबी कर दी है, जैसे किसी पीर के मजार पर जूते पहने हुए चले गए हों.

शादां की जवानी कोई गैरमामूली जवानी नहीं थी. गांव में उससे ज्यादा हसीन लड़कियां मौजूद थीं, लेकिन वह सबसे अलग नाक-नक्शेवाली सांवली-सलोनी शादां दो आंखें ऐसी लेकर आयी थी, जिनमें मुहब्बत भी थी और इज्जत भी थी, कुर्बानी का उजाला भी था और पवित्रता की रोशनी भी. उसकी उन दो आंखों में उसे सबका प्रिय और सम्माननीय बना दिया था. लेकिन दूसरों के खयालों पर काम करनेवाले हसन अली ने महसूस किया कि उसकी आंखों में लाल डोरों का एक जाल भी है और उस जाल में उसके ख्याल गिरफ्तार हैं...उन हसीं आंखों में दो नश्तर भी हैं, जो ख्यालों को अगर आजाद कर देते हैं, तो दिल में चुभने लगते हैं. दिल की यही चुभन लेकर जब वह शादां के सामने आया, तो वह मुस्करा दी. उस वक्त हसन अली ने सोचा, उन आंखों में वह जादू भी है, जो जख्मों का मरहम बन जाय.

हसन अली और शादां की मुहब्बत खामोशी से परवान चढ़ती रही...वे दूसरों से बेनियाज होकर एक-दूसरे में गुम रहे और जब शादां दुल्हन बनकर उस छोटे-से कुटियानुमा मकान में पहुंची, तब हसन अली ने यह भी महसूस किया कि उन आंखों में बहुत गहराई है, ऐसी गहराई, जिनमें डूबकर निकलने को जी नहीं चाहता. और सचमुच हसन अली की मुहब्बत शादां की गहराई से गुजरकर उसके दिल की तह तक पहुंच गयी थी, बल्कि शादां सरारा हसन अली की मुहब्बत बन गयी थी-

शादां के लिए हसन अली की जैसी चाहत और नौजवान भी रखते थे. वे थे नियाज और रामस्वरूप. नियाज शायद पहला नौजवान था, जिसने जुक्ति से काम लेकर शादां की आंखों में तैरते हुए रोब से बेनियाज होकर उसका हाथ थाम और लरजती हुई आवाज में कहा-मैं तुझे चाहता हूं!

शादां का बचपन नियाज के साथ गुजरा था. नियाज के साथ ही उसने जवानी की हदों को छुआ था. और जब नियाज की यह बात सुनी तो कुछ देर के लिए उस पर सकता-सा छा गया. उसने आंखें बंद कर लीं और बड़ी बेचारगी के लहजे में बोली-नियाज भैया, मैं तो ऐसा नहीं समझती थी.

नियाज ने उस पर नजरें गाड़ दीं. फिर अचानक उसकी आंखों में आंसू आ गये.

शादां ने आंसू देखे, तो लरजती हुई आवाज में कहा-नियाज भैया! मैं फिर...

नियाज ने तड़पकर अपना कांपता हुआ हाथ उसके होंठों पर रख दिया और दर्दीले लहजे में बोला-शादां, तू मुझे अपनी मुहब्बत नहीं दे सकती है, यह मेरी किस्मत है. लेकिन मुझसे तू इस दर्द की दौलत न छीन.

और उस दिन के बाद से नियाज के गीतों का गला घुट-सा गया. उसकी बांसुरी की लय न जाने किन वीरानों में गुम हो गयी.

और रामस्वरूप, वह तो बस चाहता था...सब-कुछ और कुछ नहीं. उस नियाज के गीतों की मौत देखी थी. उसे तो शादां से कुछ कहने की हिम्मत ही न हुई. वह तो बस उसे जब भी देख लेता, तो नजरों के साथ-साथ सर भी झुका देता और हाथ जोड़कर ओठों के नीचे गुनगुनाता-नमस्ते!

शादां की हसन अली के साथ शादी हो जाने के बाद भी रामस्वरूप उसी आस्था से नमस्ते करता रहा.

और नियाज, वह तो घबराकर गांव ही छोड़ गया. और जब वापस आया, तो उसके जिस्म पर खाकी वर्दी थी. और जेब में सोने के चन्द जेवर.

और इधर शादां की गोद में खेलता हुआ बच्चा और जब नियाज ने हसन अली की मौजूदगी में शादां के आगे अपनी जेब उलट दी तो रामस्वरूप को नियाज का व्यक्तित्व बहुत प्यारा और महान नजर आया. शादां के नन्हे-मुन्ने, खूबसूरत बच्चों के गाल में आहिस्ता से प्यार-भरी चुटकी लेकर नियाज ने हसन अली से कहा-हसन भाई, मैं फौज में चला गया हूं...बड़े मजे की जिन्दगी होती है.

हसन अली अब तक उस चमकते हुए छोटे-छोटे जेवरों को देख रहा था, जो शादां के आगे पड़े थे. नियाज की बात सुनकर चौंका. कन्धे पर हाथ रखकर आहिस्ता से बोला-अब तुम जाओगे, तो मैं भी चलूंगा तुम्हारे साथ.

-और मैं भी,-रामस्वरूप ने भी जैसे बगैर समझे-बूझे हसन अली की बात में बात मिलायी.

नियाज ने हसन अली का कन्धा थपथपाया-रामस्वरूप जा सकता है, लेकिन तुम नहीं. तुम शादां की जिन्दगी हो, इस बच्चे की जिन्दगी हो. फौज में जिन्दगी मिलती नहीं, बल्कि छिनती है.

लेकिन हसन अली के सर में न जाने क्या पागलपन समा गया था! उसकी आंखों में बस वही सुनहरे जेवर नाज रहे थे, जो नियाज लाया था. वह सोच रहा था, अगर मैं ऐसे ही सुनहरे जेवरों से शादां को सजा दूं, तो...तो...और हसन अली को न शादां की सिसकियां रोक सकीं और न नियाज के लहजे की तल्खी. वह फौज में चला ही गया.

गांव की जवान लड़कियों के कुंवारे गीत सहम गये. लय थरथराने लगी. बोल बहकने लगे. फिर ये गीत खामोश हो गये.

और इन गीतों के बजाय सरगोशियां जनम लेने लगीं धीरे-

धीरे, आहिस्ता-आहिस्ता.

पहली सरगोशी में शादां लरज उठी. ओंठ फड़फड़ाने लगे...नियाज फौज में मारा गया!

दूसरी सरगोशी सुनकर शादां की आंखों में पानी हिलकोरें ले-लेकर बाहर निकलने के लिए मचलने लगा, जिसको वह गांववालों के लिए लायी थी, कस्बेवालों के लिए लायी थी, बल्कि पूरे सूबे के लिए लायी थी...रामस्वरूप भी उस आग में भसम हो गया.

और फिर, फिर तो शादां की आंखों में ठहरे हुए समुद्र में तूफान आ गया. उसकी शान्ति की दुनिया में हलचल-सी मच गयी, गीत नोहे बन गये, सरगोशी चीख बनकर फिजां में फैल गयी, एक दुख-भरी चीख, इसलिए कि इस मरतबे हसन अली की मौत की खबर आयी थी, इसलिए कि वह शादां का गम था और शादां का गम तो गांववालों का अपना गम था. शादां ने आंसू की आड़ लेकर धड़कते हुए दिल के साथ सोचा, उस दूर देश जानेवाले मुसाफिर ने मेरे दिल को अपनी मंजिल क्यों बना लिया था?

मगर वक्त गुजरता रहा. पानी बरसता रहा. खेत लहलहाते रहे. फसलें कटती रहीं. और शादां की गोद में खेलने-वाले बच्चे को अब गांव की जरूरत नहीं रही. वह वक्त के साथ भागने की कोशिश करने लगा. और शादां उसे देखकर मुस्कराती रही, बरसते हुए बादलों की तरह.

उसकी जिन्दगी की सतह बराबर हो गयी. कभी हसन अली, कभी नियाज और कभी रामस्वरूप की याद एक कंकर बनकर आती और उसके शान्त सरोवर में हलचल मचा देती. उसके बाद वही ठहराव. वही रोज के काम. अब शादां की तमन्नाओं का एक मात्र केन्द्र उसका मुस्कराता हुआ बच्चा था, जिसको वह तमाम दिन खेलता हुआ देखकर निहाल होती रहती और रात को सीने से लगाकर तपती हुई भट्ठी को ठंडा कर लेती. लेकिन एक दिन बच्चा भी सिधार गया. न बीमारी, न हादसा, सुबह उठा तो नाक बह रही थी, रात हुई तो बुखार था और दूसरी सुबह शादां की जिन्दगी की शाम हो चुकी थी.

उस दिन से उसने अपने आंसुओं का खजाना लुटा दिया. जितना रो सकती थी, रोयी और दूसरे दिन से वह अपने रोज के कामों में बिल्कुल ऐसे लग गयी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं. अलबत्ता उसकी आंखों में रोग नजर आने लगा. पवित्रता का उजाला बढ़ गया, कुरबानी की रोशनी और फैल गयी.

जब शादां के सर पर पहला सफेद बाल आया, तो गांव के बच्चों ने उसे खाला कहना शुरू कर दिया और जब उसके

आधे से ज्यादा बाल सफेद हो गये, तो वह पूरे गांव की खाला बन गयी. गांववाले जो मुहब्बत शादां के लिए दिल में रखते थे, वह इज्जत में बदल गयी. वह इज्जत उस वक्त और बढ़ गयी जब दयानन्द की मंझली बहन की बारात मर्जी के मुताबिक दहेज न मिलने पर दरवाजे से लौट रही थी. खाला ने नियाज के दिये हुए जेवरों से हसन अली से छुपाकर जमा की हुई रकम से जानेवाली बारात के आगे दीवार खड़ी कर दी...दयानन्द खाला के कदमों पर गिर पड़ा और उसकी बहन, जिसकी बारात लौट रही थी, सोचने लगी, यह तो देवी है. इसके तो पैरों पर सर रख देना चाहिए! और वाकई जब खाला ने उसे सीने से लगाकर उसके बालों को चूमकर अपना लरजता हुआ हाथ उसके सर पर रखकर कहा-मेरी बच्ची!-तो वह देवी कहकर खाला के कदमों पर गिर पड़ी.

खाला ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया-मैं तेरी मां हूं, देवी नहीं! तू मेरी बेटी है, तू मेरा बेटा है!-खाला का गला रुंध गया.

और फिर पूरे चालीस साल के बाद आसमान ने शोलावार अंगारों से जमीन को देखा, तो किसान का दिल हदल गया. खड़ी फसल मुरझा गयी. कुएं के पानी की सतह नीची होती गयी और नहरों का पानी धरती के सीने से लगता गया. उस वक्त मन्दिर और मस्जिद फिर आबाद हो गये. और जब लोगों की दुआएं और प्रार्थनाएं बेकार जाने लगीं, तो वे कुछ सोचकर खाला के पास आये. उस वक्त खाला पर एक अजीब जलाली कैफियत छा रही थी. उसके सफेद बाल बिखरे हुए थे. आंखों में आंसू थे. जबान पर पानी-पानी!

गांववाले हालत देखकर खाला के साथ दुआएं मांगने लगे.

दूसरे दिन हल्की-हल्की फुहारें पड़ने लगीं और शाम को मूसलाधार बारिश हो गयी. गांववाले जो खाला के लिए इज्जत दिल में रखते थे, वह आस्था में बदल गयी.

और फिर यह भी खाला ही का दम था कि उन्होंने उस गांव में झगड़े की आग को न भड़कने दिया. वर्ना अब्दुल्ला और रामभरोसे तो जरा-सी बात पर एक-दूसरे से उलझकर गांववालों में फूट पैदा कर चुके थे.

खाला ने आगे बढ़कर रामभरोसे का गरेबान पकड़ लिया और चीखकर कहा-तू अगर मुसलमानों को मारने की सोच चुका है, तो आ, पहले मुझे मार डाल, इसलिए कि मैं मुसलमान हूं.

फिर अब्दुल्ला के बाल खींच लिये-तुम लोगों के दिल में अगर फसाद भरा है, तो पहले मेरे सीने को चीर डालो, इसलिए कि सब से बड़ी हिन्दू मैं हूं.

यह सुनकर रामभरोसे थर्रा गया. अब्दुल्ला कांप उठा. दोनों के हाथ ढीले पड़ गये. नजरें झुक गयीं. गांव में शान्ति छा गयी. मगर दिलों में खलिश पैदा हो चुकी थी.

दिन दहाड़े जब खाला छोटी हवेली के पास गुजरी, तो सोचा, लाओ रामभरोसे की बहू ही से दो बातें करती चलूं. खाला ने अभी देहलीज में कदम ही रखा था कि बाहर से रामभरोसे बदहवासों की तरह चीखता हुआ आया.

-खैरियत? खैरियत?-खाला ने रामभरोसे को इस तरह बदहवास देखकर पूछा.

-खैरियत कहां है, खाला? मेरा बच्चा और अब्दुल्ला का मुन्ना, दोनों आग में घिर गये! दुआ करो!-रामभरोसे एक सांस में कहता हुआ आगे बढ़ गया.

-कहां? आग कहां लग गयी है?-खाला घबराकर चीखीं.

-अब्दुल्ला के भूसे के कोठे में,-रामभरोसे ने चीखकर जवाब दिया. और अन्दर जाकर अपनी बीवी से न जाने किस चीज के बारे में तेज आवाज में पूछा.

खाला ने यह सुनकर अपनी बैसाखी फेंकी और झुकी हुई कमर के साथ तेज-तेज कदम उठाती बल्कि भागती हुई अब्दुल्ला के घर पहुंच गयी. चारों तरफ आग फैल गयी थी. लोग अब्दुल्ला को मशविरा दे रहे थे, जो कुछ भी निकाल सकता है, निकाल ले, वर्ना किसी दम इस भूसे की कोठी की आग घर तक पहुंच जायगी. अब्दुल्ला के होश-हवास गायब हो चुके थे. उसकी बीवी अपने बच्चे के गम में बेहोश पड़ी थी. और जब रामभरोसे और उसकी चीखती हुई बीवी वहां पहुंचे, तो खाला आग के शोलों में गुम हो चुकी थी. लोगों ने शोर मचाया और बूढ़ों ने खुदा और भगवान का वास्ता देकर लौट आने को कहा. मगर जब खाला शोलों में गुम हो गयी, तो सब खामोश हो गये.

खाला को आग में जाते हुए देखकर कुछ लोगों में जोश पैदा हुआ, मगर अचानक आग देख उनकी हिम्मत पिघल गयी. और अब लोग यह सोचने लगे कि इस दीवानी बुढ़िया ने पराई आग में कूदकर अपने दिल में लगी हुई आग को बुझा लिया और अब्दुल्ला और रामभरोसे के बच्चों के साथ भसम हो गयी. उस वक्त यह बात सोचनेवाले सन्न हो गये, और देखनेवालों की आंखों के साथ-साथ मुंह भी खुले रह गये, खाला दोनों बच्चों को सीने से लगाये और अपने कपड़ों में आग भड़काये चली आ रही थी. फौरन ही बच्चों को उससे अलग करके कपड़ों की आग बुझायी गयी.

खाला के सफेद बाल जल गये थे. जिस्म जल गया था. लेकिन पानी का वह खजाना, जिसे वह अपनी आंखों में गांववालों के लिए लेकर आयी थी, सूखा नहीं था. उन्होंने इशारे से अब्दुल्ला और रामभरोसे को करीब बुलाया और लड़खड़ाते लहजे में कहा-मैं अब तक तुम लोगों को हर गलत बात पर टोकती रही थी, लेकिन अब...हां, तुम दूसरों को हमेशा गलत बात पर टोकना, मेरे बच्चों! खुद कोई गलत बात न करना.

उनकी आंखों से आंसू बह निकले और फिर आंखें बन्द हो गयीं.

रामभरोसे ने अपना सर दीवार पर दे मारा...और अब्दुल्ला आधा पागल हो गया.

यह मजार भी है और समाधि भी.

इस मजार पर गांव के मुसलमान हर गुरुवार को चिराग जलाते हैं, फातिहा पढ़ते हैं, चन्द दुआएं मांग कर और फूल बिखेर कर चले जाते हैं.

हर बुधवार को गांव के हिंदू यहां फूल लेकर आते हैं, गंगाजल चढ़ाते हैं और मन्नतें मांग कर लौट जाते हैं.

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