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प्राची - जनवरी 2016 - लघुकथा / अच्छी जिन्दगी / राकेश माहेश्वरी

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अच्छी जिन्दगी

राकेश माहेश्वरी

न दिनों जब अपनी साइकिल से कॉलेज जाता था, रोज प्रिंसिपल के बंगले के सामने से निकलता था. उनकी चमचमाती हुई कार और बंगले की शानोशौकत बस देखते ही बनती थी. कितनी अच्छी जिन्दगी है यह, ऐसा मैं सोचता था. कभी-कभी खाली पीरियड में कॉलेज के ग्राउंड में अकेले बैठे-बैठे मैं अपने आप को कोसता रहता था. ‘क्या ये जिन्दगी है, लगता है नर्क से भी बदतर अभावी जीवन होता है. न चैन से सो पाता हूं और न ही अपनी मर्जी से कुछ हो पा रहा है. रोज वही घिसी-पिटी दिनचर्या से शुरुआत होती है. सुबह जल्दी उठो, छोटे भाई-बहनों को अपनी साइकिल घसीटते हुए स्कूल छोड़कर आओ. मां की अदेशी भाषा-कभी गेहूं पिसा लाओ-कभी सब्जी लेकर आओ-कभी किराना की दुकान पर जाओ तो कभी पिता की दवाई लेने जा- मन में गड़ती थी.

आज मैं उसी कॉलेज का प्रिंसिपल बन गया हूं. मेरा अपना भव्य बंगला और चमचमाती हुई नये मॉडल की कार मेरे पास है. सभी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इस घर के अंदर घुसते ही मेरा मन कॉलेज के ग्राउण्ड की तरफ जाता है. दिनभर की कॉलेज की व्यस्तता और थकान के साथ मैं जब अपने बंगले के अंदर आता हूं तो सबसे पहले मुझको अपनी छोटी बहिन दिखती है जिसका मुझको विवाह करना है. बेटा विदेश पढ़ने जाना चाहता है. बिटिया का एडमीशन मेडिकल कॉलेज में कराना है. मैं चुपचाप नेट खोलकर सभी के लिए तलाश शुरू कर देता हूं. ऐसे ही रोज कोई न कोई समस्या उभरती रहती है. समस्याओं का अंत नहीं. अब मां मुझसे कुछ भी नहीं कहती हैं. मां का चुपचाप रहना मुझको अखरता नहीं है. लगभग आधी रात ऐसे ही व्यतीत हो जाती है. मैं अपने लॉन में टहलते हुए अक्सर यही सोचता रहता हूं-कॉलेज के दिन कितने अच्छे थे. कितनी अच्छी जिन्दगी थी वो.

संपर्कः गली नं. 7,

नरसिंहपुर (म.प्र.)

मोः 8602114379

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