मंगलवार, 15 मार्च 2016

बालकथा :- बच्चों की सोच /

 

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        प्रत्येक वर्ष कुछ नया करने की लालसा रखने वाले बच्चों ने इस बार भी एक सपना देख रहा था। वह कोई साधारण सपना न होकर भविष्य की चिन्ता का नमूना भी था। अब आवश्यकता थी; तो यही कि यह सपना पूरा कैसे किया जाये।

        बच्चों ने आपस में बैठक कर एक दिन निश्चित कर लिया, कि विद्यालय के चारों ओर का जो खाली क्षेत्र है। उसे वृक्ष रोपण कर हरा-भरा बना दिया जाये। इसके लिए सबसे पहले विद्यालय के प्रधानाचार्य से मिलकर बात करली जाये।

        अगले दिन बच्चों की भीड़ जब प्रधानाचार्य कक्ष में पहुंची; तो वह आश्चर्य में पड़ गये। आखिर क्या बात है। कहीं कोई लड़ाई-झगड़ा तो नहीं हो गया। उन्होंने डांटने के अन्दाज में पूछा-
 
        ''बच्चों क्या बात है? यहां क्यों भीड़ लगा रखी है।

        -कुछ नहीं सर, आपसे कुछ बात करनी है।

        'तो फिर एक-दो चले आते, इतने बच्चों की क्या आवश्यकता।'

        सर, बात ही ऐसी है। सभी का आपके सामने होना आवश्यक है। बच्चों ने जवाब देते हुए कहा,

        अच्छा तो फिर बतलाओ, मुझे और भी काम करने हैं। प्रधानाचार्य ने कहा।

 

        सर, ऐसा है, कि हम सब इस विद्यालय के चारों ओर खाली पड़ी भूमि पर वृक्षरोपण करना चाहते हैं। शिखर ने बच्चों की बात रखते हुए कहा,

        यह तो तुम सबकी अच्छी सोच है। इससे हरियाली तो आयेगी ही विद्यालय का नाम भी रोशन होगा। तुम लोग चाहो तो कल से ही अपना काम प्रारम्भ कर सकते हो।

        ठीक है सर, लेकिन पौधे कहां से आएंगे और गडढे बनाने का सामान कैसे मिलेगा। गडएों को कितनी दूरी पर कितना गहरा बनाना पड़ेगा। हम लोगों के पास तो कुछ भी नहीं हैं ।शिखर ने जानना चाहा।

        पौधों की चिन्ता तुम लोग मत करो, मैं नर्सरी से मंगवा  दूंगा। गडढे खोदने की बात है तो उसके लिए सामान विद्यालय में है ही। निकलवा दूंगा। साथ ही क्रम से एक-एक कर्मचारी तुम लोगों की सहायता के लिए रहेगा। मैं भी समय मिलने पर आकर देखा करुंगा। अच्छा, अब तुम लोग जा सकते हो! प्रधानाचार्य जी ने बच्चों को पूरी बात समझाने के बाद कहा,

        अगले दिन से बच्चों ने अपना काम छुट्टी के बाद शुरु कर दिया। विद्यालय के कर्मचारी ,शिक्षक भी समय-समय पर सहयोग देते रहे।

        गडढे बन जाने के बाद प्रधानाचार्य जी ने पौधे नर्सरी से मंगवा दिये। जिनको बच्चों के सहयोग से गड्ढों में लगवा दिया गया। नियमित रूप से उनकी देखभाल होने लगी।

        कुछ ही वर्षों के बाद विद्यालय हरे-भरे वृक्षों से घिर गया। दिन भर पेड़ों की डालियों पर पक्षियों का कलरव गूंजता। बसन्त में कोयल मधुर संगीत के तराने छेड़ती।

        विद्यालय के प्रधानाचार्य व क्षेत्रवासियों के प्रयासों के बाद राज्य के वनमंत्री ने मेहनती बच्चों को सम्मानित करने की बात स्वीकार कर ली।

        वन महोत्सव के दिन विद्यालय में विशाल आयोजन हुआ। क्षेत्रके सैंकड़ों नागरिकों, शिक्षक-कर्मचारियों के मध्य वनमंत्री ने बच्चों को शील्ड व प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। बच्चों की खुशी का ठिकाना न रहा। मुख्य अतिथि के रूप में वन मंत्री ने सम्बोधित करते हुए कहा-

        ''बच्चों मुझे व इस देश को तुम  पर गर्व है। निश्चय ही अपने विद्यालय की भांति ही देश के वातावरण को भी हरा-भरा बनाने में सफल होगे। हमारी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं।''

        आयोजन के अन्त में प्रधानाचार्य ने सभी के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा-
        
        ''आज बच्चों के इस कार्य ने हमारा भी सिर गौरवान्वित किया है। इस तरह के बच्चों की प्रत्येक विद्यालय में आवश्यकता है। यदि देश के प्रत्येक विद्यालय के बच्चे अपने शिक्षकों -प्रधानाचार्य के सहयोग से इसी तरह रचनात्मक कार्य करते रहें; तो कितना अच्छा हो। जैसे आज हमारे विद्यालय में हरियाली है वैसा ही वातावरण पूरे देश के विद्यालयों का हो जायेगा।

इसके बाद कार्यक्रम समाप्त होने की घोषणा कर दी गयी और सभी अपने-अपने घर चले गये। 

शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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