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कहानीः एक था चिका एक थी चिकी / सत्यनारायण पटेल

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आज रूपा का काम जल्दी समेटा गया। रोज़ रात ग्यारह के आसपास बिस्तर लगाती। आज खाना-बासन से क़रीब नौ बजे ही फारिग़ हो गयी। बिस्तर पर बैठी और रिमोट से टी.वी. चालू किया। टी. वी. की आवाज़ दूसरे कमरे तक पहुँची। पूजा रोहित खेल रहे थे। वे खिलोनों से खेलते हुए बोर हो गये थे। सो वे भी रूपा के पास टी.वी. वाले कमरे में चले आये।

रूपा-लगभग तीस बरस की घर में रहने वाली महिला। सुतवाँ बदन। जबड़ों के भीतर घुसते गेहूँए गाल। कोटर की तलहटी में धँसी कमज़ोर आँखें। वह रोज़ गृहस्थी के के काम-काज से निपटकर टी.वी. के सामने बैठ जाती। रिमोट उठाती और टी.वी. पर कोई पुरानी फ़िल्म टटोलने लगती। ख़ासकर ऎसी फ़िल्म, जो गाँव की कहानी पर बनी हो। पर आज टी.वी. पर समाचार ख़त्म होने के बाद कोई धारावाहिक शुरू हो गया। ऎसा धारावाहिक जो उसे बिल्कुल पसंद नहीं। और केबल उसके यहाँ है नहीं। वह केबल कनेक्शन लेना चाहती। मगर केबल का तीन सौ रुपया मासिक किराया भरना, रूपा के बस का नहीं। वह डी.डी. वन और मैट्रो से ही काम चलाती है। उस वक़्त उन दोनों चैनलों पर कुछ ख़ास नहीं चल रहा था, इसलिए उसने टी.वी. बन्द कर दिया।

रूपा रोहित की मामी और पूजा की मौसी है। वे रूपा के साथ शहर में रहते हैं- पढ़ने के लिए। जब पूजा और रोहित का पढ़ने और खेलने में मन नहीं लगता है। टी.वी. पर भी कुछ ख़ास नहीं आता। और रूपा रिकामी ( फुर्सत में ) दिख जाती, तब वे रूपा से केणी (कहानी-क़िस्सा) सुनने की जिद करते। रूपा गाँव की कोई लोक कथा, क़िस्सा या मनगढ़न्त केणी सुना देती। और ऎसा अक्सर होता। रूपा को केणी-क़िस्सों का खजाना विरासत में मिला था। और कई बार ख़ुद केणी-क़िस्से गढ़ लेती। आप बीती या देखी-सुनी को केणी-क़िस्सों के साँचे में पिरोकर सुना देती थी।

तो आज रात जब पूजा ने कहा- मौसी केणी सुनाओ न.. तो पूजा की बात में रोहित ने भी जोड़ा- हाँ..हाँ.. मामी केणी सुनाओ।

रूपा को अभी सोना नहीं था। उसका काम तो निपट गया था, लेकिन अभी उसका पति काम से नहीं लौटा था। उसके पति का घर आने का कोई टाइम-टेबल नहीं था। वह नौकरी से समय पर फारिग़ हो जाता तो दोस्तो के साथ बैठ जाता। दोस्तो के साथ खाता-पीता और बहस करता। व्यवस्था को कोसता। उसे बदलने का सपना देखता। लेकिन रूपा के लिए तो दो कमरों के घर की व्यवस्था को संभालना ही एक अहम काम था। जिसमें पूरा दिन और देर रात तक उलझी रहती। रात को लगभग बारह बजे तक पति का इंतज़ार किया करती। आज भी करना थ इंतज़ार। सो उसका मन भी केणी सुनाने का हो गया था।

वह बोली- अच्छा सुनाती हूँ, पर बीच में कोई बोलना मत। बोले तो मैं केणी भूल जाऊँगी और केणी सुनने वाले रास्ता भूल जायेंगे।

पूजा और रोहित ने न बोलने की मंजूरी में गर्दन हिलायी। आलती-पालती मारी और दीवार से टिककर बैठ गये। हालाँकि मन ही मन तीनों जानते थे कि बीच में न बोलने की हिदायत का कोई मतलब नहीं है। रूपा केणी सुनाते-सुनाते कभी भी नहीं भूली। रोहित और पूजा बीच में बोले बग़ैर नहीं रहते। वे भी कभी स्कूल जाते-आते रास्ता नहीं भूले। फिर भी हर बार रूपा केणी सुनाने से पहले बीच में न बोलने को चेताती ज़रूर। आज भी उन्हें चेताया और अपनी कमर के पीछे तकिया लगाती बोली- तो सुनो, आज चिका और चिकी की केणी सुनाती हूँ। एक था चिका और एक थी चिकी।

-चिका..! मतलब क्या होता है मौसी..? पूजा ने पूछा।

-तेरा मौसा…बीच में बोलना बन्द किया था न…! चुपचाप सुन… बताती हूँ। चिका मतलब- चिड़ा और….

-और मामी… चिकी का मतलब ! रोहित ने पूछा।

-तेरी मामी… जा नहीं सुनाती केणी। मानते ही नहीं.. बोले ही जा रहे हो..!

दोनों बच्चे चुप। लगभग एक मीनिट की चुप्पी रही। फिर दोनों बच्चों ने बीच में बोलने की ग़लती मानी। फिर से बीच में न बोलने का दिलासा दिया। रूपा हँस पड़ी और बोली- अच्छा.. जहाँ समझ न आये…पूछ लेना, ठीक है।

-तो चिकी का मतलब क्या है..? दोनों बच्चों ने एक स्वर में पूछ लिया।

-चिड़िया.. चिकी का मतलब चिड़िया। अब सुनाऊँ आगे..?

-हाँ..। दोनों ने कहा।

और रूपा फिर से शुरू हो गयी- एक था चिका और एक थी चिकी। दोनों एक बबूल के पेड़ पर रहते थे।

-चिका कैसा दिखता था मौसी..! पूजा ने पूछा।

-तेरे मौसा जैसा। रूपा बताने लगी- उसका मुँह साँवला था, और देशी कबेलू के रंग के पँख थे। बबूल पर रहने वाले चिकों में उसके बराबर घुन्ना कोई नहीं था। वह अकेला ज्यादा कहीं भटकता भी नहीं था। दाना चुगने, पानी पीने जाता, तब ही थोड़ा इधर-उधर घूम फिर आता था। इस तरह वह अपने ही ढँग का और एकदम अनूठा चिका था। सबसे अलग, पर साधारण-सा।

-उस बबूल पर कितने चिका-चिकी रहते थे मामी। रोहित ने पूछा।

-अरे हाँ… ये तो मैं भूल ही गई। ये तो बताने वाली बात है। रूपा ने दाँतों तले जीभ दबाकर कहा और आगे बोली- उस बबूल पर हज़ारों हज़ार चिके रहते थे। एक-एक डगाल पर कई-कई घोंसले। बबूल आसपास के दस-बारह गाँव में ठावा था। उसके बराबर का बबूल कहीं और है- ऎसा कभी देखने-सुनने में नहीं आया। तना ख़ूब चौड़ा और ऊँचा। जैसे गाँव में बाखलें और बाखलों में घर। बबूल पर लम्बी-लम्बी असँख्य डगालें थीं। डगालें पीले फूल और हरी पपड़ियों से लदी रहती। पर उन पर फूल और पपड़ियों से ज्यादा घोंसले नज़र आते। लोग उसे घोंसलों वाला बबूल कहा करते थे।

-क्या बहुत बड़ा था बबूल..? रोहित ने विस्मय से आँखें फैला कर पूछा- हमारे स्कूल के पेड़ से भी बड़ा..!

-हाँ.. बहुत बड़ा। रूपा ने दोनों बाहें फैला कर उसकी विशालता के बारे में संकेत किया और बोली- बबूल गाँव के किनारे पर था, या बबूल के किनारे पर गाँव था। यह कहना मुश्किल था। क्योंकि दोनों ही एक-दूजे की वजह से ठावे थे। लोग गाँव के बारे में बात करते तो कहते- बड़े बबूल वाला गाँव। बबूल के बारे में बात करते तो कहते- बड़े गाँव वाला बबूल। या ज्यादा घोंसले वाला बबूल। कभी गाँव को भी ज्यादा पक्षियों वाला गाँव कह कर बात करते। यानी सबकी पहचान जुदा-जुदा होकर भी, एक-दूसरे से जुड़ी थी।

-तब तो बबूल की छाँव में पुरे गाँव के बच्चे पकड़ापाटी खेलते होंगे! पूजा की आँखों में पकाड़ापाटी का नज़ारा चल रहा था। वह अपनी सहेलियों के साथ स्कूल के मैदान में ख़ूब पकड़ापाटी खेलती। वह बोली- यहाँ तो मैडम डाँटती है। वहाँ भी डाँतती होगी!

-वहाँ स्कूल ही नहीं था। रूपा की आँखों में एक टीस कौंध गयी। गाँव में स्कूल न होने और न पढ़ पाने की टीस। अनपढ़ होने के कारण क्या-क्या सुनना पड़ता है। वह मन ही मन बुदबुदाने के बाद बोली- चुप कर, मुझे भटका मत। केणी सुन। अं..क्या.. किसके बारे में बता रही थी मैं..?

-बबूल के बारे में..। रोहित ने अंदाज़ मार ठोका। बीच में उसका भी ध्यान भटक गया था।

-हाँ.., तो बबूल पर साँवला चिका और चिकी का घोंसला गाड़ीगरवट की तरफ़ था। गाड़ीगरवट यानी बैलगाड़ी के आने-जाने की कच्ची बाट ( रास्ता ) । वह बबूल और गाँव के बीच थी। वह थी भी बहुत बड़ी। इतनी कि उस पर चार-पाँच बैलगाड़ी एक साथ बराबरी से चल सकती थीं।

जब क़स्बे में हाट-बाज़ार भरता। तब परगामी लोग उसी गाड़ीगरवट से गुज़रकर हाट-बाज़ार जाते। बबूल की छाँव में कई बैलगाड़ियाँ थुबतीं (रुकती)। लोग आराम करते। आपस में बातें करते कि जब इस बबूल पर नया घोंसला बनाने की जगह नहीं बचती होगी। तब सभी पक्षी मिलकर बबूल की डगालों को खींच-तानकर लम्बी कर लेते होंगे। कोई कहता- जब डगालों पर घोंसले ठसमठस हो जातें होंगे, तब ख़ुद बबूल अपनी विशाल बाँहों को और फैला देता होगा। ताकि उस पर जन्मा पक्षी घोंसले की तलाश में कहीं और न भटके।

गाँव में शादी, नुक्ता जैसे कोई मौसर भी होता। बबूल के नीचे एक साथ पूरा गाँव जीम लेता। जिस दिन बबूल के नीचे नुक्ता होता। पत्तलों से जूठन उठाने वालों का, कुतरों व पक्षियों का त्यौहार होता। वे सब एक ही प्रार्थना करते- है प्रभु, बबूल के नीचे रोज़ ही नुक्ता करवाओ।

वहीं बबूल से थोड़ी दूरी पर एक बड़ा-सा कुआॉ था। बबूल पर रहने वाले चिका-चिकी के अलावा कव्वा,कबूतर,काबर, होला, बगुला जैसे पक्षी वहीं पानी पीते। उनमें काले, सफ़ेद पँखों या अगड़े-पिछड़ों जैसा कोई मसला नहीं था।

साँवला चिका शुरू से इतना घुन्ना नहीं था। शुरू-शुरू में तो वे दोनों चिका-चिकी दिन भर यहाँ-वहाँ रपाटे मारा करते। इस पटेल के खेत या खलीहान से दाल चुन लाते। उस पटेल के खेत या खलीहान से चावल चुन लाते। दोनों मिलाकर खिचड़ी राँधते। मज़े-मज़े से खाते। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती प्रेम में बदल गयी। उनके प्रेम के क़िस्से हवा में उड़ने लगे। बबूल का एक-एक फूल एक नयी ख़ुशबू से महक़ने लगा।

-वह चिकी… अपनी गैलरी में बैठने वाली जैसी दिखती थी क्या..? पूजा ने पूछा।

-नहीं… सानिया मिर्ज़ा जैसी थी। रूपा ने कहा।

-सानिया मिर्ज़ा अपने घर सामने की संगम दीदी भी दिखती है। पूजा ने फिर कहा।

-हाँ.. वो नाक में नथ भी पहनती है। रोहित बोला- एक दिन है ना.. वो दीदी हमारे स्कूल के उधर दिखी थी। एक भैया की बाइक पर पीछे बैठी थी- यों कमर को पकड़ कर।

-चुप..मैं दीदी की नहीं..चिकी की केणी कह रही हूँ। रूपा ने रोहित को मीठी झीड़की दी।

-पर मामी..क्या चिकी टेनिस भी खेलती ! रोहित ने पूछ- और उसकी नाक में नथ भी थी..?

-वह तो चिकी थी, टेनिस कैसे खेलती भला ! रूपा ने अपने घर के बन्द दरवाज़े की ओर देखते कहा- पर हाँ.. कभी सारा अकाश उसका था। वह चिकों से भरे उस अकाश में सानिया-सी सनसनी ही थी। उसकी चोंच सोयाबीन के दाने की तरह पीली, मुँह सफ़ेद झक, पँख मटमैले, और चमकदार थे। उसके पिछले पँख के नीचे का हिस्सा यानी कमर के नीचे का भाग, एकदम गुलाबी था- सानिया ने उस दिन गुलाबी ड्रेस पहन टेनिस खेली थी न, ठीक वैसा। बबूल के चिकों में उसी की चर्चा होती रहती। उसे देख कै चिकों की आँखों में मस्ती चढ़ती। कुछ जोड़ी आँखों में उसे पाने के सपने लगातार चलते रहते। लेकिन सपने का मज़ा तब किरकिरा हो जाता, जब सपने में चिकी के साथ वह चिका भी नज़र आता और सपने देखती आँखों में अचानक गिट्टी की किरिच चुभने लगती। सपना टूट जाता और सपना देखने वाला, साँवले चिके के नाम दो-तीन गालियाँ जड़ देता।

गुनाह तो नहीं था- चिका-चिकी का प्रेम करना। एक ही बबूल पर एक ही घोंसले में रहना। पर उससे रश्क़ करने वाले अड़ोस-पड़ोस के चिके, कई छिछोरे और छीनाले टाइप के चिके, ऎसा एहसास कराते मानो वे गुनाह कर रहे हो। वे गंदे और भद्दे ताने से भी नहीं चुकते और लार भी टपकाते। वे चीत और पट दोनों चाहते थे।

साँवले चिके को यह पसन्द नहीं था। शायद यही वजह भी थी कि साँवला चिका अब ज्यादा भटकता नहीं था। बबूल के चिकों के बीच कम उठता-बैठता। अपने घोंसले में ही रहता। कम बोलता। लेकिन कहने वालों का क्या किया जा सकता है! वे हर स्थिति में कुछ न कुछ फुर्री छोड़ ही देते। कभी कोई कहता- वह चिकी के साथ घोंसले में घुसा रहता है। वो तो है ही घोंसला घुसा। साँवला चिका ऎसी बातों पर कम ही ध्यान देता। लेकिन कभी-कभी उदास भी हो जाया करता।

पर एक बात है- इन सब बातों से उनके प्रेम पर कभी कोई फर्क़ नहीं पड़ा। वे दोनों अक्सर गाँव के पटेल के खलीहान में एक साथ दाना चुगते देखे जाते। कुएँ के चाठ्या में भरे पानी में पँख फड़फड़ाते, छपाक-छपाक करते। फिर कुएँ की मुँडेर पर बैठ धूप सेंकते। हँसी ठिठोली करते। कभी चिकी चिका पर बैठ जाती। कभी चिका चिकी पर की पीठ पर बैठ जाता। उसकी चोंच में दाना देता। उन्से जलने वले चिके आँखें भर-भर उन्हें देखते। साँवले चिके की क़िस्मत पर रश्क़ करते। अपने भाग्य कोसते।

एक दिन की बात है- उस दिन सबेरे-सबेरे ठन्ड ज़ोरदार थी। चिका और चिकी कुएँ की मुँडेर पर बैठे थे- नरम-नरम धूप में मीठी-मीठी बातें करते। तभी उनसे कुछ ही दूरी पर एक और चिका आकर बैठा। यह चिका उन प्रेमी युगल चिका-चिकी के लिए ओगला था। हालाँकि वह था उसी बबूल का एक छिछोरा। पर वे नहीं जानते थे। अपने ही आसपास एक ही मल्टी में कितने लोग होते हैं, अपन कहाँ सबको जानते हैं!

-हाँ..मौसी मेरे साथ वह ख़ुशबू खेलती है न… मैं उसके मम्मी-पापा को नहीं जानती।

-तो मेरी बहना, कल ख़ुशबू से पूछ लेना। उसके मम्मी-पापा कौन हैं..? दुबले-पतले हैं! मोटे-ताज़े हैं! लम्बे हैं कि ठिगने हैं! वे क्या करते हैं! सब जान लेना। अभी केणी सुन! रोहित ने पूजा को चुप करते कहा- फिर क्या हुआ मामी!

-थोड़ी देर बाद क्या हुआ कि वह छिछोरा चिका चिकी की ओर भद्दे इशारे करने लगा। रूपा आगे सुनाने लगी- चिकी ने एक-दो बार तो अनदेखा किया। पर जब वह लगातार गंदे इशारे करने लगा। तब उसने साँवले चिके को बता दिया।

साँवला चिका बोला- कहीं दूर से उड़कर आया लगता है। ओगला है। थका है। कुछ देर सुस्स्ताकर उड़ जायेगा। तू उसकी तरफ़ मत देख।

-मैं होता तो उसके पँख उखाड़ देता। रोहित ने कहा।

-हाँ मौसी..भैया ने एक बार स्कूल में सोनू भैया को पटक दिया था। पूजा ने बदला लेते हुए रोहित की पोल खोली-सोनू भैया ने इसकी चिकी की तरफ़ मुँह बनाया था।

रोहित ने पूजा की ओर यों घूरा और जैसे आँखों ही आँखों में कहा- कल स्कूल के रास्ते में बताऊँगा तूझे। रूपा के सामने अटकता बोला- मामी वो मेरी दोस्त है।

-मौसी.. जब हम स्कूल जाते हैं तो दोनों को आप दो-दो चॉकलेट देती हो न..। पूजा ने रूपा के पीछे छुपते हुए कहा।

-हाँ तो…

-भैया एक चॉकलेट खाता है और एक उस चिकी को देता है।

-नहीं मामी.. मैं नहीं देता। वो ले लेती है। फिर वो मुझे कभी-कभी उसके टिफिन में से हलवा भी तो खिलाती है।

-छटी-सातवी में ये हाल है। रूपा ने झिड़की लगायी- ग्यारहवी–बारहवी तक आते-आते तो तू उसे लेकर भाग जायेगा।

-मामी वो तो भाग ही नहीं सकती। उसका एक पाँव पोलियो से लंगड़ा है।

-ओ..ह । रूपा को जानकर दुख हुआ। वह थोड़ी देर को चुप रह गयी थी।

-तो मौसी चिका ने फिर क्या किया ? पूजा ने फिर केणी की ओर ध्यान दिलाया।

-चिका ने नहीं.. चिकी ने उस बदमाश चिका की ओर देखना बन्द कर दिया। मगर ओगला चिका अपनी आदत से बाज नहीं आया। उसकी हरक़तों को साँवला चिका कनखियों से देख रहा था और मन ही मन बुदबुदाया- ये तो महा लुच्चा है। थोड़ी देर में चिकी ने फिर कतराकर साँवला चिका की ओर देखा।

तब साँवला चिका तंग आकर ओगले चिके के पास गया। उसे समझाने की कोशिश करने लगा। मगर ओगला चिका कुछ ऎसा बोला कि साँवला चिका आगबबूला हो उठा। कुएँ की मुँडेर पर ही दोनों एक-दूसरे पर झपट पड़े। एकदम आमक-झुमक, गुत्थम-गुत्था हो गये। चिकी घबरा गयी। शोर मचाने लगी। चिकी का शोर सुन। आसपास चुगते, धुप सेंकते चिका-चिकी, काबर और होला चले आये। वे बीच बचाव कर दोनों को जुदा करते, उससे पहले ही मुँडेर से फिसल कुएँ में गिर पड़े। चाहते तो बीच में लड़ना छोड़ कर । पँख खोल कर। उड़ सकते थे। पर ऎसा नहीं किया। ओगला चिका कुएँ के चढ़ाव से टकराया। उसके सिर और पँखों में बहुत ज़ोर की चोंट आयी। वह मर गया।

-च्च…च्च…बेचारा। पूजा उदास हो गयी।

-और साँवला चिका मामी। रोहित ने पूछा।

-साँवला चिका सीधा पानी में गिरा। उसे कहीं ज्यादा चोंट भी नहीं आयी। बहर ठंड थी, पर कुएँ का पानी गरम था। उसने एक-दो डुबकी लगायी और कुएँ की सीढ़ियों पर चढ़ आया। सीढ़ियों पर चढ़ते ही उसके पँख बर्फ़ हो गये। ऎसी धूजनी भरायी कि चलने की न बनी। ऊपर से झाँकती चिकी और बहुत सारे पक्षियों की तरफ़ गर्दन उठाकर देखा,मगर कुछ कहने को मुँह न खुला।

साँवला चिका सीढ़ियों पर बर्फ़ के ढेले की माफिक बैठा था। उड़ न पाने की वजह से, वह कुएँ के बाहर नहीं आ पा रहा था। मुँडेर पर बैठी चिकी दुखी थी। उसने वहाँ जमा पक्षियों से गुहार लगायी कि किसी तरह चिके को बाहर निकाले। पर वहाँ जमा चिका-चिकी, काबरा-काबरी किसी को कोई तरक़ीब नहीं सूझी। कुछ तो शायद यह सोच इधर-उधर हो गये थे कि अब साँवला चिका ठन्ड में वहीं जम जायेगा। जो चिके साँवले चिके से ईर्ष्या करते थे। अपनी प्रसन्नता को छुपाये खड़े थे।

एक चिका कई दिनों से उस चिकी पर नज़र रख रहा था। लेकिन वह कभी कुछ बोलता नहीं था, बस चिकी को कनखियों से देखा करता था। उस दिन उसने हिम्मत की और चिकी को ढ़ाँढस बँधाने के बहाने, यह तक कहा- अब चिका बाहर नहीं आ सकेगा। वहीं मरेगा। उसका खयाल छोड़ दे । चिकी चीख़ उठी थी।

कुछ ने उसे कुछ और ढँग से समझाया। पर एक बुजुर्ग चिके की बात उसे जम गयी और गाड़ीगरवट पर आते-आते लोगों से वह मदद की गुहार करने लगी।

उसने एक ग्वाल से मदद माँगी। ग्वाल ने कहा-मुझे टैम नहीं है। भैंसे जा रहीं हैं। मैं यहाँ बिलम गया तो भैंसे किसी की फ़सल उजाड़ देगी। फ़सल वाला मेरी लू उतार देगा। और वह चला गया।

कुएँ पर पानी लेने दो औरतें आयीं। चाठ्या पर बैठ गगरे-भान्डे माँजने लगी। चिकी ने सोचा- अगर पानी खेंचने की बाल्टी-रस्सी चिके के पास पहुँच जाये, तो वह बाल्टी में बैठ जायेगा। खींचने पर ऊपर आ जायेगा। औरतें मेरा दुख समझ कर शायद मदद करेगी। उसने रोते-गिड़गिड़ाते अपनी व्यथा सुनायी।

तब पहली औरत बोली- मुझे खेत पर काम करने जाना है। मेरा लाड़ा सबेरे से खेत पर गया है। वह भूखा है। मेरी राह देखता होगा। मैं नहीं कर सकती।

दूसरी ने कहा- मैं यहाँ ज्यादा देर नहीं रुक सकती। मेरी सास शकेली है। मुझसे लड़ेगी। ताने देगी कि मैंने किसी ग़ैर मरद से मिलने में देर की है। उसके मन में ऎसा शक लोगों की मदद करने से ही बना है। माफ़ करना, मैं कुछ नहीं कर सकती। और दोनों औरतें अपने-अपने पानी के बेयड़े भरकर चली गयी।

-फिर क्या हुआ मौसी..? पूजा ने पूछा- चिका कुएँ में ही रह गया..?

-नहीं.., ठन्ड में ठिठुरते चिके ने सोचा-ठन्ड में बैठे-बैठे तो मर जाऊँगा। क्यों न वापास पानी में गिर पड़ूँ.. पानी कम से कम गरम तो है। वह फिर पानी में कूद पड़ा।

-हँ..हा..हा… दोनों बच्चे हँसने लगे।

-तो कुछ देर चिका पानी में पँख फड़फड़ाता रहा। पर नन्हीं-सी जान कब तक पानी में रहता। थकने पर वापस सीढ़ियों पर चढ़कर बैठ गया। पानी में पँख फड़फड़ाते उसे मालूम हुआ- एक पँख में भी हल्की-सी चोंट आई है। उसने एक-दो बार उड़ान भरने की भी कोशिश की, पर असफल रहा। पँख नहीं खुले।

धीरे-धीरे वहाँ मौजूद चिका-चिकी इधर-उधर उड़ गये। कुएँ के बाहर चिकी अकेली रह गयी। वह साँवले चिका को न निकाल पाने से परेशान और दुखी थी। धीरे-धीरे गुनगुनी हो रही थी। पर कुएँ के भीतर तो धूप दोपहर तक पहुँचती है। तब तक चिके का बचा रहना उसे मुश्किल लग रहा था।

वह यही सब सोच रही थी, तब उसे एक मिन्की यानी बिल्ली मिली। मिन्की सारे घटनाक्रम की रमूज पहले ही कहीं से ले चुकी थी। उसने सीधी मुद्दे की बात करते हुए कहा- मैं चिके को कुएँ से बाहर ला सकती हूँ। और उसने चिकी के चेहरे पर, चिके की चाहत को देखते हुए कहा- पर मेरी एक शर्त है।

-मुझे सब शर्तें मंजूर हैं। चिकी ने आँसू पोंछते हुए कहा- जो कहोगी करूँगी।

-नहीं… ऎसे नहीं..पहले मेरी बात सुनो। मिन्की ने कहा।

-जल्दी कहो.. ठन्ड से चिके की बुरी हालत हो रही है। वह व्यग्रता से बोली- वह दम न तोड़ दे।

मिन्की के पास यह मौक़ा था, जब वह चिकी से अपने मन की बात मनवा सकती थी। उसने कहा- देख, अगर मैं चिके को नहीं निकालूँ, तो उसका मरना तय है। तू उससे एक बार भी नहीं मिल सकेगी। मगर निकाल लेती हूँ, तो तू उससे मिल सकती है। बात कर सकती है। पर मुझे क्या..?

-तू जो कहेगी.., वह कर दूँगी... बस.. उसे निकाल ला। चिकी गिड़गिड़ायी।

मिन्की ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा- मैं सबेरे-सबेरे कई घर घूम आई हूँ। कहीं दाँव नहीं चला है। बहुत भूखी हूँ। इसलिए जब तू चिके से मिल लेगी, मैं उसे खा जाऊँगी।

चिकी चिन्ता में पड़ गयी- चिके को कुएँ से बाहर नहीं निकाला तो ठन्ड से मर जायेगा। बाहर आने पर बिल्ली खा जायेगी।

-वह तो कुएँ में उतर कर भी खा सकती थी! रोहित बोला।

-हाँ.. खा सकती थी। ये बात चिकी भी समझती थी। रूपा ने कहा-इसलिए वह सोच रही थी कि क्या करे..? चिके को कैसे बचाये..? वह कुछ देर चुपचाप सोचती रही। कोई रास्ता नहीं सूझा। पर थोड़ी और मग़ज़पच्ची के बाद उसके मन में खयाल आया- हो सकता है, मिन्की चिके को बाहर लाये, तब तक हालात कोई और मोड़ ले ले। चिके को बचाने का कोई रास्ता नज़र आ जाये। मिन्की तो भूखी है। उसे भूख शान्त होने से मतलब है। अगर चिके की बजाय कुछ और भी मिल जायेगा, तो शायद चिके को नहीं खायेगी। उसने मिन्की की शर्त मान ली।

मिन्की कुएँ में गयी। चिके को मुँह से पकड़ा, और बाहर ले आयी। कुएँ में उतरने-चढ़ने से मिन्की की भूख और बढ़ रही थी। मुँह में पकड़े चिके को सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते ही खाने का मन कर रहा था। पर उसने अपने मन पर काबू रखा। चिके को धूप में बैठालती बोली- जो बातें-वातें करनी हैं, फटाफट कर लो। फिर मैं इसे खाऊँगी। ज़ोर की भूख लगी है। और फिर मेरे बच्चे भी भूखे हैं। जाकर उन्हें भी दूध पिलाना है।

चिकी ने देखा-चिका ठन्ड से धूज रहा है। सिकुड़े पँख नहीं कुल रहे हैं। चिके के प्रति उसका मन बेहद भावुक होने लगा- जाने कहाँ से वह ओगला चिका चला आया..? मैंने चिके से क्यों बताया कि वह मुझे छेड़ रहा है ? मेरी वजह से चिके की जान ख़तरे में पड़ गयी। उसके भीतर यही सब चल रहा था। वह ख़ुद को दोषी समझ रही थी।

-क्या मिलना-जुलना हो गया ? थोड़ी देर के बाद मिन्की ने पूछा। भूख से उसका बुरा हाल हो रहा था।

चिकी ने कहा- मैं ख़ूब मान मानूगीं। बुरी बखत में मदद की। पर चिके से बात कैसे करूँ, वह ठन्ड में धूज रहा। मुँह नहीं खुल रहा। आवाज़ नहीं निकल रही। जब तक धूप से पँख नहीं सूखेंगे। भीतर की धूजनी ख़त्म नहीं होगी। बात कैसे होगी.? अगर थोड़ी देर और रुक जाएगी, बड़ी दया होगी।

चिकी यह सब कह ज़रूर रही थी। पर उसकी बात पूरी तरह सच नहीं थी। चिका काँप रहा था। पर वह बात भी आसानी से कर पा रहा था। हाँ, अभी उड़ने की स्थिति में नहीं था। और चिकी चाहती थी कि चिका उड़ने की स्थिति में आये, तब तक मिन्की को बातों में बिलमाया जाये। ऎसे ही चिकी मिन्की को बिलमा रही थी और चिके के पँख सूख रहे थे।

भूखी मिन्की को अपने बच्चों के पास जाने की भी कुछ जल्दी थी। फिर भी उसके मन के किसी कोने में दया का भाव आ गया। वह बोली- तू चिके के पँख पोंछ दे। जल्दी सूख जायेंगे। तू बात भी जल्दी कर सकेगी और…….. वह कहते हुए रुक गयी थी।

चिकी और चिका आपस में बात कर रहे थे। उनकी बात ख़त्म होते ही चिके को मिन्की खाने वाली थी। वह बात ख़त्म होने का इंतज़ार करती धूप में बैठी थी। तभी गाड़ीगरवट पर आती एक बैलगाड़ी दीखी- बैलगाड़ी के नीचे एक कुतरा भी चल रहा था। जैसे ही मिन्की की नज़रे कुतरे पर पड़ी। वह दबे पाँव कुछ पीछे हटी कुएँ की मुँडेर की आड़ में हो गयी। पर कुतरे ने उसे पीछे हटते देख लिया। वह भौं..भौ.. करता मिन्की की ओर दौड़ा। मिन्की दौड़ लगाकर एक घर में घुस गयी।

अब तक चिके के पँख सूखे कुछ समय हो गया था। चिका का मन मिन्की को चकमा देने का नहीं हो रहा था। वह चाह रहा था- मिन्की और चिकी के बीच जो शर्त तै हुई, उसे निभाया जाए।

पर चिकी ने कहा- अभी मौक़ा है, पहले यहाँ से उड़ो। आगे बात करेंगे। और उड़ लिये।

-ए..मिन्की टूँगती रह गयी। रोहित ने हँसते और ताली बजाते कहा। पूजा को भी चिका-चिकी का उड़ भागना अच्छा लगा। वह ताली बजाती हँस रही थी।

-सुनो-सुनो अभी केणी ख़त्म नहीं हुई। रूपा ने उनके उत्साह को बीच में रोका और आगे बोली- दोनों उड़कर अपने घोंसले पर गये। थोड़ा सुस्ताने के बाद चिकी ने कहा- अपन इस बबूल पर से घोंसला बदल लेते हैं। अब यहाँ रहना ठीक नहीं है।

-लेकिन ये तो मिन्की के साथ धोका होगा। चिका कुछ उदास होता बोला- फिर गाँव में कोई किसी की मदद नहीं करेगा।

-नहीं.. मिन्की की माँ ग़लत है। ग़लत माँग को पूरा करना ज़रूरी नहीं। चिकी ने कहा।

-तब बबूल ही नहीं, हम ये गाँव भी छोड़ देते हैं। चिके ने कहा- ऎसे गाँव में क्या रहना, जहाँ लोग बुरी बखत में काम न आये..? किसी की जान भी जान के बदले बचाये। थू.. थू़..।

-हाँ.. चलो वहाँ जहाँ एक-दूसरे की मदद बग़ैर शर्त की जाती हो। चिकी बोल रही थी।

-उस दिन एक ढँग-ढोरे की जगह की तलाश में चिका-चिकी निकल पड़े। उनकी बातों में आकर और कई पक्षी निकल पड़े।

-फिर क्या हुआ मामी..?

-वे भटकते-भटकते एक शहर में पहुँचे। रहने का ठिकाना ढूँढा। दाना-चुग्गा ढूँढा। यहाँ उन जैसों की न गिनती थी, न क़द्र थी। चिकी यहाँ अकेली महसूस करती। पर चिका शहरी माहौल में ढल गया था। चिका पहले जैसा नहीं रह गया। चिके के नये दोस्त बने। नयी-नयी आदतें बनी। वह दोस्तो के साथ बाते करता। रात में टैम-बेटैम लौटता।

-तो मौसी, अपनी बिजली की पेटी में जो चिका-चिकी रहते हैं, पूजा गम्भीर होकर बोली- कहीं ये वही तो नहीं हैं। मौसा बार-बार उनका घोंसला तोड़ देता है। आप मौसा को समझाना उनका घोंसला न तोड़े।

-मामा सुनते हैं किसी की, रोहित बोला- उन्हें समझाना कठिन है।

-अच्छा सुनो, सुनो। केणी थी तो पूरी हो गयी। हुँकारा देने वाले डोकरा-डोकरी हो गये। रूपा बोली- अब सो जाओ, पौने बारह बज गयी। सबेरे उठते नहीं हो। फिर स्कूल जाने में रिंग-रिंग करते हो।

तभी रूपा को घर में एक चिकी की चहचहाहट सुनायी पड़ी। लगा चिकी घर में नहीं उसके मन में चहचहा रही है। लेकिन जल्द ही उसे समझ में आ गया। चिकी मन में नहीं घर में ही चीख़ रही है। उसके घर की कॉल बेल की आवाज़ चिकी के चहचहाने की आवाज़ करती थी। पर वह रूपा को चिकी के चीख़ने की आवाज़ लगी। वह उठी और हड़बड़ाती दरवाज़े की और दौड़ी।

रोहित ने मामी को दौड़ते देखा। पूजा ने मौसी को दौड़ते देखा। दोनों ने एक चिकी को घबराकर दौड़ते देखा। दोनों को लगा- अब चिकी का न आसमान है न ज़मीन। वह तीसरे माले पर दो कमरों में क़ैद है। जो चिका के आने पर थर-थर धूजने लगती है। चिका बाहर खड़ा बेल बजा रहा है। रोहित की मामी ने और पूजा की मौसी ने किवाड़ खोला। रोहित का मामा और पूजा का मौस गैलरी में आया। रोहित और पूजा ने एक-दूसरे की ओर देखा। रोहित और पूजा ने आँखों ही आँखों में कहा- चिका टुन्न है। चिकी को घूर रहा है। भुनभुना रहा है। फिर रोहित-पूजा चिके की तरफ़ देखे बग़ैर बोले- गुड नाइट। और नींद के बग़ैर आँखें बन्द कर सो गये।

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सत्यनारायण पटेल

मधुमति में प्रकाशित

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