रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु रचनाएँ आमंत्रित.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html देखें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

भगवतीचरण वर्मा का कवि-व्यक्तित्व – विरुद्धों का सामंजस्य डा. सुरेन्द्र वर्मा

साझा करें:

                          रचना और रचनाकार                                  (२)           भगवतीचरण वर्मा का कवि-व्यक्तित्व – विरुद्धों का स...

                          रचना और रचनाकार

                                 (२)

          भगवतीचरण वर्मा का कवि-व्यक्तित्व – विरुद्धों का सामंजस्य

                            डा. सुरेन्द्र वर्मा

            हम दीवानों की क्या हस्ती हैं आज यहां कल वहां चले,

            मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहां चले .                  

भगवतीचरण वर्मा की एक प्रसिद्ध कविता की यह प्रथम पंक्तियाँ हैं और इस पूरी कविता में कवि का फक्कड़पन, मस्ती और आत्म-विश्वास जैसे छलका पड़ता है. पर कवि का अपना जीवन भयानक संघर्षों का जीवन रहा है. हर क़दम पर उन्हें लड़ना पड़ा और इस लड़ने के बाद, जैसा वे कहते हैं, उन्हें पराजय ही मिली. विजयी होना जैसे उन्होंने जाना ही नहीं. लेकिन एक आश्चर्यजनक बात यह रही कि पराजय के बाद उन्हें हमेशा एक नया बल मिला –फिर से लड़ने के लिए. और यह जुझारूपन उनके कवि-व्यक्तित्व का अंग बन गया –

             दोस्त एक भी नहीं यहां पर, सौ-सौ दुश्मन जान के

             इस दुनिया में बड़ा कठिन है, चलना सीना तान के .                   

लेकिन बावजूद कठिनाइयों के वे हमेशा सीना तान कर चले. भले ही उनके व्यक्तित्व का यह बहिरंग ही क्यों न हो, लेकिन उनकी अधिकांश कविताओं में जीवंतता का स्वर है .-       

           फिर झमका रंग गुलाल सुमुखि, फिर गमका फागुन राग

           फिर चमका मनसिज के नयनों पे, रवि का नव अनुराग.                   

     वस्तुतः भगवतीचरण वर्मा के कवि-व्यक्तित्व में हम एक प्रकार का द्वन्द्व स्पष्ट देख सकते हैं. यह द्वन्द्व उनके बहिरंग और अंतरंग का है, बुद्धि और भावना का है, प्रकृति और दृष्टि का है, शिल्प और विषय का है.                               

प्रारम्भिक कविताएं –छायावाद

भगवती बाबू ने अपने साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ एक कवि के रूप में ही किया था. कविता करना उनकी एक स्वाभाविक या नैसर्गिक प्रवृत्ति थी जिसका मोह वे जीवन में अंत तक नहीं छोड़ पाए. उनकी प्रथम कविता सन् 1917 में उनके स्कूल की एक हस्तलिखित पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. उस समय वह आठवीं कक्षा में पड़ते थे और उनकी अवस्था 14 वर्ष की थी. वह काफी समय तक सिर्फ कविताएं लिखते रहे लेकिन आर्थिक संघर्ष और विषम परिस्थितियों के कारण उनका रुझान उपन्यास और कहानियां लिखने की तरफ हुआ और धीरे-धीरे वह उपन्यासकार के रूप में स्थापित हो गए. वह कवि हैं या उपन्यासकार, यह प्रश्न अक्सर भगवती बाबू के अंदर उठता था और प्रायः वह स्वयं को उपन्यासकार का फतवा भी देते थे. लेकिन गम्भीरता पूर्वक विचार करने के उपरांत उन्हें लगता था कि वस्तुतः वह कवि भी हैं और उपन्यासकार भी. उन्होंने अपेक्षाकृत कविताएँ कम लिखीं लेकिन इतनी तो लिखी हीं कि वे उन्हें एक सफल कवि के रूप में प्रतिष्ठित कर सकें. इसमें संदेह नहीं कि रस लेने वाले पाठकों का एक बड़ा वर्ग आज भी उनको एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में देखता है. स्वयं भगवतीबाबू भी कविताओं की दुनिया में, जितने भी प्रसिद्ध और श्रेष्ठ कवि हुए हैं, उनकी कविताओं की तुलना में अपने को कम नहीं समझते थे. लेकिन वे सहज भाव से तुलसीदास को उद्धरित करते हुए यह भी कहते हैं कि – निज कवित्त केहि लाग न नीका.

     भगवती बाबू की प्रारम्भिक रचनाएं देश-प्रेम की भावनाओं से ओतप्रोत थीं –

       ऐ अमरो की जननी तुझको शत-शत बार प्रणाम

       मातृ भू शत-शत बार प्रणाम.

     काव्य जगत में पदार्पण उन्होंने द्विवेदी-युगीन कवियों के बीच किया. किंतु अपने बहुमुखी साहित्यिक व्यक्तित्व के कारण भगवतीबाबू द्विवेदी-युगीन काव्य परम्पराओं से अधिक दिनों तक जुड़े नहीं रह सके और उनकी कविता का स्वर अनायास छयावादी हो गया –

         मैं कब से ढूंढ रहा हूं अपने प्रकाश की रेखा

         तम के तट पर अंकित है निःसीम नियति का लेखा

         देने वाले को अबतक मै देख नहीं पाया हूं...

    वस्तुतः उन्होंने जब कविता लिखनी आरम्भ की थी तब छायावाद की लहर उठना आरम्भ हो गई थी. इस नई लहर में वह बह चले और छायावाद के उठते हुए प्रमुख कवियों में उनकी गणना होने लगी. छायावाद के प्रवर्तकों में पंत, प्रसाद और निराला की वृहद त्रयी स्थापित हो चली थी और जैसा कि भगवती बाबू स्वयं कहते हैं किसी ने यह भी परिकल्पना कर डाली थी कि महादेवी वर्मा और रामकुमार वर्मा के साथ छयावाद की इस लगु-त्रयी में एक और वर्मा भगवतीचरण का नाम जुड़ना आरम्भ हो गया था. ज़ाहिर है, यह परिकल्पना सही साबित नहीं हुई. महादेवी वर्मा को लघु-त्रयी में रखना जितना ग़लत था उतना ही ग़लत भगवती बाबू को महादेवी वर्मा और रामकुमार वर्मा के समकक्ष घोषित करना था. भगवतीचरण वर्मा छायावाद का साथ बहुत देर तक नहीं दे सके और छयावादी दृष्टिकोण से बहुत जल्द ही उनका मोह भंग हो गया. छायावादी कवि स्वभावतः रहस्यवाद की ओर उन्मुख हुए बिना नहीं रहता पर भगवतीचरण वर्मा रहस्यवाद की ओर जाने के स्थान पर उससे छिटककर दूर आ पड़े और प्रगतिवाद-वस्तुवाद-भौतिकवाद की ओर मुड़े. प्रकृतिसे वे वस्तुवादी थे, उनकी अध्यात्म की ओर कोई रुचि नहीं थी. उसे वे अपनी पकड़ के बाहर की चीज़ मानते थे. लोग जिसे रहस्यवाद कहते हैं उससे वे बहुत दूर थे. और इसी लौकिक दृष्टि ने उन्हें अनुशासित और अनुप्राणित किया,. भगवती बाबू की कुछ कविताओं में प्रकृतिवादी दृष्टिकोण के अनुरूप भौतिक जगत का बहुत ही सजीव समाजिक चित्रण मिलता है, इस संदर्भ में उनकी कविता “भैंसा गाड़ी” उल्लेखनीय है –

            उस ओर क्षितिज के कुछ आगे कुछ पांच कोस की दूरी पर

            भू की छाती पर फोड़ों से हैं उठे हुए कुछ कच्चे घर

            पशु बनकर पिस रहे जहाँ, नारियां जन रहीं हैं ग़ुलाम

            पैदा होना फिर मर जाना, बस यह लोगों का एक काम

            धन की दानवता से पीड़ित कुछ फटा हुआ कुछ कर्कश स्वर

            चरमर चरमर चूं चरर मरर जा रही चली भैंसा गाड़ी.

<भावना और बुद्धि, शिल्प और विषय>

   भगवतीचरण वर्मा के कवि व्यक्तित्व में भावना और बुद्धि का द्वन्द्व सदैव चलता रहा पर भावना हमेशा बुद्धि पर हावी रही. वे मानते थे कि हमारी बुद्धि भावना से ही जन्मी है और उसे भावना का ही एक अंग माना जा सकता है. पर विकास के क्रम में बुद्धि भावना से पृथक होकर एक स्वतंत्र संज्ञा बन गई है. भगवती बाबू का अपना समस्त अस्तित्व भावनामय था. वे सदैव भावना से ही अनुशासित और अनुप्राणित रहे.         

     उनके अनुसार जितनी कलाएं हैं वे सभी भावनात्मक होती हैं. जो बौद्धिक है वह कला क्षेत्र में न होकर विज्ञान के क्षेत्र में होता है. कला अपनी अभिव्यक्ति के लिए कोई न कोई माध्यम ढूंढ लेती है और यह एक रोचक तथ्य है कि साहित्य और कविता को छोड़ कर कला का कोई अन्य माध्यम शब्द द्वारा संचालित नहीं है. जितनी अन्य कलाएं हैं वे निःशब्द हैं. मूर्तिकला में शब्द नहीं है, संगीत में शब्द नहीं है- कम से कम वह उसका आवश्यक अंग नहीं है. लेकिन सभी कलाओं का एक मूलाधार है और वह सबमें समान रूप से उपलब्ध है- आखिर आधार जो ठहरा- और यह है, गति. लय गति का ही एक रूप है. लय और गति ही जीवन है, यदि ऐसा कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी. जिसे हम जीवन की प्रेरणा कहते हैं. वह हमें भावना से प्राप्त होती है, बुद्धि से नहीं. प्रेरणा स्वयं में गति है. कोरे शब्द आवश्यक नहीं हमारी भावनाओं को अभिव्यक्त कर सकें. हम आपके दुःख में दुःखी हैं, - यह आसानी से कहा जा सकता है, लेकिन इन शब्दों में दुःख की अभिव्यक्ति हो ज़रूरी नहीं. दुःख का अनुमान, कहने वाले की शारीरिक गति और भंगिमा से होता है, शब्दों से नहीं. कविता में जब हम भावाभिव्यक्ति करते हैं तो बेशक शब्दों से ही करते हैं, लेकिन शब्दों में भावाभिव्यक्ति तभी हो सकती है जब शब्द जीवंत हों, उनमें गीत और लय हो.

     भगवतीचरण वर्मा कविता में लय और गति को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं. कविता में छंद-प्रयोग उसे लय प्रदान करता है, ठीक ऐसे ही जैसे संगीत की लय ताल में निबद्ध होती है. भगवती बाबू की सभी कविताएँ इसलिए छंद-बद्ध हैं और तभी उनमें लय और गति है. यहां यह दृष्टव्य है कि समकालीन अतुकांत कविता भी भले ही छंद-बद्ध न हो पर लय विहीन नहीं होती. कविता में किसी न किसी रूप में लय की अनिवार्यता को सभी ने स्वीकार किया है. भगवतीचरण की कविताओं में लय के लिए सिर्फ छंद का ही प्रयोग नहीं किया गया है बल्कि शब्द-विन्यास भी कुछ इस प्रकार गढे गए हैं कि वे कविता को अतिरिक्त गति प्रदान करते हैं. इस संदर्भ में हम, भैसा-गाड़ी, शीर्षक कविता का सटीक हवाला दे सकते हैं.

     वस्तुतः गति और लय के बिना हम कविता की कल्पना ही नहीं कर सकते कविता का शिल्पगत सौंदर्य उसकी गति और लय में ही निहित है. शिल्पहीन कला मृत शरीर की भांति है. उसमें प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती. शिल्प कला का आवश्यक तत्व है. लेकिन शिल्प कला का केवल शरीर मात्र है. विषय-वस्तु द्वारा जो उदात्त भावना का शिल्प पर आरोहण है, कला का प्राण तो वही है. कविता के संदर्भ में भी यही बात सत्य है. कविता केवल शिल्प नहीं है. शिल्प निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन कविता का भाव ही कविता को कविता की गरिमा प्रदान करता है. इस भाव में भावना और विचार (या, बुद्धि) का समन्वय होता है. जिसे हम भाव कहते हैं उसका आधार बेशक भावना ही है, लेकिन भाव की भावना से पृथक अपनी निजी सत्ता है. भावना और बुद्धि के योग से भाव का जन्म होता है और इसलिए यदि हम भाव को भावना का बौद्धिक रूप कहें तो अनुचित न होगा. जहाँ भावना विशुद्ध वैयक्तिक उपकरण है, वहीं भाव बौद्धिक होने के कारण सामाजिक उपकरण बन गया है. भावना हमारी व्यक्तिगत चीज़ है, बुद्धि के क्षेत्र के बाहर. शुद्ध बौद्धिक प्रक्रिया से हम भावना को व्यक्त नहीं कर सकते, बुद्धि के द्वारा हम भावना को जो रूप देते है, यह भाव कहलाता है.

     भावना का रूप बदलता रहता है. कभी हर्ष कभी विषाद, कभी आशा और कभी निराशा. केवल ऐसी भावनाओं की शाब्दिक अभिव्यक्ति सही अर्थ में कविता नहीं हो सकती. यह तो क्षणिक भावनाओं के साथ केवल भटकन भर होगी. भावना के साथ जब  तक कोई विशेष दार्शनिक दृष्टि या वैचारिक नज़रिया न हो, भावना निरर्थक है. कविता में भावना के अतिरिक्त एक दार्शनिक दृष्टिकोण के भी भगवतीचरण वर्मा क़ायल हैं. उनका दृष्टिकोण, एक शब्द में कहें तो, नियतिवादी दृष्टिकोण है.

<प्रवृत्ति और दृष्टि>

भगवतीचरण वर्मा अपनी नियतिवादी दृष्टि को दूसरों पर निःसंदेह आरोपित नहीं करना चाहते. इसकी, जैसा कि वे कहते हैं, न उनमें क्षमता है और न ही आग्रह. किंतु यह दृष्टि-कोण उनके लिए सत्य है जिसे वे झुठलाना भी नहीं चाहते.

     नियतिवाद वह दार्शनिक सिद्धांत है, जो स्वतंत्र संकल्प के विरुद्ध है. इसके अनुसार हम कोई भी कार्य अपनी इच्छानुसार नहीं करते. वस्तुतः हमारा संकल्प, या कोई इच्छा करना, भी पहले से नियत होता है. सभी घटनाएँ या संकल्प किन्हीं कारणों या अचेतन प्रेरकों द्वारा घटित होती हैं. नियतिवाद इस प्रकार भौतिकवाद का प्रतिफल है. सभी भौतिक घटनाओं के घटने के पीछे कोई न कोई कारण होता है. वे अपने आप से घटित नहीं हो जातीं. पुनः, संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो भौतिक न हो. अतः, सभी कुछ नियत है. कोई भी व्यक्ति जिसने जन्म लिया है, अपना प्रारब्ध लेकर आया है. यह अपनी नियति को नकार नहीं सकता. व्यक्ति को भले ही यह लगता हो कि यह अपनी ज़िंदगी को खुद ही दिशा दे रहा है, या कि उसका कर्म उसकी इच्छानुसार है, लेकिन  वस्तुतः उसका समस्त अस्तित्व उसकी नियति या प्रारब्ध द्वारा ही नियंत्रित होता है. विधि के विधान को कोई पलट नहीं सकता. जो प्रारब्ध में है उसका लिखा कोई मिटा नहीं सकता. प्रारब्ध या भाग्य या नियति की यह अधीनता ही नियतिवाद है.   नियतिवादिता की यह दृष्टि स्वतंत्र संकल्प पर तो कुठाराघात है ही, यह सामान्यतः मनुष्य को निराश और ह्तोत्साहित करने वाली  दृष्टि भी है. इस प्रकार अनास्था और अविश्वास नियतिवादिता का एक अनिवार्य पहलू-सा हो जाता है.

     भगवतीचरण वर्मा का नियतिवाद में अटूट विश्वास रहा है. नियतिवादिता उनकी जीवन-दृष्टि है जिसे उन्होंने अपने जीवनानुभवों से अर्जित किया है. नियति का यह चक्र उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर जल्दी-जल्दी जाने के लिए मजबूर करता है- कभी कानपुर तो कभी इलाहाबाद, कभी कलकत्ता तो कभी बम्बई, तो कभी लखनऊ, और इस नियति-चक्र ने उनकी साहित्यिक दिशा को भी बदला है –कवि से वे उपन्यासकार हो गए. अपनी नियति को वे स्वीकार करते हुए लिखते है -

                     हम तो रमते-राम सदा के, दोस्त हमारा गाँव न पूछो

                     एक यंत्र सा जो कि नियति के हाथों से संचालित होता

                     कुछ ऐसा अस्तित्व हमारा, दोस्त हमारा काम न पूछो

                                       अथवा,

                          उल्लास और उच्छ्वास तुम्हारे ही अवयव

                          तुमने मरीचिका और तृषा का सृजन किया

                          अभिशाप बनाकर तुमने मेरी सत्ता को

                          मुझको पग-पग पर मिटने का वरदान दिया.

     इस बनने-मिटने, टूटने और क़ायम रहने में अपना कोई वश नहीं है. इस सबमें कोई दूसरा विधान काम कर रहा है. यह दूसरा विधान क्या है, इसे भगवती बाबू नहीं जानते, लेकिन इतना उन्हें अवश्य पता है कि इसी के इशारे पर समस्त सृष्टि संचरित होती है और मनुष्य भी इसी नियति के चक्र में फंसा हुआ है.

     नियतिवादी दृष्टि से सामान्यतः अनास्था और अविश्वास फलित होता है, लेकिन यह एक विरोधाभास ही है कि भगवतीचरण वर्मा के जीवन से ये अभद्र भावनाएं दूर रहीं और आस्था और विश्वास सदैव उनके जीवन का अविलग भाग रहा. यहां स्पष्टतः उनकी प्रकृति और दृष्टि में विरोध झलकता है. उनकी प्रवृत्ति में फक्कड़पन, मस्ती, जीवंतता और प्राण-शक्ति है. वे आत्मविश्वास से लबरेज़ हैं. स्वाभिमान उनमें कूट-कूट कर भरा है. वे अपनी निजता के प्रति न केवल जागरूक हैं बल्कि उसे हर क़ीमत पर बनाए रखना चाहते हैं. लेकिन उनकी दृष्टि नियतिवादी है. इस विरोधाभास को ठीक से समझ पाना मुश्किल है और यही कारण है कि जहाँ एक ओर हमें उनकी कविताओं मे जीवंतता के दर्शन होते हैं वहीं दूसरी ओर वे उनकी नियतिवादी दृष्टि का कथन भी करती हैं. भगवतीच्ररण वर्मा अपने स्वाभिमान की रक्षा और अपनी निजता की पहचान आवश्यक मानते हैं. वे परामर्श देते हैं कि –

                          देखो, सोचो, समझो, सुनो, गुनो और जानो 

                          इसको, उसको सम्भव हो तो निज को पहचानो

                          जीवन की धारा में अपने को बहने दो

                          तुम जो कुछ हो वही रहोगे, मेरी मानो.

   भगवतीचरण वर्मा की नियतिवादी दृष्टि उनके आत्मविश्वास को, जो उनकी प्रवृत्ति  का मूल स्वर है, ख़ामोश नहीं कर पाती. बल्कि यह उन्हें एक ओर समर्पण का भाव तो दूसरी ओर समरसता प्रदान करती है. उन्हें नियतिवादी दर्शन में निराशा नहीं दिखती. केवल एक प्रकार का समर्पण से युक्त संतोष मिलता है जिससे कुंठाएं और कटुताएं उनके जीवन पर हावी नहीं हो पातीं. –

                 तुममें निर्बलता और शक्ति इन हाथों की

                 मै चला कि चरणों का गुण केवल चलना है

                 थे दृश्य रचे, दी वही दृष्टि तुमने मुझको

                 मै क्या जानूं क्या सत्य और क्या छलना है

                 रच-रच कर करना नष्ट तुम्हारा ही गुण है

                 तुममें ही तो है कुठा इन सीमाओं की

                 है निज असफलता और सफजता से प्रेरित

                 अर्पित है मेरा कार्य,इसे स्वीकार करो.

    समर्पण भाव के अतिरिक्त नियतिवादी दृष्टि कवि हृदय में दुःख और सुख में  समरसता का भाव भी जगाती है. इससे कवि को अपनी तथाकथित असफलताओं और अज्ञान पर क्लेश नहीं होता. जिसे हम असफलता कहते हैं वह बड़ी सीमित वस्तु है और जिसे हम ज्ञान समझकर बघारते हैं वह बहुत संदिग्ध है. इसलिए जैसे-जैसे समय बीतता गया भगवतीचरण वर्मा सफलता और असफलता के ऊपर उठते गए. वे एक सीमा तक तटस्थ हो गए –

                 छककर सुख दुःख के घूंटों को, हम एक भाव से पिए चले

                 हम दीवानो की क्या हस्ती हैं आज यहाँ कल वहाँ चले!

                                    (हिंदुस्तानी त्रेमासिक, अक्टूबर-दिस. 2003)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3841,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2786,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,831,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,4,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1919,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: भगवतीचरण वर्मा का कवि-व्यक्तित्व – विरुद्धों का सामंजस्य डा. सुरेन्द्र वर्मा
भगवतीचरण वर्मा का कवि-व्यक्तित्व – विरुद्धों का सामंजस्य डा. सुरेन्द्र वर्मा
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2016/03/blog-post_47.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2016/03/blog-post_47.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ