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शबनम शर्मा की लघुकथाएँ

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तेरहवीं

शाम को एक छोटा सा कार्ड बिना दरवाज़ा खटखटाए कोई फेंक गया। रात को मुन्ना हाथ में लिये मुझे दिखा रहा व बोला, ‘‘अम्मा, पिछली गली वाली दादीजी की तेरहवीं है। कल दोपहर का खाना है व 2 से 3 बजे तक पगड़ी की रसम।’’ उसके बताते ही मेरे शरीर में बिजली सी कौंध गई। मेरा अच्छा-खासा प्यार था उनसे। दूसरे दिन मैं समयानुसार उनके पिछले वाले बड़े से आँगन में पहुँच गई। बड़ा सा शामियाना, आज़ाद टैंट वालों का इन्तज़ाम। खाना सजा हुआ, लोग घूम-घूमकर चटकारे लेकर खाते हुए। सिर्फ कमी थी तो ये कि डी.जे. के अश्लील गानों पर लोग नाच नहीं रहे थे। माहौल चुपचाप खाकर, लिफ़ाफा पकड़ाकर जाने का था। कोने में खड़ी-खड़ी मैं ये दृष्य देख रही थी कि अचानक मेरा ध्यान दादी की उस स्थिति पर चला गया, जब मैं उन्हें आखिरी बार मिलने गई थी। ढीली खाट, जिस पर बिछी चादर न जाने कब बिछाई गई थी। गुच्छा-गुच्छा होकर दादी के बदन को तंग कर रही थी, दादी कभी इधर से सीधी करती कभी उधर से। तकिया बेहाल था। कमरे में ज़ीरो वॉट का बल्ब था। न कोई खिड़की, न झरोखा। पास में एक प्लास्टिक की टूटी बालटी पड़ी थी। सुबह-सुबह पानी का लोटा, गिलास रख दिया जाता। लाख आवाज़ें देने पर भी कोई न आता। हरिया भागता-भागता कभी-कभी चाय का गिलास, दो रस दे जाता। दादी बेचारी हाँफती-हाँफती उठती, मुष्किल से नहाती, धोती, अपने अस्त-व्यस्त बाल अपने हाथों से सुलझाती। कभी किसी से कोई शिकायत न करती। कोई हाल पूछता तो कहती, ‘‘बेटा बुढ़ापा ही तो सबसे बड़ी बीमारी है।’’ तरस आता उन्हें देखकर। किसी के पास वक्त न था उन्हें कुछ पूछने का, उनकी सेवा करने का, पर आज ये लाखों रूपये खर्च कर दिखावा क्यूँ?

रसम

छुट्टियों के बाद स्कूल में मेरा पहला दिन था। नीना को सामने से आता देख मुझे अचम्भा सा हुआ। वह स्कूल की पी.टी. अध्यापिका है। पूरा दिन चुस्त-दुरुस्त, मुस्काती, दहाड़ती, हल्के-हल्के कदमों से दौड़ती वह कभी भी स्कूल में देखी जा सकती है। आज वह, वो नीना नहीं कुछ बदली सी थी। उसने अपने सिर के सारे बाल मुंडवा दिये थे। काली शर्ट व पैंट पहने कुछ उदास सी लग रही थी। कुछ ही समय में पता चला कि इन छुट्टियों में उसके पापा की मृत्यु हो गई थी। सुनकर बुरा लगा। शाम को मैं करीब चार बजे उसके घर गई। उसने मुझे बैठक में बिठाया। पानी लाई व मेरे पास बैठ गई। पूछने पर पता चला कि उसके पिता की मृत्यु हृदय गति रूकने के कारण हुई थी। रात का समय था, वह उन्हें अस्पताल ले गई जहाँ डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। घर आकर उसने अपने रिष्तेदारों को पिता जी मृत्यु की सूचना दे दी। सुबह पूरा जमघट लग गया। सवाल कि संस्कार पर कौन बैठेगा? चाचा के 3 बेटे थे। तीनों खिसक लिये। समय का अभाव था। नीना की दो बड़ी बहनें शादीषुदा थी, उनके बच्चे व पति भी व्यस्त थे। वह 10 दिन बैठ नहीं सकते थे। लाष को उठाने से पहले यह कानाफूसी नीना तक पहुँच गई। वह माँ के पास बैठी थी। उसने आँसू पोंछे व पिछवाड़े वाले ताऊजी से कहा जो रात से उनके साथ थे, ‘‘ताऊजी, मैं करूँगी पिताजी का अन्तिम संस्कार, मैं बैठूँगी सारी पूजा पर।’’ सबके दाँतों तले अंगुली आ गई। पर नीना ने किसी की परवाह न की। कंधे पर सफ़ेद कपड़ा रख कर, सबसे पहले अपने पापा की लाश को कंधा दिया व शमशान तक पूरी विधिपूर्वक सब कार्य किया। बताते-बताते उसकी आँखें कई बार नम हुई। बोली, ‘‘मैडम, मेरे पापा उकसर कहते थे मेरी दो बेटियाँ, एक बेटा है। मुझे क्या पता था कि आज...........’’ मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘नीना, मुझे तुझ पर गर्व है।’’

माँ

आदत है हर रोज़ शाम को मन्दिर जाकर कुछ समय बिताने की। दिवाली थी उस दिन। पूरा दिन काफ़ी व्यस्त रही, शाम को भी काम खत्म नहीं हो रहा था। पर मन था कि एक चक्कर मन्दिर का काट आऊँ। जैसे-तैसे काम निबटाकर मैं मन्दिर चली गई। मन्दिर का पुजारी उस अहाते में ही छोटी सी कुटिया में रहता था। मन्दिर में माथा टेक कर मैं पुजारी जी के पास कुछ देने चली गई। देखा पुजारी जी घर में पूजा कर रहे थे व उनकी आँखों से बरबस आँसू टपक रहे थे। मैं भी जूते उतार कर धीरे से वहां बैठ गई। 5-10 मिनट बाद उन्होंने आँखें खोली। मुझे देखकर बोले, ‘‘माफ़ करना बिटिया, कुछ भावुक हो गया। देखो ये मेरी माँ की तस्वीर, मैं आज के दिन इसकी पूजा करता हूँ। आपको बताऊँ, हम 9 भाई-बहन थे, मेरा बाप शराबी था, दिवाली से 4 दिन पहले ही जुआ खेलने बैठ जाता था, मेरी गरीब माँ, फटे-पुराने कपड़ों में, प्लास्टिक की चप्पल पहने, कमज़ोर सी देह में लोगों के घरों में बासन माँजती, झाडू-फटका करती। इन दिनों लोग उससे बहुत काम लेते, घर साफ़ करवाते, कपड़े धुलवाते, बासन मंजवाते, फिर कहीं मिठाई का डिब्बा और 5 रू. देते। वह सारी थकान भूल जाती व सामान लाकर हमारे सामने खोलकर रख देती। हम सब भाई-बहन बिन कुछ महसूस किये खुश हो-होकर, शोर मचाकर खाते। बस हमारी दिवाली मन जाती। आज सब कुछ है पर माँ नहीं है।’’ कहकर वे फिर से रोने लगे।

इन्तज़ार

रात गहराती जा रही थी। मेरा मन बहुत घबरा रहा था। मेरी बेटी शाम 4 बजे से यह कहकर गई थी कि वो 2-2) घंटे में वापस आ जायेगी। मैंने उसे अनगिनत फोन कर डाले। फोन मिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। ‘अनरिचेबल’ की टोन ने मुझे और भी परेशान कर दिया। आखिर माथे पर हाथ रखकर, थक हार कर, एक पिटे ज्वारी की तरह मैं अपने कमरे में बैठ गई। पर मनगडंत प्रश्नों-उत्तरों का सिलसिला मुझे बार-बार झकझोर रहा था। एक पल भी मुझे एक बरस की तरह लग रहा था। ज़माना कितना खराब है? लड़की की जात, ऊपर से सर्दियों के दिन, ये दिल्ली जैसा शहर और अकेली लड़की। बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि दरवाजे पर घंटी बजी। मैं बिजली की तरह दरवाज़े की ओर लपकी। दरवाज़ा खोला कि सामने मेरी बेटी हाथ में फूल का गुलदस्ता व कुछ पैकेट, मुस्कान होठों पर लिये खड़ी थी। उसको मुस्कुराता देख मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। मैंने एक जोरदार थप्पड़ उसके मुंह पर मार दिया व लगी बोलने। वह अवाक सी खड़ी सुनती रही। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, पर मैं अपनी पूरी बात कह कर ही चुप हुई। उसने फिर भी मुझे बाँहों में भरा और कहा, ‘‘माँ, तू इतनी परेशान हुई, इसके लिए मुझे माफ़ कर दे। पर सुन, आज जब मैं गई तो रास्ते में मेरा फोन किसी ने निकाल लिया और तू कल वापस जा रही है। तुझे पता है, मुझे आज पहली पगार मिली थी, मैं तेरे लिये ये तोहफा लेने गई थी, मुझे देर हो गई, तो मैंने अपनी सहेली को बुला लिया, जो अभी दरवाज़े के बाहर ही खड़ी है। माँ, चुप हो जा, शाँत हो जा और देख, खोल इस पैकेट को, कैसा लगा तुझे।’’ इतने में उसकी सहेली भी अन्दर आ गई, बोली, आँटी, ‘‘इसे कुछ पसंद ही नहीं आ रहा था, बार-बार कह रही थी, अम्मा को ऐसी चीज़ दूँगी कि वो खुश हो जायें।’’ मैंने उन दोनों को गले लगा लिया और ताकने लगी शून्य में।

समझौता

अध्यापिका हूँ। हर रोज़ अलग-अलग बच्चों से वास्ता पड़ता है। कक्षा में जाना, पढ़ाना, बच्चों से बतियाना, उनकी नन्हीं-नन्हीं समस्याओं को सुलझाना मेरा शौक है। इस कक्षा में जाते मुझे करीब 6 माह हो गये थे। दो जुड़वाँ भाई-बहन को पढ़ाती हूँ। जहाँ बहन अति शान्त, कुशल व स्नेही वहीं भाई शरारती, बातूनी व कभी-कभी लापरवाह। उससे मेरी उम्मीदें कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी। हमेशा उसमें सुधार लाने की इच्छा ने मुझे उसके करीब ला दिया। परन्तु बात न मानना तो जैसे उसका संकल्प सा हो। वह अपनी मनमानी करता परन्तु पलटकर न तो कभी जवाब देता न ही सही काम करता। परीक्षा हुई। परिणाम भी मेरी आशा से कम था। उसकी कुशाग्र बुद्धि से ज़्यादा उम्मीद की जा सकती थी। मैंने उसके माता-पिता को संदेश भिजवा कर मिलने का आग्रह किया। निश्चित समय पर उसके माता-पिता अपने बच्चों के साथ मेरे पास आए। पिता ने पूछा, ‘‘मैम, आपने बुलाया था, क्या कोई समस्या है?’’ मैंने बच्चों की ओर देखा, दोनों के चेहरे पीले हो गये थे। मैंने कहा, ‘‘इन्होंने क्या कहा?’’ पलटकर पिता ने कहा, ‘‘ये क्या कहेंगे, रात को बताया कि कल रिजल्ट है और मैम ने आपको बुलाया है। मैडम मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ इससे पहले कि आपकी सुनूं। मैंने 7 माह पहले शादी की है। ये बेटी मेरी पहली पत्नि की है, जो पिछले बरस गुजर गई और लड़का इनका है (अपनी पत्नि की और इशारा करते हुए) इसका पापा भी पिछले बरस गुजर गया। मेरी बहन ने यह रिश्ता सुझाया और हमने ब्याह कर लिया। जाने वाले तो चले गये, अब आगे की भी तो सोचनी है। हाँ, मैडम कहिए आप क्या बता रही थीं?’’ मैं उनकी बातें सुनकर स्तब्ध थी। मैंने दोनों बच्चों की ओर देखा जो अभी भी वैसे ही सहमे से खड़े थे। मैंने कहा, ‘‘बस यूं ही बुलाया आपको, आपके बच्चे नए हैं इस स्कूल में। पूछना था इन्हें कैसा लगा?’’ वह बोले, ‘‘ओर, शुक्रिया।’’ देख सकती थी अब मैं उन दोनों अधूरे बच्चों के मुँह पर लौटती रौनक।

कुंठा

रीमा आफिस में नई-नई आई है। देखने में सुन्दर, सुशील और बहुत ही सुलझी हुई। अपने काम से काम और फिर होठों पर सदा मुस्कराहट। यह सब देखते हुए मुझे कुछ तसल्ली सी न होती। वह पूरे स्टाफ में किसी के साथ भी घुल-मिल न पाई। बस सबके साथ औपचारिकता निभाती दिखाई देती। एक दिन ज़ोरों की बारिश हो रही थी कि आज आफिस में काम भी कुछ कम था। मेरे साथ उसका रिश्ता माँ-बेटी का सा है। मैंने कहा, ‘‘रीमा चाय पीते हैं।’’ उसने स्वीकारात्मक ‘हाँ’ भर दी। हम दोनों बैठे थे कि चाय आ गई व मैंने पूछा, ‘‘रीमा शादी नहीं हुई अभी।’’ ‘‘नहीं।’’ उसके बाद वह इधर-उधर ऐसे देखने लगी, जैसे कि कुछ गलत कह दिया हो मैंने। ‘‘फिर कब कर रही है, मुझे मिठाई कब खिलाएगी।’’ ‘‘कभी नहीं।’’ कह कर वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। मुझे लगा, मुझसे कोई बड़ी भूल हो गई है। मैंने उठकर उसे गले से लगाया। वह जी भर कर रोई व ‘‘सॉरी’’ कहकर बैठ गई। उसकी यह दशा देख मैं अन्दर तक हिल गई थी। कुछ सांत्वना भरे शब्द कहकर उसके कंधे पर हाथ रखकर कारण पूछा। उसने बताया वह मात्र 12 बरस की थी जब उसका ब्याह हुआ। वह ब्याह के मायने भी न समझती थी, ऊपर से ससुराल वालों की असीमित उम्मीदें, जिन पर वह ख़री न उतर पाई। उसके साथ सबका व्यवहार बद से बदत्तर हो गया और आखिर मात्र 13 साल 3 महीने की उम्र में उसे मार-पीटकर घर से निकाल दिया। वह पीहर आ गई। यहाँ उसके माता-पिता ने उससे वापस जाने को कहा पर वह न मानी। फिर उसने अपनी पढ़ाई जारी की और बी.कॉम. फिर एम.कॉम. किया। उसने बताया, उस पर किये जुल्म उसे आज भी सोने नहीं देते। वह फिर से रो पड़ी। इस बीच मैंने पूछा कि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली। उसने बताया उसके 2 बच्चे भी हैं। पर वह शादी नहीं करेगी क्योंकि वो जानना चाहती है उसमें क्या कमी थी। उन लोगों ने ऐसा क्यों किया? मैंने उसे बिठाया, चुप कराया व समझाया, ‘‘देखो रीमा, कल कभी लौटता नहीं, और हर दिन एक सा होता नहीं। तब तुम मात्र 12-13 वर्ष की अबोध बालिका थी, अब इतनी सुन्दर, सलोनी, प्यारी सी लड़की हो। अगर किसी ने तुम्हारे बड़े होने का इन्तज़ार नहीं किया, तो तुम क्यों इस जि़न्दगी को बरबाद कर रही हो और हाँ, तुमने कुछ नहीं खोया, उन्होंने एक अच्छी बहु खोई।’’ उसके चेहरे की रंगत बदल गई। मुझे खुशी है इस बात की, कि उसकी कुंठा को निकाल पाई मैं और पता चला कि उसने अब इरादा बदला है। नए जीवन की ओर पग बढ़ाया है।

फितरत

पिछले माह मुझे मिसेज गुरुंग के घर जाने का मौका मिला। रात गहरा गई थी। मौसम भी बहुत अच्छा था। सर्दी के साथ-साथ अच्छा खाना, सूखे मेवे व गरमा-गरम चाय-काॅफी ने समय बांध दिया था। हम दोनों ड्राईंग रूम में बैठे बतिया ही रहे थे कि उनकी दोनों लड़कियाँ अपने बच्चों के साथ घर में आ गईं। आते ही पर्स इधर फेंका, शाल कुर्सी के कोने पर टंगा दी और जूते अस्त-व्यस्त रख दिये, बच्चों ने अपना पूरा धमाल शुरु कर दिया। घर का माहौल क्षण भर में ही बदल गया। बच्चे रसोई की तरफ दौड़े, बोलते हुए, ‘‘मामी जी भूख लगी है कुछ खाने को दो।’’ लड़कियाँ भी आवाजें लगाने लगी, ‘‘अरे, भाभी एक-एक कप चाय, पकौड़े हो जायें।’’ बेचारी भाभी ‘‘हां जी’’ बोलकर रसोई की तरफ भागी। आध घंटे में सबकी फरमाइशें पूरी करके दस व्यक्तियों के खाने की तैयारी करने लगी। पता चला उसे चैथा महीना चल रहा है, पर किसी को भी परवाह नहीं। मुझसे रहा न गया। पूछ ही बैठी, ‘‘मिसेज गुरुंग आपने लड़कियों की शादी लोकल की और ये जब-तब आएँ तो इससे काम नहीं बढ़ जाता, देखो दोनों जब से आई हैं, एक फोन पर, दूसरी टी.वी. के आगे और बच्चे धमाल किये हुए हैं, इससे बहू-बेटे के जीवन पर क्या असर पड़ेगा।’’ उन्हें मेरी बात ज़रा न भाई। तपाक से बोलीं, ‘‘मिसेज शर्मा, दोनों कमाती हैं, हर माह मेरे हाथ पर अच्छे पैसे रखती हैं। आखिर इन्हें पाला, पढ़ाया-लिखाया। शादी करके बेचा तो नहीं, इनका घर है जब चाहें आएँ-जाएँ, ससुराल में तो खटती ही है, यहाँ भी काम करें तो मायका क्या?’’ मैंने पूछा, ‘‘फिर इनके घर पर कौन देखभाल करता है?’’ वह नाक-भौं तरेरकर बोली, ‘‘इनकी माऐं यानि सासें और ननदें।’’ मैं हैरान थी ये सब देख-सुनकर कि मेरी नजर उनकी बहू पर पड़ी जो 1-1) किलो आटा गूंथ रही थी। मुझे उसकी तरफ देखते ही मिसेज गुरुंग बोली, ‘‘गरीब घर की है, बाप भी नहीं, माँ है भाई के साथ रहती है। जान-बूझकर लाये इसे, घर का काम तो करे और दो रोटी खाती रहे व पड़ी रहे।’’ मेरे लिये अब रुकना मुहाल हो गया इस फितरती माहौल में। मैं उठी और भारी कदमों से घर वापिस आ गई।

कलयुगी बेटा

मैं किसी काम से बैंक में बैठी थी। कार्य कुछ ज्यादा होने की वजह से मैं मैनेजर के चैम्बर में चली गई। अकेली थी काम ज्यादा। कुछ फार्म भरकर मैंने मैनेजर साहब को थमाए। उन्होंने मुझे बैठने व कुछ देर और इन्तज़ार करने को कहा। मैं बैठ कर इधर-उधर आए लोगों को निहारने लगी कि बैंक के मेन गेट से लम्बा, ऊँचा, सुन्दर सा युवक, आधुनिक वेशभूषा में प्रवेश हुआ और मैनेजर साहब का कमरा खेल अन्दर आ गया। पीछे हाथ बाँधे, एक लिफ़ाफा हाथ में थामे उसने कहा, ‘‘सर, मुझे बहुत जरूरी सूचना चाहिये?’’ मैनेजर ने उसे बैठाया व पूछा, ‘‘हाँ, बताओ मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ।’’ उसने लिफ़ाफा आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘सर, इसमें मेरे पिताजी के बैंक के कुछ कागज़ हैं, मुझे पता करना है कि यह पैसा किसको मिल सकता है और मुझे यह पैसा लेने के लिये क्या-क्या कार्यवाही करनी होगी, जल्दी बताइए।’’ लिफ़ाफा खोलते ही मैनेजर सकते में आ गया। उसने कहा, ‘‘अभी इसी सप्ताह तो वो अपनी पैंशन लेकर गये हैं, मेरे साथ चाय पी है, क्या हुआ उन्हें? कब हुआ?’’ लड़का बोला, ‘‘परसों सुबह वो हमें छोड़कर चले गये।’’ मैनेजर ने कहा, ‘‘भले मानस डैथ सर्टीफिकेट लेने तक तो इन्तज़ार करते। इतनी भी क्या जल्दी है। आज तीसरा ही दिन है।’’ उसने जवाब दिया, ‘‘सर, वो तो आराम से मर गये। हमें अब समाज की भी लाज रखनी है। खर्च करूँगा उतने हिसाब से ही जो छोड़ कर गये हैं मेरे लिये।’’ मैनेजर ने कम्प्युटर खोला तो देखा, उसकी आँखों में आँखें डालकर बोला, ‘‘बेटा तेरे नाम कुछ नहीं है, उनके सारे खाते तुम्हारी माँ के नाम है। उसकी मर्जी है तुम्हें दे या न दे।’’ लड़का बिजली सा उठा, कागज समेटे व गुस्से में बोला, ‘‘मरता भी ढंग का काम न कर गया, अब करे ये बुढि़या जो चाहे, मैं तो चला कल अपनी नौकरी पर।’’ मैं पैसे के लिए पागल इस कलयुगी औलाद को ताकती रह गई।

वो समझदार बहू

शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। उसकी सासू माँ कई दिनों से बीमार है। सोच खबर भी ले आऊँ और बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। ‘‘अम्मा जी, कैसी हैं?’’ शिष्टाचारवश पूछ कर इतमिनान से चाय-पानी पीने लगी। फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ शिकायतें, ‘‘जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया।’’ आध घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। कोई भी अम्माजी के कमरे तक न गया। उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, ‘‘निशा अम्माजी, आज 1) साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है।’’ उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़ सी हो गई। वह बोली, ‘‘बहनजी, ये सात बच्चों की माँ है। इसने रात-रात भर गीला रहकर सबको पाला। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब इसकी है। अपनी-अपनी समझ है। मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरा बेटा, इनका पोता सुबह-शाम इनके पास बैठकता है, ये मुस्कराती है, इन्हें ठंडा पिलाता है तो दुआएँ देती हैं। जब मैं इनको नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, तो जो संतुष्टि मेरे पति को मिलती है, देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ और वह बड़े ही उत्साह से बोली, एक बात और है ये जहाँ भी रहेंगी, घर में खुशहाली ही रहेगी, ये तो मेरा तीसरा बच्चा बन चुकी हैं।’’ और ये कहकर वो रो पड़ी। मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी और म नहीं मन उसे सराह रही थी।

शबनम शर्मा

अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. - 173021

मोब. - 09816838909, 09638569237

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शबनम शर्मा जी की सारी ही कथाएँ वास्तविक लगीं । दिल को छू गयीं । उनका अभिनन्दन ।

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