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बोलें कम, लिखें ज्यादा / डॉ. दीपक आचार्य

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जो बोला जाता है उसे वर्तमान पीढ़ी का मात्र एक से पाँच फीसदी हिस्सा ही सुन पाता है और इनमें भी अस्सी फीसदी बातें भुला दी जाती हैं अथवा भूल जाते हैं। या फिर अपने काम ही नहीं होने की वजह से हम लोग उस पर कान नहीं धरते, बिना सुने ही सर हिलाते रहते हैं या हाँ जी- हाँ जी करते रहते हैं।

मजमा छोटा हो या बड़ा, लोगों को सिर्फ अपने काम या स्वार्थ की बातों से ही मतलब है। लोग अर्से से सुन-सुन कर इतने चतुर हो गए हैं कि उन्हें हर किसी बात के पीछे का रहस्य अपने आप समझ में आ जाता है, भनक लग जाती है कि जो बोला जा रहा है वह किसके लिए है, क्यों बोला जा रहा है तथा इसका उद्देश्य या लक्ष्य क्या है।

बहुधा लोग एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं। जहां कहीं बहुत अधिक भीड़ जमा होती है वहाँ हर वक्ता को यह भ्रम हो जाता है कि जो लोग आए हैं वे सारे के सारे उन्हें सुनने के लिए आए हैं, जो तालियां बजा रहे हैं, सर हिला-हिला कर श्रवण परंपरा निभा रहे हैं वे सब कुछ समझते जा रहे हैं और उन्हें सुनकर प्रभाव में आ रहे हैं, सामूहिक रूप से वशीभूत होते जा रहे हैं।

सच तो यह है कि कोई कितना ही बड़ा संत-महात्मा, प्रवचनकर्ता, सत्संगी, मोटीवेटर, कथावाचक हो या समाज-जीवन और परिवेश से लेकर वैश्विक या ब्रह्माण्ड स्तर का कितना ही बड़ा वक्ता, लगता तो ये है कि जैसे लोग तल्लीनता से एकाग्र होकर सुन रहे हैं मगर यह सभी का परम भ्रम ही है।

और यह भ्रम ही है जिसके कारण बड़े-बड़े वक्ताओं की जिन्दगी भ्रमों का पर्याय बनकर रह गई है। कुल मिलाकर यथार्थ यही है कि जो बोला जाता है उसका वजूद अधिक नहीं रहता। हो सकता है कोई शुद्ध चित्त, सत्यवादी और दैवदूत अथवा सिद्ध जो बोले वह ब्रह्माण्ड में सदियों तक रहकर गूंजता रहे।

उस अवस्था में हर युग को इसका लाभ प्राप्त हो सकता है किन्तु सामान्य लोगों की वाणी का प्रभाव ज्यादा नहीं रहता। और जो झूठी बातें करता है, झूठन खाता है, झूठ बोलता है और मन-वचन तथा कर्म में कहीं सामन्जस्य नहीं रखता है, उसकी वाणी दूषित होती है और यह कचरा पात्र में रखे कचरे के समान होती है। इसका वजूद उस स्थल तक ही होता है जहां यह झूठ धाराप्रवाह चलता है।

जीवन और परिवेश में जो कुछ अनुभव हमारे सामने आएं, उनके बारे में लिखा जाना चाहिए। लिखा हुआ लम्बे समय तक रहता है और कई बार ऎसा लिखा जाता है जो कालजयी हो जाता है और इसका अस्तित्व युगों तक रह सकता है। 

छपे हुए शब्दों और चित्रों का अस्तित्व लम्बे समय तक रहता है और इसका उपयोग भी खूब होता है। इस दृष्टि से समाज, देश और दुनिया के लिए यह जरूरी है कि दस्तावेजीकरण यानि की डॉक्यूमेंटेशन पर ध्यान दिया जाए।

हर इंसान ज्ञानी और अनुभवी होता है। इन अनुभवों का सार्वजनीन लाभ तभी प्राप्त हो सकता है कि जब कहीं लिपिबद्ध हो। यह शब्दों के रूप में हो सकता है, चित्रात्मक संदेश भी हो सकते हैं और कार्टून भी।

हर इंसान को कुछ न कुछ लिखना चाहिए जिसमें उसके जीवन भर में अर्जित ज्ञान और अनुभवों को निचोड़ हो। इनका लाभ पाकर दूसरे लोगों को जीवन की राह प्राप्त हो सकती है, समस्याओं और बाधाओं के बारे में पूर्ववर्ती जानकारी हो सकती है तथा कई ऎसे ऎहतियाती उपाय सुनिश्चित किए जा सकते हैं जिनसे कि जीवन निरापद और सफल हो सके।

अक्सर देखा जाता है कि हम लोग ज्ञान और अनुभव के अभाव में बार-बार वे ही गलतियां करते रहते हैं जो हमारे पुरखों ने की हैं। पुरखों के ज्ञान और अनुभवों की जानकारी हमें पहले से प्राप्त हो जाए तो हम अपनी सफलता की रफ्तार को पा सकते हैं और ढेरों समस्याओं, बाधाओं से पहले ही मुक्त हो सकते हैं, हम हमारे उस समय की बचत कर सकते हैं जो समय हमारे पुरखों को अनुभव या सबक सीखने में लगा।

यह समय हम हमारे कामों की धार तेज करने और गुणवत्ता अभिवृद्धि में लगा सकते हैं। इसलिए जो कुछ हो उसका दस्तावेजीकरण अनिवार्य होना चाहिए। व्यक्ति चाहे सरकारी क्षेत्र में हो, निजी या अद्र्ध सरकारी अथवा दूसरे किसी क्षेत्र में भी। दुनिया में कहीं भी गुजर-बसर कर रहा हो।  इनमें छोटे-बड़े सभी स्तरों के व्यक्तियों को चाहिए कि वे अपने अनुभवों को नियमित रूप से लिखें और संग्रहित करें तथा प्रकाशन की व्यवस्था करें।

इससे उनका लेखन कालजयी भी रहेगा और आने वाली कई पीढ़ियों तक को उनके अनुभवों का लाभ मिलने लगेगा।  अनुभव लेखन को यदि अनिवार्य कर दिया जाए तो यह किसी भी देश के लिए अमूल्य धरोहर, प्रेरक और मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

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डॉ. दीपक आचार्य

941330677

dr.deepakaacharya@gmail.com

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