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महशिवरात्रि पर विशेष – समरथ कहुं नहि दोष गोंसाईं / हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

हिंदू पंचांगके अनुसार प्रतिवर्ष 24 शिवरात्रि मनाया जाता है ! फाल्गुन मास की कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को महाशिवरात्रि के रूप में उत्साह/उमंग के साथ मनाए जाने की परम्परा सृष्टि के आरम्भ से ही चली आ रही है ! महाशिवरात्रि अर्थात कल्याण की रात्रि , आत्मकल्याण की रात्रि ,लोककल्याण की रात्रि ! यह दिन कल्याणकारी कार्यों का संकल्प लेने का होता है ! पुराने कार्यों/संकल्पों का लेखा जोखा , उसका विष्लेषण एवम नए कार्यों की योजना , उसके क्रियांन्वयन और सम्पादन की व्यवस्था आज के ही दिन से प्रारम्भ की जाती रही है प्राय: , और यह परम्परा सदियों पुरानी है हमारे देश में ! और शायद इसी के परिपालन स्वरूप आम बजट की प्रस्तुति इस तिथि के आसपास आज भी की जाती है ! यह महज संयोग नही है , वास्तव मे पौराणिक शासकों द्वारा ऋषि मुनियों के सुझाव या आदेश से संचालित परम्परा है !इस दिन भगवान शिव अपने कल्याण्कारी योजनओं को शासकों के मुख से उगलवाते हैं ताकि शासनाधीन प्रजा सुख और शांति का अनुभव कर सके !

महाशिवरात्रि के ही दिन भगवान शिव का दर्शन होता है – यह मान्यता सही नही है ! उनका दर्शन तो हरेक पीडित व्यक्ति तन मन से गुहार लगाकर कभी भी कर सकता है ! परंतु यह दिन विशेष इसलिए होता है क्योंकि भगवान शिव ने इसी दिन को अपना जनदर्शन घोषित किया हुआ है ! बिना किसी विशेष प्रयास से लोग उनके स्वरूप को ज्योति रूप में अपने आसपास स्थापित शिव मंदिरों मे या अपने भीतर भी महसूस सकते हैं , जिसे वेद ने स्वयं कहा है ‌-

अंतज्योर्ति बर्हिज्योति: प्रत्यग ज्योति परात्परम ! ज्योर्तिज्योति: परमज्योति सत्यं ज्योति शिवोड्स्महम ! महशिवरात्रि की रात्रि को ही दिव्यज्योति का प्राकट्य महाकाल के रूप मे पृथ्वी पर हुआ था कभी ! उस अछोर,अपार , अनंत ज्योति के लिए शिवपुराण लिखता है -

आकाशे तारकं लिगं ,पाताले हाटकेश्वरम ! मृत्युलोके महाकालं , लिंगत्रय नमोस्तुते !

इसी ज्योतिपिण्ड से बारह प्रकाश किरणें निकलीं , जिसे द्वादश ज्योर्तिलिंगानि कहते हैं – सौराष्टे सोम्नाथं, श्री शैले मल्लिकार्जुनम ! उज्जैन्या महाकालं,ओंकारं ममलेश्वरम !

परल्या वैद्यनाथं ,च डाकिन्या भीमशंकरम !सेतुबंधे तु रामेश्वरम , नागेश दारूकावने !

वाराणस्या तु विश्वेशं ,त्र्यम्बके गौतमीतटे ! हिमालये तु केदारं ,पुरमेशं च शिवालये !

सृष्टि का आरम्भ – शून्य, नीरवता एवम भयावह पिंड से हुआ ! पुराण और आधुनिक विज्ञान की मान्यताओं के अनुसार अखिल ब्रम्हाण्ड कभी आग उगलते गोले का स्वरूप थी , जो शनै: शनै: टूट कर इधर उधर बिखरती रही – भटकती रही ! इन्ही टूटे पिंडों पर सृष्टि विस्तार कर खेल खेलने का मन बनाया त्रिदेवों ने ! चिंतन की अविराम यात्रा के बीच निष्कर्ष निकला कि, सृष्टि की रचना ब्रम्हाजी करेंगे ,विष्णुजी रचना को सुंदरता प्रदान करेंगे एवम शिवजी वापस समेटकर कल्याण करेंगे ! खेल प्रारंभ हो गया , सृष्टि का निर्माण होने लगा ! पेड़ , पौधे , पशु , पक्षी ,जीव , जंतु , मानव सभी की रचना होने लगी ! उनको सुंदर बनाने के लिये बिष्णुजी व्यवस्था करते , अंत में शंकरजी इन्हे घर-घुंदिया की तरह समेट देते ! खेल बडा नीरस था ,क्योंकि ब्रम्हा जी बनाते, बिष्णुजी जैसे ही सुंदरता प्रदान करते वैसे ही शंकरजी उजाड़ देते ! पुन: एक साथ बैठे चिंतन मनन के लिये ! खेल को सरस बनाने का उपाय ढूढ़ने लगे ! ब्रम्हाजी ने कहा – मै इससे अधिक कुछ नही कर सकता, बिष्णुजी ने भी हाथ खड़े कर दिया और कहा – ज्यादा से ज्यादा भौतिक विलासिता प्रदान कर सकता हूं , पर खेल में मजा नही आयेगा , क्योंकि केवल खिलाड़ी कसरत कर रहे है ! ब्रम्हाजी ने सुझाव दिया –यदि हमारे प्यादे भी इस खेल मे मजा लेना शुरू कर देंगे तो खेल मे सरसता ऐसे ही आ जाएगी ! परंतु इसके लिए प्यादों को सजीव बनाना पड़ेगा और यह काम केवल शिव ही कर सकता है , क्योंकि वही इतना सामर्थ्यवान है जो अपनी आत्मा को किसी भी रूप में कहीं भी स्थापित कर सकता है , तब से शिवजी ने अपनी आत्मा को ज्योति का रूप देकर ,निर्जीवों में प्राण फूंक दिया, इसलिये बेद पुराण जीव को शिव का अंश मानते हैं !

महाराज हिमालय और माता मैंना अपनी पुत्री गिरिजा के विवाह योग्य हो जाने पर चिंतित थे ! नारदजी द्वारा हस्तरेखा देखने के बाद , नारदजी के हाव भाव को देख, मां पिता की हैरानी स्वाभाविक थी ! उन्होने बताया –पूरी दुनिया मे तुम्हारी पुत्री के योग्य वर मिल पाना असम्भव तो नही है , पर मुश्किल जरूर है – अगुन ,अमान ,मातु पितु हीना ! उदासीन सब संशय छीना !! और

जोगी, जटिल , काम, मन, नगन अमंगल दोष ! अस स्वामी एहि कंह मिलहि ,परी हस्त असि देख !!

अर्थात गुणहीन, मानहीन, माता पिता विहीन ,उदासीन, लापरवाह ,योगी ,जटाधारी ,निष्काम हृदय ,नंगा और अमंगलवेषधारी पति इसके भाग्य में लिखा है , पर इसके बावजूद ‌-

समरथ कहि नहि दोष गोसाईं ! रवि , पावक , सुरसरि की नाईं !

वह समर्थ व्यक्ति होगा , जिसकी इच्छा से रवि ,अग्नि , और गंगा सामर्थ्यवान बन पाते हैं ,ऐसे समर्थ व्यक्ति/देव को उक्त दोष कुछ नही बिगाड़ सकते ! प्रश्न अब यह उठता है कि समर्थ कौन होता है ? क्या वह, जिसके पास सत्ता की कुंजी है, या वह जिसके पास अकूत धन दौलत है, या वह जिसके पास बुद्धि या ताकत है ?लोग गलत व्याख्या कर कहते हैं – समर्थ वह जिसमें कोई दोष नही , कुछ यह भी कहते है - समर्थ जो करता है , उसे गलत नही ठहराया जा सकता !

यह क्षणिक सामर्थ्यता है , जो बुद्धि, बल, अन्यथा किसी अन्य तरीके के प्रभाव से हासिल की गई होती है , परंतु उसका प्रभाव नष्ट होते ही सामर्थ्यता कहां गुम हो जाती है ,पता तक नही चलता ! पर देवों के महादेव सामर्थ्यवान इसलिये हैं क्योंकि उनके पास देने के लिए कुछ दिखता नही परंतु सारे जग को अपना सर्वस्व दे देते हैं , सारे जग की बाधाए हर लेते हैं ! अपना प्राण देकर निर्जीव को सजीव बना देने वाले महादेवशिव ही समर्थ हैं !

शिव को समर्थ इसलिए भी कहा गया है क्योंकि वही हैं जो सारे विश्व मे वास करते हैं ! तभी तो शिव की उपासना आराधना श्मशान घाट तक में की जाती रही है ! सम्भवत: विश्व में वास करने के कारण विश्वास के रूप में माना व जाना जाता है ! कुछ मानस व्याख्याकार रवि ,गंगा और अग्नि को शिव की तरह समर्थ मानते हैं ! पर वास्तव में ये शिव के अभिन्न अंग हैं , उससे अधिक कुछ नही ! इनका नियंत्रक और स्वामी है शिव ! वास्तविकता तो यह है कि शिव को छोड़कर इनको धारण करने की सामर्थ्यता किसी मे भी नही ! शिव को शंकर इसलिये भी कहा गया है क्योंकि सृष्टि के सारे प्रमुख तत्व इन्ही में समाया हुआ है ! शंकर अर्थात मिला हुआ ! सृष्टि के रूप में मिली पार्वती शिव को शंकर बना , उन्हे समर्थ बनाने में अपना नाम जोड़ लेती है –

शंकर जगत वंद्य जगदीशा ,सुर नर मुनि सब नावत शीशा !

वास्तव में विश्व का सृष्टि क्रम अनवरत है ! हम सभी महसूसते हैं ईशान अर्थात शासनकर्ता के रूप मे एक शक्ति को ! अनादिकाल से ऋषिमुनियों ने आत्मरूप शिव की साधना , विश्वरूप शिव की आराधना और मूर्त अमूर्त रूप में शिव की उपासना का क्रम निर्धारित किया हुआ है और तभी से एको ब्रम्ह द्वितीयोनास्ति का सिद्धांत चलता रहा जो कलांतर में एक सत्यं , विप्रा बहुधा वदंति ..... के रूप में मान्यताएं बदलती रही !

शिव को समर्थ कहने का आधार सिर्फ इतना ही नही है ! सभी विधाओं और सभी विद्याओं के ईशान अर्थात स्वामी हैं भगवान शिव ! वे ही पंचमहाभूतों के नियंता भी हैं जिनका अनुशासन विश्व की सम्पूर्ण चेतना स्वीकारती रही हैं , प्रमाण स्वरूप -

ईशान सर्वविधानामीश्वर: सर्वभूतानाम (वेद)

ईश्वर: सर्व ईशान: शंकर चंद्रशेखर: (उपनिषद)

ईश्वर: सर्वभूतानां हृदयेशेडर्जुन तिष्ठति ( गीता) !

शिव पुराण के अनुसार ईशता सर्वभूतानां ईश्वर:, स्वयं सिद्ध और सर्वमान्य सत्य है ! तुलसी के शिव –

भवानी शंकर वंदे , श्रद्धा विश्वास रूपिणौ ! याभ्यां बिना न पश्यंति,सिद्धा: स्वांत स्थामेश्व्र: !!

सागर मंथन से निकले चौदह रत्नों में एक विष भी था , जिसके ताप से लोग जले जा रहे थे ! प्राणीमात्र घुटन महसूस रहे थे , सभी तरफ हाहाकार मच गया था ! कौन है जो इसे धारण कर सकता है ? ब्रम्हा और बिष्णुजी जानते थे , शिव के अलावा इसका पान किसी के लिए सम्भव नही ! सभी ने मिलकर भगवान शिव को याद किया ! कल्याणकारी महादेव ने प्रगट होकर विषम गरल को अपने कण्ठ में धारण किया ! वेदों ने यश गाया ! तुलसी लिखतें हैं -

जरत सकल सुर वृन्द , विषम गरल जिन्ह पान किया! तेहि न भजसि मतिमंद,को कृपालु संकर सरिस !

रहीम के अनुसार – मान रहित विष पान करि, सम्भु भये जगदीश !

शिव की डमरू से स्वर और व्यंजनों का जन्म हुआ ! डमरू के प्रथम घात से ,,,,लृ, और द्वितीय घात से सामवेद के सात स्वर सा,रे,,,,द्य,नि ध्वनित हुए !

एकोडहम बहुस्याम सृजनेच्छा से लेकर कालोडस्मि लोकक्षय कृत प्रवृद्दौ तक के मूल कारक होने के कारण इन्हे नटेश्वर कहते हैं , तथा सृष्टि को क्रीड़ा के रूप में विसर्जित करने की कला में निपुण ये ताण्डवरूपी महारास करने वाले रासराशेश्वर भी हैं !

राक्षसों के गुरू शुक्राचार्य , देवों के गुरू बृहस्पति और मानवों के गुरू वेदव्यास हैं ! इन तीनों के गुरू का दायित्व निर्वहन भी महाकाल ही करते आ रहे हैं अनादिकाल से !

राक्षसों के वैद्य सुखेन , देवताओं के वैद्य अश्वनीकुमार और मनुष्यों के वैद्य धन्वंतरि भी इन्हे महावैद्य के नाम से पुकारते रहे हैं , एवम संकटकालीन परिस्थिति में ये भी शिव का सहारा लेते हैं ! तभी तो इन्हे परल्या वैद्यनाथं कहा गया है !

शिव की उपासना सृष्टि के प्रारम्भ से ही होती आ रही है ! गांवों मे आज भी गोबर से घर द्वार की लिपाई करने वाली गृहणी के मुख से शिव शिव की ध्वनि सुनी जा सकती है ! घट पर कपड़ा धोता धोबी शिव शिव की रट लगाए रहता है , हल चलाता किसान तथा बर्तन धोता सेवक अपने काम में मग्न शिव का अस्पष्ट उच्चारण आज भी करते /देखे/सुने जा सकते हैं ! वास्तव में सभी जन यह जानते हैं कि शिव के ही सबसे करीब जीव होता है ! उस ज्योतिपिण्ड का ही हिस्सा है हमारा जीव, जिसका नास नही होता – ईश्वर अंश जीव अविनाशी ! जीव इसलिए न पैदा होता , न ही मरता , यह केवल प्रगट होता है और उसी शिव में विलीन हो जाता है !

जाने अनजाने में नाम लेने अथवा दर्शन पा लेने वाले को भी शिव मुक्ति प्रदान करते हैं ! भगवान शिव स्वयं कहते हैं – काशी मरत जंतु अवलोकी, करउ नाम बल जीव बिसोकी !

संतों के अनुसार काशी का अर्थ हमारा शरीर है – मन मथुरा , दिल द्वारिका , काया काशी जान ! दसवां द्वार देहुरा , तामें ज्योति पिछान ! पाप ताप और आवेश से छुटकारा पाने के लिए – जपहु जाई सत संकर नामा , होइहि हृदय तुरत विश्रामा ! शिव की महिमा का बखान मानस में – शिव सेवा पर फल सुत सोई , अविरल भगति राम पद होई ! और- शिव पद कमल जिन्हहि रति नाही , रामहि ते सपनेहु न सुहाही ! वेदों मे शिव महिमा –

असिति गिरि सम्स्यात कज्जलं सिंधु पात्रे ! तरूवरं शाखां , लेखनी पत्र मुर्वीम !

लिखिति यदि गृहित्वा ,शारदा सर्वकालं ! तदपि तव गुणाणाम ईशं,पारं न याति !!

शि अर्थात पापनाशक और अर्थात मुक्तिदाता ! जो हमारे पाप का नाश कर हमारी आत्मा को मुक्ति प्रदान करता है , वही तो शिव है -

शि कहते अद्य नाशक ,व कहते ही मुक्ति ! गजानंद शिव शिव कहु , प्रेम ज्ञानयुक्त भक्ति !

सृष्टि को सृष्टा से , इडा को पिंगला से ,मैं को तू से, अहम को परम से, त्व को स्वयं से, पर को अपर से, अलख को लख से, चर को अचर से, जड़ को चेतन से मिलाकर जीव को शिवत्व का बोध कराने वाले स्वयंसिद्ध समर्थ ही योगेश्वर शिव हैं !

निश्चित ही ऐसे कल्याणकारी महादेव ही समर्थ हैं , जो आज भी विराजित हैं, न केवल मंदिरों में बल्कि हमारे , आपके सभी के दिलों में ! प्रणम्य है इस महाशिवरात्रि की शुभ बेला में और कामना है विश्व के हर छोटी बड़ी कार्यों/ घटनाओं पर आपकी ज्योति की छाया पड़ती रहे ताकि, न केवल मानव जाति का, बल्कि पूरी सृष्टि का स्वमेव कल्याण होता रहे ! वैसे भी शिव जो करेंगे वह सही ही होगा क्योंकि – समरथ कहुं नहि दोष गोसाईं !!

 

 

लेखक –

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

उप मुख्य नियंत्रक , द.पू.म. रे. रायपुर

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