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राँग नंबर / कहानी / राहुल देव

रॉंग नंबर

आज फिर वही हुआ। जफ़र के मोबाइल की घंटी बजी। फ़ोन उठाया तो पता चला रॉंग नंबर। ये स्थिति कोई नयी नहीं थी। जफ़र ने जब से अपना नया मोबाइल लिया था तभी से यह सिलसिला शुरू हो गया था। हफ्ते में दो-चार रॉंग नम्बरों से कालें आ ही जातीं थीं। पहले-पहल जब दोस्तों ने जफ़र से उसका नंबर पूछा तो उसने बताया 9454.....

‘क्या बे सीएसएलएल का नंबर लियो है ?’, दोस्तों ने जोर का अट्टहास लगाते हुए कहा।

‘क्यूँ क्या हुआ ?’, जफ़र ने पूछा।

‘अबे सीएसएलएल सरकारी लोगों की पहचान है, थकी सेवा है। तुझे इसका फुलफॉर्म मालूम है कि नहीं सीएसएलएल मतलब काम्प्लीकेटेड सेवा लेके लुटे।’, जफ़र के दोस्तों ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा।

जफ़र एक गरीब घर का अच्छा लड़का था। इन्टर गाँव से पास करने के बाद उसके अब्बू ने उसे शहर जाकर कोई हुनर सीखने को कह रहे थे। जफ़र होनहार व काम में तेज लड़का था। उसका मन आगे और पढ़ने को था। इस बारे में जब उसके अब्बू को पता चला तो वे बोले, ‘बेटा, घर के हालात का तो तुझे पता ही है। कोई हुनर सीखेगा तो कमाएगा। पढ़कर क्या करेगा और पढ़ाई में भी पैसा लगेगा। तुझे तो पता ही है फिर पढ़ने-लिखने के बाद भी आजकल नौकरी मिलती कहाँ है ?’

जफ़र की अम्मी से जफ़र की उदासी देखी न गयी उन्होंने अपनी जमापूंजी अपने शरीर से उतारकर दे दी। इस प्रकार जफ़र ने किसी तरह शहर के एक कॉलेज में ग्रेजुएशन में दाखिला ले लिया। अब घर पर कुल चार प्राणी रह गए। उसकी अम्मी, अब्बू और जफ़र की दो बहनें।

कुछ ही दिनों में शहर की चकाचौंध से जफ़र का दिमाग खुलने लगा। यार, दोस्त बढ़े और उसकी पढ़ाई का एक साल गुज़र गया। दूसरे साल जफ़र ग्रेजुएशन सेकंड इयर के एग्जाम देने के बाद घर आया हुआ था। उसने एक दिन अपने अब्बू से मोबाइल दिलवाने को कहा। उसके अब्बू ने रुखी आवाज़ में कहा, ‘मोबाइल क्या करेगा तू ? यहाँ खाने को पैसा नहीं और तुझे मोबाइल चाहिए। पीसीओ से महीने में एकाध बार फ़ोन कर लिया कर बस...|’

जफ़र उगता सूरज था। उसके सभी दोस्तों के पास एक से एक बढ़िया मोबाइल फ़ोन्स थे। जफ़र ने अम्मी से कहा, ‘अम्मी मेरे दोस्त सुहैल के पास बहुत बढ़िया मोबाइल है, उससे फोटू भी खिंच जाता है। उसके मामू ने उसे ख़ास सउदिया से लाकर दिया है। अम्मी मेरे मामू मुझे कभी कुछ नहीं देते...!’

अम्मी क्या कहतीं, चुप रहीं और इस साल भी जफ़र की मोबाइल लेने की ख्वाहिश पूरी न हो सकी।

फाइनल इयर में पहुँचते- पहुँचते वह दो-चार जगह ट्युशंस पढ़ाने लगा। मोबाइल खरीद लेने की उसकी इच्छा ने उसके खर्चे कम करा दिए। पैसे जोड़-जोड़ कर धीरे-धीरे उसने मोबाइल खरीदने लायक पैसे जमा कर लिए और ग्रेजुएशन का रिजल्ट आते-आते उसने एक मोबाइल खरीद लिया। अपने नए मोबाइल के लिए उसने सीएसएलएल कंपनी का सिमकार्ड लिया था। उस दिन वह बहुत खुश था और तुरंत ही उसने अपने सभी दोस्तों को अपना नंबर बाँट दिया था। उसने सबसे पहली कॉल अपने घर पर की और बताया कि उसने अपनी कमाई से एक अच्छा सा मोबाइल फ़ोन ख़रीदा है। उसकी बहनें उसका मोबाइल देखने के लिए जिद करने लगीं। उसके अम्मी और अब्बू भी यह सोचकर खुश हुए की चलो लड़का लाइन पे लग गया। उसने कई बार अपने मोबाइल को उलट-पलट कर देखा, कभी बटन दबाकर रिंगटोन्स सुनने लगता तो कभी गेम्स खेलने लगता। अपनी कमाई से लिए गए इस आधुनिक खिलौने से खेल-खेलकर वह प्रफुल्लित हो रहा था।

ट्युशंस से उसका खर्च निकल आता था इसलिए अब उसने घर से मदद लेना भी कम कर दिया था। आज दोस्तों की बात सुनकर पहले तो उसने नंबर चेंज करने की ठानी लेकिन लगभग सभी जगह वह अपना नंबर दे चुका था। उस समय आज की तरह एमएनपी सेवा भी नहीं थी। खैर उसका वह नंबर बना रहा।

ग्रेजुएशन पास करने के बाद उसने कई जगह नौकरी वगैरह के लिए हाथ-पाँव मरने शुरू कर दिए मगर बेरोजगारी के इस दौर में उसे आसानी से नौकरी कहाँ मिलनी थी। कुछ समय बाद जफ़र ने मार्किट में पुस्तकों की एक दूकान में एक छोटी-मोटी नौकरी कर ली जिससे उसके रूम का किराया एवं उसका अन्य खर्च निकल आता था। जफ़र के कमरे से पुस्तकों की दूकान लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर थी। पैसे बचाने के लिए वह अपने कमरे से दूकान तक पैदल ही जाता था। उसके पास इतने पैसे न थे की वह कोई गाड़ी खरीद सकता मगर उसके मन में तमाम बढ़िया गाड़ियों की तस्वीरें छाईं रहतीं। सड़क पर एक से एक अच्छी गाड़ियों को देखकर उसका मन मचल उठता। वह सोचता कि काश वह भी एक गाड़ी खरीद सकता जिस पर वह अपनी अम्मी को बैठाकर पूरे शहर भर की सैर कराता।

जफ़र का तेज दिमाग धीरे-धीरे कुंद होता जा रहा था। घर से पहली बार शहर आते वक़्त उसकी अम्मी ने नसीहत दी थी कि कि बेटा कुछ भी हो हर वक़्त यह जरूर याद रखना कि अल्लाह हमें देखता है उसकी नज़रों से कहीं कुछ भी छिपा नहीं है। ये दुनिया और इस दुनिया के तमाम मसले उसी के बनाए हुए है। बुरे वक़्त में घबराना नहीं और अच्छे वक़्त में उसे भूलना नहीं। मगर अब वह पूरी तरह से मनीमाइंडेड बन चुका था। वह सोचता था कि शायद आज के दौर में जिसके पास पैसा है वही खुश है। उसने गरीबी के दंश को झेला था जिसका ज़िम्मेदार वह ऊपरवाले को मानता था और इसी वजह से वह नमाज़ भी नहीं पढ़ता था।

पुस्तकों की दूकान का मालिक जफ़र के काम से खुश था। जफ़र भी मेहनत से अपना काम करता था। एक दिन दूकान का मालिक किसी काम से बाहर गया हुआ था और जफ़र दूकान पर अकेला था। अचानक उसकी नज़र काउंटर पर गल्ले की तरफ पड़ी जिसमें चाभी लगी हुई थी शायद जल्दी में दूकान मालिक चाभी लगी छोड़ गया था। जफ़र के अलावा उस समय दूकान पर और कोई नहीं था। उसने गल्ला खोलकर देखा तो उसमें रुपये भरे हुए थे। गल्ले में रक्खे रुपयों को देखकर जफ़र का मन डोल उठा। एकाएक पता नहीं क्यों उसके मन में रुपये चोरी करने का विचार आया। उसकी अंतरात्मा ने उसे एक बार रोका पर फिर भी वह अपने आप पर नियंत्रण न रख सका। उसने इधर-उधर देखकर तुरंत कुछ पैसे पार कर दिए, तत्पश्चात उसने गल्ला बंद किया और पूर्ववत अपने काम में लग गया। थोड़ी देर में जब दूकान मालिक वापस आया तो जफ़र अन्दर ही अन्दर बहुत डर रहा था लेकिन ऐसा वैसा कुछ भी नहीं हुआ। शाम को जफ़र अपने कमरे पर वापस आया तो उसने चोरी किये गए रुपयों को गिना, पूरे तीन हज़ार रुपये थे। वह बहुत खुश हुआ, उसे जल्दी से पैसे बनाने का यह आईडिया बहुत अच्छा लगा।

धीरे-धीरे जफ़र की संगत भी बिगड़ती जा रही थी। शाम को दूकान से छूटने के बाद बिगडैल लड़कों के साथ घूमना, पिक्चरें देखना और सिगरेट पीना शुरू कर दिया था उसने। पारिवारिक संस्कारों, विचारों, पढ़ाई आदि को ताक पर रखकर जीवन जीने लगा था जफ़र।

एक दिन हमेशा की तरह जफ़र अपने दोस्तों के बीच बैठा हुआ तफरीह कर रहा था कि उसका मोबाइल घनघना उठा। उसने उठाया तो कोई रॉंग नंबर था। उधर से आवाज़ आई-

‘हेल्लो पापा ! आप जल्दी से घर आ जाओ, बड़ी दिक्कत है यहाँ पर। हम लोगों को दिन दिन भर खाना नहीं मिलता। उधार वाले रोज-रोज आकर आपके बारे में पूछते हैं। आप कब तक आओगे पापा...?’

जफ़र की कुछ समझ में नहीं आया तो उसने फ़ोन काट दिया। फ़ोन पर कोई बच्चा बड़ी ही दैन्य आवाज़ में बोल रहा था। इसके बाद जफ़र ज्यादा देर तक अपने दोस्तों के बीच बैठ न सका। वह अपने कमरे पर लौट आया।

रात में वह जब अपने बिस्तर पर लेटा तो उस रॉंग नंबर वाले बच्चे की आवाज़ उसके सामने गूंजने लगी। उसे ऐसा लगा कि जैसे उसका बचपन ही उससे बातें कर रहा हो। पूरी रात उसे नींद नहीं आई।

इस बात को धीरे-धीरे चार-पांच दिन बीत गए। जफ़र के मोबाइल पर कोई रॉंग नंबर नहीं आया। जफ़र खुश था कि शायद नेटवर्क की गड़बड़ी ठीक हो गयी कि तभी उसका मोबाइल बज उठा। उसने गुस्से में फ़ोन उठाया तो उधर फिर किसी बच्चे की आवाज़ थी-

‘पापा...पापा आप हो ! आप आ जाओ न ! आप जबसे कमाने के लिए बाहर गए हो तबसे मम्मी की तबियत बहुत खराब है और आज सुबह से हमने कुछ भी नहीं खाया है...!’

‘बेटा तुम्हारे पापा कहीं गए हुए हैं। तुम अपने घर का पता मुझे बता दो तो मैं कुछ पैसे भिजवा देता हूँ।’, जफ़र ने धीरे से कहा।

इस पर बच्चे ने अपने घर का पता उसे बता दिया जिसे जफ़र ने अपनी एक कागज़ के टुकड़े पर नोट कर लिया। वह सोच रहा था कि एक ही जगह से इतनी बार रॉंग नंबर कैसे आ रहा है !

उसने यह बात शाम को अपने दोस्तों को बताई तो वे हंसी उड़ाने लगे। वे बोले,

‘अबे बेवकूफ तो तू मदद करेगा उस परिवार की जिनको तू जानता तक नहीं है।’

जफ़र ने कहा, ‘मेरे पास उसका एड्रेस है कम से कम चलकर देखें तो सही अगर उनकी स्थिति वास्तव में खराब है तो हमें चलकर उनकी मदद करनी चाहिए।’

उसके दोस्तों को उसका आईडिया पसंद नहीं आया। उन्होंने एक स्वर में कहा-

‘तुझे समाज सेवा का शौक चर्राया है तो तू जाके देख। हम लोग तेरे साथ फ़ालतू में कहीं नहीं जाने वाले। अरे यार कोई हम लोग भी बहुत अमीर तो हैं नहीं। जब अपनी हालत ही पतली है तो हम मदद कैसे कर सकते हैं।’

जफ़र बुझे मन से अपने रूम पर वापस लौट आया।

वह अपने रूम में बैठा था कि उसकी नज़र अपनी संदूकची पर पड़ी जिसमे वह दूकान से चुराए हुए रुपये जमा करता था। उन्होंने संदूकची खोलकर गिने तो पूरे पंद्रह हज़ार रुपये थे। उसके सामने अब अपने सपने नहीं बल्कि उस बच्चे का भूख से पीड़ित चेहरा आ रहा था। जफ़र हमेशा अपनी तुलना अपने से बड़े लोगों से करता था उसे इल्म ही नहीं था कि उससे भी ज्यादा गरीब लोग इस दुनिया में पड़े हुए हैं। आखिरकार अपने आप से एक लम्बी जद्दोजहद के बाद जफ़र ने निश्चय किया कि कल वह दूकान से छुट्टी लेकर उस बच्चे के घर जायेगा तथा इकट्ठा किये हुए ये सारे पैसे उसके परिवार को दे देगा। शायद यह उसके संचित संस्कार ही थे जो कि धीरे-धीरे उसके हृदय को परिवर्तित कर रहे थे। उसने अल्लाह से अपने बुरे कर्मों की तौबा की तथा आगे से कभी चोरी न करने की कसम खायी।

आज दूकान पर जाते हुए वह अपने आप को काफी हल्का महसूस कर रहा था। दूकान पर पहुंचकर उसने दूकान मालिक से कुछ जरूरी काम होने की बात कहकर आज न आ पाने की बात कही तथा वह वहीं से उस परिवार के घर के लिए निकल गया।

रास्ते की दूरियां तय करते-करते तथा पूछते-पाछते वह दिए गए पते पर पहुँच गया। उस घर के बाहर पहुँचने पर उसने देखा कि घर की स्थिति अत्यंत खराब थी। उसने लकड़ी का टूटा हुआ दरवाज़ा खटखटाया तो उधर से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। आस-पड़ोस के लोग उसे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे थे मानो पूछना चाहते हों कि वह यहाँ क्यों आया है ? कौन है वह ??

जफ़र ने सोचा कि शायद यहाँ कोई नहीं आता। उसने हड़बड़ी में अपने कपड़ों को ठीक करने की कोशिश की, इतने में एक दस ग्यारह साल के बच्चे ने दरवाज़ा खोला और बोला-

‘आप कौन हो ? पापा अभी नहीं हैं। जब पापा वापस आ जायेंगे तब आप अपने पैसे ले जाना। अभी हमारे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है।’

शायद वह जफ़र को भी उधार वाला समझ रहा था।

जफ़र बोला-

‘बेटा ! मैं तुम्हारे पापा का दोस्त हूँ। याद है मेरी तुमसे फोन पर बात हुई थी।’

‘आप...हाँ..हाँ याद आया, आप इतनी जल्दी आ गए, आप अन्दर आ जाओ।’, लड़का थोड़ा खुश होते हुए बोला।

बरसात की वजह से उस घर में भयंकर सीलन थी। जफ़र ने अपने आप को व्यवस्थित करते हुए एक कोने में पड़ी हुई कुर्सी पर बैठ गया। लड़का भागकर अन्दर के कमरे में चला गया। जफ़र ने अपनी नज़रें उठाकर इधर-उधर देखा तो उसे महसूस हुआ कि दुनिया में उससे भी ज्यादा गरीब लोग हैं जिनके पास शिक्षा तो दूर खाने तक को नहीं है। पता नहीं हमारी सरकार को यह सब क्यों नहीं दिखता...

थोड़ी देर बाद एक बीमार सी लगने वाली महिला ने कमरे में प्रवेश किया। बच्चे ने शायद उसे जफ़र के बारे में बता दिया था। उसने एक आशा भरी दृष्टि से जफ़र की ओर देखा। जफ़र ने उसे पैसे देते हुए कहा कि यह पैसे उसके पति ने भेजे हैं। यूँ कहकर वह तेजी से जाने के लिए खड़ा हो गया। जफ़र को डर था कि कहीं वह ज्यादा पूछताछ न करने लगें। इससे पहले कि वह महिला उससे कुछ और पूछ पाती वह तेजी से बाहर की ओर निकल गया।

लौटते वक़्त जफ़र के मन में झंझावात उमड़ रहा था। उसे अपने पिछले कुछ समय के कृत्यों पर बहुत पश्चाताप हो रहा था। उसने आसमान की ओर मुंह कर सही राह दिखाने के लिए अल्लाह का शुक्रिया अदा किया। घर आकर उसने अपने मोबाईल पर अपनी अम्मी और अब्बू से बात की। अब उसके दिल में एक शांतिमय सुकून था। इस एक रॉंग नंबर ने उसके जीवन की दिशा बदल दी थी।

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संक्षिप्त परिचय

राहुल देव

जन्म – 20/03/1988

शिक्षा - एम.ए. (अर्थशास्त्र), बी.एड.

साहित्य अध्ययन, लेखन, भ्रमण में रूचि | एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह तथा एक बाल उपन्यास प्रकाशित | पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतरजाल मंचों पर कवितायें/ लेख/ कहानियां/ समीक्षाएं आदि का प्रकाशन | साहित्यिक वार्षिकी ‘संवेदन’ के दो अंकों का संपादन | त्रैमासिक पत्रिका ‘इंदु संचेतना’ का सहसंपादन | ई-पत्रिका ‘स्पर्श’ (samvedan-sparsh.blogspot.in) का संचालन | ‘जलेस’ से जुड़ाव |

सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन एवं अध्यापन |

संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203

मो.– 09454112975

ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

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बहुत अच्छी लगी कहानी। . कुछ समय के लिए भटक सकता है अच्छे संस्कार वाले लोग लेकिन जल्दी हीं वे नेक राह पकड़ लेते हैं हमेशा के लिए .फिर कभी भटकते नहीं ...

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