अनाहत / कहानी / राहुल देव

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अनाहत “प्रशांत जी आपको मैनेजर साहब अपने कमरे में बुला रहे हैं।” चपरासी ने प्रशांत के केबिन का डोर खोलते हुए उससे कहा। “क्यों ?”, प्रशां...

अनाहत

“प्रशांत जी आपको मैनेजर साहब अपने कमरे में बुला रहे हैं।” चपरासी ने प्रशांत के केबिन का डोर खोलते हुए उससे कहा।

“क्यों ?”, प्रशांत ने न चाहते हुए भी पूछ लिया।

“पता नहीं”, चपरासी ने मुंह बिचकाकर कहा।

“ठीक है तुम चलो मैं आता हूँ।”, प्रशांत बोला।

प्रशांत पिछले डेढ़ साल से शहर के इस निजी बैंक में सेल्स ऑफिसर की हैसियत से काम कर रहा था। काम ठीक-ठाक चल रहा था मगर अचानक आयी वैश्विक मंदी व बाज़ार में आयी गिरावट की वजह से पिछले तीन महीनों से उसके क्लाइंट्स उससे छूटते जा रहे थे। वह अपना टारगेट पूरा नहीं कर पा रहा था। चारों तरफ बेरोज़गारी का आलम था, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ लगातार अपने कर्मचारियों की छंटनी कर रहीं थीं। सामाजिक और आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा था और ऐसे में लोगों की जेब से पैसे निकलवाना बहुत ही टेढ़ी खीर था। प्रशांत भी पिछले तीन महीनों से इन्हीं दबावों का सामना कर रहा था। प्रशांत जान रहा था कि हमेशा की तरह आज भी उसे बॉस की डांट का एक लम्बा डोज़ मिलने वाला है। हालाँकि वह यह भी जानता था कि उसका बॉस चीजों को समझने वाला एक अच्छा आदमी है। वह उसे तभी डांटता है जब खुद उसके ऊपर के अधिकारी उसके डंडा करते हैं। यों सोचते हुए थोड़ी देर बाद प्रशांत ब्राँच मैनेजर के केबिन में पहुंचा। जैसा कि उसने सोचा था ठीक वैसा ही था। मैनेजर का पारा गरम था। केबिन में घुसते ही वह प्रशांत पर बरस पड़ा-

“मैं कई दिनों से तुम्हें देख रहा हूँ प्रशांत कि तुम्हारा ध्यान काम पर नहीं है। कहीं और ही खोए रहते हो तुम। याद है पिछले तीन महीनों से तुमने अपना टारगेट अचीव नहीं किया है !”

“सर....”, प्रशांत के कांपते हलक से सिर्फ इतना ही निकला।

“क्या सर-सर लगा रक्खा है यार, मैं कब तक तुम्हें बचाता रहूँगा। तुम्हीं बताओ पिछले तीन महीनों का तुम्हारा क्या आउटपुट है ? आखिर मुझे भी ऊपर जवाब देना पड़ता है।”, बॉस ने पानी का ग्लास हाथ में लेते हुए कहा, “जवाब दो मुझे मैं तुमसे पूछ रहा हूँ मिस्टर प्रशांत !”

“सॉरी सर मैं तीन महीनों का टारगेट इस महीने के आखिर तक पूरा करके दे दूंगा।”, प्रशांत ने एक साँस में कह दिया। उसने क्या कह दिया है इस पर गौर करने के लिए उसके पास समय नहीं था। उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था शायद !

“ओके, ठीक है जाओ और अपने काम पर ध्यान दो।”, बॉस ने नार्मल होते हुए कहा।

बॉस की डांट सुनने के बाद प्रशांत वापस अपने केबिन में आकर कुर्सी में धंस गया। वह अपने हाथों को अपनी बंद आँखों पर रखकर सोचने लगा। हालांकि मैनेजर के सामने उसने कह तो दिया था लेकिन उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपना टारगेट कैसे पूरा करेगा ! उसकी नौकरी पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। चारों ओर से लगातार बढ़ते जा रहे दबाव, चिंता और बेचैनी के बीच उसे अपना बीते हुए दिन याद आ रहे थे.....

यहाँ-वहाँ पड़े हुए बगैर ढक्कन के पेन, पेंसिल की छिली हुई कतरनें और मेज पर बेतरतीब फैली हुई ढेरों किताबों और कापियों के बीच बैठा हुआ प्रशांत ज्योमेट्री के सवाल लगाने में व्यस्त था। उसे एक प्रश्न कुछ कठिन लग रहा था, वह बार-बार उस प्रश्न को हल करने की कोशिश करता पर उत्तर नहीं आ रहा था। तभी उसकी बहन बबली उसके लिए चाय लेकर आयी।

‘लो भईया गरमागरम चाय पियो’, बबली ने कहा।

‘नहीं बबली पहले मैं यह सवाल लगा लूँ तब चाय पियूँगा। तुम पी लो और अम्मा को भी दे दो’, प्रशांत ने शांत भाव से कहा।

यह कहानी 20 मार्च 1999 की है जब प्रशांत इंटरमीडिएट का विद्यार्थी था। हाईस्कूल उसने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया था। उसके पिताजी एक कंपनी में साधारण वर्कर थे। लखनऊ में उनका अपना मकान था। परिवार में वह, उसकी एक बहन व उसके माता-पिता थे। प्रशांत शुरुआत से ही पढ़ने में बहुत होशियार था। हर बार परीक्षा में उसके सबसे अच्छे अंक आते थे। हाईस्कूल की परीक्षा उसने विज्ञान वर्ग से उत्तीर्ण की थी और आगे चलकर वह किसी नामी कंपनी में अधिकारी बनना चाहता था।

प्रशांत के पिता बहुत कट्टर और सिद्धांतवादी थे। उनकी मर्ज़ी के खिलाफ घर में कोई काम नहीं होता था। उनकी इस आदत से घर के सभी सदस्य परेशान थे पर बेचारे मरते क्या न करते। उन्होंने जो भी तुगलकी फरमान एक बार सुना दिया वो सुना दिया फिर चाहे वह सही हो या गलत।

आज प्रशांत सुबह जल्दी ही नहा धोकर फ्रेश हो रहा था। बबली ने जब भाई को जल्दी तैयार होते देखा तो बोली, ‘भैया आज कहाँ जाने का इरादा है ? वैसे तो तुम जाड़े के दिनों में कभी इतनी जल्दी नहीं उठते फिर आज कैसे ? जरुर कोई बात है !’

‘नहीं बबली ऐसी कोई बात नहीं है।’

‘तो बात क्या हैं भैया कुछ बताओगे भी !’

‘दरअसल आज मेरे दोस्त के घर में न्यू इयर की पार्टी है इसलिए मुझे वहाँ जल्दी पहुंचना है।’

‘दोस्त या दोस्तिन’

‘ऐसा कुछ नहीं है बबली’

‘ओहो अब मैं समझी वैसे तो आप हफ़्तों नहीं नहाते थे और आज आपको ठंडे-ठंडे पानी से नहाते जाड़ा नहीं लगा ?’, बबली हँसते हुए बोली।

‘चुप कर कहीं अम्मा ने सुन लिया तो हजामत बना देगी।’, यूँ कहकर प्रशांत बाहर चला गया।

प्रशांत के पेपर सिर पर थे इसलिए अब वह हर समय पढ़ाई में व्यस्त रहता था। उसकी बहन उसकी पढ़ाई में बहुत सहायता करती थी क्योंकि वह अपने भाई को बहुत प्यार करती थी। वह चाहती थी कि उसका भाई पढ़-लिखकर एक दिन बड़ा आदमी बने। वह प्रशांत के स्वास्थ्य का भी पूरा ख़याल रखती थी।

कुछ दिनों बाद प्रशांत के पेपर प्रारंभ हो गए। पहला पेपर हिंदी का था। प्रशांत जल्दी-जल्दी तैयार होकर घर से निकला। पेपर सुबह की मीटिंग में था। प्रशांत रात भर पढ़ता रहा था इसलिए सुबह उसकी आँखें काफी सूजी हुई और लाल थीं।

प्रशांत परीक्षा केंद्र पहुंचा। क्लासरूम खुल जाने पर सभी छात्र अपना-अपना रोल नंबर देखकर कक्षाओं में जाने लगे कि तभी चार-पांच लड़कियां डिस्प्ले बोर्ड की ओर आयीं और अपना-अपना रोल नंबर ढूँढने लगीं। शायद बहुत देर से उन्हें अपना रोल नंबर नहीं मिल रहा था। तभी पीछे से एक लड़की ने प्रशांत को पुकारा, ‘एक्सक्यूज मी ज़रा सुनिए !’

प्रशांत ने पीछे मुड़कर देखा। उस लड़की ने घबराते हुए जल्दी में कहा, ‘मेरा नाम अनुषा है ज़रा मेरा रोल नंबर ढूँढने में मेरी मदद करेंगे। मुझे मिल नहीं रहा है और पेपर शुरू होने में सिर्फ पांच मिनट शेष रह गए हैं।

प्रशांत ने उसे देखा, उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें स्पष्ट रूप से झलक रहीं थीं। वह सफ़ेद रंग का सलवार सूट पहने हुए थी जिस पर पड़ा हुआ काला दुपट्टा उसके रूप की शोभा को और भी बढ़ा रहा था। उसने अपने घने काले बालों को कसकर चोटी बनाकर उसमे एक गुलाबी रंग का रिबन बांध रखा था।

‘प्लीज ज़रा जल्दी करिए’, अनुषा ने कहा।

शायद वह डर रही थी कि कहीं उसका पर्चा छूट न जाये। प्रशांत ने अपने होश सँभालते हुए उसके कांपते हाथों से उसका प्रवेश पत्र लिया और डिस्प्ले बोर्ड पर चस्पा लिस्ट में उसका नाम ढूँढने लगा। उसका रोल नंबर प्रशांत के रोल नंबर से कुछ ही अंक ज्यादा था। दोनों का रोल नंबर स्कूल के द्वितीय तल के कमरा नंबर 19 में था। अनुषा की सीट प्रशांत से तीसरे नंबर की लाइन में थी। वह चुपचाप जाकर अपनी सीट पर बैठ गयी। नियत समय पर बेल बजी और पेपर बंटने लगे पर प्रशांत की आँखों में वही सूरत याद आ रही थी हालाँकि अनुषा प्रशांत से पीछे की सीटों पर बैठी हुई थी परन्तु मुड़कर उसे दुबारा देखने की सामर्थ्य प्रशांत में नहीं थी। उसे ऐसा लगा कि जैसे अनुषा मन ही मन उसे थैंक्स कह रही है।

उस दिन प्रशांत ने जैसे-तैसे पेपर तो कर डाला था लेकिन घर आकर बार-बार उस लड़की की सूरत उसकी आँखों में आ जाती थी। वह सोच रहा था कि वह उसका नाम भी नहीं पूछ सका। शायद वह भूल गया था कि उसने अपना नाम उसके बगैर पूछे ही बता दिया था। प्रशांत सोच रहा था कि वह कौन है,कहाँ रहती है वगैरह वगैरह पर थोड़े ही दिनों बाद अपने कैरिअर का खयाल करके उसने उस लड़की के बारे में सोचना ही बंद कर दिया।

समय बीतता गया और इन्टर का रिजल्ट भी निकल आया। प्रशांत ने पेपर में अपना रिजल्ट देखा तो वह प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ था। वह आज बहुत खुश था और इस समय उसे अनायास ही वह लड़की याद आयी जो उसे पेपर के समय मिली थी। प्रशांत सोच रहा था कि पता नहीं वह पास हुई या नहीं, वह उसका रोल नंबर याद करने की कोशिश करने लगा। उसे उसका रोल नंबर याद आया, देखा तो वह भी पास थी। यह देखकर पता नहीं क्यों प्रशांत को बहुत आत्मिक संतोष का अनुभव हुआ।

प्रशांत ने अब बीएससी में एडमिशन ले लिया था। अब वह यूनिवर्सिटी का छात्र था। इतने समय बाद भी प्रशांत के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया था। उसके ज्यादा दोस्त नहीं थे, वह अब भी उसी सादगी के साथ रहता था और अपनी पढ़ाई में मन लगाता था। उसे अपने माता-पिता और अपने सपनों को साकार करना था और खासकर अपनी बहन जो कि उसे दिलोजान से चाहती थी। प्रशांत अपनी पढ़ाई पूरी करके जल्द से जल्द नौकरी पाना चाहता था और सोचता था कि वह अपनी बहन की शादी किसी अच्छे घर-परिवार में कर दे जहाँ उसकी बहन सुखी रहे।

धीरे-धीरे बीएससी प्रीवियस व सेकंड इयर पास करके वह फाइनल इयर में आ गया था, इस वर्ष प्रशांत काफी मेहनत कर रहा था।

एक दिन प्रशांत कॉलेज के लॉन में बैठा हुआ कुछ सोच रहा था कि तभी उसकी नज़र सामने से आती हुई एक लड़की पर पड़ी। प्रशांत ने उसे देखा तो फिर देखता ही रह गया उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह वही लड़की है जो उसे इन्टर का पेपर देते समय मिली थी। प्रशांत को एक पल के लिए अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ लेकिन वह अनुषा ही थी। आज वह हलके आसमानी रंग का सलवार सूट पहने हुई थी तथा उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में काजल की एक पतली सी रेखा थी जो कि उसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा रही थी। अब वह प्रशांत के और पास आती जा रही थी।

प्रशांत सोच रहा था कि इतने लम्बे अन्तराल के बाद क्या वह उसे पहचान पायेगी या नहीं पर उसका शक गलत था वह प्रशांत को पहचान गयी थी।

‘सर बीए प्रीवियस की क्लास कौन सी है’, उसने पूछा।

उसके मुहं से सर शब्द सुनते ही प्रशांत भौचक्का रह गया उसने मन ही मन सोचा कि क्या यह भी यहीं पढ़ती है, पर इससे पहले तो इसे यहाँ पर कभी नहीं देखा। हड़बड़ी में कुछ संभलते हुए वह बोला, ‘नमस्ते...बैठिये !’

वह वहीं पड़ी बेंच पर एक तरफ बैठ गयी। थोड़ी देर तक दोनों चुप बैठे रहे फिर अनुषा ने बात शुरू की-

‘सर आपका नाम प्रशांत है न ! मैं तो इस कैंपस में पहली बार आयीं हूँ। वैसे मुझे लगता है कि आप यहाँ पर बहुत फेमस हैं आज कई सहेलियों से आपकी काफी तारीफ सुनी।’

प्रशांत सोच रहा था कि काफी बातूनी लड़की है।

‘माफ़ करिए क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ’, उसने बात आगे बढ़ाने के लिहाज से पूछा।

‘मेरा नाम अनुषा है, मैंने आपको बताया था।’ अनुषा ने जवाब दिया।

‘हाँ शायद मैं भूल गया था। आपको याद है आप मेरे साथ दो साल पहले इन्टर का इग्जाम दे रहीं थीं।’, प्रशांत ने कहा।

‘हाँ अच्छी तरह याद है कि आपने ही उस दिन मेरा रोल नंबर ढूँढा था। नहीं तो मेरा पेपर छूट जाता और मैं फेल हो जाती।’ अनुषा ने कहा।

‘तो फिर आज आप यहाँ कैसे ?’ प्रशांत ने पूछा।

‘बहुत लम्बी कहानी है छोड़ो फिर कभी बताऊँगी’, उसने कहा।

प्रशांत के बार-बार जोर डालने पर अनुषा ने एक गहरी साँस ली और बताने लगी-

‘दरअसल मेरा इन्टर का पेपर हो जाने के बाद मैं छुट्टियों में अपने घर इलाहाबाद चली गयी थी। रिजल्ट निकला तो मैं पास थी। इसके बाद पापा ने मेरी पढ़ाई बंद करवा दी। हालांकि मैं और आगे पढ़ना चाहती थी पर पापा कहते कि पढ़-लिखकर क्या अफसर बनना है। उन्होंने कहा कि वह मेरी शादी कर देने वाले हैं फिर ससुराल में जो मन आये वो करना और फिर कौन सी लम्बी कमाई है हमारी। इन्टर तक पढ़ा दिया यही बहुत है।’

प्रशांत ध्यान से अनुषा की बातों को सुन रहा था। अनुषा ने आगे बताया-

‘मम्मी मुझे और पढ़ाना चाहती थी। इसी बीच मेरे लिए एक रिश्ता आ गया और मेरी शादी तय कर दी गयी। मैं इतनी छोटी उम्र में शादी नहीं करना चाहती थी लेकिन सिर्फ चाहने से ही हर चीज़ कहाँ होती है। देखते-देखते मेरी शादी की तारीख भी पक्की हो गयी और मेरी शादी हो गयी। कुछ दिनों बाद पता चला वह लड़का किसी और लड़की को चाहता था। यह शादी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ हुई थी। धीरे-धीरे हम दोनों के बीच अक्सर छोटी-छोटी बातों को लेकर लड़ाईयां होने लगीं। मेरा पति मुझे रोज ताने मारता था और एक दिन....!’

बताते-बताते अनुषा चुप हो गयी।

‘आगे बताओ अनुषा’, प्रशांत ने सहानुभूति के साथ कहा।

‘और एक दिन उसने मुझे तलाक दे दिया। मैं अपने मायके चली आयी। अब मैं घर में किसी से नहीं बोलती थी। बस पूरा दिन चुपचाप अपने कमरे में गुमसुम सी बैठी रहती। मम्मी से मेरी यह हालत देखी नहीं गयी उन्होंने पापा से जिद करके मुझे मामा के यहाँ लखनऊ भेज दिया। मामा के यहाँ आकर मुझे कुछ अच्छा लगा और मैं धीरे-धीरे सब कुछ भूलने की कोशिश करने लगी। फिर मम्मी ने मेरी इच्छा को देखते हुए मेरा एडमिशन यहाँ करवा दिया। मैं अब मन लगाकर पढ़ना चाहती हूँ ताकि आगे अपने पैरों पर खड़ी हो सकूँ।’

इतना कहकर अनुषा चुप हो गयी।

‘बीए में कौन से विषय है आपके’, प्रशांत ने पूछा।

‘हिंदी, राजनीति शास्त्र और समाज शास्त्र’, अनुषा ने कहा।

घर आकर प्रशांत ने अनुषा के विषय में सोचना प्रारंभ कर दिया। वह सोच रहा था कि कैसे माँ-बाप होते हैं जो अपने बच्चों का ज़रा भी ध्यान नहीं रखते उनके भविष्य के बारे में नहीं सोचते। अगर आज अनुषा ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली होती तो वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी। वह अनुषा के विषय में और भी बहुत कुछ जानना चाहता था क्योंकि अनुषा उसे बहुत अच्छी लगी थी और पहली बार उसने किसी लड़की से इतनी देर तक अन्तरंग बातें की थीं। धीरे-धीरे प्रशांत अनुषा के नजदीक आने लगा था और उसने अनुषा को अपने परिवार के बारे में भी काफी कुछ बता दिया था। अनुषा ने अब प्रशांत को सर कहना भी छोड़ दिया था। जब कभी भी अनुषा के मुहं से सर निकल जाता तो प्रशांत नाराज़ होकर चला जाता था। यूनिवर्सिटी कैंपस में वे दोनों बातें करते रहते, घूमते, पढ़ते और हँसते थे। शायद प्रशांत ने अनुषा के सारे ग़मों को भुला दिया था। यद्यपि प्रशांत और अनुषा की मंजिलें अलग-अलग थीं। कहाँ वह साइंस का छात्र और कहाँ वह कला वर्ग की छात्रा, लेकिन दोनों के विचार आपस में बहुत मिलते थे। प्रशांत और अनुषा की दोस्ती वक़्त के साथ और भी गहरी होती चली गयी।

प्रशांत अनुषा को मन ही मन बहुत चाहने लगा था। अनुषा भी उसे पसंद करती थी लेकिन अभी तक उसने अनुषा से अपने दिल की बात नहीं कही थी। शाम को प्रशांत अपनी मेज पर पढ़ने बैठा तो उसके सामने अनुषा का मुस्कुराता हुआ चेहरा घूमने लगा। वह पढ़ाई छोड़ बिस्तर पर आ लेटा और करवटें बदलने लगा, उसे नींद भी नहीं आ रही थी क्योंकि अगले दिन कॉलेज में फेयरवेल पार्टी थी उसे डर था कि उसके बाद वह और अनुषा....! आखिरकार बड़ी हिम्मत कर उसने अनुषा के नाम एक प्रेमपत्र लिखने का निश्चय किया।

अगले दिन कैंपस में फेयर वेल की पार्टी थी। सभी लड़के एवं लड़कियां आ जा रहे थे एवं कुछ तैयारी कर रहे थे पर प्रशांत आज उदास था। वह सोच रहा था कि जब पेपर हो जायेंगे तब वह और अनुषा कहाँ मिलेंगे। यही सब सोचकर प्रशांत का चेहरा मुरझाया हुआ था। तब तक पार्टी शुरू हो चुकी थी। फ्रेंड्स की रिक्वेस्ट पर अनुषा ने एक बड़ा सुन्दर सा गीत भी गाया....

‘करुँ सजदा एक खुदा को
पढूँ कलमा या मैं दुआ दूँ ,
दोनों हैं एक
खुदा और मुहब्बत !.... ‘

उसकी मीठी आवाज़ में यह गीत सुनकर प्रशांत भाव विह्वल हो उठा। इसके बाद क्रम से सभी लोगों ने कुछ न कुछ परफॉर्म किया मगर प्रशांत के दिमाग में केवल अनुषा के द्वारा गाये गए गाने की पंक्तियाँ ही गूँज रहीं थीं।

पार्टी समाप्त होने के बाद प्रशांत और अनुषा घूमने निकल गए। प्रशांत सोच रहा था कि वह अनुषा से अपने दिल की बात डायरेक्ट कह दे। वह डर भी रहा था कि कहीं अनुषा उसे गलत न समझ बैठे। उसे लगा कि शायद अनुषा उसे अपना एक अच्छा दोस्त समझती है और कुछ नहीं। कहीं ऐसा न हो कि उसके प्रपोज करने पर वह शॉक्ड न हो जाए और फिर फलस्वरूप वह दुबारा टूट जाए। प्रशांत इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था कि अनुषा ने उससे कहा,

‘काफ़ी ?’

प्रशांत ने स्वीकृति में अपना सिर हिलाया और वे दोनों एक रेस्तरां में बैठकर काफी पीने लगे। काफी देर तक दोनों शांत से बैठे रहे, कुछ देर बाद प्रशांत ने कहा,

‘कुछ बोलोगी...’

‘क्या बोलूं’, अनुषा ने मुस्कुराते हुए कहा।

‘अच्छा सुनो अनुषा आज हम दोनों के साथ का आखिरी दिन है फिर पेपर्स शुरू हो जायेंगे और फिर पता नहीं तुम कहाँ और मैं कहाँ।’

अनुषा उसकी बातें ध्यान से सुन रही थी।

‘अनुषा एक बात कहूँ बुरा तो नहीं मानोगी’, प्रशांत ने कहा

‘कहो’, अनुषा बोली

प्रशांत ने अपने आप को नियंत्रित करते हुए कहा-

‘अगले साल तुम्हे कॉलेज में कैसा लगेगा ?’

‘पता नहीं..’, मानो अनुषा ने आधे मन से कहा हो।

दरअसल प्रशांत कहना कुछ और चाहता था पर अपने संकोच और शर्मीले स्वभाव के कारण वह कुछ कह नहीं पाया। अनुषा ने प्रशांत को दो मिनट रुकने का इशारा किया और रेस्त्रां के काउंटर की तरफ चली गयी। उसकी कुर्सी पर उसका बैग पड़ा हुआ था। प्रशांत को पता नहीं अचानक क्या हुआ और उसने धड़कते दिल से रात में लिखा हुआ लवलेटर निकाला और जल्दी से अनुषा के बैग में से उसकी डायरी निकालकर उसमें रख दिया। कुछ देर बाद अनुषा वहाँ आ गयी, उसके हाथ में दो आइसक्रीम्स थीं। उसने एक आइसक्रीम प्रशांत को दी और दोनों आइसक्रीम खाने लगे। आइसक्रीम खा चुकने के बाद प्रशांत अनुषा को ऊँगली दिखाकर वाशरूम की तरफ चला गया। अनुषा कुछ सोच रही थी, मन ही मन वह भी उसे पसंद करती थी। दोनों को शायद एक दूसरे के इजहारे इश्क की पहल का इंतज़ार था। अचानक अनुषा को कुछ याद आया और उसने एक गुलाब का फूल अपने बैग से निकालकर प्रशांत के बैग से उसकी डायरी निकालकर उसमें रख दिया। थोड़ी देर में प्रशांत वापस आ गया और दोनों थोड़ी देर और टहलने के बाद अपने-अपने घर चले गए।

जीवन का अर्थ उन्नति है उन्नति का मतलब हृदय का विस्तार है और हृदय का विस्तार तथा प्रेम एक ही वस्तु है अतएव प्रेम ही जीवन हुआ और वही एकमात्र जीवन गति का नियामक है। स्वार्थपरता ही मृत्यु है, जीवन रहने पर भी प्राणी को यह मृत्यु घेर लेती है और देहांत हो जाने पर यही स्वार्थपरता वास्तव में मृत्यु है।

सामान्य प्रेमकथाओं में असामान्य भावनाओं का उद्रेग होता है। तमाम सामाजिक और पारिवारिक वर्जनाओं के नीचे अनुषा व प्रशांत के प्यार की भावनाएं आज दबी रह गयीं थीं।

अनुषा पेपर्स होने के बाद अपने घर इलाहाबाद चली गयी थी और उधर प्रशांत भी अपने एक्जाम्स के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में लग गया था। वह सोचता था कि हो सकता है कभी शायद अनुषा से उसकी मुलाकात हो जाए क्योंकि वह जानता था कि अनुषा कम से कम यहाँ बीए तक तो पढ़ेगी ही और वह कॉलेज जाकर उससे मिल लिया करेगा। वह यह भी सोचता कि क्या अनुषा ने उसका प्रेमपत्र पढ़ा होगा ?

धीरे-धीरे छुट्टियों के बाद कॉलेज भी खुल गए। प्रशांत अक्सर अनुषा से मिलने के लिए कॉलेज जाता था पर उसे कहीं भी अनुषा दिखाई नहीं देती थी। प्रशांत अपने मन को यह समझाकर संतोष कर लेता कि हो सकता है कि वह अभी घर से न आई हो। इसी तरह करते करते दिन, महीने, साल बीतते चले गए। कितनी बार पतझड़ हुआ और पेड़ों में नयी-नयी कोपलें मुस्कुरायीं, बौर फूला और झड़ गया। इसी बीच प्रशांत को एक ठीक-ठाक नौकरी भी मिल गयी। वह दिन भर ऑफिस में व्यस्त रहता और शाम को घर आकर सो जाता। इसी बीच अपनी उसने बहन की शादी भी कर दी थी। दिन भर की भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में वह तो जैसे अनुषा को भूल ही गया था। घर में प्रशांत के पिता चाहते थे कि वह जल्दी से जल्दी शादी कर ले ताकि उसकी माँ को कुछ आराम मिले।

दूसरी तरफ अनुषा का जीवन था। वह अपने घर इलाहाबाद लौट गयी थी। उसके पिता ने उसकी दूसरी शादी तय कर दी थी। उसके मन में भी प्रशांत के प्रति प्रेम था परन्तु इन भावनाओं को समय पर व्यक्त करने में उसने स्वयं को असमर्थ पाया था।

एक दिन अनुषा घर की साफ़-सफाई कर रही थी कि तभी अलमारी में उसकी नज़र अपनी डायरी से बाहर निकले हुए कागज़ पर पड़ी। उसके कागज़ को डायरी से बाहर निकालकर देखा तो वह प्रशांत का प्रेमपत्र था। उसने वह पत्र पढ़ना शुरू किया-

‘प्रिय अनुषा ! कैसी हो ?

मैंने इससे पहले किसी को प्रेमपत्र नहीं लिखा इसलिए समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरू करूँ। आई लव यू वैरी मच ! शायद जब तुम मेरा पत्र पढ़ रही होगी तब तक हम दोनों बहुत दूर होंगे। क्या तुम्हें याद है कि सबसे पहले हम दोनों कैसे मिले थे ? मैंने तो जब तुम्हें पहली बार देखा तभी से पागलों की तरह तुम्हें देखता ही रह गया। यू अरे लुकिंग सो ब्यूटीफुल एट देट टाइम ! सचमुच मुझे तुमसे पहली नज़र में ही प्यार हो गया था।

मैंने तब तुम्हें बड़ी गहराई से नोटिस किया था लेकिन मैं यह भी सोचता था कि क्या तुमने भी मुझे नोटिस किया होगा। कॉलेज में तुम जब मुझे देखकर मुस्कुराती थी तो मेरा मन मचलने लगता था। मैं उस समय तक काफी अंतर्मुखी स्वभाव का था इसीलिए लड़कियों से बातचीत करने में असहजता महसूस करता था। फिर उस समय इश्क, मोहब्बत जैसी बातें आई मीन टू से किसी को प्रपोज करना देटस लाइक वैरी अनकमफ़रटेबल एंड बिग थिंग फॉर मी ! तुम्हारे इशारे तो मैं ठीक-ठीक समझ भी न पाता था और मुझे इशारा करना भी नहीं आता था। यानी कि पूरी कहानी वनसाइडेड सी थी। उस समय की मेरी स्थिति मैं तुम्हें क्या बताऊँ मेरी रातों की नींद उड़ गयी थी क्योंकि सपनों में तुम होतीं थी पढ़ाई में मन कम लगता था क्योंकि किताबों में तुम होती थी, चीज़ें इधर-उधर रखकर भूल जाता था क्योंकि खयालों में तुम होती थीं, यानी की बस हर जगह तुम ही तुम। किसी शायर ने क्या खूब कहा है-

‘जहाँ के जर्रे-जर्रे में वो ही नज़र आये तुमको,

हकीकत में अगर तुमको किसी से प्यार हो जाए !’

अनुषा हो सके तो लिखना कि उस समय तुम मेरे बारे में क्या सोचती थीं। शायद तुम्हें मेरी पहल का इंतज़ार था और मैं इस आस में था कि पहल तुम करोगी। इस उम्मीद में काफी दिन गुजर गए।

अनुषा क्या तुम अपनी दोस्ती के दिनों के इस विस्तृत वर्णन से बोर तो नहीं हो रही हो...ओके अनुषा, तुम्हें याद है जब मुझे कॉलेज में देखकर तुम हैरान हुई थीं और मैं खुश ! समय बीतता गया और पता ही न चला कि कब हमारी तुम्हारी दोस्ती हो गयी।

अनुषा मैं तुम्हें सच्चा प्यार करता था, करता हूँ और करता रहूँगा। (मैं जानता हूँ कि ये बहुत घिसीपिटी लाइनें हैं जिन्हें पढ़कर तुम्हें मेरे ऊपर हंसी आ रही होगी...) सचमुच प्यार के ये अंदाज़ कैसे निराले होते हैं न। आई थिंक लव इज ए डिवाइन थिंग, जीवन में जिसने प्यार नहीं किया उसने कुछ नहीं किया। प्यार शरीर का नहीं प्यार तप आत्मा का होता है और जब आत्मा से आत्मा का मिलन हो जाता है तो शरीर की भूमिका उसमें नगण्य हो जाती है।

अनुषा ! तुम तो मुझे जानती हो, मैं बहुत बोलता हूँ न, लेकिन मैं क्या करूँ। तुमसे बातें शुरू करता हूँ तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेतीं। मैं अपने कॉलेज के दिनों को बहुत मिस करूँगा। समाज की कुछ घिसीपिटी विडम्बनाएँ ही शायद मेरे और तुम्हारे डर का कारण हैं। संस्कृति और सभ्यता का झूठा आवरण मुझसे अब और नहीं ओढ़ा जाता, मेरा तो दम घुटता है इस माहौल में !

अनुषा, लोग कहते हैं कि प्यार में बड़ी ताकत होती है। अगर हम दोनों का प्यार सच्चा है तो वह अपनी मंजिलें खुद तलाश लेगा।

अनुषा शायद मैं भावनाओं में कुछ ज्यादा ही बह रहा हूँ पर मेरे कारण तुम बिलकुल भी परेशान मत होना। सच बात तो यह है कि मुझे लव लैटर लिखना ही नहीं आता। बात कहाँ पर शुरू की थी और कहाँ पर ख़त्म कर रहा हूँ। हो सके तो तुम जवाब जरूर देना, शायद मैं तुमसे कुछ सीख सकूँ और हाँ मेरी एक बात हमेशा याद रखना। ऑलवेज थिंक पॉजिटिव ! मंजिलें और भी हैं रास्ते भी हैं कारवां छूटा तो क्या राही, हम अपने दम पे नया कारवां बनायेंगे, जलने वाले जलते रहेंगे और प्यार करने वाले हमेशा प्यार करते जायेंगे। फिलहाल इतना ही शेष फिर कभी, तुम्हारा- प्रशांत’

पत्र ख़त्म हो चुका था। अनुषा की आँखें आंसुओं से भीगी हुई थीं उसे यह अंदाज़ा न था कि प्रशांत उसे इस कदर प्यार करता था। उसे प्रशांत पर गुस्सा आ रहा था कि उसने समय रहते उससे अपने मन की बात क्यों नहीं कही। साथ ही उसे अपने आप पर भी क्रोध आ रहा था कि उसने इतने समय बाद अपनी डायरी खोलकर क्यों देखी जिसमें प्रशांत का प्रेमपत्र रखा हुआ था।

और दूसरी तरफ प्रशांत था जो अपने जीवन की आपाधापी में कहीं खो गया था।

“सर घर जाइए ऑफिस बंद करना है।”, चपरासी की आवाज़ सुनकर प्रशांत ने अपनी आँखें खोलीं तो देखा ऑफिस बंद होने का टाइम हो चुका था। उसने अपने आपको व्यवस्थित करते हुए अपना बैग उठाया और बोझिल क़दमों से घर की ओर चल पड़ा। इधर पिछले तीन महीनों से पता नहीं उसे क्या हो गया था। क्लाइंट्स छूटते चले जाने की वजह से वह अपने तयशुदा टारगेट से बहुत पीछे चल रहा था और जिसकी वजह से आज ऑफिस में उसके बॉस ने उसे डांटा था। घर आकर उसने चुपचाप खाना खाया और सो गया।

सुबह प्रशांत ने कुछ जरूरी कागज़ात निकालने के लिए अपनी अलमारी खोली। अचानक उसकी वही डायरी जमीन पर गिर गयी जिसने अनुषा ने गुलाब का फूल रखा था और उसकी सारी पंखुडियां जमीन पर बिखर गयीं। प्रशांत ने नीचे देखा तो उसे लगा कि जैसे एक पल के लिए उसकी वही पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं हों। वही अनुषा, वही कॉलेज लाइफ, घूमना, हँसना सब कुछ उसे याद आने लगा। अनुषा की यादों ने प्रशांत के हृदय को झकझोर डाला। उसके मस्तिष्क में फिर से कई प्रश्न उभरने लगे- कहाँ होगी अनुषा ? किस हाल में होगी वह ?? क्या उसकी दुबारा शादी हो गयी होगी या वह उसका इंतज़ार कर रही होगी ???

एक क्षण के लिए वह समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या करे ! प्रशांत ने धीरे से डायरी उठाई और फूलों की पंखुड़ियों को बीनकर डायरी के उस पृष्ठ को खोला जिसमें वह फूल रखा था। उसकी आँखें नम थीं। वह आज अपने आप में पछता रहा था। वह सोच रहा था कि काश अगर उसने अपने प्यार का इज़हार कर दिया होता तो अनुषा आज उसकी होती। अनुषा को उसके जीवन के सफ़र में उसने अकेला ही छोड़ दिया। आखिर किस के सहारे जी रही होगी वह ? जीवन में उसे एक ही तो सच्चा साथी मिला था अगर वह उसके भी काम न आ सका तो उसका जीवन व्यर्थ है।

प्रशांत को ऑफिस की देर हो रही थी इसका उसे पता न था। वह तो अपनी बीती यादों में गम हुआ जा रहा था। एक प्रश्न बार-बार उसके मस्तिष्क में गूँज रहा था कि क्या अनुषा वापस लौट आएगी उसकी दुनिया में ! शायद उसे आज भी उसका इंतज़ार था। उसकी ज़िन्दगी के ख्वाब भी गुलाब की पंखुड़ियों की तरह बिखर गए थे।

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संक्षिप्त परिचय

राहुल देव

जन्म – 20/03/1988

शिक्षा - एम.ए. (अर्थशास्त्र), बी.एड.

साहित्य अध्ययन, लेखन, भ्रमण में रूचि | एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह तथा एक बाल उपन्यास प्रकाशित | पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतरजाल मंचों पर कवितायें/ लेख/ कहानियां/ समीक्षाएं आदि का प्रकाशन | साहित्यिक वार्षिकी ‘संवेदन’ के दो अंकों का संपादन | त्रैमासिक पत्रिका ‘इंदु संचेतना’ का सहसंपादन | ई-पत्रिका ‘स्पर्श’ (samvedan-sparsh.blogspot.in) का संचालन | ‘जलेस’ से जुड़ाव |

सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन एवं अध्यापन |

संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203

मो.– 09454112975

ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

नाम

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: अनाहत / कहानी / राहुल देव
अनाहत / कहानी / राहुल देव
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