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रचना और रचनाकार (२७) : गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव - सब शून्य नहीं है बसंत फिर आएगा / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

साहित्यकार गिरीश चंद्र श्रीवास्तव कहानीकार ही नहीं एक अच्छे कवि भी हैं. उनके दो काव्य-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं. उनका पहला संकलन ‘सब शून्य नहीं’ प्रकाशन के लगभग 12 वर्ष बाद ‘फिर बसंत आएगा’ आया है. दोनों ही पुस्तकों के शीर्षक में उत्तरोत्तर आशावादिता का स्वर बढा है, लेकिन वर्तमान स्थितियों से असंतोष का भाव भी इनमें स्पष्टतः निहित है. कविता संग्रह ‘सब शून्य नहीं’ उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा सम्मानित हो चुका है और इसके लिए दो से अधिक शब्दों में ‘दो-शब्द’ डॉ. जगदीश गुप्त ने लिखे हैं, जो संकलन की मूल्यवत्ता दर्शाते है. दूसरा संकलन किताब महल, इलाहाबाद, से प्रकाशित हुआ है.

सब शून्य नहीं, लगभग तीस कविताओं का एक ऐसा संग्रह है, जिसे सात खंडों में विभाजित किया गया है – कुछ प्रश्न, यंत्रणा की पगडंडियॉ, सपना छलावा, नींव में दबी ईंटें, मुखौटों का विद्रोह, खुली हवा में और सब शून्य नहीं. जिस रूप में ये शीर्षक दिए गए हैं उनसे स्पष्ट है कि कवि का अपने वर्तमान समय से बहुत कुछ मोहभंग हो चुका है, फिर भी खुली हवा की गुंजाइश है और सब शून्य नहीं है.

स्थितियों को देखकर तमाम अनुत्तरित प्रश्न कवि के दिमाग़ में कौंधते हैं. राहत के सभी रास्ते उसे बंद दिखाई देते हैं और केवल यंत्रणा की पगडंडियां ही शेष रह गईं हैं जिनपर चलने के लिए व्यक्ति अभिशप्त है. हर तरफ लोग मुखौटे पहने स्वच्छंद और निर्भय खुली हवा में घूम रहे हैं बावजूद इसके कवि को लगता है कि अभी सबकुछ बर्बाद नहीं हुआ है. किंतु कवि की आस्था उसे वर्तमान दुरावस्था से विमुख नहीं करती कहीं-कहीं यह चित्रण अतियथार्थवादी तक हो गया है और अकविता की हदें छूने लग जाता है. संदर्भहीन, बेमक़सद और विरोधाभास की सभी स्थितियों को सशक्त वाक्यांशों से उभारा गया है. इन कविताओं में रौंधी हुई घास है तो विवशता का अहसास और अकर्मण्यता भी है. परम्परा का सलीब घसीटता कापुरुष है, राक्षस की भूमिका में हिंसा को बेहतर बतानेवाला दुष्ट भी है. सुबह होने तक, कविता, में ये छबियां अकविता के मुहावरों की याद दिलाने लगती हैं इसमें अंतड़ियों को हथेली पर लेकर घूमते अभिशप्त लोग हैं और भुतही इमारतें हैं. ओस के पत्थर हैं, और व्यथा की बर्फीली नदी है. अन्य कविताओं में भी ऐसे वाक्यांश बेतरतीब बिखरे पड़े हैं. इनमें अंधाधुंध शोर है, समर्पण का सन्नाटा है, पीड़ाओं के बयावान हैं, विसंगतियों की मछलियां हैं और रोशनी के नश्तर हैं. अपनी ही मान्यताओं से निर्मित पाषाण पुरुष हैं, जली हुई पत्तियों की राख है. दुनिया अब बहुत बदल गई है. कवि कहता है – खुला आसमान/कलकल बहती नदी/चुप्पियां ओढे पहाड़ / फूलों और तितलियों की गुपचुप/पंख फैलाए पक्षियों की उड़ान/ बांध नहीं पाते हमें (पृ.51) लेकिन अभी भी सम्वेदनशीलता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. बचपन के दिनों में उसे याद है कि वह भूखे भिखारी को खाने के लिए अपने हिस्से की रोटियां और पिता की पुरानी धोती उसे पहनने के लिए दे देता था. यही भिखारी आज जब आ धमकता है लोग उसे पागल समझते हैं और पत्थर मार मार कर उसे भगाते हैं. किंतु आज भी वह भागता नहीं और आशा भरी निगाहों से देखता है.

आओ कहीं और चलें, शीर्षक कविता, में पलायनवादी स्वर में जब लौटती लहर के साथ पावों के नीचे की रेत सरकने लगती है, जब पड़ाव छोडने की पीड़ा धूल सी चुभने लगती है, जब वह तट ही जहां कभी नाव बांधी थी डूबने लगता है, जब मुखौटे पहने लोहे के महामानव सत्य और प्रेम की व्याख्या करने लगते हैं, जब झील में ज़हर घुलने लगता है और पगडंडियां मिटने लगती हैं, जब सन्नाटा तक मुखबरी करने लगता है और नफरतों के टीलों से शोले गिरने लगते हैं तो बेशक एक बार मन करता है – चलो कहीं और चलो. लेकिन जाएं तो जाएं कहां!

ऐसे में आस्था और आत्मविश्वास की राह (सड़क) कवि को राहत प्रदान करती है. निःसंदेह कवि यह नहीं जानता कि इस सड़क का स्रोत कहां है, पर उसे पता है कि यही वह सड़क है जिसने उसे ज़िंदा रहने का अहसास दिलाया है और यह कवि से अलग नहीं.

भयंकर अंधकार है तो क्या हुआ – बचानी होगी आग. जीना होगा, उस दिन के लिए जब अंधकार छंट जाएगा. अभी भी शून्य नहीं हुआ है. जल रहा है अभी एक दिया. कुछ देर रुको तो ज़रा – पिछवाड़े की पछुआ बयार/तुम्हारे ही सामने/आधी रात को सुगंध/ बिखेरने लगी है

गिरिश चंद्र का दूसरा संग्रह आते-आते, जैसा कि मुहावरा है, गंगा में बहुत सा पानी बह चुका था. लेकिन क्या वास्तव में परिस्थितियों में कोई बदलाव आया है. कोई भी विचारवान व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि इस अंतराल में कम से कम एक सामान्य व्यक्ति के जीवन-यापन में कोई गुणात्मक सुधार हुआ हो, या, कोई सकारात्मक परिवर्तन

आया हो जो कवि की सोच को थोड़ा भी प्रभावित कर सके. कवि ने पहले भी साधारण जन को यंत्रणा की पगडंडियों पर चलते देखा था और आज भी वह आम आदमी के जीने का अर्थ ढूंढ रहा है. वह उसको विवशता और ग़लीज़ में उसके ज़िंदा रहने की कला पर आश्चर्य करता है. स्थितियां वस्तुतः बद से बदतर हुई हैं और कवि अपने इस नए संग्रह में भी कड़े से कड़े शब्दों में इन्हें अभिव्यक्ति देता है. इन कविताओं में आम आदमी, लहूलुहान स्वप्न, है और, अधकचरे स्वप्नों के ताबूद, हैं. यहां आंसुओं का सैलाब है और पीड़ाओं की पगडंडियां हैं. घृणा की अंधेरी घाटियां हैं और ईर्ष्या की नदी भी है. इनमें भय और आतंक के सौदागर हैं और यातनाओं के मरुस्थल हैं.भयावह खंडहर और राख के टीले हैं. कवि ने सामाजिक दुरावस्था के वर्णन में अपनी ओर से शब्दों की कोताही नहीं की है. पर लगता है कि शब्द शायद और भी कठोर हो सकते थे, लेकिन कवि का संस्कारित मन उसे शायद अनुमति नहीं देता कि ग़लीज़ स्थितियां उसके शब्दों को भी ग़लीज़ कर दे. वह जानता है कि ऐसे शब्द भी आंखों में किरकिराते और कानों में गढते हैं. मुख में कसैला स्वाद छोड़ जाते हैं. फिर ऐसे शब्द सबके लिए समान अर्थ भी तो नहीं रखते. कवि जानता है कि विवशता का हलाहल पीता हुआ शब्दों का यह मकड़जाल एक दिन ज़रूर टूटेगा और फिर बसंत आएगा. उसकी पीड़ा बेशक तेज़ाबी है. वह अच्छी तरह जानता है कि सभी दरवाज़े दीमक लगे हैं लेकिन वह अपने विश्वास और अपनी उम्मीदों पर क़ायम रहता है. शब्दों से परे उसे साधारण दिखाई देने वाले लोगों से ही आशा की कोई किरण दिखाई देती है. कवि सोचता है वह दिन दूर नहीं जब

काले लबादे/पतझर की तरह/झर जाएंगे

और

राख के टीलों से/फिर उगेगा/एक नया जंगल

पहले से विशाल/सघन और जीवंत

लेकिन यह काम निश्चित ही सरल नहीं है. राहत पाने के लिए कभी-कभी कवि अतीत में पलायन कर जाता है तो कभी मां के आगोश में दुबक जाना चाहता है –

मैं हर बार/छू लेना चाहता हूं

अतीत की सीमा रेखाओं में टंगे

झिलमिल लमहे/जो मेरे वर्तमान

की पीड़ा को/अनायास सहला जाते हैं

गिरीश चंद्र श्रीवास्तव अपनी इस कृति में बसंत के आगमन का विश्वास दिलाते हुए कल्पना और यथार्थ के बीच एक भावात्मक सेतु का निर्माण करते हैं. वे हर सहृदय को अपने साथ लेते हुए चलते हैं. कवि की सम्वेदना केवल दरिद्र की तक ही सीमित नहीं है, हर यंत्रणा, हर पीड़ा के प्रति वे सम्वेदनशील हैं – फिर चाहे वह छत पर टंगे बिजली के पंखों के डैनों से टकराकर एक चिड़िया की मौत ही क्यों न हो. ऐसे में उसे लगता है कि ‘जैसे मेरे भीतर का बहुत अंतरंग अंश अचानक मर गया है’ वह पूछता है, किससे कही जाए उसकी मौत की बात! कवि अपनी मुक्ति का बस एक ही रास्ता देखता है – अपने हाथों में सरकंडे की क़लम! लिखना और अपनी आहत भावनाओं को अभिव्यक्ति देना, बस इसी में वह अपनी मुक्ति देखता है. पर निराशा का एक क्षण ऐसा भी आता है जब वह लेखन के इस एक मात्र विकल्प पर भी भरोसा नहीं कर पाता – क्या होता है कागज़ काला करने से!

जंगल, जानवर और आदमी से नहीं, कवि अपनी उम्मीदें औरतों, मां, बच्चों और बेटियों से बांधता है. आफत के वक्त ढाल बनकर वे ही तो खड़ी होती हैं

फूलों को बचाना होगा...

नंगे पेड़ की खुरदरी डाल पर/आकाश की ओर

मुंह किए हुए/कुछ बोलती हुई/कुछ सुनाती हुई/

चिड़िया को बचाना होगा

बेशक फिर बसंत आएगा, फिर पेड़ लहलहाएगा.

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-डा.सुरेन्द्र वर्मा मो. ९६२१२२२७७८

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