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पारस पत्थर की खोज में..! / ऐतिहासिक, रहस्य रोमांच की कहानी / रामकिशोर पंवार

 

मैं और कुन्जू बचपन के सहपाठी कम संग साथी ज्यादा थे . हम दोनों एक दूसरे के बिना रहते नहीं थे . साथ खेलने से लेकर पढ़ऩे तक आना - जाना करने से हमारी जुगल जोड़ी को देख कर गांव का हर कोई हमें एक सिक्के के दो पहलू कह कर भी चिढ़ाया करते थे . वैसे देखा जाये तो मेरा एक प्रकार सें गांव का पूरा बचपन कुन्जू के साथ ही बीता . मैं जब अपने गांव को छोड़ कर जैसे शहर आया हम दोनों दोस्त एक दूसरे से ऐसे बिछड़े की सालो - साल बीत जाने के बाद एक दूसरे से नहीं मिल पाये. मुझे याद है कुन्जू के दादा जी जिसे पूरा गांव ‘‘लोहार बाबा ’’ कहा करता था वह रोज शाम होते ही कोई न कोई किस्सा कहानी सुनाया करते थे . गांव में अपने घर के सामने ‘‘लोहार बाबा ’’ आँगन में खाट पर या फिर टाट पर बैठ जाते थे . ‘‘लोहार बाबा ’’ को घेरे आसपास के घरों के बच्चों का झुण्ड उनकी किस्से कहानी तक सुनते थे जब तक की उन्हें नींद नहीं आने लगे . गांवो में पाँच - छै साल की उम्र में अकसर बच्चे अपने दादा - दादी के पास किस्से कहानी सुनने के बहाने उन्हें घेरे रहते थे . नींद आने से पहले कहानी सुनते - सुनते सो जाना बचपन की एक आदत थी जो अब बच्चों में कहाँ रही . .....? मुझे अच्छी तरह से याद है कि ‘‘लोहार बाबा ’’ जो कहानी बताया करते थे वह उनके परिवार से जुड़ी थी क्योंकि कुन्जू के पुरखों ने ही खेड़ला के महाराजा जैतपाल लगान न चुकाने के बदले में उनके पास जितना लोहा था वह सब दे दिया था जिसे राजा जैतपाल ने पारस पत्थर से छुआ कर उसे सोना बना दिया था . राजा जैतपाल के पास पारस पत्थर होने की जानकारी राज घराने तक को नहीं थी . राजा ने ही कुन्जू के पुरखों उनके राज्य की सीमा से निकाल बाहर किया था क्योंकि उन्हें आशंका थी कि कहीं ए लोग पारस पत्थर होने का भेद न खोल दे .

उस जमाने में जब राजा जैतपाल के राज्य में आज का बैतूल बीते कल का बदनुर नामक कस्बा था जो कि खेड़ला के पास एक छोटी सी बस्ती के रूप बसा था . राज्य में रोंढ़ा नामक गांव में सबसे बड़ा बाजार लगता था . लोग दूर - दूर से दो दिन पहले ही बाजार करने आ जाया करते थे . जब कुछ महीने पहले कुन्जू ने यह बात बिरजू को बताई तो वह आश्चर्य चकित रह गया उसने कुन्जू से कहा कि ‘‘ भैया , आप भी क्या फालतू की बातें करते रहते हैं...................!’’ ‘‘ पूरी दुनिया में ऐसा कोई पत्थर है नहीं जिसके छूने से लोहा सोना बन जाये ........! और न कोई धन गढ़ा हुआ है ....... अगर धन गड़ा हुआ होता तो वह आज तक किसी को कहीं तो मिलता है.......? ’’ जब खेड़ला के किले में गड़ा हुये धन की बात जब बिरजू ने गांव के कोटवार नौखेलाल को बताई तो वह हंस पड़ा . दुर्गेश के पिता बिरजू आसपास के जाने - माने भगत थे . नौखेलाल को हंसता देख पास खड़ा रामदीन बोला ‘‘ नौखे भैया अभी तूने कुछ देखा नहीं है इसलिए तू बिरजू भैया की कहीं बातों को हंसी में उड़ा रहा है. अगर तुझमे दम है तो आज हमारे साथ चल ......................!,’ मैं तुझे बताता हूँ कि कहाँ कौन सा खजाना छुपा है............... ? अब रामदीन की बात सुन कर नौखे को मिर्ची लग गई वह तांव खाकर बोला रामदीन से बोला ‘‘चलो जो होगा देखा जायेगा .............? ’’ यह कह कर आज शाम को ही नौखे , रामदीन , बिरजू , बाबूलाल तथा गोपाल बंगाली के साथ खेड़ला की ओर निकल पड़े . उनके साथ नौखे का साला मोहन ने यह सोच कर निकल पड़ा कि चलो आज मैं भी जीजा कि साथ चल कर तो यह देखूं ए लोग कैसे गड़ा धन खोदते हैं.........? उसने भी बिरजू भगत और नौखे के साथ खेड़ला किला जाने के लिए निकल पड़ा.

सतपुड़ा के पठार पर स्थित भारत के दक्षिण जिलों में एक बैतूल को बदनूर के नाम से भी जाना जाता है जो कि कालान्तर से लेकर आज तक उत्तर में नर्मदा घाटी तथा दक्षिण बरार के मैदानो के बीच स्थित है . विवेक सिंधु के अनुसार ईसवी शताब्दी 997 में खेड़ला के राजा इल की राजधानी एलिजपुर भी थी . खेड़ला राजवंश का अंतिम राजा जैतपाल हुआ जिसके पास पारस पत्थर था . जैतपाल काफी सनकी टाइप का था . उसने अपने राज्य के सभी साधु , संतो , मौलवीयो , बाबाओं , सन्यासियो एवं फकीरों को आदेश देख रखा था कि वे जिसे भी मानते हैं उसका चमत्कार दिखाये ऐसा न करने पर वह उन्हें अपनी काल कोठरी में डाल देता था . उसकी काल कोठरी में लगभग तीन सौ की संख्या में साधु , संत , फकीर बंदी बनाये गये जिसे वह काफी यातना देकर प्रताडि़त किया करता था . इस दौरान उसकी भेट बनारस से आये मुकंदराज स्वामी हुई . मुकंदराज स्वामी ने सशर्त चमत्कार दिखाने की बात कहीं . मुकंद राज स्वामी की यह शर्त थी कि अगर वह चमत्कार दिखाने में सफल होगा तो उसकी काल कोठरी में बंदी सभी साधु - संतों को उसे छोडऩा होगा . राजा जैतपाल इस शर्त पर तैयार हो गया . मुकुंद राज स्वामी के स्पर्श मात्र से गैंती , फावड़ा , कुल्हाड़ी , सब्ब्ल अपने आप चलने लगी . राजा जैतपाल इस चमत्कार देख कर चारों खाने चित हो गया और उसने मुकंदराज स्वामी को अपने दरबार में सर्वोच्च स्थान दिया . मुकंदराज स्वामी ने ही इस दौरान विवेक सिन्धु नामक गंथ की रचना की जिसके अनुसार ईसवी 1433 के बाद खेड़ला राजवंश के मालवा से जुड़ जाने की वजह सें इसका प्रथम गोंड़ राजा नरसिंह राय एक अति महत्वाकांक्षी हिन्दू राजा होने के साथ - साथ उसने अपने राज्य में अपनी भक्ति भावना आस्था तथा क्रूरता के भी कई उदाहरण प्रस्तुत किये . खेड़ला के राजा जैतपाल के बारे में यह भी जनश्रुति है कि वह राजपूत पिता तथा गोंड़ माता की संतान था . चण्डी उसकी ही माँ थी उसनें ही रहमान शाह दुल्हा का सिर उमरी में अपनी तलवार से उसके धड़ से अलग करके अपनी माँ को उसके समाधि स्थल जो कि चिचोली के पास चण्डी दरबार कहलाता है वहाँ पर ले जाकर उसे भेट किया था . जनश्रुति के अनुसार मुकंदराज स्वामी की मृत्यु के पश्चात दिल्ली के मुसलमान शासक के सेनापति रहमान शाह दुल्हा ने एक मुस्लीम फकीर की मौत का बदला लेने के लिए लगभग 12 वर्षो तक खेड़ला के किले को घेर को रखा इन बारह वर्षों के बाद हालांकि राजपूत शासक की पराजय हुई लेकिन मुस्लीम सेनापति रहमान शाह दुल्हा को मौत भी हो गई कहा तो यह तक जाता है कि बिना सिर के रहमान शाह दुल्हा और जैतपाल एलिजपुर तक लड़ते गए लेकिन सुबह शौच के लिए जाने वालें महिला के द्वारा टोक देने पर वह वही पर ढेर हो गया आज भी एलिजपुर जो कि अचलपुर कहलाता है में रहमान शाह दुल्हा और जैतपाल की समाधि बनी हुई है . आज भी जिलें का चण्डी दरबार पूरे जिले में आस्था एवं विश्वास तथा श्रद्घा का केन्द्र है . बाबूलाल ने भी दस साल तक इसी चण्डी दरबार में रह कर तंत्र - मंत्र या जादू - टोना सीखा था . बाबूलाल इनके साथ आने के पहले अपने घर से चण्डी दरबार का नींबू और काला धागा साथ ले गया था . चलते - चलते उसने बिना किसी को बताये अपनी जेब में उस काली चुडैल को भी रख लिया था क्योंकि वह जानता था कि राजा जैतपाल हो या इल इनका किला खेड़ला जरूर यंत्र - मंत्र - तंत्र से बंधा होगा .

असंख्य लोग खेड़ला के खजाने और पारस पत्थर की तलाश में यहाँ तक आने के बाद जो अनुभव अपने साथ लेकर गए है उन्हें सुनने के बाद कोई भी व्यक्ति यहाँ पर आने की हिम्मत नहीं करता लेकिन लालच के चलते आज भी कई लोग यहाँ पर आते हैं, कई बार तो लोग उस खजाने तक पहुंच भी जाते हैं. लेकिन आज तक उस खजाने से कोई चवन्नी लेकर जीवित वापस नहीं लौट सका है . बाबूलाल ने यह बात नौखे को बता दी थी लेकिन वह कहाँ मानने वाला . उसे अपने साथी गोपाल बंगाली पर पूरा भरोसा था क्योंकि वह भी काफी बड़ा जानकार था . लोग पता नहीं क्यों इस सच्चाई को जानने के बाद भी खजाने और पारस पत्थर को पाने की लालसा में अभी भी यहाँ तक आने के बाद हाथ - पैर तुड़वा कर चले जाते हैं . आज कार्तिक-पूर्णिमा की रात थी ऐसे में रोंढ़ा गांव से एक ऐसी ही मित्र मंडली, जिसमें आठ-दस लोग शामिल थे वे खेड़ला की पहाड़ी पर चढ़े चले जा रहे थे. दल का मुखिया बाबूलाल यूं तो एक पैर से अपाहिज था, पर वह चलने और भागने में चीते जैसा फुर्तीला था . वह पहाड़ों पर ऐसे चलता था कि देखने वाले दांतों तले उंगली दबा लिया करते थे. इस वक्त भी वह सबसे आगे चल रहा था. उसके पीछे था उसका खास आदमी रामदीन, बिरजू, नौखे के अलावा , फिर उसके पीछे थे बबलू व जवाहर. कुल मिलाकर आठ - नौ उस टोली में शामिल थे नौखे ने अपने साथ चोपना बंगाली कैम्प के गोपाल बंगाली को भी अपने साथ इसलिए लाया था . क्योंकि गोपाल बंगाली कई बार अपनी तंत्र-मंत्र के द्वारा जहाँ- तहाँ छुपे हुए गड़े धन को खोज निकाला था. जब उसे खेड़ला के किले में मौजूद खजाने के रहस्य के बारे में पता चला तो वह उसे पाने के लिए आज रात में इस टोली में शामिल हो गया जो कि खेड़ला आ पहुँची थी. बाबूलाल खजाने की खोज में कई बार खेड़ला जैसे किलो में अमावस्या और पूर्णिमा की रातों को आ चुका है लेकिन वह हर बार खाली हाथ ही लौटता है वह भी जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर उल्टे पांव .............! जब भी वह खाली हाथ लौटता है तो वह कसमें खाता है कि अबकी बार चाहे जाने चली जाए पर खाली हाथ वापस नहीं लौटूंगा लेकिन हर बार की तरह वही होता जो वह नहीं चाहता है .

‘आज का मुहूर्त अच्छा है........ !’ खेड़ला की पहाड़ी पर चढ़ता हुआ बिरजू भगत अपने साथी मंगल सिंह से बोला........ ! ‘ मंगल आज रात को देखना हमें इस बार पहले की तरह कुछ ज्यादा गडढा नहीं खोदना पड़ेगा.............! बस बीस-बाईस फीट की खुदाई के बाद ही हमें छप्पर फाड़ कर खजाना मिल जाएगा...............! ’ . ‘मंगल बिरजू की बात पर खुशी से उछल कर बोला ‘ बिरजू भैया तुम्हारे मुंह में घी-शक्कर.................! ’ मंगल और बिरजू की बातों को अनसुनी करते हुए रामदीन ने बिरजू भगत से कहा ,‘ भैया हम तो तो कई बार इस तरह के प्रयास कर करके थक चुके है. देखते हैं, इस बार तुम्हारी वजह से किले में क्या गुल खिलता है.................. ? ’ अपने संगी साथियों की बातों को सुन रहा मनोहर उस बार की घटना को आज तक नहीं भूल पाया था. उसे जब भी वह घटना याद आती तो उसका पूरा बदन सिहर उठता है. मनोहर ने अजीब सा मुँह बना कर बिरजू भगत से कहा ‘ काका पिछली बार तो हमारे साथ गये एक भगत ने हमसे उस रात खजाना अब निकलेगा - तब निकलेगा कह कर रात भर में जबरन तीस फिट का गहरा गड्ढा खुदवा लिया ................! ’ और उस रात न तो हमें ‘खजाना मिला और न कुछ ....... , उल्टे और बबलू वगैरा की जान के लाले पड़ गये थे.................! वह तो भगवान की खैर मानो की उस रात हमारे साथ कुछ उल्टा नहीं हुआ वरना बबलू का बाप हमारी जान ले लेता............! मनोहर की बातों को सुन कर गोपाल बंगाली से रहा नहीं गया उसने आखिर मनोहर सें पुछ ही लिया कि उस रात ऐसा क्या हो गया था............. .! मनोहर बोला उस रात हुआ यूं कि उस रात तीस फिट गहरा गड्ढा खोदने के बाद हमने खजाने की खोज में बबलू को उस गड्ढे में नीचे उतारा ही था कि वह उसमें धंसने लगा. तब गहरे गडडे में स्वयं को धंसता देख बबलू जोर - जोर से चीखते हुए चिल्लायाने लगा , ‘मुझे बाहर खींचो, मैं धंसा जा रहा हूं.........................! ’‘ओह....’ ‘तब चार-पांच लोगों ने बबलू को उस गड्ढ़े में से बाहर खींच निकाला ............! ’ बाबूलाल ने गोपाल बंगाली को आगे बताया, ‘भैया अगर हम उस रात बबलू को बाहर खींचने में जरा-सी भी देर कर देते तो खजाने के चक्कर में बबलू की उस रात बलि चढ़ गयी होती.’ ‘मुझे तो बाद में पता था कि जिस जगह पर हमने गड्ढ़ा खोदा था उसके नीचे से काफी गहरी और लम्बी सुरंग निकली हुई है...............!, मनोहर बोला कि गोपाल काका , ‘मैंने उस रात उस भगत को यह बात बताई भी थी पर उसने मेरी एक न सुनी और हमसे जबरन तीस फिट गहरा गड्ढा खुदवाकर समस्या पैदा कर दी थी.................! ’ ‘लेकिन आज की रात तुम लोगों के सामने कोई भी समस्या नहीं आयेगी’ ‘गोपाल बंगाली पूरे आत्मविश्वास के साथ मंडली के लोगों से बोला, क्योंकि, आज तुम्हारे साथ कोई साधारण भगत नहीं, बल्कि मैं चल रहा हूं.’ यूं तो पूर्णिमा की रात होने के कारण पहाड़ी पर चांद की दूधिया रोशनी चारों ओर फैल रही थी, फिर भी सुरक्षा की दृष्टि से हर किसी के हाथ में एक टार्च थी लोग खेड़ला की पहाडियों पर चले जा रहे थे.

कई बार मुगल शासकों के आक्रमण के बाद भी खेड़ला राजवंश का यह किला अपनी जगह से टस से मस नहीं हो सका . आज इस किले को पुरात्व विभाग की उपेक्षा एवं गड़े हुए धन की लालसा ने खण्डहर का रूप दे दिया है. विश्व के जाने- माने इतिहासकार टोलमी के अनुसार आज बैतूल बीते कल के अखण्ड भारत का केन्द्र बिन्दु था. इस बैतूल में ईसा पश्चात 13० से 161 कोण्डाली नामक राजा का कब्जा था जो कि गौंड़ जाति से अपने आप संबंधित मानता था. इस अखण्ड भारत का केन्द्र बिन्दु कहा जाने वाला जिला बैतूल यूँ तो गोंड राजा- महाराजाओं की कई सदियों तक से रियासत के अधीन रहा है. मुगलों के आक्रमण के पश्चात ही 35 परगनो वाले खेरला राजवंश के किले को मुगलों ने अपने अनिश्चित हमलों के बाद हुए समझौते के तहत उसे खेडला से मेहमूदाबाद नाम दिया गया . बैतूल जिला मुख्यालय से लगभग दस कि.मी. की दूर पर स्थित ऐतिहासिक महत्व की धरोहर कहलाने वाला खेड़ला किला आज भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद है . खण्डहर में तब्दील हो चुके इस किले की दीवारों के बेजान पत्थर आज भी अपने साथ किले में छुपे खजाने को हासिल करने की नीयत से हुए बर्बरता पूर्वक व्यवहार और दुराचार को चीख-चीखकर सुनाते हैं . गुजरे इतिहास की गाथा को ताजा करते खेड़ला के किलो के इन पत्थरों को जब भी यहाँ पर आने- जाने वालों ने एक पल के लिए छूने का प्रयास किया तो उसका स्पर्श मात्र ही आने- जाने वाले को एक पल के लिए स्तब्ध कर देता है.

बाबूलाल जो कि इस मंडली का मुखिया था,वह पास के रानीपुर गांव का रहने वाला था. उसकी आसपास के गांवों में भरने वाले साप्ताहिक बाजार में परचून की दुकान लगती है. अकसर उसकी परचून की दुकान पर आने - वाले ग्राहकों में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा होती है जो कि गड़े हुए मुर्दे उखाडऩे में माहिर होते हैं. बाबूलाल के सलाहकारों एवं जानकारों में आसपास के गांव के वे आदिवासी हुआ करते थे, जो तंत्र-मंत्र वगैरह जानते हैं. बाबूलाल का अधिकांश समय इन लोगों के पास बैठकर, गड़ा हुआ धन खोजने व उसे निकालने की तरकीब में ही बीता करता था. इस बात को उसके साथ वाले व रिश्तेदार भी जानते थे. बबलू व उसकी अच्छी पटती थी. गड़े धन के चक्कर में अक्सर दोनों कई बार रात-रात भर गायब रहा करते थे . एक दिन बबलू के पिता रघुनंदन ने एक दिन समझाइश देते हुये बाबूलाल से कहा भी था, ‘अरे बाबूलाल, ये तुम लोग रात-रात भर कहां रहते हो.......? तुम लोग खजाना पाने का चक्कर छोड़ कर मेहनत मजदूरी करो......’ ‘भैया, आप भी क्या फालतू की बातें करते हैं.’ बाबूलाल ने बबलू के पिता से कहा . बाबूलाल बोला ‘‘ अपनी झोपड़ी में चार आदमी के सोने की तो जगह है नहीं, इसलिए हम चाचा-भतीजा उधर माता मंदिर के पास बने चबूतरे पर सोते हैं, और कहीं नहीं जाते हैं ........... तुम्हें यकीन नहीं है हमारी बात का तो तुम कभी भी माता मंदिर पर आकर देख सकते हो..................! ’’ आज भी बाबूलाल रघुनंदन से यही झूठ बोल कर बबलू को अपने साथ इस अभियान में लाया था. जब से बबलू ने पढ़ाई - लिखाई बंद करके वह दुकानदारी करने लगा था वह भी बाबूलाल की तरह हाट बाजार में अपनी दुकान लगाता था . खजाने की चाह उसे भी थी. इसीलिये बाबूलाल के हर बार के खजाना खोजो अभियान में वह उसके साथ रहता था . बबलू को पिछली बार की घटना अच्छी तरह याद है क्योंकि उसके पीछे चले आ रहे मनोहर को पहाड़ी पर चढ़ते समय काली नागिन ने डस लिया था . वह तो अच्छा था कि उस वक्त साथ में डोमा था . उसने हिम्मत नहीं हारी . वह सांप का जहर उतारना जानता था . उसने अपनी मंत्र साधना के बल पर उस काली नागिन को बुलाया और उसे मनोहर का जहर चूसने के लिए मजबूर किया . इस तरह उस बार मनोहर चाचा की जान बच पाई थी.

इधर इस टीम में शामिल जवाहर मामू को किसी ने बता दिया था कि अगर वह खजाने की खोज में यदि चार बार बच गया तो उसे पांचवीं बार वह खजाना मिल जायेगा . आज जवाहर मामू फूले नहीं समा रहा था क्योंकि वह चार बार तो मरते - मरते बचा . वह इस बार इसलिए ही इस बार खजाने की खोज में जा रहा था, इसलिए इस बार उसके मन में विशेष उत्साह था. पहाड़ी पर कुछ देर बाद जब वे सब लोग पहुंच गये तो किले के बाहर खंडहर के पास बबलू ने ठंड दूर करने के उद्देश्य से सूखी लकड़ी व पत्ते जमा कर उसमें आग लगानी चाही तो मनोहर ने उसे रोका, ‘इतनी रात गये पहाड़ी पर आग जलाना ठीक नहीं होगा.’ ‘चाचा मैं तो ठंड से कांप रहा हूँ, इसलिये मैं तो आग जलाकर ही रहूंगा.’ बबलू ठंड से कांपता हुआ कह उठा. वह माना नहीं, मना करने पर भी उसने आग जलाकर ही छोड़ी. आग जब जल ही गयी तो मंडली के सभी लोग आग के चारों ओर बैठकर उस पर हाथ तापने लगे.

उसी वक्त एक बूढ़ा न जाने कहां से वहां आ गया. वह कुछ देर तक उन लोगों के पास चुपचाप खड़ा रहा. वह लगातार बाबूलाल को घूरे जा रहा था. काफी देर बाद वह बाबूलाल के नजदीक आकर बोला, ‘क्यों तू हर बार अपनी मौत बुलाने चला आया करता है यहां........? जाने की खैर मानता है तो भाग जा यहां से.....................! मैं आज पहली और आखिरी बार कहता हूं कि तू भाग जा अपनी मंडली के साथ यहां से. आज की रात तेरे और मंडली के लिये अच्छी नहीं है......................!’ बूढ़े की बात सुनकर हर कोई चौंक पड़ा. बाबूलाल ने इशारे से गोपाल बंगाली से कुछ कहा. इस पर गोपाल बंगाली जोर से एक मंत्र गुनगुनाने लगा. मंत्र का प्रभाव कहिये या नियति का फेर, वह बूढ़ा पल भर में ही वहां से गायब हो गया. उसके गायब होते ही सभी के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई. गोपाल बंगाली मुस्कुराकर बाबूलाल से बोला ‘हम खजाने के रखवाले पहले शैतान को मारने में सफल हो गये हैं. अब केवल नौ रखवालों की तलाश और करनी है हमें. अब हमें यहां से आगे चल देना चाहिए, किसी भी प्रकार की देर हम सबकी जान जोखिम में डाल सकती है.’

यह सुनकर सभी उठ खड़े हुए. हाथ में टार्च लेकर सभी बाबूलाल व बंगाली के पीछे-पीछे चलने लगे. वे किले के अंदर प्रवेश करने ही वाले थे, तभी मंत्रोच्चार करता गोपाल बंगाली अचानक चीख कर गिर पड़ा. बाबूलाल भगत भी खतरे को भांप चुका था उसने अपने साथ आये लोगों से चीखते हुये कहा ‘संभलो.’ वे संभल पाते इससे पहले ही किले के अंदर से सिर कटी लाशों का एक - एक करके बाहर की ओर गिरना शुरू हो गया. अचानक हुये हमले से बाबूलाल व उसकी मित्र मंडली सकपका गई क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था की वहाँ पर क्या - क्या हो सकता है. हालांकि बाबूलाल पूर्व से इन सब तमाम घटनाओं से परिचित था क्योंकि उसका ऐसी घटनाओं से कई बार पाला पड़ चुका था. बाबूलाल भी थोड़ा तंत्र-मंत्र जादू - टोना क्रिया का जानकार था. उसने भी अपनी तंत्र -मंत्र शक्ति का प्रयोग करके लाशों को गायब करके गोपाल बंगाली को फिर से ठीक करके उसे उठा लिया . गोपाल बंगाली ने बाबूलाल को प्रशंसा भरी नजरों से आश्चर्य चकित होकर उसकी ओर देखते हुए कहा, ‘बाबूलाल भाऊ तू भी तंत्र-मंत्र जानता है ......? आज अगर तू नहीं होता तो मैं अपने घर नहीं जा पाता .........? ’ बाबूलाल बोला काका ‘हां थोड़ी बहुत जानकारी तो रखनी ही पड़ती है.’

रात काफी हो चुकी थी अब उन सबको किले के अंदर जाने से पहले लोहे के विशाल दरवाजे को खोलना था. सब लोगों ने ताकत लगाकर दरवाजे को धकेला तो वह ‘चर्र-चर्र’ की आवाज करता हुआ खुल गया. पास पड़े ढोल पर बाबूलाल ने थाप मारी तो किले के अंदर से मानव किलकारी व बच्चों की रोने और चीखने चिल्लाने की आवाजें आना शुरू हो गई . बाबूलाल ने फिर ढोल पर थाप मारी तो गरड़-गरड़ करती जमीन उनके पैरों के नीचे से खिसक गई. अब उन्हें सामने किले के अंदर एक सुरंग दिखाई दी. सुरंग के मुहाने पर दीवार पर कुछ लिखा हुआ था और एक रेखाचित्र बना हुआ था. बाबूलाल व उसके साथ यहां कई बार आ चुके थे . गोपाल बंगाली ने अपनी पोटली खोलकर उसमें से एक पुतले को निकाल कर उसे किले के अंदर फेंका तो जोरदार धमाके के साथ एक जिन्न ने प्रकट होकर सभी को हैरत में डाल दिया. ‘क्या हुक्म है, मेरे मालिक?’ जिन्न ने गोपाल बंगाली से पूछा. ‘मैं इस किले के अंदर छिपे करोड़ों के बहुमूल्य खजाने का पता जानना चाहता हूं. गोपाल बंगाली ने जिन्न से कहा.’ ‘मेरे मालिक, मैं आप लोगों को खजाने तक पहुंचा तो सकता हूं, पर उसे ला नहीं सकता.’ ‘अच्छा ठीक है, तू हम सब को वहां तक ले चल.’ पल भर बाद ही वे सब एक ऐसे स्थान पर थे, जिसकी कल्पना से ही बदन में कंपकंपी आ जाती है. उस वक्त वे करोड़ों के अनमोल खजाने को अपनी नंगी आंखों से देख रहे थे. बाबूलाल ने जब उस खजाने को छूना चाहा तो वह आगे खिसक गया. ज्यों-ज्यों कोई भी उस खजाने के पास पहुंचता, खजाना आगे की ओर खिसकता जाता. कई घंटे की मेहनत के बाद भी जब कोई भी उस खजाने को छू न सका तो गोपाल बंगाली ने एक बार फिर पोटली से एक पुतला निकाला और उसे खजाने की ओर फेंक दिया. उसी वक्त एक तेज प्रकाश हुआ, जिससे सभी की आंखें चकाचौंध हो उठीं. उस तेज प्रकाश से एक जिन्न प्रकट हुआ.

‘गुलाम जिन्न, सारा खजाना समेटकर ले चल.’ गोपाल बंगाली ने उस जिन्न को आदेश दिया.

जिन्न ने उसके आदेश का पालन नहीं किया. वह चुपचाप खड़ा रहा. यह देखकर गोपाल बंगाली ने जिन्न से पुन: कहा, ‘गुलाम जिन्न, मेरा कहना मान, वरना मैं तुझे जलाकर राख कर दूंगा.’ जिन्न फिर भी नहीं हिला तो गोपाल बंगाली ने पोटली खोली और एक नींबू जिन्न की ओर फेंका. लेकिन जिन्न फिर भी किसी पुतले की तरह जमा खड़ा रहा. इससे खीझ कर गोपाल ने पूरी ताकत के साथ जिन्न के ऊपर मंत्रोच्चारण कर एक काले धागे से बंधी हड्डी फेंकी तो वह चीखकर उससे बोला, ‘मेरे मालिक, मेरी जान फंस गई है. ऐसा लगता है कि कोई मुझसे बड़ी ताकत इस खजाने की रखवाली कर रही है. आप ऐसा करें कि अपने साथियों के साथ यहां से फौरन चले जाएं, वरना आप सबकी जान जा सकती है. आज पूर्णिमा है, उस ताकत को मुझसे बड़ी बलि चाहिए.’

जिन्न की बात को अनसुनी कर गोपाल बंगाली उस अदृश्य शक्ति से भिड़ गया. कुछ देर की कोशिशों के बाद ही उसको लगने लगा कि उसके दांव उल्टे पड़ते जा रहे हैं. वह पसीने से तरबतर होकर बाबूलाल से कह उठा, ‘बाबूलाल जल्दी करो, मेरी शक्ति उल्टी होकर मुझ पर ही भारी पड़ रही है. कहीं मैं मर न जाऊं.’ इतना कहकर गोपाल किसी कटे पेड़ की तरह गिर पड़ा. इस तरह गोपाल बंगाली ने इस अभियान के बारे में डींगे हांकी थी, वे धरी-की-धरी रह गई. यह देखकर एक बार फिर बाबूलाल ने बांस का वंश लोचन सिद्ध कर, उसे पूरी ताकत के साथ फेंकने पर गोपाल की जान में जान आई .बाबूलाल सोचने लगा कि लोग पता नहीं क्यों बिच्छु का मंत्र मालूम नहीं और सांप के बिल में हाथ डाल बैठते हैं.

बाबूलाल को पता था कि राजा इल बहुत बड़ा तंत्र - मंत्र विद्या का जानकार था . उसके किले से खजाना निकाल पाना इतना आसान नहीं है . आज का ग्राम दुधिया के पास स्थित अखंहर में परिवर्तित दुधिया गढ़ का किला किसी जमाने में आदिवासी राजा इल की राजधानी हुआ करती थी. राजा इल और उसकी पत्नी रानी चण्डी अपनी प्रजा को दर्शन देने के लिए दुधिया गढ़ के किले से गोधना के जंगलो में बने राजा - रानी के गुबंदो तक आना - जाना करते थे . गोधना के जंगलो में बने राजा इल और रानी के आराम करने वाले गुबंदो में रानी का गुबंद इस तकनीकी से बना था कि उसमें आवाज गुजंती थी तथा कम सुनाई देने वाले बहरे व्यक्ति को आज भी इस गुबंद में आवाज गुंजती हुई साफ सुनाई देती है. रानी चण्डी को कम सुनाई देता था इसलिए रानी का गुंबद इस तकनीकी पर आधारित बनाया गया था. किसी जमाने में राजा की रानी चण्डी का दरबार लगता था . राजा इल ने अपना सारा खजाना किले की सुरंग से बने तलघर में छुपा रखा था . उस समय दिल्ली की सल्तनत क्रूर मुगल शासक औरंगजेब के हाथों में थी. उस समय जब राजा इल अपनी तय शुदा वार्षिक लगान को मुगल शासक को नहीं चुका पाया तो मुगल शासक औरंगजेब ने राजा इल के किले पर हमला करवाने के लिए सेना भेज दी . जब हमलावार सेनापति ने अपनी सेना के साथ खेड़ला के किले को चारो ओर से घेर लिया . राजा इल अपने परिवार की जान को खतरे में देख कर उसने अपनी पत्नी चण्डी रानी छोटी बेटी छोटी चण्डी तथा अपने वफादार नौकर काल्या को लेकर सुरंग के रास्तो सें बाहर निकलने लगा तो इस बात की भनक मुगल सेना को पहुँच गई . मुगल सेना ने सुरंग के दोनों छोर पर सुर्ख लाल मिर्ची डाल उसमें आग लगा दी. जिसके चलते दम घुटने के कारण राजा इल का पूरा परिवार मर गया. गोपाल बंगाली को जब यह बात बाबूलाल ने बताई तो स्तब्ध सा रह गया. बाबूलाल बार - बार कह रहा था कि देखो जिद मत करो इतना आसान नहीं है इस किले से राजा इल का खजाना तथा राजा जैतपाल का वह पारस पत्थर हथियाना पर लोग नहीं माने और अपनी - अपनी साधना में भिड़ गये .

खेड़ला के राजा ने इल की रानी चण्डी ने अपने पति के जीवित रहते हुये स्वयं को सति साबित किया था . इसलिए हर कोई चण्डी माँ के रूप में उसे पूजता है . रानी चण्डी कई अवसरों पर ऐसे चमत्कारों को अपनी प्रजा को दिखा चुकी थी कि प्रजा उसे देवी की आज भी पूजती चली आ रही है . जानकार लोगों तथा कुछ इतिहासकारों का यह भी तर्क चण्डी माँ का प्रभाव पांढुर्णा के आसपास आज भी देखने को मिलता है . विश्व प्रसिद्ध पांढुर्णा के गोटमार मेला की शुरूआत से लेकर अंत तक चण्डी माता की जय जयकार और इस मेले के पीछे लोगों का पागलपन भी इस बात प्रमाणित उदाहरण है कि बैतूल , छिन्दवाड़ा सिवनी , सहित वे सभी जिले जो कि गोंड़ राजाओं के आधिपत्य में थे वे चण्डी को देवी माँ की तरह पूजते चले आ रहे है . पारस पत्थर को लेकर आज भी कई किस्से कहानियाँ इस किले और रावणवाड़ी के तालाब की के हिस्सों में खुदाई का कारण बनता चला आ रह है. बैतूल जिला मुख्यालय से मात्र दस किलो मीटर की दूरी पर स्थित यह रहस्य राजा के मरने के बाद ही आम हो पाया था. इधर जिस स्थान पर रानी चण्डी की मौत हुई थी उसी स्थान पर एक शिला (पत्थर) के अंदर से ऊपर की ओर निकलने के बाद ग्रामीण लोगों ने उसे ही चण्डी देवी मान कर पूजना शुरू कर दिया. इस स्थान पर प्रगट चण्डी की शिला (पत्थर) को समीप के गांव सिंगार चावड़ी के यादवों अपने गांव ले जाकर उसका मंदिर बनाना चाहा लेकिन उक्त शिला (पत्थर) अपने स्थान से टस से मस तक नहीं हुई , जिससे नाराज यादवों ने छेनी - हथोड़ों से उस शिला (पत्थर) के उसके टुकड़े करके उसे बैलगाड़ी से ले जाना चाहा लेकिन वह आज भी अपने स्थान पर ज्यों की त्यों है . इस स्थान पर एक अन्य जमीन से निकली छोटी शिला (पत्थर) को रानी की बेटी छोटी चण्डी तथा समीप के एक पेड़ को राजा इल का वफादार नौकर काल्या जी मान कर पूजा जाता है. गोधना स्थित चण्डी दरबार तक जाते समय रास्ते में पडऩे वाली कुछ मजारों को राजा के परिजनों के रूप में पूजा जाता है उक्त परिजन राजा इल के किले पर हुये मुगल सेना के हमले में मारे गये थे .

मुगल शासको से 12 साल तक लड़ते रहे जैतपाल ने आखिर में सबसे पहले उस पारस पत्थर को इतनी ताकत से फेंका कि वह किले के सामने मात्र 1.5 किलो मीटर की दूरी पर खुदे रावणवाड़ी के तालाब में जा गिरा. पारस पत्थर के चक्कर में रावणवाड़ी ऊर्फ खेडला ग्राम के पास स्थित खेडला के किले की कई बार खुदाई हो चुकी है. बाबूलाल को यह बात अच्छी तरह से पता थी कि वे लोग जिस पारस पत्थर की खोज में यहाँ आये है वह उन्हें इतनी आसानी से नहीं मिलने वाली क्योंकि राजा इल को भी पारस पत्थर इतनी आसानी से नहीं मिला था . किले के सामने 22 हेक्टर की भूमि पर बना बैतूल जिले का सबसे बड़ा तालाब जिसमें एक सोने का सूर्य मंदिर धंसा हुआ है . इस मंदिर के लिए बाबूलाल कई बार खुदाई कर चुका है लेकिन वह हर बार बुरी तरह मुसीबतों के चक्कर में फँसा है इस बार भी नहीं आना चाहता था पर गोपाल बंगाली कहाँ मानने वाला था. उसने ही उसे जबरन घसीट कर ले आया था .

बीच तालाब में मंदिर के धंसे होने के कारण उसे चारों ओर से हजारों टन मिट्टी के मलबे को आज तक कोई भी पूर्ण रूप से निकाल बाहर कर पाया है. इस मंदिर को लेकर आसपास के लोगों में प्रचलित एक अधंविश्वास के अनुसार मंदिर के लिए मंदिर की खुदाई करने वाले को उसके सपने में यह मांग की जाती है कि वह अगर मंदिर में छुपे खजाने को पाना चाहता है तो उसे सबसे पहले अपने पहले पुत्र एवं पहली पुत्र वधु की नरबलि देनी होगी. आज यही कारण है कि मंदिर तक कोई भी पहुँच पाने में सफल नहीं हो सका है. बरसो पहले राजा इल की नगरी में एक बार बहुत जमकर अकाल पड़ा. सूखे व अकाल से प्रजा में त्राहि-त्राहि का आलम व्याप्त हो गया. तब कोई संत वहां से गुजरे . राजा जैतपाल ने उनकी आवभगत कर उनसे राज्य में फैले सूखे व अकाल के निदान का उपाय पूछा. राजा जैतपाल के आतिथ्य से प्रसन्न महात्मा ने राजा जैतपाल से कहा कि वह अपने किले के ठीक सामने 22 एकड़ की भूमि पर तालाब खुदवाये तथा उस तालाब की खुदाई के बाद उस तालाब के बीचोंबीच भगवान भोलेनाथ के मंदिर का बनवा कर उसके परास शिवलिंग की स्थापना कर उसकी प्रथम पूजा अपने पहले पुत्र व पुत्र वधू से करवाये साथ ही सूर्य के ताप को कम करने के लिए उसे भगवान सूर्य का सोने का भव्य मंदिर बनवाना होगा अगर वह ऐसा करता है तो उसके राज्य में तथा इस तालाब में कभी पानी की कमी नहीं आएगी. महात्मा की सीख के अनुसार जब राजा ने अपने पुत्र व वधु मंदि स्थापना के बाद पूजन के लिए भेजा तब पुत्र व वधु का पूजन पूरा भी नहीं हुआ था कि वह स्थान पूरा का पूरा जलमग्न हो गया और राजा और उसके पुत्र एवं वधु उस जल में जल मग्न हो गए. राजा इल के पुत्र एवं वधु की जल समाधि के बाद से लेकर आज तक यहां कभी पानी की कमी लोगों को महसूस नहीं होती हैं. राजा जैतपाल के पास जो चमत्कारिक पारस पत्थर था जो उन्हें उसी महात्मा ने अपनी सेवा से प्रसन्न होकर दिया था. साथ ही इसके दुरूपयोग करने का मना किया था लेकिन राजा जैतपाल ने अपने राजपाट के दौरान लगान न चुकाने वाले किसानों से लगान के बदले उसके घर के सभी लोहे के सामान को हथियाना शुरू कर दिया . राजा जैतपाल ने अपने खजाने में किसानों से मिलने वाले लोहे के सामान पारस पत्थर से छुआ कर उसे सोना बना कर अपने किले के अंदर खुदवाये विशाल टैंकों में जमा कर रखा था. राजा जैतपाल इस चमत्कारिक पारस पत्थर से लोहा को छुआने का काम पूर्णत: गुप्त रूप से करते थे लेकिन कुन्जू के पुरखों को यह बात पता चल चुकी थी कि राजा जैतपाल ऐसा करता है क्योंकि गांव के लोहार होने के कारण सबसे अधिक लोहा उन्हीं के पास रहता था. राजा ने एक दिन उसके पास का पूरा लोहा बुलवा लिया और उसे भी पारस पत्थर से छुआ कर सोना बना दिया. अब लोहारों के सामने सबसे पहले संकट इस बात का आया कि बिना लोहा के वे अपना पेट कैसे पालेंगे.......? राजा जैतपाल ने उन्हें अपने राज्य से निकाल बाहर कर दिया. वे जैतपाल के मरने के बाद रोंढ़ा गांव में आकर बस गये तभी से इसी गांव के रहवासी हो गये .

रावणवाड़ी के इस तालाब में खेडला के राजा द्वारा मुगलों से आक्रमण के पश्चात उसके पास मौजूद अमूल्य पारस मणि को फेंकने की इस कथा ने गोरे अंग्रेजों तक को विचलित कर दिया था. बताया जाता है कि चार हाथियों के पैरों में लोहे की मजबूत सांकल बांध कर उन्हें तालाब के चारों ओर घुमाया गया था जिसमें से मात्र एक ही सांकल के लोहे के होने की सांकल के सोने के बन पाई थी . आज एक बार फिर अपनी किस्मत की सांकल को सोने का बनाने के चक्कर में रोंढ़ा गांव की पूरी टीम खेड़ला आई हुई थी. गोपाल बंगाली जब पूरी तरह हार गया तब बाबूलाल ने उसे सलाह दी कि क्यों बेवजह अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हो ..........? पारस पत्थर यूँ नहीं मिलने वाला.......? बाबूलाल भगत की बात मान कर गोपाल और उसकी पूरी टीम वापस बैंरग लौट आई क्योंकि वे रात भर के अदृश्य हमलों से वे यह जान सके थे कि दुनिया की कोई भी ताकत उस तालाब से पारस पत्थर को नहीं निकाल पायेगी. आज राजा इल का किला आज भी भले चारों ओर हरे भरे खेत और खलिहानों से घिरा हो लेकिन बीते कल वह जंगल और जंगली जानवरों से घिरा हुआ था. आदिवासी होने के कारण राजा ‘इल’ के किले का प्रवेश द्वार 7० से 8० फीट ऊंचा होने के कारण वह किसी भी सीधे हमला का उस पर कोई असर नहीं पड़ता था. लगभग दो ढ़ाई सौ बड़े मजबूत पत्थरों को कलात्मक रूप से तराशकर उनका उपयोग शानदार सीढिय़ों के निर्माण में किया गया था . प्रवेश द्वार से राजा के महल की दूरी साढ़े चार सौ गज की है. अधिक ऊंचाई पर बने राज इल के इस किले से पूरा आसपास का क्षेत्र दिखाई पड़ जाता है. किले तक पहुँचने वाली सभी संदिग्ध गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के बाद भी इस किले पर अनेक बार आक्रमण हुए है वह सिर्फ इस महल में छुपे खजाने एवं पारस पत्थर के कारण जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक न तो मुगलों को मिला न आज के लालची इंसान को जिसने इसकी खोज में पूरे किले को खण्डहर का रूप दे दिया है.

इति,

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार हैं. संपर्क - ramkishorepawar@gmail.com )

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