मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

हनुमान जन्म पर विशे‍ष : वातजातं नमामि / गोवर्धन यादव

हनुमान जी जन्मोत्सव पर विशेष

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अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं दनुज वन कृषानुं ज्ञानीनाम अग्रगण्यं. सकल गुणनिधानं वानरानामं धीशं रघुपति प्रिय भक्तं वातजातम नमामि

निज लोकहिं विरंचि गे, देवन्ह इहइ सिखाई बानर तनु धरि धरि महि, हरि पद सेवहु जाई (बालकाण्ड-१८७)

श्रीरामावतार के समय ब्रह्माजी ने देवताऒ को वानर और भालुओं के रूप में पृथ्वी पर प्रकट होकर श्रीरामजी की सेवा करने का आदेश दिया. इससे उस समय सभी देवता अपने-अपने अंशों से वानर और भालुओं के रूप में उत्पन्न हुए. इसमें वायु के अंश से स्वयं रुद्रावतार महावीर श्री हनुमानजी ने जन्म लिया.

मारुतस्यौरसः श्रीमान हनुमान नाम वानरः

वज्रसंहननोपेतो वैनतेयसमो जवे

सर्ववानरमुख्येषु बुद्धिमान बलवानपि

ते सृष्टा बहुसाहस्त्रा दशग्रीववधोद्दताः

अप्रमेयबला वीरा विक्रान्ताः कामरूपिणः

ते गजाचलसंकाशा वपुष्मन्तो महाबलाः (सप्तदशः सर्गः-वाल्मिक.बालकंड.१६,१७,१८).

हनुमान नाम वाले ऎश्वर्यशाली वानर वायुदेवता के औरस पुत्र थे. उनका शरीर वज्र के समान सुदृढ़ था. वे तेज चलने में गरुड़ के समान थे. सभी श्रेष्ठ वानरों में वे अधिक बुद्धिमान और बलवान थे. इस प्रकार कई हजार वानरों की उत्पत्ति हुई. वे सभी रावण का वध करने के लिए उद्दत रहते थे. उनके बल की कोई सीमा नहीं थी. वे वीर, पराक्रमी और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे. गजराजों और पर्वतों के समान महाकाय तथा महाबली थे.

वीर हनुमानजी के पिता वानरराज केसरी और माताश्री अंजनादेवी थीं. जन्म के समय इन्हें क्षुधापीडित देखकर माता अंजना वन से फ़ल लाने चली गयीं, उधर सूर्योदय के अरूण बिम्ब को फ़ल समझकर बालक हनुमान ने छलांग लगायी और पवन-वेगसे जा पहुंचे सूर्यमण्डल. उस दिन राहु भी सूर्य को ग्रसने के लिए सूर्य के समीप पहुंचा था. हनुमानजी ने फ़ल की प्राप्ति में अवरोध समझकर उसे धक्का दे दिया तो वह घबराकर इन्द्र के पास जा पहुंचा. इन्द्र ने सृष्टि की व्यवस्था में विघ्न समझकर बालक हनुमान पर वज्र का प्रहार किया, जिससे हनुमानजी की बायीं ओर की ठुड्डी( हनु) टूट गयी. अपने पुत्र पर वज्र के प्रहार से वायुदेव अत्यन्त क्षुब्ध हो गए और उन्होंने अपना संचार बंद कर दिया. वायु ही प्राण का आधार है, वायु के संचरण के अभाव में समस्त प्रजा व्याकुल हो उठी. समस्त प्रजा को व्याकुल देख प्रजापति पितामह ब्रह्मा सभी देवताओं को लेकर वहां गए, जहां अपने मुर्छित शिशु हनुमान को लेकर वायुदेव बैठे थे. ब्रह्माजी ने अपने हाथ के स्पर्ष से शिशु हनुमान को सचेत कर दिया. सभी देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र-शस्त्रों से अवध्य कर दिया. पितामह ने वरदान देते हुए कहा- मारुत ! तुम्हारा यह पुत्र शत्रुओं के लिए भयंकर होगा. युद्ध में इसे कोई जीत नहीं सकेगा. रावण के साथ युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाकर यह श्रीरामजी की प्रसन्नता का सम्पादन करेगा.

हनुमानजी की कृपा प्राप्ति के लिए निम्न लिखित श्लोकों का पाठ करना चाहिए.

जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः दासोSहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः हनूमाश्चशत्रुसैन्यानां निहन्ता मारूतात्मजः न रावणसहत्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्त्रशः अर्दयित्वा पुरीं लंकामभिवाद्द च मैथिलीम समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम

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गोवर्धन यादव

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

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  1. गोवर्धन यादव.10:26 am

    सम्मानीय रविजी,
    सादर नमस्कार
    आलेख प्रकाशन के लिए हार्दिक आभार.
    आशा है, सानन्द०स्वस्थ हैं

    उत्तर देंहटाएं

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