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प्रेमचंद युग में खींच ले जाती कहानियाँ –सिन्धी कहानियाँ

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१९-१२-२०१४ की शाम रशियन कल्चरल सेंटर दिल्ली में सुश्री उर्मिल के कार्यक्रम में देवी नागरानी जी से भेंट हुई थी । उस दिन आपने उपरोक्त पुस्तक मुझे भेंट की थी । उपरोक्त पुस्तक में सिंधी से अनूदित कहानियों को पढ़कर लगता ही नहीं कि हम अनुवादित कहानियों को पढ़ रहे हैं। किसी अन्य भाषा की कहानी या कविता को किसी दूसरी भाषा में विशेष कर हिंदी में अनुवाद करना एक दुरूह कार्य है । यों तो अनेक लेखक अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हैं लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या किया गया अनुवाद मूल का भाव , बिम्ब ,कथ्य और प्रभाव और प्रवाह समेट पाया है ? लेकिन आपके द्वारा इन सिंधी कहानियों को हिंदी भाषियों को उपलब्ध कराना एक अति प्रशंसनीय कार्य है । कहानियाँ भी ऐसी जो हमें खींच ले जाती हैं प्रेमचंद युग में, कुछ कहानियों का ज़िक्र मैं करना चाहूँगा :-

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देवी नागरानी


यों तो सिंधी कहानियों का इतिहास काफ़ी पुराना है लेकिन देवी नागरानी ने मौजूदा दौर के नामवर कहानीकारों की ही कहानियाँ अनुवाद के लिये चुनी हैं । पुस्तक की सबसे पहली कहानी " ज़िंदादिली” जिसके मूल लेखक शेख़ अयाज़ हैं, का अनुवाद पढ़ते समय लगता ही नहीं कि हम कोई अनुवादित कहानी पढ़ रहे हैं । जिस ज़िंदादिल लड़की के ऊपर यह कहानी आधारित है एक स्थान पर कहती है " यह स्वर्ग नर्क का मामला भी अजीब है , मैं तो सोचकर ही परेशान हो जाती हूँ , अगर इन्सानी रूह में ख़ुदा का अंश है तो नर्क में भी सिर्फ़ रूह जाती है और इसका मतलब यह हुआ कि नर्क में ख़ुदा जाता है "
इसी तरह जो पुरुष पात्र है कहता है कि “मैं तो उस से इस लिये नफ़रत करता हूँ कि मुझे उस से मोहब्बत है।“

 

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बी. एल. गौड़


कहानी का अंत भी हमें बहुत दुखी कर जाता है - वह लड़की कहने भर को ज़िंदादिल थी पर कभी भी अपने प्यार का इज़हार नहीं कर पाई । प्रेमी की शादी कहीं और हो जाती है , उसका एक बच्चा भी है जब वह उसके घर जाती है तो वह अपने बच्चे से कहता है " लो तुम्हारी बुआ आ गई"  , वह बच्चे को छाती से लगा लेती है और आँसुओं की अविरल धार उसकी आँखों से बहती रहती है । प्रेमी सिर्फ़ इतना पूछता है "ख़ैरियत तो है "


इसी तरह " बिल्लू दादा " अयाज़ क़ादरी की कहानी का अनुवाद करते समय भी देवी नागरानी जी ने बिल्लू दादा को पूर्णरूपेण जीवंत कर दिया है । बिल्लू दादा केवल एक मवाली नहीं बल्कि मवाली के रूप में सही मायने में एक सच्चा इन्सान है । इसी क्रम में एक और शशक्त कहानी है " यह ज़हर कोई तो पीयेगा " हमीर सिंधी की इस कहानी का अनुवाद करते समय मुझे लगता है कि देवी नागरानी पूरी तरह से पात्रों के भीतर जाकर उनसे आत्मसात हो जाती हैं और हमें याद दिलाती हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी "कफ़न " की । मुफ़लिसी आदमी से जो न करा ले कम है । किस तरह उस्ताद शफ़ी मुहम्मद जो किसी स्कूल के हैडमास्टर पद से रिटायर हुए हैं और सिस्टम के तहत जैसा आज भी होता है उनकी पैंशन के काग़ज़ों की फ़ाइल आये दिन कहीं न कहीं गुम हो जाती है , घर में घोर ग़रीबी है , लड़कियों के पास सही से तन ढकने को कपड़े नहीं हैं , लड़का बे रोज़गार है । बेरोज़गार लड़का कोकीन की पुड़ियां बेचने लगता है । घटनाक्रम में पुलिस से बचने के लिये वह ज़हर की उन पुड़ियों को अपने पिता को पकड़ा देता है । एक आदमी आकर उनसे पुड़ियां लेकर बहुत सारे पैसे दे जाता है लेकिन मास्टर साहब उन तमाम नोटों को आग के हवाले कर देते हैं और उस ग़रीबी को गले लगा लेते हैं जो उन्हें जीने को कम और मरने को अधिक बाध्य करती है ।


इस तरह की पंद्रह सिंधी कहानियों का अनुवाद देवी नागरानी ने अपनी शशक्त लेखनी से किया है । ये तो केवल कुछ कहानियों की झलक मात्र है लेकिन मैं यह तो ज़रूर कह सकता हूँ कि जो एक बार उनकी इस पुस्तक को पढ़ना शुरू करेगा बीच में नहीं छोड़ पायेगा और यही किसी लेखक / अनुवादक की सफलता का पैमाना है ।

पुस्तक के प्रकाशक : हिंदी साहित्य निकेतन ,१६ साहित्य विहार , बिजनौर ( उ प्र ) भारत / मूल्य दो सौ रुपये ।
लघु समीक्षा : बी एल गौड़ , संपादक - गौड़संस टाइम्स


पुनशच - इसकी समीक्षा ९ बरस से लगातार प्रकाशित समाचार पत्र " गौड़संस टाइम्स में छपेगी १६ से २८ वाले अंक में जिसे आप देख सकती हैं www.thegaursonstimes.com पर ।

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