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महाभारत : आदि पर्व 5

 

(पिछले अंक 4  से जारी : )

 

इधर धर्मात्मा विदुर जी ने जब धृतराष्ट्र को पाण्डवों के द्रौपदी से विवाह की सूचना दी तो महाराज ने विदर के सामने तो प्रसन्नता प्रकट की परन्तु दुर्योधन और कर्ण के सामने पाण्डवों की अप्रत्याशित अभिवृद्धि पर गहरी चिन्ता प्रकट की।

धृतराष्ट्र ने भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा विदर आदि को बुलाकर विचार-विमर्श किया और उनके वचनों को गौरव देते हुए विदुर जी को पाञ्चाल देश जाकर कुन्ती और द्रौपदी सहित पांचों पाण्डवों को लिवा लाने का आदेश दिया।

पांचाल देश पहुंच कर विदुर जी ने महाराज द्रुपद से भेंट की और उन्हें महाराज धृतराष्ट्र का सन्देश कह सुनाया। महाराज द्रुपद और पाण्डवों ने विदुर जी का बड़े ही स्नेह-सम्मान से स्वागत किया। विदुर जी कुछ दिन वहां का आतिथ्य- भोग करने के उपरान्त द्रौपदी के साथ पाण्डवों को लेकर हस्तिनापुर आ गये।

धृतराष्ट्र ने पाण्डवों का स्वागत करते हुए युधिष्ठिर से कहा-वत्स। मैं नहीं चाहता कि दुर्योधन आदि के साथ तुम्हारा किसी प्रकार का विवाद हो। अतः तुम लोग आधा राज्य लेकर खाण्डवप्रस्थ में अपनी राजधानी बना लो और वहां सुखपूर्वक रहो। पाण्डवों ने धृतराष्ट्र की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए खाण्डवप्रस्थ को राजधानी के रूप में विकसित किया और उसे इन्द्रप्रस्थ नाम देकर वे वहीं रहने लगे।

राजन्! इन्द्रप्रस्थ में सुखपूर्वक रहते हुए पाण्डवों के पास आकर नारद जी ने उन्हें सुन्द और उपसुन्द का आख्यान सुनाया, जिसका उद्देश्य उन्हें द्रौपदी के कारण भाइयों में सम्भावित संघर्ष से सावधान करना था। नारद जी बोले-पाण्डवो। दैत्यराज निकुम्भ के प्रबल पराक्रमी सुन्द और उपसुन्द नामक दो पुत्र थे। दोनों भाइयों में बड़ी ही घनिष्ठता, आत्मीयता, अनन्यता परस्पर विश्वसनीयता तथा सुदृढ़ बन्धुता थी। अधिक क्या कहूं वे दोनों एक प्राण दो देह थे। उन्होंने कृच्छ साधना द्वारा ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके उनसे एक-दूसरे के अतिरिक्त किसी भी अन्य जीवधारी द्वारा अपने अवध्य होने का वर प्राप्त कर लिया था।

इस वर से उन्मत्त होकर दोनों भाई देवों, असुरों, यक्षों, गन्धर्वों, ब्राह्मणों तथा अन्यान्य जीवधारियों को व्यथित करने लगे। उनके उत्पातों से त्रिलोकी में त्राहि' त्राहि' मच गई और सभी देव मिल कर ब्रह्मा जी के पास गये और इन दुष्ट दैत्यों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिये उनसे प्रार्थना करने लगे।

ब्रह्मा जी ने अनुपम सन्दरी तिलोत्तमा को इस कार्य के लिये नियुक्त किया। जब वे दोनों दैत्य मदिरापान कर नशे में झूम रहे थे तो उस समय उन दोनों की दृष्टि रूपवती तिलोत्तमा पर पडी। उसके अनुपम रूप-सौन्दर्य पर मुग्ध होकर दोनों ने उसका एक-एक हाथ थाम लिया। शराब के नशे में उन्मत्त, दोनों उस पर अपना अधिकार बता कर एक-दूसरे से विवाद और संघर्ष करने लगे। क्रोध के आदेश तथा काम के उन्माद में वे वर्षों पुराने अपने स्नेह-सौहार्द को भूल गये। एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए वे दोनों कुछ ही क्षणों में पृथ्वी पर गिर कर नामशेष हो गये।

यह आख्यान सुना कर नारद जी बोले-पाण्डुनन्दन। काम का उन्माद बड़ा ही विषम और भयंकर होता है, अतः कहीं तुम पांचों भाइयों में भी द्रौपदी के कारण परस्पर वैमनस्य उत्पन्न न हो जाय, इसके लिये तुम्हें द्रौपदी के साथ विषय- भोग के सम्बन्ध में निश्चित नियम बना लेना चाहिये और उसका कठोरता से पालन करना चाहिये।

नारद जी के कथन को सर्वथा उपयोगी मानते हुए पाण्डवों ने देवर्षि के प्रति आभार प्रकट किया और उनके सामने ही प्रतिज्ञा की कि द्रौपदी एक नियमित समय तक प्रत्येक के पास रहेगी और जब कभी वह एक के साथ एकान्त में होगी तो दूसरा कोई भाई भीतर नहीं जायेगा। पाण्डवों ने यह भी प्रतिज्ञा की कि इस नियम के उल्लंघन करने वाले को बारह वर्ष तक ब्रह्मचारी बन कर बन में रहना पड़ेगा। पाण्डवों के ऐसा नियम बना लेने पर नारद जी सन्तुष्ट होकर चल दिये।

जनमेजय द्वारा यह पूछने पर कि क्या पाण्डवों ने आजीवन इस नियम का पालन किया अथवा कहीं इस नियम का अतिक्रमण भी हुआ, वैशम्पायन जी बोले-राजन्! एक दिन जब महाराज युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकान्त में थे तो एक ब्राह्मण करुण क्रन्दन करते हुए आया और अर्जुन से बोला-वीरवर! आप के राज्य में लुटेरों ने मुझ ब्राह्मण की गौएं हर ली है, अब मैं गव्य के अभाव में यज्ञ-याग आदि किस प्रकार से सम्पन्न करूंगा? अर्जुन ने उस ब्राह्मण को ढाढ़स बंधाया, परन्तु अब समस्या यह थी कि अर्जुन के .शस्त्रास्त्र भीतर थे, जहां युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकान्त में थे और वहां जाना निषिद्ध था। बिना भीतर से -शस्त्रास्त्र लाये ब्राह्मण की धेनुओं का लौटाना सम्भव नहीं था। इस स्थिति में अर्जुन निस्संकोच भीतर जाकर .शस्त्रास्त्र ले आये और ब्राह्मण द्वारा निर्दिष्ट दिशा में गये दस्युओं का पीछा करके ब्राह्मण की गौएं लौटा लाये।

अर्जुन ने युधिष्ठिर के पास जाकर नियम- अतिक्रमण के अपराध में बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वनवास का निश्चय प्रकट किया। युधिष्ठिर ने इसे परिस्थिति की विवशता बताते हुए तथा क्षमा का प्रस्ताव करके अर्जुन को रोकने की बहुत चेष्टा की। युधिष्ठिर ने कहा-

शास्त्र की मर्यादा है कि बड़ा भाई स्त्री के साथ बैठा हो और छोटा भाई भीतर चला जाय तो उससे कोई हानि नहीं होती, पर यदि छोटा भाई स्त्री के साथ हो तो बड़े भाई को घर में प्रवेश नहीं करना चाहिये।

पार्थ! तुम विवशतावश भीतर आये हो, मैं इसमें अपना अपमान ही नहीं समझता अतः मेरे विचार में तुम्हें दण्ड भुगतने की कोई आवश्यकता नहीं। परन्तु अर्जुन अपने निश्चय पर अडिग रहकर वन को चल दिया।

एक दिन अर्जुन स्नान- ध्यान आदि से निवृत्त हुआ ही था कि नागकन्या उलूपी उसके रूप-सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपने भवन को गई। उलूपी ने अइर्जुन से प्रणय-याचना की तो अर्जुन ने बारह वर्षों तक अपने ब्रह्मचर्य व्रत के निर्वहण की बात कही। इस पर उलूपी बोली कि तुम्हारा यह नियम तो द्रौपदी के साथ धर्म-पालन करने के लिये है, दूसरों के विषय में नहीं। कामातुर उलूपी ने यह भी कहा कि यदि अर्जुन उसकी इच्छा पूर्ण नहीं करेगा तो वह आत्महत्या कर लेगी। अर्जुन ने आर्त्तरक्षा को धर्म मानते हुए उसकी इच्छा पूर्ण की और प्रातःकाल होने पर वे उससे विदा लेकर हरिद्वार आ गये।

हरिद्वार में गंगा-स्नान, ध्यान, दान आदि के उपरान्त वहाँ से चल कर आगे बढ़ते हुए वे मणिपुर पहुंचे। वहां की राजकुमारी चित्रांगदा को देखते ही अर्जुन उस पर आसक्त हो गये और उसके पिता के पास जाकर अपना परिचय देते हए राजा से उसकी पुत्री का हाथ मांगा। राजा ने अर्जुन को अपनी पुत्री के लिये उपयुक्त वर मानते हुए उसका अर्जुन के साथ विधिर्पूवक विवाह कर दिया।

अर्जुन ने कुछ समय चित्रांगदा के साथ सुख-भोग में बिताया और फिर तीर्थाटन को निकल पड़े। घूमते-फिरते वे महाराज तीर्थ पहुंचे तो उन्होंने ऋषियों से कुछ पवित्र सरोवरों के सुनसान पड़े होने का कारण पछा। ऋषियों द्वारा उन सरोवरों में विकराल ग्राहों की उपस्थिति बताने पर अर्जुन सौभद्र तीर्थ में घुस गये। वहां एक ग्राह ने अर्जुन का पैर पकड़ लिया। अर्जुन के प्रहार से वह सुन्दरी के रूप में परिणत हो गया। सुन्दरी बोली-मैं प्रेयसी वर्गा अप्सरा हूं जो अपनी चार सखियों के साथ एक ऋषि के तप में विघ्न डालने के अपराध के कारण प्राप्त श्राप वश ही ग्राह योनि में रह रही हूं।

अप्सरा ने बताया कि हमारी अनुनय-विनय पर ऋषि ने प्रसन्न होकर हमें बताया था कि अर्जुन द्वारा ही हमारा उद्धार होगा अतः हे नररत्न! जिस प्रकार आपने मेरा उद्धार कर मुझे उपकृत किया है, उसी प्रकार आप मेरी चारों सखियों का भी उद्धार करने की कृपा करें। अर्जुन ने ऋषि द्वारा किये गये विधान को मान्य करते हुए ग्राह योनि में पड़ी उन चारों सुन्दरियों का भी उद्धार किया। इन ग्राहों के नष्ट होने से वे सरोवर पुनः बाधाहीन हो गये तथा निष्ठावान् व्यक्ति वहां आकर स्नान- ध्यान करने लगे।

वहां से चल कर अर्जुन प्रभास क्षेत्र में आये और वहां उन्होंने श्रीकृष्ण से भेंट की। श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन द्वारका गये और वहां उनके महल में रहते हुए उनकी दृष्टि श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा पर पड़ी तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मनोभाव को समझते हुए उसे सुभद्रा के हरण का परामर्श दिया।

एक दिन सुभद्रा रैवतक पर्वत पर देव-पूजा के उपरान्त घर लौट रही थी तो अर्जुन ने उसका हरण कर लिया। अंगरक्षकों ने जब यह सूचना सेनाध्यक्ष को दी तो यदुवंशी क्रोधाविष्ट होकर अर्जुन को पकड़ने और उसका वध करने को उद्यत हो गये। श्रीकृष्ण ने यादवों को समझाया-बुझाया और उनकी सहमति से अर्जुन को बुलवा कर उनका सुभद्रा के साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया गया। एक वर्ष द्वारिका में बिता कर अर्जुन सुभद्रा के साथ इन्द्रप्रस्थ लौटे तो द्रौपदी ने सगी बहन के रूप में सुभद्रा का स्वागत किया। वैशम्पायन जी कहते हैं-महाराज जनमेजय! एक दिन श्रीकृष्ण और अर्जुन यमुनातट पर विचर रहे थे कि बाह्मणवेश में अग्नि ने आकर उनसे कहा कि मैं खाण्डव वन को जला डालना चाहता हूं परन्तु जब भी मैं इस दिशा में प्रयत्नशील होता हूं तो इस वन में सपरिवार रह रहें तक्षक की रक्षा के लिये इन्द्र वर्षा करके मुझे बुझा देता है, जिससे मेरी लालसा अतृप्त रह जाती है। आप इस सम्बन्ध मैं मेरी सहायता करने की कृपा करें।

अर्जुन ने इन्द्र का सामना करने के लिये धनुष आदि उपयुक्त सामग्री के अभाव की बात कही तो अग्निदेव ने अर्जुन को तत्काल गाण्डीव धनुष, अक्षय तूणीर और हनुमान् के चिह्न वाला ध्वजा से युक्त एक रथ समर्पित किया। अग्निदेव ने श्रीकृष्ण को भी सुदर्शन चक्र दिया। यह सामग्री प्राप्त कर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अग्निदेव को खाण्डव वन को जलाने का कार्य प्रारम्भ करने को कहा। शीघ्र ही दावानल ने प्रचण्ड रूप धारण किया। आग की लपटें आकाश को छूने लगीं। देवताओं की घबराहट पर इन्द्रदेव ने मेघों को जल-वृष्टि करने को कहा, परन्तु अर्जुन ने अपने अस्त्रकौशल से मेघों को छितरा दिया।

उस समय संयोगवश तक्षक वहां नहीं था, वह खाण्डव वन से कुरुक्षेत्र गया हुआ था, परन्तु उसका परिवार, पत्नी और उसका पुत्र अश्वसेन आदि वहीं थे। अश्वसेन ने अग्नि से बच कर निकलने की बहुत चेष्टा की, परन्तु वह अर्जुन के बाणों से बाहर न हो सका। अश्वसेन की मां ने उसे निगल कर बचाने का प्रयास किया। वह उसे पूंछ तक निगल भी गयी और अर्जुन ने उसे अपना लक्ष्य बना ही लिया था कि इन्द्र ने अकस्मात् प्रबल झंझावात चला कर उसे बचा लिया। इन्द्र के इस दुष्कृत्य से अर्जुन तिलमिला उठा और इन्द्र पर भयंकर अस्त्रों से घातक प्रहार करने लगा। इन्द्र को जब तक्षक के कुरुक्षेत्र में सुरक्षित होने का पता चला तो वह युद्धक्षेत्र से हट गया। मयदानव तथा चार शांर्ग पक्षियों ने श्रीकृष्ण और अर्जुन के शरणागत होकर अपने प्राण बचाये।

मयदानव जब तक्षक के निवास से भागा तो अग्निदेव ने उसका पीछा किया। प्रथम तो वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गया, परन्तु -शीघ्र ही संभल कर बोला-वीरवर अर्जुन! मैं तुम्हारी .शरण हूं। इस पर अर्जुन ने उसे अभय करके जीवनदान दिया। इधर शांर्ग पक्षियों के पिता मन्दपाल ने अग्नि की स्तुति करके अपने चार बच्चों की रक्षा का उनसे वचन ले लिया।

इस प्रकार अश्वसेन, मयदानव और चार शार्ग पक्षियों के सिवाय शेष सारे खाण्डव वन को भस्मीभूत करके अग्निदेव कृतकृत्य हो गये। अग्निदेव ने श्रीकृष्ण और अर्जुन का धन्यवाद करके अपने लोक को प्रस्थान किया। इधर इन्द्र ने पृथ्वीलोक में आकर श्रीकृष्ण तथा अर्जुन के शौर्य की प्रशंसा की और सभी एक-दूसरे का अभिवादन करके अपने- अपने निवास को चले गये।

 

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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