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महाभारत : आदि पर्व 4

 

(पिछले अंक 3 से जारी:- )

 

भीष्म ने बडी सावधानी, से धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर का पालन-पोषण किया तथा उनकी उपयुक्त शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था की। भीष्म ने तीनों बालकों के युवा होने पर उनके विवाह? कीं भी व्यवस्था की। गान्धारराज सबल की पत्री गान्धारी का विवाह धृतराष्ट्र से हुआ। उस देवी को अपने पति के नेत्रहीन होने का पता चला तो उसने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली! पाण्डु का विवाह कुन्ती और माद्री नामक दो सुन्दरियों से हुआ। इधर विदुर जी का विवाह देवक की एक सुन्दरी दासीपुत्री से करा दिया गया।

धृतराष्ट्र ने गान्धारी के उदर से सौ पुत्रों को जन्म दिया। ज्येष्ठ दुर्योधन के उत्पन्न होने पर हुए अपशकुनों को देखकर ज्योतिषियों ने उसे कुलनाशक घोषित किया तथा धृतराष्ट्र को सुझाव दिया वे उसका परित्याग कर दें, परन्तु राजा धृतराष्ट्र वात्सल्य के मोहवश उसे छोड़ नहीं सके। विदुर आदि के समझाने-बुझाने का भी उन पर कोई प्रभाव न पडा।

पाण्डु को मिले शाप की चर्चा करते हुए वैशम्पायन जी बोले-राजन्! एक बार वन में विचरते हुए पाण्डु ने मृगी के साथ मैथुनरत एक मृग पर पांच बाण साध कर मारे तो इससे दोनों मृग-मृगी घायल हो गये। मृग रूपधारी तपस्वी मुनि किन्दिम ने राजा के इस कृत्य के लिये घोर भर्त्सना की। मुनि ने बताया कि मनुष्य रूप में मैथुन करने में लज्जा की अनुभूति के कारण ही वे मृग रूप धारण कर यह कृत्य कर रहे थे। मुनि ने कामरत प्राणियों को हत्या के जघन्य अपराध के लिये राजा को शाप दिया कि अपनी पत्नी से सहवासरत होते ही उसकी मृत्यु हो जायेगी। मुनि ने कहा-

राजन्! जिस प्रकार मुझे सुख के समय तुमसे दुःख मिला है उसी प्रकार तुम भी सुख की अनुभूति के समय दुःखलाभ करोगे।

पाए ने अपनी दोनों पत्नियों को मुनि के शाप से अवगत करा कर वानप्रस्थ के समान रहने का निश्चय किया! कुछ समय बीतने पर पाण्डु ने अपनी पत्नियों को बुला कर उन्हें सन्तान-प्राप्ति के लिये यत्न करने को कहा तो कुन्ती ने बचपन में दुर्वासा जी से प्राप्त मन्त्र की बात कही, जिससे किसी भी देवता का आह्वान करके अभीष्ट लाभ किया जा सकता था। पाण्डु ने समय-समय पर कुन्ती से धर्मराज वायु और इन्द्र का आह्वान करने को कहा। कुन्ती ने पति की आज्ञानुसार इन देवों का आह्वान करके उनसे क्रमशः युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन- को जन्म दिया। पति के कहने पर कुन्ती ने माद्री के लिये अश्विनीकुमारों का आह्वान किया और उनके वीर्य को धारण करके माद्री ने नकुल और सहदेव को उत्पन्न किया।

एक दिन छलकते रूप-यौवन वाली माद्री बहुत ही भड़कीली वेशभूषा और सुन्दर आभूषण धारण करने के रूप में खूब सज- धज कर अपने पति के साथ एकान्त मेँ विचरण कर रही थी। माद्री, मधुर भाषण और मोहक मुस्कान से पति का मन मोहित कर रही थी। इस समय पाण्डु का चित्त विचलित हो गया और उन्होंने काममोहित होकर माद्री को बलपूर्वक पकड़ लिया। माद्री ने अपने को छुड़ाने की बहुत चेष्टा की, परन्तु वह पाण्डु को अपने साथ मैथुन से निवृत्त न कर सकी। फलतः किन्दिम मुनि के .शाप के कारण पाण्डु दिवंगत हो गये। माद्री भी अपने बच्चों का भार कुन्ती को सौंप कर पति के साथ सती हो गई।

पाण्डु की मृत्यु से सत्यवती इतनी अधिक विचलित हो गई कि उसने अपनी दोनों बहुओं- अम्बिका तथा अम्बालिका-के साथ घर छोड़ कर वन को प्रस्थान किया। वन में तीनों ने तप करते हुए योग द्वारा .शरीर त्याग दिया।

राजन्। कौरवों ने देखा कि बल बुद्धि और विवेक में पाण्डव उनसे बहुत आगे थे। भीम तो अप्रतिम शक्तिशाली थे। इससे कौरवों को यह अनुमान हो गया कि वे शक्तिबल से पाण्डवों को जीतने में असमर्थ हैं, अतः दुर्योधन ने छल-कपट का आश्रय लेते हुए निद्रा -मग्न भीम को गंगा में फेंकने का तथा युधिष्ठिर और अर्जुन को बन्दी बनाने का निश्चय किया ताकि कौरव निष्कण्टक राज्य कर सकें।

योजना के अनुसार कौरवों ने पाण्डवों को गंगा में जल -विहार के लिये आमन्त्रित किया। दुर्योधन ने बड़े स्नेह और अनुरोध से भीम को विषमिश्रित लड्डू खिलाया। थोड़ी देर में जल-क्रीडा करते हुए भीम भयंकर विष के प्रभाव से निश्चेष्ट हो गये। कौरवों के आदेश से निश्चेष्ट भीम को रस्सियों से बांध कर ऊंचे तट स नदी में प्रवाहित कर दिया गया। भीम पानी में डूब कर नागलोक जा पहुंचे। वहां सांपों द्वारा उन्हें डसे जाने से उनका विष उतर गया और वे स्वस्थ होकर घर की ओर लौट पड़े। इधर जल क्रीड़ा से निवृत्त होने पर पाण्डव भीम को न पाकर व्यथित हो उठे। सायंकाल घर लौटने पर वे रात भर सो न पाये और दूसरे दिन प्रभात होते ही भीम की खोज में लग गये। कुछ दिनों के उपरान्त भीम घर लौटे तो पाण्डवों को जहां भीम के सकुशल लौटने की प्रसन्नता हुई वहां दुर्योधन की धूर्त्तता पर आश्चर्य और दुख भी हुआ।

भीष्म जी ने पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा -दीक्षा का समुचित प्रबन्ध किया। उन्होंने धनुर्वेद की शिक्षा देने के लिये द्रोणाचार्य को नियुक्त किया। द्रोणाचार्य भरद्वाज मुनि के पुत्र और धनुर्विद्या में निष्णात परशुराम प्रभृति आचार्यों से शिक्षा-प्राप्त थे। उन्हें अपने सहपाठी द्रुपद के राजा बन जाने पर उससे बड़ी आशा थी। वे अपने पुत्र अश्वत्थामा के लिये एक गाय की याचना लेकर उसके पास गये थे परन्तु द्रुपद ने कहा -

विप्र! समान धन और समान कुल वालों में ही मैत्री और विवाद झगड़ा होता है. पुष्ट अर्थात् सम्पन्न की अपुष्ट अर्थात् विपन्न अथवा दरिद्र से न तो मित्रता शोभा देती है और न ही लड़ना झगड़ना अच्छा लगता है, क्योंकि विपन्न से सम्पन्न की जीत और हार दोनों ही अपयश के कारण बनते हैं, अतः तुम जैसे भिखारी का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं।

द्रुपद के इस अपमानजनक व्यवहार से द्रोणाचार्य इतने अधिक क्षुब्ध हुए कि उनके हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला धधकने लगी। इसी चिन्ता में घूमते हुए वे संयोगवश उधर से गुजरे जहां खेलते हुए कौरवों-पाण्डवों की गेंद कुएं में गिर गई थी और बालक उसे निकाल न पाने के कारण खिन्न थे। द्रोणाचार्य ने प्रथम तो मुस्कराते हुए बालकों को इन शब्दों में फटकारा-

बालको। लगता है कि तुम लोग बलशक्ति से रहित हो और तुम्हारी धनुर्वेद की शिक्षा भी निरर्थक है। आश्चर्य है कि तुम तेजस्वी भरतकुल में जन्म लेकर भी इस गेंद को नहीं निकाल पा रहे। इसके उपरान्त उन्होंने अपने धनुष से एक सींक गेंद पर मारी और उस सींक पर दूसरी-तीसरी-चौथी सींक जोड़कर उसे सुविधा से बाहर निकाल दिया।

बालकों ने आचार्य के इस चमत्कार की चर्चा भीष्म जी से की तो उन्हें यह समझते देर न लगी कि वह महापुरुष कौन हैं। उन्होंने द्रोणाचार्य को सादर बुलवा कर उन्हें कौरवों और पाण्डवों का शिक्षक नियुक्त कर दिया।

द्रोणाचार्य ने कौरवों और पाण्डवों को उत्तमोत्तम ढंग से धनुर्विद्या का प्रशिक्षण दिया। एक दिन उन्होंने शिष्यों से एकान्त में पूछा कि क्या वे अपनी विद्या-समाप्ति पर उनकी इच्छा पूरी करेंगे? अर्जुन ने बड़े ही उत्साह के साथ आचार्य के वचनों का पालन करने की प्रतिज्ञा की। इससे अर्जुन के प्रति आचार्य का विशेष पक्षपात हो गया। अर्जुन भी जहां शिक्षा-दीक्षा में विशेष रुचि लेते थे, वहां गुरु की सेवा के प्रति भी विशेष सतर्क और सचेष्ट रहते थे।

एक दिन निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य द्रोणाचार्य के पास शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा से आया तो आचार्य ने उसके निम्न जाति से सम्बन्धित होने के कारण उसकी प्रार्थना स्वीकार न की। एकलव्य ने वन में जाकर द्रोणाचार्य की मूर्त्ति बनाई और उसमें निष्ठापूर्वक आचार्य-भाव रखकर वह शस्त्राभ्यास करने लगा। इसी प्रयत्न से वह इतना निपुण हो गया कि एक बार वन में गये कौरवों-पाण्डवों के अनुचर का कुत्ता जब उसे अभ्यासरत देखकर भौंकने लगा तो एकलव्य ने इस योग्यता से कुत्ते का मुख बाणों से भर दिया कि उसका भौंकना तो रुक गया, परन्तु उसे चोट थोड़ी -सी भी नहीं पहुंची।

पाण्डव और कौरव एकलव्य के इस कौशल और शस्त्र - बोध -सामर्थ्य से प्रभावित हुए बिना न रह सके। एकलव्य ने पूछे जाने पर अपने को द्रोणाचार्य का शिष्य बताया तो अर्जन ने घर लौटने पर आचार्य को इस पक्षपात -एकलव्य को अपने से अधिक कुशल बनाने- का उपालम्भ दिया तो आचार्य स्तब्ध रह गये। उन्होंने अर्जुन से तत्काल उस शिष्य से मिलाने को कहा।

द्रोणाचार्य ने अर्जुन के साथ वन में जाकर जटा -वल्कल धारी एकलव्य को शस्त्राभ्यास करते देखा। एकलव्य ने ज्योंही आचार्य को देखा त्यों ही वह दौड़ कर उनके चरणों में गिर पड़ा। पाद्य - अर्ध्य आदि से आचार्य का यथोचित सत्कार करने के उपरान्त उनके आगे नतमस्तक होकर बोला गुरुदेव आपका शिष्य आपकी सेवा में उपस्थित है आज्ञा दीजिये। द्रोणाचार्य ने शिष्टाचारवश एकलव्य को आशीर्वाद देते हुए उस से कहा -वत्स! यदि तम सचमुच ही मेरे शिष्य हो तो मुझे गुरुदक्षिणा दो। एकलव्य ने हर्षोत्फुल्ल होकर अपनी स्वीकृति दी और आचार्य महोदय से अभीष्ट मांगने का निवेदन किया। आचार्य बोले - वत्स! मुझे अपने दाहिने हाथ का अंगूठा दो। एकलव्य ने तत्काल बिना किसी प्रकार का सोच -विचार किये ही प्रसन्नतापूर्वक अपने दाहिने हाथ का अगूंठा काट कर गुरु को सौंप दिया। गुरु प्रसन्न होकर लौट आये और अर्जुन भी अपने प्रतियोगी के न रहने से सन्तुष्ट हो गया क्योंकि एकलव्य के लक्ष्यसन्धान में अब वह स्फूर्ति नहीं रह गई थी। इधर द्रोण भी इस बात से निश्चिन्त हो गये कि अब अर्जुन का कोई प्रतिद्वन्दी नहीं रहा और उसका मुझ पर पहले जैसा अटूट विश्वास बना हुआ है -

एक बार द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने के लिये एक नकली गीध बनवा कर एक वक्ष पर उसे इस प्रकार से छिपा कर रख दिया कि ध्यान से देखने पर ही वह दिखवा; दे। गुरु ने सभी राजकुमारों को बुला कर कहा कि देखो वृक्ष पर बैठे इस गीध का सिर उडाना है। तम सब लोग धनुष पर बाण चढ़ा कर तैयार हो जाओ। द्रोण ने सर्वप्रथम युधिष्ठिर को बुला कर पूछा कि उसे क्या-क्या दिखाई दे रहा है? युधिष्ठिर ने सम्पूर्ण वृक्ष अर्थात् .शाखाएं, पुत्र पुष्प तथा फल आदि के साथ वहां उपस्थित गुरु, भाई तथा अन्य बन्धु-जनों के दिखाई देने की बात कही तो आचार्य ने निराश और खिन्न हारकर उसे लक्ष्यसन्धान से रोक कर वहां से हटा दिया। इसके उपरान्त दुर्योधन आदि को एक-एक करके बुलाया गया और सबके द्वारा एक जैसा उत्तर दिये जाने पर सबको लक्ष्यसन्धान में असफल मानते हुए हटा दिया। अन्त में जब अर्जुन से यही प्रश्न किया गया तो उसने कहा-गुरुदेव। मुझे तो गीध के सिर के अतिरिक्त और कुछ भी दिखाई नहीं देता। गुरु ने गीध की आकृति के विषय में पूछा तो अर्जुन ने दृढ़ता से कहा-

भगवन्! मुझे तो केवल उसका सिर ही दीखता है, अतः मैं उसकी आकृति के विषय में क्या बता सकता हूं? द्रोणाचार्य ने सन्तुष्ट होकर अर्जन को लक्ष्यवेध का आदेश दिया और उसने तत्काल गीध का सिर उड़ा दिया। अर्जुन की इस सफलता से द्रोणाचार्य को विश्वास हो गया कि अर्जुन द्रुपद से उनके अपमान का प्रतिशोध ले सकता है।

एक दिन द्रोणाचार्य गंगा-स्नान करने गये तो मगर ने आकर उनकी जांघ पकड़ ली। आचार्य समर्थ होने पर भी रक्षा के लिये चीत्कार करने लगे। अर्जुन ने तत्काल जल में छिपे मगर को पांच पैने बाणों से जल में ही बींध डाला। मगर के मरते ही आचार्य उसके बन्धन से मुक्त होकर बाहर आये तो उन्होंने तट पर खड़े दूसरे शिष्यों-सभी कौरवों और चारों पाण्डवों-की किंकर्त्तव्यविमूढ़ता पर क्षोभ प्रकट करते हुए उनकी भर्त्सना की। गुरुदेव ने अर्जुन के प्रति विशेष पक्षपात एवं परितोष दिखाते हुए उसे प्रार्थना और संहार के साथ बह्मशिरा नामक दिव्य- अमोघ अस्त्र भी प्रदान किया।

राजकुमारों के .शस्त्रास्त्र-संचालन में कुशल हो जाने पर धृतराष्ट्र द्वारा आचार्य की सहमति से रंगशाला में गण्य-मान्य नागरिकों के सामने एक प्रदर्शन का आयोजन किया गया। यथासमय सभी आमन्त्रित महानुभाव अपने- अपने आसनों पर बैठ गये। सर्वप्रथम भीम और दुर्योधन अपनी गदायें लेकर रंगभूमि में उतरे। दोनों ने अपने- अपने कौशल से दर्शकों को मुग्ध कर दिया। इसके उपरान्त आचार्य ने अर्जुन को अपना कला-कौशल दिखाने के लिये आमन्त्रित किया। अर्जन ने आग्नेयास्त्र, बारुणास्त्र, वायव्यास्त्र तथा पर्जन्यास्त्र से क्रमशः अग्नि, जल, वायु और मेघ उत्पन्न किये। अपने कौशल से अर्जुन क्षण भर में लम्बायमान और क्षण भर में सूक्ष्म रूप धारण करते दिखाई देते थे। अर्जुन ने खड्‌गयुद्ध, गदायुद्ध तथा धनुर्युद्ध की अनेक कलायें दिखा कर दर्शकों को मुग्ध कर दिया।

इसी समय कर्ण ने रंगशाला मैं प्रविष्ट होकर अर्जुन को चुनौती दी कि वह उससे भी अधिक कौशल दिखा सकता है। दर्शक इस वीर की बातों से स्तब्ध रह गए। इधर द्रोणाचार्य की आज्ञा पाकर कर्ण ने वह सब और अधिक विशिष्टता के साथ कर दिखाया जो कुछ अर्जुन ने किया था। कर्ण के कौशल से प्रसन्न होकर दुर्योधन ने उससे स्थायी मित्रता कर ली।

अर्जन ने कर्ण के कौशल को अपना अपमान समझते हुए उसे द्वन्द्व-युद्ध के लिये चुनौती दी, जिसे स्वीकार कर कर्ण तत्काल रंगशाला में उतर आया। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए कृपाचार्य ने कर्ण से उसके वंश का परिचय देने को कहा तो कर्ण का सिर लज्जा से झुक गया। दुर्योधन ने बीच में पड़ते हुए कहा कि यदि कर्ण अर्जन के साथ केवल किसी देश का राजा न होने से युद्ध नहीं कर सकता तो मैं अभी इसे अंग देश का राज्य देता हूं।

दुर्योधन ने उसी समय ब्राह्मणों को निमन्त्रित करके कर्ण को विधिपूर्वक अंग देश के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। इसी समय अधिरथ ने आकर कर्ण को बाहुपाश में बांधा और कर्ण ने उसके चरणों में सिर रखा तो यह रहस्य स्पष्ट हो गया कि कर्ण सूतपुत्र है। फलतः अर्जुन उसके साथ युद्ध करने में अपना अपमान समझते हुए युद्धभूमि से हट गया। भीम ने व्यंग्य करते हुए कहा-

हे सूतपुत्र! तुम रणभूमि में अर्जन से मारे जाने योग्य नहीं हो, तुम अश्वसंचालन के लिये अपने कुल के अनुरूप लगाम थामो।

इस पर दुर्योधन ने भीम की भर्त्सना करते हए कहा-

भीम। नदियों और वीरों की उत्पत्ति का पता लगाना कठिन होता है। उनका कर्म दर्शनीय होता है, जन्म नहीं।

दुर्योधन स्नेह से कर्ण का हाथ पकड़ कर उसे अखाड़े से बाहर ले आया। इसी समय सूर्यास्त हो जाने पर सभा विसर्जित कर दी गई और सभी अतिथि तथा राज-परिवार के लोग अपने- अपने घरों में लौट गये।

द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों को युद्ध-विद्या में निष्णात देख कर उन्हें अपने पास बुलाया और गुरुदक्षिणा के रूप में पांचालराज द्रुपद को पकड़ लाने का आदेश दिया। सर्वप्रथम गुरु की आज्ञापालन का श्रेय और यश लेने की इच्छा से दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण तथा युयुत्सु आदि सभी शिष्य शस्त्र धारण कर चल पड़े। अर्जुन उनके प्रयत्न के परिणाम की प्रतीक्षा में रुक गया। द्रुपद ने अपनी शस्त्र-विद्या से कौरवों को भागने पर विवश कर दिया। रोते-चिल्लाते कौरव पाण्डवों के पास आये। अब अर्जुन ने नकुल व सहदेव को अपने रथ का रक्षक बना कर द्रुपद नरेश पर ऐसा भयंकर आक्रमण किया कि द्रुपद नरेश सामना न कर सके। द्रुपद द्वारा पराजय स्वीकार करने पर अर्जुन उन्हें बन्दी बना कर द्रोणाचार्य के पास ले आया। द्रुपद को दीनहीन अवस्था में देखकर द्रोणाचार्य बोले-द्रुपद। हम तो स्वभाव से ही क्षमाशील बास्मण हैं अतः तुम्हारे प्राणहरण नहीं करेंगे। हम तो तुम्हारे साथ बचपन का मैत्री सम्बन्ध स्थिर रखना चाहते हैं। तुमने कहा था कि राजा की मित्रता राजा से ही हो सकती है, अतः हमने तुम्हारा राज्य पाने का प्रयास किया है-

अब हम तुम्हारा आधा राज्य तुम्हें लौटाते हैं और आधा राज्य अपने पास रखते हैं ताकि मित्रता के अधिकारी बने रहें। यह कह कर द्रोण ने द्रुपद को मुक्त और स्वतन्त्र कर दिया।

वैशम्पायन जी बोले-राजन्। पाण्डवों की शक्ति से भयभीत कौरवों ने शकुनि और कर्ण आदि से परामर्श करके पाण्डवों के वध की बहुत योजनायें बनाई, परन्तु उन्हें किसी भी प्रयास में सफलता न मिली। इधर पाण्डवों के गुणों पर मुग्ध होकर पुरजन तथा सभासद युधिष्ठिर को युवराज बनाने की मांग करने लगे। इससे दुर्योधन की पाण्डवों के प्रति ईर्ष्या और भी बढ़ गई। वह धृतराष्ट्र के पास जाकर बोला-पिताजी। यह मैं क्या सुन रहा? लोग आपके स्थान पर युधिष्ठिर को राज्य पर प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। यदि युधिष्ठिर को राज्य मिल गया तो उसकी वंश-परम्परा ही उत्तराधिकार में राज्याभिषिक्त होगी और हम कहीं के नहीं रह जायेंगे, अतः आपको कोई ऐसी युक्ति निकालनी चाहिये जिससे हम अपने इस कांटे को शीघ्र ही दूर कर सकें। कर्ण, शकुनि आदि ने सोच-विचार के बाद पाण्डवों को वारणावत भेजने का सझाव दिया है।

धृतराष्ट्र ने चतुर मन्त्रियों से कह कर इस प्रकार का वातावरण बनाया कि वारणावत की सांस्ँकृतिक, धार्मिक तथा प्राकृतिक विशिष्टता से प्रभावित होकर पाण्डवों की इच्छा उस प्रदेश में जाने की हो गई। जब पाण्डवों ने धृतराष्ट्र के सामने अपनी इच्छा प्रकट की तो महाराज ने वहां चल रहे प्रसिद्ध मेलों का महत्त्व बताते हुए उन्हें वहां जाने के लिये प्रोत्साहित किया।

पाण्डवों के वारणावत जाने के निश्चय से दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने अपने विश्वस्त मन्त्री पुरोचन को एकान्त में बुला कर उसके प्रति अपनी आत्मीयता तथा निर्भरता. को प्रकट करते हुए उसे गुप्त रूप से वारणावत में जाकर एक ऐसा विस्फोटक भवन बनाने का आदेश दिया कि जो जरा-सी आग से भड़क उठे, परन्तु किसी को भी इस तथ्य का पता न चल सके।

परोचन को भेज कर दुर्योधन अपने लिये सुखद परिणाम सुनने की प्रतीक्षा करने लगा। निश्चित दिन पाण्डवों ने वारणावत को प्रस्थान किया। विदुर जी को दुर्योधन के दुर्भाव का अनुमान हो गया और उन्होंने पाण्डवों को इस सम्बन्ध में सतर्क रहने की चेतावनी दी।

पाण्डवों के वारणावत पहुंचने पर पुरोचन ने उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया और उन्हें सभी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण अपने लाक्षागृह में ठहराया। पाण्डवों को विचित्र भवन देखकर कुछ सन्देह तो अवश्य हुआ, परन्तु उन्होंने आपस में विचार-विमर्श करके अपने सन्देह को गुप्त रखने का ही निश्चय किया। इधर विदुर जी के एक विश्वस्त सेवक ने आकर एक सुरक्षित सुरंग खोद दी और उधर पाण्डवों ने घूम-फिर कर आसपास के सुरक्षित मार्गों की जानकारी प्राप्त कर ली।

विरोचन ने देखा लगभग एक वर्ष बीत गया है और पाण्डव निश्शंक भाव से रह रहे हैं, अतः अब इनसे छुटकारा पा ही लेना चाहिये। पाण्डवों को इन दिनों पुरोचन की अतिरिक्त प्रसन्नता से दाल में कुछ काला दिखाई देने लगा ' एक दिन पाण्डवों ने ब्राह्मण-भोज का आयोजन किया तो सभी अन्य ब्राह्मण, दरिद्र तथा भिक्षुक आदि खा-पीकर चले गये परन्तु अधिक सेवन से उन्मत्त एक भीलनी और उसके पांचों पुत्र रात में वहीं पड़े रह गये। उसी रात सभी लोगों के साथ-साथ पुरोचन के सो जाने पर भीम ने उस भवन को आग लगा दी और योजना के अनुसार पांचों पाण्डव कुन्ती के साथ सुरंग के मार्ग से बाहर निकल गये। भवन के आग पकड़ने और चटकने की भयंकर ध्वनि से भयभीत पुरवासी नींद से उठकर बाहर इकट्‌ठे होने लगे और पाण्डवों को जला कर मारने की योजना के लिये धृतराष्ट्र तथा कौरवों की निन्दा करते हुए कहने लगे-

हमें निश्चित जान पड़ता है कि पापी दुर्योधन ने ही पाण्डवों को नष्ट करने के लिये यह दुष्कर्म किया है।

इधर पाण्डव रात में ही गंगा-तट पर पहुंच गये।

प्रातःकाल आग बुझने पर लोगों को पांच पुत्रों सहित भीलनी के शव मिले तो उन्होंने ये शव पाँचों पाण्डवों और कुन्ती के समझ कर धृतराष्ट्र के पास सन्देश भिजवाया। धृतराष्ट्र ने-शोक प्रकट करते हुए पाण्डवों की सद्‌गति के लिये उनका विधिपूर्वक संस्कार करने का आदेश दिया।

गंगा पार कर पाण्डव बड़ी सावधानी से दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते गये। मार्ग में तृषा अनुभव किये जाने पर भीम अपनी मां और भाइयों को एक सुरक्षित स्थान पर बिठा कर जल लेने गया तो वापस आकर उसने उन सबको निद्रामग्न पाया। इधर नरभक्षी हिडिम्ब नामक असुर ने पाण्डवों को देखा तो उसने अपनी बहन हिडिम्बा को उन्हें मार कर अपने पास लाने को कहा. ताकि वह नर-रक्त पीकर अपनी भूख-प्यास बुझा सके।

हिडिम्बा ने पाण्डवों के पास आकर भीम को देखा तो वह उसके मोहक एवं तेजस्वी व्यक्तित्व पर मुग्ध हो उठी। फलतः पाण्डवों को अपना आहार बनाने का उसका विचार बदल गया। हिडिम्बा ने सुन्दर नारी का रूप धारण कर भीम से उसका परिचय पूछा तथा अपने आने का मूल प्रयोजन बताते हुए अपने मन में आये परिवर्तन की बात बतायी। राक्षसी के प्रणय-निवेदन पर भीम ने कहा कि यदि मैं तुम्हारे साथ सुख-भोग में प्रवृत्त हो जाऊंगा तो पीछे से तुम्हारा भाई आकर मेरी मां और भाइयों को अपना आहार बना लेगा। इधर हिडिम्बा जब देर तक न लौटी तो हिडिम्ब स्वयं पाण्डवों की ओर चल दिया। हिडिम्बा ने अपने भाई को क्रुद्ध मुद्रा में आते देख कर भीमसेन को सावधान किया। भीम ने हिडिम्बा को आश्वस्त करते हुए कहा कि चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारे भाई को नष्ट करने में समर्थ हूं। हिडिम्ब ने अपनी बहन को मनुष्य रूप में भीम पर अनुरक्त देखा तो वह क्रोधाविष्ट होकर अपनी बहन को गालियां देने लगा। हिडिम्ब ने ज्यों ही सोते पाण्डवों पर झपटने की चेष्टा की, त्यों ही भीम ने उसका हाथ पकड़कर उसे घसीटा और दूर ले जाकर द्वन्द्व-युद्ध में उसे मौत के घाट उतार दिया।

इसी कोलाहल में कुन्ती और चारों पाण्डवों की नींद खुल गई। कुन्ती ने अपने सामने खड़ी परम सुन्दरी हिडिम्बा से जब उसका परिचय पछा तो उसने सारी कथा-भाई के निर्देश से पाण्डवों को खाने के लिये आने और भीम पर मुग्ध होने आदि-सुना कर कुन्ती से उसे बहू रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया। भीम द्वारा उसे मायाविनी बता कर अपनाने से इन्कार करने पर उसने अपनी सत्य-निष्ठा का विश्वास दिलाया। इस पर कुन्ती की अनुमति से भीमसेन ने हिडिम्बा को पत्नी रूप में अपना लिया और उसके साथ एकान्तवास करने लगा। यथासमय उसके गर्भ से घटोत्कच नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। उसके उपरान्त भीम अपने भाइयों के पास लौट गया। वहां से चल कर पांचों भाई कुन्ती के साथ एकचक्रा नगरी में पहुंचे और वहां बाह्मणवेश में रहते हुए भिक्षा मांग कर निर्वाह करने लगे। एक दिन संयोगवश भीमसेन भिक्षा मांगने न जाकर घर में मां के पास रह गया तो मां-बेटे को अपने आश्रयदाता ब्राह्मण के घर करुण क्रन्दन सुनाई दिया। कुन्ती ने सहानुभूतिवश ब्राह्मण के दुःख को जानने और उसे दूर करने का जिन किया। पूछताछ करने पर कुन्ती को पता चला कि गांव के प्रत्येक घर से प्रतिदिन बारी-बारी से एक व्यक्ति एक नरभक्षी राक्षस के आहार के लिये जाता है और आज इस परिवार की बारी है। घर में सभी सदस्य अपने को समर्पित करके दूसरे सदस्यों की रक्षा का आग्रह कर रहे हैं! कुन्ती ने अपने पुत्र को उस राक्षस के पास भेजने का प्रस्ताव किया तो ब्राह्मण ने इसे अतिथि के प्रति अन्याय बताते हुए अस्वीकार कर दिया। कुन्ती ने अपने पुत्र के सामर्थ्य का विश्वास दिलाते हुए जब जिद पकड़ ली तो ब्राह्मण परिवार मान गया।

कुन्ती ने घर आकर सारी बात भीमसेन को बताई और उससे अपने आश्रयदाता आतिथेय के ऋण से मुक्त होने के लिये साहसिक कार्य करने का अनुरोध किया। कुन्ती ने कहा-पुत्र। अवसर आने पर उपकारी का प्रत्युपकार करने बाला व्यक्ति ही सच्चा परुष कहलाता है

अपने उपकारी के उपकार का बदला चुकाने वाले व्यक्ति का पुण्य कभी क्षीण नहीं होता।

भीम ने मां को आज्ञापालन करने का आश्वासन दिया।

दूसरे दिन भीमसेन बकासुर के लिये भोजन लेकर गया तो उसका नाम पुकार-पुकार कर स्वयं ही खाने लग गया। बकासुर भीम के इस दुस्साहस पर दांत पीसता हुआ उस पर लपका तो भीम उसकी चेष्टाओं पर बिना कुछ ध्यान दिये भोजन खाता ही रहा। बकासुर ने तमतमा कर भीम को पकड़ा और उसे दर तक घसीटता चला गया। इस चेष्टा में बकासुर थक गया तो भीमसेन ने उसे पकड़ कर उसकी गरदन दबा दी तथा कमर तोड़ डाली जिससे राक्षस के प्राण-पखेरू उड़ गये। बकासुर की चीख सुन कर उसके परिवार के सदस्य घर से बाहर निकले तो बकासुर की मृत्यु का दृश्य देखकर आतंकित हो उठे। भीमसेन ने उन्हें नरमांस न खाने की शर्तों पर निर्भय करके छोड़ दिया। भीम ने बकासुर की लाश द्वार पर पटक दी, जिसे देख कर नागरिकों को बड़ी भारी तसल्ली हुई।

एकचक्रा नगरी में रहते हुए पाण्डवों को जब द्रौपदी के स्वयंवर की जानकारी मिली तो वे इस स्वयंवर समारोह को देखने की इच्छा से पांचाल देश को चल पड़े। पांचाल देश में पहुंचने पर पाण्डवों ने नगर के बाहर एक कुम्हार के घर डेरा डाला और ब्राह्मण के रूप में भिक्षावृत्ति से निर्वाह करने लगे।

द्रुपद की यह हार्दिक अभिलाषा थी उसकी पुत्री द्रौपदी का विवाह अर्जुन से हो। इस उद्देश्य से उन्होंने एक ऐसे धनुष का निर्माण कराया जिसे अर्जुन के अतिरिक्त दूसरा कोई झुका न सके। इसके अतिरिक्त आकाश में एक ऐसा यन्त्र टंगवा दिया गया जो चक्कर काटता रहता था और उस के ऊपर वेधने का लक्ष्य रखा गया। द्रौपदी के विवाह की यह शर्त घोषित की गई कि इस धनुष से छोड़े पांच बाणों से घूमते यन्त्र के छिद्र में से चक्र का लक्ष्यवेध करने वाला वीर-रत्न ही द्रौपदी से विवाह का अधिकारी होगा। द्रुपद को विश्वास था कि यह कार्य केवल अर्जुन ही कर सकता है।

निश्चित दिन द्रुपद की सभा आमन्त्रित नरेशों से भर गई। द्रौपदी सुन्दर वस्त्र तथा बहुमूल्य अलंकार धारण कर अपने भाई धृष्टद्युम्न के साथ विवाहमण्डप में आई। धृष्टद्युम्न ने विवाह की शर्त का विधिवत् उद्‌घोष किया। धृष्टद्युम्न के वक्तव्य को सुनकर दुर्योधन शल्य तथा शाल्व आदि राजाओं ने अपना पराक्रम दिखाने के लिये प्रयास किया, परन्तु उन्हें घोर निराशा और अपमान का मुंह देखना पड़ा। शिशुपाल और जरासन्ध को भी असफलता का सामना करना पड़ा। कर्ण अपने भाग्य की परीक्षा के लिये उठा तो द्रौपदी ने सूतपुत्र का वरण न करने की कहकर उसे निराश कर दिया। ब्राह्मणों की पंक्ति में बैठा अर्जुन उठा तो बाह्मण उसे अपनी जाति का सदस्य मान कर उसकी सफलता के लिये मंगल-कामना करने लगे। अर्जुन ने बड़ी ही सहजता से धनुष को उठाया और पांच बाणों से घूमते चक्र का लक्ष्यवेध कर दिया। सभा में उपस्थित क्षत्रिय राजाओं ने स्वयंवर में ब्राह्मण के भाग लेने को अनधिकार चेष्टा बताया। उन्होंने ब्राह्मण को अवध्य मान कर उस पर आक्रमण करना तो उचित नहीं समझा परन्तु ब्राह्मण को लक्ष्यसन्धान की अनुमति देने वाले द्रुपद पर वे बुरी तरह टूट पड़े। द्रुपद को भयभीत देख कर अर्जन ने शरसन्धान किया तो कर्ण सहित, सभी क्षत्रिय पराजित होकर भाग खडे हुए। कर्ण के युद्ध से हटते ही सभी अहम्मन्य क्षत्रियों का मनोबल टूट गया।

इसी समय श्रीकष्ण ने आकर उपस्थित राजाओं को समझाया कि इस ब्राह्मण ने धर्मानुसार द्रौपदी को प्राप्त किया है, अतः इसका विरोध करना सर्वथा अनुचित है। पाण्डवों ने द्रौपदी को लेकर घर में प्रवेश करते ही मां से कहा कि आज तो हम अनोखी भिक्षा लाये हैं। कुन्ती ने बिना देखे भीतर से ही कह दिया-बेटो। पांचों भाई मिल कर उसका उपभोग करो। कुन्ती को जब पता चला कि विशेष भिक्षा राजकुमारी द्रौपदी है तो उसे अपने वचन पर बडा पश्चात्ताप हुआ।

कुन्ती के दुःख को देखते हुए युधिष्ठिर ने सच्चे अधिकारी एवं विजेता अर्जुन को ही द्रौपदी से विवाह करने को कहा। युधिष्ठिर ने कहा-

अर्जुन। तुमने ही द्रौपदी को जीता है और तुम्हीं को पतिरूप में पाकर यह देवी सन्तुष्ट होगी, अतः तुम अग्नि प्रज्वलित कर विधिपूर्वक उसमें आहुति डालो तथा शास्त्रोक्त विधि से इस देवी से विवाह सम्पन्न करो।

युधिष्ठिर के वचन सुनकर अर्जुन ने आयु के क्रम में अपना तीसरा स्थान बताते हुए अपने से पूर्व युधिष्ठिर और भीम के विवाह की बात कही। द्रौपदी के सौन्दर्य, माधुर्य और शील स्वभाव ने पांचों भाइयों को मुग्ध कर दिया था, अतः किसी भी प्रकार के सम्भावित संघर्ष से बचने के लिए द्रौपदी को पांचों भाइयों की ही पत्नी बनाने का निश्चय किया गया। युधिष्ठिर ने उद्‌घोष किया कि इस द्रौपदी के कारण कहीं हम भाइयों में फूट न पड़ जा-, इसलिये मेरा यह प्रस्ताव है-

यह .शुभ लक्षणा वाली द्रौपदी हम सबकी पत्नी होगी।

बाह्मणवेशधारी पाण्डव जब द्रौपदी को लेकर चले तो धृष्टद्युम्न ने उनकी वास्तविकता जानने के लिये विश्वस्त अनुचरों के साथ गुप्त रूप से उनका पीछा किया। उसने शीघ्र ही यह पता लगा लिया कि द्रौपदी को पाने वाला युवक वास्तव में अर्जुन ही है। धृष्टद्युम्न ने अपने पिता द्रुपद को यह जानकारी दी तो उसने पुरोहित को उस ब्राह्मण के पास भेजा। पुरोहित ने पांचों ब्राह्मणों को कुन्ती और द्रौपदी सहित राजा की ओर से भोजन के लिये निमन्त्रित किया। भोजन कर चुकने पर युधिष्ठिर ने महाराज द्रुपद को अपना और भाइयों का वास्तविक परिचय दिया तो चारों ओर आनन्द का वातावरण फैल गया।

भगवान् वेदव्यास ने द्रुपद को बताया कि कुन्ती के आदेश से पांचों पाण्डवों ने संयुक्त रूप से द्रौपदी को अपनी पत्नी बनने का निश्चय किया है अतः आप पांचों पाण्डवों के साथ अपनी पुत्री का विवाह रचायें। द्रुपद ने जब इसे लोकाचार, वेदाचार तथा सदाचार के विपरीत बताया और कहा कि एक पुरुष की एकाधिक स्त्रियां तो सुनी जाती हैं, परन्तु एक स्त्री के एक से अधिक पति न कहीं किसी ने देखे है और न ही सुने हैं। इस पर व्यास जी द्रुपद को एकान्त में ले गये तथा उन्हें दिव्य दृष्टि देकर पाण्डवों के और द्रौपदी के पूर्वजन्मों का स्वरूप दिखाते हुए कहा-

यह बाला मूलतः स्वर्ग की अप्सरा है, जिसने पाण्डवों को पाने के लिये कठोर तप किया है और तुम्हारी यज्ञशाला में यज्ञाग्नि से कन्यारूप में प्रकट हुई है।

तम इसकी लक्ष्यसिद्धि में बाधक मत बनो और मेरे कथन के अनुसार पांचों पाण्डवों से इसके विवाह का आयोजन करो। व्यास जी के वचनों से द्रुपद को पक्का विश्वास हो गया कि द्रौपदी पांचों पाण्डवों की पत्नी बनने के लिये ही उत्पन्न हुई है। इस विश्वास को कार्यरूप में परिणत करते हुए राजा द्रुपद ने विधि-विधान से द्रौपदी का पांचों भाइयों से विवाह कर दिया। इस बात की सूचना जब कौरवों को मिली तो उन्हें पाण्डवों के जीवित और ऐश्वर्यशाली होने का बड़ा ही दःख हुआ। वे सोचने लगे कि सचमुच भाग्य प्रबल है मनुष्य के पुरुषार्थ से कुछ नहीं होता है-

यदि भाग्य की अपेक्षा पुरुषार्थ प्रबल होता तो हमारे प्रयासों के फलस्वरूप आज पाण्डव जीवित न होते। हमने उन्हें मारने और साधनहीन बनाने के कितने प्रयास नहीं किये। पाण्डवों को जीवित और उत्कर्ष को पहुंचा देख कर यही मानना पड़ता है विधिरहो बलवान् अर्थात् भाग्य की शक्ति अनन्त और अपरिमित है।

 

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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