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मजदूर दिवस विशेष / अनिल कुमार पारा

हाँ मैं मजदूर हूँ !


हाँ में मजदूर हूँ और मजदूरी करता हूँ, हर इमारत की नींव मेरे ही हाथों से रखी गई है और मेरे ही हाथों से हर इमारत में ईंट रखी गई है, में इस जग का निर्माता हूँ, मेरे हाथों से ही मंदिर, मस्जिद,और गुरूद्वारे का निर्माण हुआ है।कल्पना कीजिए यदि मैं ना होता तो ये धरती कैसी दिखती। मैंने इस वीरान धरती पर झोंपड़ी से लेकर महलों का निर्माण किया है, मेरे हाथों ने पर्वत का सीना चीरकर रास्ते का निर्माण किया है मैं उस समय भी मजदूर था और आज भी मेरा नाम मजदूर ही है। मेरी तकदीर में पत्थर तोड़ना उस खुदा ने लिखा जिसके नाम इस प्रकृति की रचना को किया गया है।

मेरे हाथों ने भी इस प्रकृति का श्रृंगार किया है, खेतों में भी मैं ही उग रहा हूँ और मैं ही कट रहा हूँ, मैं अपने पसीने से ही खेतों को सीच रहा हूँ, हरी भरी दिखती बगिया के फूलों की सुगंध में मेरे श्रम की महक छिपी हुई है। नदी हो या नाले सब मेरे ही श्रम की गाथा गा रहे हैं फिर भी में मजदूर होकर मजबूर हूँ। बड़े-बडे बांधों में उफनता जल नहरों में मदमस्त होकर बहता जल मुझे नहीं भूल पाया है। में वही मजदूर हूँ जिसके कंधों पर बांध की मिट्टी को समेटा गया था, सड़कों पर भारी वाहनों के धूमते पहिए मेरे श्रम को नापने में लगे हुए हैं पर आज तक मेरे श्रम को भारी वाहनेां के पहिए भी नाप नहीं पाए । मैंने ही नदियों पर बड़े-बडे पुलों निर्माण किया है, मैंने झौपड़ी से लेकर जंगल तक बनाये हैं। हां में फिर भी मजदूर होकर मजबूर हूँ।चिलचिलाती धूप के खंजर को मैंने ही सहा है। शर्द हवाओं के थपेड़ों के निशान मेरे गाल पर आज भी बने हुए हैं। में रोज लाता हूं और रोज खाता हूँ।

मुझे ना कल की परवाह है और ना ही परसों की। मैं थकता नहीं हूँ किसी काम से। मेरा खेल ही काम है और काम ही खेल है। मेरी कमजोरी मेरी नींद है जो मुझे सकून से सोने देती है। हाँ मैंने मजदूरी को ही अपना खुदा माना है, मजदूरी मेरा धर्म है, मजदूरी मेरा कर्म, मैं इंसानों के बीच तो रहता हूँ मगर इंसान मेरे बीच नहीं रहते हैं। मैंने समन्दर का सीना चीर के ईंधन की खोज की है।पर मैं उसका मालिक नहीं हूँ । हाँ मैंने दुनिया में बडे़-बडे कल कारखानों को अपने श्रम से तैयार किया पर मैं उसका मालिक नहीं हूँ। हाँ मैंने समन्दर के किनारों पर जहाजों के अड्डे बनाये हैं पर मैं उसका मालिक नहीं हूँ। मैंने रेल,बस,कार,हर छोटे से लेकर बड़ा वाहन बनाया है पर मैं उसका मालिक नहीं हूँ।

हाँ में प्राचीन काल से ही मजदूरी कर रहा हूँ मेरे हाथों से तैयार बाग-बगीचे और महल आज भी राजा महाराजाओं के ठिकानों की शान हैं। मेरे कंधो और बाजुओं में आज भी वही ताकत है जो कल थी, मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैं समय के साथ रहा हूँ समय से मेरा गहरा नाता रहा है। मैं समय के साथ चला हूँ और समय के साथ ही रूका हूँ। मैं किनारा हूँ समन्दर का मैंने ही धरती का सीना चीर कर पानी को निकला है। मैं तब भी मजदूर था और आज भी मजदूर हूँ। हाँ मैं मजदूर हूँ और मजदूर ही रहूँगा। मेरा ठिकाना ही झोंपड़ी है, मैं महलों को बनाता जरूर हूँ पर उसमें रहता कोई और ही है। आर्थिक तंगी से मेरा नाता कोई आज का नहीं है, जहाँ भी मैं रहूँगा आर्थिक तंगी मेरी छाया की तरह मेरे साथ ही रहेगी। मेरे कंधों पर ही ईंटा और गारे ने जन्म लिया है और मेरे कंधो पर ही ईंटा और गारा खत्म हो जाता है। मेरे कंधो से ही जश्न और बरातों में रोशनी के झाड़ रोशन होते है और मेरे कंधों पर ही रोशनी की चिंगारियां शांत हो जाती है। मैं हर छोटे और बड़े काम का हिस्सा होता हूँ पर मेरे हिस्से में मजदूरी के अलावा कुछ नहीं रहता। गहरे गड्डों में को भरने में मुझे जरा भी वक्त नहीं लगता उसी प्रकार मेरे श्रम के घाव भी भरने में समय नहीं लगता । मेरे चोटिल शरीर को ना तो किसी इलाज की जरूरत है और ना किसी के सहारे की । मैं अपने पैर पर चलकर जाता हूँ और अपने पैर से ही घर वापस चला आता हूँ।

मेरी साईकिल के पहियों में भी मेरे श्रम की हवा भरी रहती है। मेरे श्रम की यज्ञशाला में ही देवताओं को आहूती दी जाती है। मैं धार्मिक भी हूँ और अधार्मिक भी। शोषण और श्रृंगार से भी मेरा नाता पुराना ही है। मैंने ना जाने कितनों का शोषण सहा है और ना जाने कितनी इमारतों का श्रृंगार कर दिया है। चमकती दीवारों में मेरे श्रम की आहूती मैंने ही दी है। फिर भी में मजदूर हूँ और मजबूर हूँ। मेरे ही बनाए बांध जब फूटते हैं तो मेरा ही अंत सबसे पहले होता है। मेरी झोंपड़ी बांध के पानी में बह जाती है। जल, जंगल और जमीन से भी मेरा नाता पुराना ही है। मैंने धरती का सीना चीरकर कुआं का निर्माण किया है। और फलते फूलते जंगल के हर कौने में मेरे श्रम की इवारत लिखी हुई है। सुई से लेकर जहाज तक मैंने ही बनाये हैं पर दुर्भाग्य भी मेरा ही है कि मैं इनका मालिक नहीं हूँ मैं कल भी मजदूर था और आज भी मजदूर हूँ। मेरा नाम ना तो किसी किताब मंें छपता है और ना किसी समाचार का मैं हिस्सा होता हूँ।

रेल की पटरियों के किनारे पत्थरों को सहेजता भी मैं ही हूँ। मुझे ना तो भूख की चिंता रहती है और ना प्यास बुझाने की । मैं मजदूर हूँ और मजदूरी करता हूँ। चिलचिलाती धूप में गर्म हवाएं भी मेरा हौंसला डिगा नहीं पाती है। बरसात का पानी जब मेरे पसीने में आकर मिलता है तो उसका स्वाद भी निराला ही होता है। तंग गलियों में मेरा घर किसी महल से कम भी नहीं होता जहाँ सकून से दो वक्त का निवाला चिंता से दूर होकर पाता हूँ। मुझे ना तो मेरे बनाये हुए महल चाहिए और ना ये सड़के और पुल मैं भूखा हूँ तो मात्र स्नेह और दुलार का। मैंे दुनिया की कोई इमारत भी अपने नाम नहीं कराना चाहता। और ना ही उन इमारतों में रहने का मुझे शोक ही है जिनका निर्माण मैंने किया है। मैंने ही धरती को आकाश से मिलाने का संकल्प लिया है। और मंगल पर घर बनाने का सपना भी मैंने ही देखा है। मैं अपने बाजुओं की ताकत के सहारे आज नहीं तो कल निश्चित ही मंगल पर घर बनाकर लौट आऊंगा।

मैंने घरती पर तो अपना काम कर दिया और आगे भी करता रहूंगा। हाँ मैं दिहाड़ी मजदूर हूँ पत्थर को तौड़ता हूँ। मैं वही मजदूर हूँ जो सहम जाता हूँ अपने मालिक को देखकर, समय की रेखा को अपने बाजुओं की सुई से पार करता हुआ सुबह से शाम तक बस ललक रहती है तो काम और काम के बदले मिलने वाली पगार की। में जब सोता हूँ तो सिंहासन पाने के सपने मैंने कभी नहीं देखे मेरे सपनों में आने वाले कल के दिन काम मिलने का दर्द रहता है। मैं शोषण से भी नहीं डरता और शोषण की शिकायत भी नहीं करता तभी तो ना जाने कितनों ने मेरे श्रम की मजदूरी आज तक नहीं दी। मैं उसे पाने के लिए चक्कर काटता रहा पर फिर भी मेरे मालिक का सीना किसी भी दिन नहीं पसीजा।

मैं तो शुरूआत हूँ और मैं ही अंत हूँ मुझे मेरे श्रम की मजदूरी ना मिलने से मेरे अर्थ में कोई अंतर नहीं आया है। दो जून की रोटी पाने के लिए मैं दर-दर भटकता जरूर हूँ पर मेरे हौंसले और इरादे आज भी कम नहीं हैं। मैं मजदूर हूँ और मजदूर ही रहूँगा। मैंने किसी के साथ छल और कपट करना कभी नहीं सोचा और ना ही मैं कभी किसी घोटाले का हिस्सा ही रहा हूँ। मुझे अगर कुछ मिला है तो घुतकार ही मिला है चाहे काम का समय हो या आराम का समय धुतकार से भी मेरा रिस्ता पुराना ही है। मेरा तेज इमारतों की चमक बनकर आज भी रोशन हो रहा है। मैंने ही दुनिया के सात अजूबों का निर्माण किया है। मैं फिर कहता हूँ मैंने वीरान धरती पर शहर बसाये हैं। मैं दुनिया का रचियिता हूँ। पर फिर भी मैं मजदूर हूँ और मजबूर भी हूँ। मैं कल भी मजदूर था और आज भी मजदूर ही हूँ।

हाँ मैं मजदूर हूँ।
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अनिल कुमार पारा,

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