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नरसिंह अवतार की प्रासंगिकता / सुशील शर्मा

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥

(हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्ष आत्मसमर्पण करता हूँ।)

कश्यप नामक ऋषि एवं , उनकी पत्नी का नाम दिति को  दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम 'हरिण्याक्ष' तथा दूसरे का 'हिरण्यकशिपु' था। हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा हेतु वराह रूप धरकर मार दिया था। अपने भाई कि मृत्यु से दुखी और क्रोधित हिरण्यकशिपु ने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अजेय होने का संकल्प किया। सहस्त्रों वर्षों तक उसने कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। वरदान प्राप्त करके उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। लोकपालों को मारकर भगा दिया और स्वत: सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। देवता निरूपाय हो गए थे। वह असुर हिरण्यकशिपु को किसी प्रकार से पराजित नहीं कर सकते थे।ब्रह्माजी की हिरण्यकश्यप कठोर तपस्या करता है। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी वरदान देते हैं कि उसे ना कोई घर में मार सके ना बाहर, ना अस्त्र से और ना शस्त्र से, ना दिन में मरे ना रात में, ना मनुष्य से मरे ना पशु से, ना आकाश में ना पृथ्वी में। इस वरदान के बाद हिरण्यकश्यप ने प्रभु भक्तों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, लेकिन भक्त प्रहलाद के जन्म के बाद हिरण्यकश्यप उसकी भक्ति से भयभीत हो जाता है, उसे मृत्यु लोक पहुंचाने के लिए प्रयास करता है। इसके बाद भगवान विष्णु भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लेते हैं और हिरण्यकश्यप का वध कर देते हैं।भगवान नरसिंह में वो सभी लक्षण थे जो हिरण्यकश्यप के मृत्यु के वरदान को संतुष्ट करते थे. भगवान नरसिंह के द्वारा हिरण्यकश्यप का नाश हुआ किन्तु एक और समस्या खड़ी हो गयी. भगवान नरसिंह इतने क्रोध में थे कि लगता था जैसे वो प्रत्येक प्राणी का संहार कर देंगे. यहाँ तक कि स्वयं प्रह्लाद भी उनके क्रोध को शांत करने में विफल रहा. सभी देवता भयभीत हो भगवान ब्रम्हा की शरण में गए. परमपिता ब्रम्हा उन्हें लेकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे अपने अवतार के क्रोध शांत कर लें किन्तु भगवान विष्णु ने ऐसा करने में अपनी असमर्थता जतलाई. भगवान विष्णु ने सबको भगवान शंकर के पास चलने की सलाह दी. उन्होंने कहा चूँकि भगवान शंकर उनके आराध्य हैं इसलिए केवल वही नरसिंह के क्रोध को शांत कर सकते हैं. और कोई उपाय न देख कर सभी भगवान शंकर के पास पहुंचे।

देवताओं के साथ स्वयं परमपिता ब्रम्हा और भगवान विष्णु के आग्रह पर भगवान शिव नरसिंह का क्रोध शांत करने उनके समक्ष पहुंचे किन्तु उस समय तक भगवान नरसिंह का क्रोध सारी सीमाओं को पार कर गया था. साक्षात भगवान शंकर को सामने देख कर भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ बल्कि वे स्वयं भगवान शंकर पर आक्रमण करने दौड़े. उसी समय भगवान शंकर ने एक विकराल ऋषभ का रूप धारण किया और भगवान नरसिंह को अपनी पूंछ में लपेट कर खींच कर पाताल में ले गए. काफी देर तक भगवान शंकर ने भगवान नरसिंह को वैसे हीं अपने पूंछ में जकड कर रखा. अपनी सारी शक्तियों और प्रयासों के बाद भी भगवान नरसिंह उनकी पकड़ से छूटने में सफल नहीं हो पाए. अंत में शक्तिहीन होकर उन्होंने ऋषभ रूप में भगवान शंकर को पहचाना और तब उनका क्रोध शांत हुआ. इसे देख कर भगवान ब्रम्हा और भगवान विष्णु के आग्रह पर ऋषभ रुपी भगवान शंकर ने उन्हें मुक्त कर दिया. इस प्रकार देवताओं और प्रह्लाद के साथ साथ सभी सत्पात्रों को दो महान अवतारों के दर्शन हुए।

हरिण्याक्ष और हिरण्यकशिपु तथा उनकी बहिन होलिका वर्तमान की राजनीती के षड्यंत्रों के प्रतीक है। वर्तमान संदर्भो से इन प्रतीकों का गहरा रिश्ता है। आज राजनीति में शासक हिरण्यकशिपु है एवं प्रजा का प्रतिनिधित्व प्रह्लाद करता है। विश्व के हर कोने में अत्याचार ,आतंक शासनों के द्वारा स्वयं का गुणगान करवाना ,वंचितों को अधिकार न  देना ,ISIS तालिबान एवं आतंकियों का अधिकांश देशों में साम्राज्य हिरण्यकशिपु के आतंक की याद दिलाता है। प्रह्लाद आज ही इन हिरण्यकशिपुयों का सामना कर रहा है।

सुनो प्रह्लाद इन होलिकाओं से कैसे मुक्ति पाओगे।

कैसे मारोगे देश के अंदर सुलगते दरिंदों को?

कैसे बचाओगे पंखो पर लटकते छात्रों को ?

कैसे सहलाओगे भूख से बिलबिलाई आँखों को  ?

कैसे रोकोगे सीमा पार के आतंकों को ?

कैसे रोक पाओगे पर्वतों पर पिघलती बर्फ को ?

कैसे सह पाओगे सर्द सहमी रातों को?

क्या रोक पाओगे स्याह अँधेरे में लुटती अस्मतों को?

क्या रोक पाओगे तुम रेत के लुटते किनारों को?

क्या रोक पाओगे सलीबों पर लटकते किसानों को ?

क्या रोक सकोगे संसद में राजनीति के हंगामें को ?

मुझे मालूम है तुम इन होलिकाओं से घिरे हो अभिमन्यु की तरह ।

फिर कोशिश करेंगी यह होलिकाएँ तुम्हे जलाने की।

आज आवश्यकता है ऐसे नर्सिन्हों की जो सत्य के राही प्रह्लाद को आतंक के हिरण्यकशिपु से बचा सकें। क्या फिर होगा कोई नरसिंह अवतार ?

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जय नरसिंह।।।।

सुशील शर्माजी का लेख बहुत ही अच्छा है
सम्पूर्ण जानकारी तारीफ के काबिल है

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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