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कहानी संग्रह - अपने ही घर में / खंडहर : गुनो सामताणी

कहानी संग्रह - अपने ही घर में /

खंडहर

गुनो सामताणी

रास्ता उसका जाना-पहचाना तो था, पर बहुत अरसे के बाद वहाँ से गुज़रते हुए उसने खुद को जाने पहचाने रास्ते पर भी अजनबी महसूस किया।

यह मोड़ था ? कहाँ था ? हाँ, था - या शायद इस मोड़ पर नई इमारत बनी है, या शायद यहाँ दुकानें थीं, पर दुकानों के निर्माण की सूरत बदली हुई है और रास्ते के दाईं ओर तीसरी नम्बर गली में, मकान नम्बर चार ? उसने सोचा, उसने कुछ याद किया। हाँ, चौथा, शंकर का घर।

गली नम्बर तीन, मकान नम्बर चार, शंकर का घर। दरवाज़े का रंग बरसात और धूप में अपनी असलियत गंवाकर (इन्सान की तरह !) पहचान के बाहर हो गया है। उस रंग का नाम क्या हो सकता है ? ‘अन-नेमेबल।’

दरवाज़े पर नाम की तख़्ती लगी हुई थी। नाम मिट चुका था। घंटी नहीं थी। कड़ी अन्दर से बंद। हेमा ने हाथ उलटा करके उंगलियों की कुहनियों से दरवाज़े पर दस्तक दी। एक मिनट भी नहीं गुज़रा, हेमा को लगा कि उसने बहुत लम्बी अवधि इस दरवाज़े के खुलने का इन्तज़ार किया हो। उसने फिर दरवाज़ा खटखटाया। इस तरफ़ ठक-ठक, उस तरफ़ दरवाज़ा खुलने की आवाज़। उसका हाथ यक-ब-यक दर पर ही रुक गया।

सामने शंकर (और शंकर के ख़्याली कोण से-अगर कैमेरा उसकी आँखों के पास रखकर हेमा को फोकस में लाया जाए) सामने हेमा। दोनों ने एक दूसरे को देखा, एक ही वक़्त पर, दरवाज़ा खुलने के छोटे आकार से शुरू होकर, दरवाज़े के पूरे आकार के खुलने तक। पहले कुछ हिस्सा, फिर कुछ ज़्यादा हिस्सा, फिर एक़दम पूरा का पूरा। दोनों ने एक दूसरे को देखा, एक ही वक़्त पर और एक ही वक़्त एक दूसरे में अलग-अलग बातें देखीं।

शंकर ने देखा -

हेमा के बाल स्कूल के बोर्ड के समान थे, जिन पर कहीं-कहीं चाक से सफ़ेद लकीरें खींची हुई थीं। मुँह पर पाउडर शायद जल्दी में लगाया गया था, जो चेहरे की कुछ गहराइयों और कोनों में कुछ-कुछ रह गया था। कानों में बालियाँ शंकर को अच्छी न लगीं। साड़ी का रंग कुछ हरा, कुछ पतझड़ी पीले-सा। नाक का सिरा नीचे की बजाय थोड़ा ऊपर - बहुत अच्छी लग रही थी। निचला होंठ भरा-भरा,रसीला।

हेमा ने देखा -

शंकर के बाल कुछ रूखे से, पेशानी के ऊपर से लौटते हुए ज्वार की तरह। पेशानी पर गहरी रेखाएँ, जैसे भाटे के किनारे पर रेत के निशान। क्लीन शेव, नहीं, क्लीन शेव ही सही, पर कम से कम आज शेव की हो ऐसा नहीं। इतवार है। कुर्ता और पैजामा - सफ़ेद, या कभी सफ़ेद थे। (सफ़ेदी भी और रंगों की तरह बेरंग हो जाती है) और आँखों पर चश्मा, चश्मा ? हाँ, पहले भी होता था। फ्रेम बदला हुआ है। कुछ सादा भी है।

शंकर ने देखा -

हेमा ने उसे देखकर हँसना चाहा। निचला होंठ दांतों में दबाकर हँसी रोकी थी। फिर भी हँसी की हलकी निशानी - मुस्कान, उसके होंठों पर रह गई।

‘ओह, शंकर !’ शंकर लफ़्ज - नाम मुस्कान में डूबा हुआ, टूटा-सा था।

हेमा ने देखा -

शंकर के चेहरे पर हैरानी थी। आँखें देख रही थीं। पर ऐनक के शीशे जैसे धुंधले पड़ गये थे। उसका देखना ‘घूरना’ बन गया था।

‘तुम...!’

‘नहीं पहचाना ?’

‘नहीं’

‘अन्दर तो चलो, पहचान जाओगे’

‘आओ’

...

अन्दर

दो चारपाइयाँ एक दूसरे के सामने दीवार से सटी हुई थीं, सादी चादरों से ढकी हुई। बाईं तरफ़ एक टेबल, टेबल पर अनेक पुस्तकें, मैगज़ीनें। एक टेबल लैंप भी बिना बल्ब के, कुर्सी कहीं भी नहीं थी। कुछ दूरी पर दो संदूकें। दीवारें बिल्कुल नंगी, न कोई चित्र, न तस्वीरें, न फोटो। हेमा को लगा दीवारें जैसे कमरे से अलग खड़ी थीं, पीछे हटी हुई-सी।

‘वह मेरी मनपसंद आराम कुर्सी कहाँ है ?’

शंकर ने जवाब नहीं दिया। हाथ से चारपाई पर पड़ी चादर... चादर संवारी, तकिया एक तरफ़ रखते हुए कहा.

‘आओ यहाँ बैठो।’

हेमा बैठ गई।

‘अब पहचाना ?’

‘नाम ?’

‘हेमा।’

‘नहीं।’

‘मैं क्या इतनी बदल गई हूँ।’

‘मैं नहीं जानता।’

‘अच्छी तरह देखो। मैं हूँ हेमा।’ उसका चेहरा थोड़ा आगे, थोड़ा ऊपर हो आया।

शंकर की निगाहें भी थोड़ी आगे, थोड़ी ऊपर की ओर उठीं, आँखों में भर आया आश्चर्य उसके चश्मे के कांच से झांक रहा था।

‘तुम्हारी नज़र शायद कम हो गई है, तुम्हें दृष्टि-दोष लग गया है।’

‘मुझे ? पर मैं तो तुम्हें पहचान रही हूँ।’

‘तुमने शकुन्तला पढ़ी है ?’

‘पढ़ी है।’

‘पहचान की कोई निशानी ?’

हेमा ने हाथ उठाया। खोला, उलटा-सीधा किया।

हँसकर कहा - ‘दुष्यन्त ने कोई अंगूठी दी ही नहीं मुझे।’

‘तो फिर ?’

‘तुमने हिमालय देखा है ?’

‘देखा है’

‘याद है, तुम हेमा को हिमालय कहा करते थे ?’

शंकर ज़ोर से हँसा।

‘बहुत रोमांटिक बात बताई है।’

‘तो क्या ?’

‘निर-अर्थ... ’

‘तुम्हारी ही दी हुई यह निशानी।’

...

‘निशानी !’

(हेमा को याद है। शंकर को याद है, नहीं है, कौन जाने ?)

यूनिवर्सिटी में एम.ए. का दाख़िला-फार्म भर रहा था शंकर, भर कर पूरा किया था। पास ही एक अनजान लड़की फार्म भरने के लिये खड़ी थी। पेन खोलकर उसने लिखना शुरू किया। लिख न पाई। पेन को दो-चार बार झटका। वह बेबस होकर खड़ी रही, पेन में सियाही नहीं थी।

शंकर की ओर देखकर कहा था - ‘माफ़ करना, अपनी पेन...।’

अचानक बात अधूरी ही छोड़कर पूछा था - ‘तुम्हारा विषय कौन-सा है ?’

‘हिस्ट्री’

‘हाऊ वंडरफुल। मैं भी हिस्ट्री ही ले रही हूँ।’

शंकर चुपचाप पेन आगे बढ़ाता है।

‘देखो मुझे फार्म-वार्म भरना बहुत कठिन लगता है। ऐतराज़ न हो तो तुम ही फार्म भर दो।’

उसने फार्म लेकर, पेन खोली। शंकर ने पूछा - ‘नाम ?’

‘हेमा।’

उसने लिखा।

‘जन्म की तारीख, जन्म स्थान, पिता का नाम ?’

वह सुनाती गई, वह लिखता गया।

‘मार्क आफ आइडेंटिफिकेशन (पहचान की निशानी) ?’

‘स्कार आन लेफ्ट शोल्डर (बाएँ कँधे पर जख्म का निशान)’

शंकर का हाथ रुक गया। चेहरा ऊपर करते हुए कहा था - ‘देखूँ!’

हेमा का दायाँ हाथ तुरन्त बाएँ कंधे की ओर बढ़ा था। हाथ से ब्लाउज़ को थोड़ा नीचे करके निशान दिखाने की बजाय (शंकर की बेवजह की चाह, उम्मीद) उसने कंधे पर रखी साड़ी का पल्लू और अधिक फैलाकर खुद को ढाँप लिया। शंकर ने हँसी रोककर लिखते हुए होठों के बीच धीमे से पढ़ा भी था।

‘निशानी... बाएँ कंधे पर जख़्म!’

...

(हेमा याद में गुम। शंकर ने बात करनी शुरू कर दी थी )

‘मेरी दी हुई निशानी ?’

‘हाँ, और एक तुमको दी हुई मेरी निशानी।’

‘क्या ?’

‘मैं तुमको कहा करती थी, अगर मैं हिमालय हूँ, तो तुम हिमालय के देवता, शंकर!’ शंकर थोड़ा-सा मुस्कराया।

‘माफ़ करना, तुम्हारी उम्र कितनी है ?’

‘तेंतालीस।’

‘कितने साल हुए उसको, जब मैंने तुम्हें हिमालय कहा, तुमने मुझे ... तुमने मुझे ‘हिमालय-देव’ कहा ?’

‘हुए होंगे बीस-बाईस साल।’

‘इतने सालों बाद उन बातों को लेकर भावुक होना क्या ज़रूरी है?’

हेमा क्षण भर के लिये दीवारों को देखती रही फिर कहा - ‘इतिहास में एम.ए. की डिग्री शायद इसी कारण तुमने दीवार पर नही टांगी है, जैसे जो कुछ गुज़रा है, इतिहास है, उसको भुला दो।’

‘मैं भुलाने की बात नहीं कर रहा, भावुक बनने की बात कर रहा हूँ।’

‘क्या ?’

शाम हो चुकी थी। घर के ऊपर से बेहद शोर करता हुआ एक हवाई जहाज़ गुज़र गया। हवाई जहाज़ का शोर और शंकर का सवाल दोनों एक दूसरे में लीन हो गए। ‘क्या’ लफ़्ज का ‘आ’ कुछ लंबा हो गया। जहाज़ की आवाज़ कुछ अजीब थी। जोन्... ओन... जर ओन...सिर्फ़ हेमा ने ऐसा महसूस किया। इस अहसास के सहारे उसके जेहन में एक नाम उभर आया मोज़ार्ट। और एक धुन की... सिम्फनी!

‘क्या ?’

‘मोज़ार्ट की सिम्फ़नी।’

‘और प्रोफेसर मलकानी।’

बर्फ़ की परत पर एक और परत।

‘और प्रोफेसर का लाइब्रेरी रूम।’

परत के ऊपर परत !

‘और.. नहीं ! पहले बताओ याद है ?’

शंकर ने चश्मा उतारकर हाथ में पकड़ा। (आदत)

बर्फ़ पिघलने लगी। बिल्कुल पिघल गई।

...

मोज़ार्ट की सिम्फ़नी

हेमा का घर - एक हवाई हादसा, हेमा के भाई की मृत्यु। मृत्यु की छाया कुछ दिन तक हर चीज़ में नुमायां रही। रात का समां बरसात भी मुसलसल, तेज़, घनघोर, बिजली कड़कती।

शंकर

हेमा

शांत (नहीं शांति कहाँ थी) ?

वातावरण में दुख था। दुखमय धुन थी, मृत्यु की। सिम्फ़नी

शंकर ने रेडियोग्राम पर मोज़ार्ट का रिकार्ड लगा रखा था।

वायलिन की सिसकियाँ। पियानो ज़ोर-ज़ोर से सिसकियाँ भरता हुआ।

शंकर हेमा के पास आकर बैठा था।

‘आइ लव यू। ’

हेमा सोच रही थी, दिलीप हवाई-जहाज़ में क्यों गया ? ट्रेन में क्यों नहीं गया?

‘मन को समझने की कोशिश करता रहा। आज जान गया हूँ हेमा। मैं तुम्हें बेहद चाहता हूँ।’

(पर वो गया ही क्यों था !)

शंकर ने हेमा को कंधों से पकड़ते हुए कहा - ‘हेमा !’

‘हूँ...!’

‘क्या सोच रही हो ?’

‘तुम क्या सोच रहे थे ?’

बरसात, बिजली, गर्जना, खिड़की के काँच पर बहती जल की धारा। मोज़ार्ट की सिम्फ़नी। सिम्फ़नी का क्रिसेंडो पर पहुँचना।

शंकर ने ऐनक उतारकर हाथ में पकड़ी। नंगे नेत्र, उसने आवाज़ में नर्मी लाने की कोशिश की। लेकिन वातावरण में हो रहे शोर से ऊपर आकर, उसकी आवाज़ एक हलकी चिल्लाहट में बदल गई।

‘आइ लव यू !’

(सृष्टि के प्रथम पल का सनातन भाव !)

‘आइ लव यू !’

(मैं यक्ष हूँ, कौन अभागा होगा जो मेरी तरह अकेला, बरसात की इस रात में...)

‘आइ लव यू !’

(राधा, पूनम की यह रात, जमुना का किनारा, मधुबन)

आवाज़, पुकार, प्रतिध्वनि, ज़बान और मन। भाषा और भाव और मोज़ार्ट की सिम्फ़नी। सिम्फ़नी का क्रिसेंडो, बरसात और बिजली।

...

‘तुम्हें याद है शंकर !’

...

और प्रोफेसर मलकानी !

इतिहास के किसी भी विषय पर बात करता तो पहले ऐनक उतारकर, आँखें सिकोड़कर, एक आधा मिनट हाथ पर बंधी घड़ी में देखकर, अचानक शुरू हो जाता था। आधी बंद आँखों से जैसे इतिहास के गुज़रे युगों को वह देख सकता था। उसने शादी नहीं की थी। कहता था ‘शादी की रिवायत जंगली लोगों ने शुरू की है। देर इज नथिंग आर्यन अबाउट इट (ज्ीमतम पे दवजीपदह।तलंद ंइवनज पज) शादी ग़ुलामी है। आर्य सभ्यता आज़ाद सभ्यता थी, सिंधु की धारा की तरह मुक्त।

उसके दो प्रिय शागिर्द - शंकर और हेमा। कोई बहस करते एक दूसरे को कुछ तेवरों में बात करते तो वह हँसकर कहता था - देट्स इट, दिस वार (ज्ींजश्े प्ज .जीपे ूंत)। प्यार कमज़ोरी की निशानी है। इट इज़ नाट आर्यन टू लव (प्ज पे दवज ।तलंद जव सवअम)।

इसी प्रोफेसर के घर, शंकर और हेमा, पढ़ते, बहस करते, नोट्स लिखते आर्यहीन बन गए।

प्रोफेसर मन ही मन में हँसा था। उसकी आँखे बाहर से सिकुड़ गई। (ऐनक के बिना) उसकी निगाह वाच पर वैसे से कुछ अधिक वक़्त अटकी रही। फिर उसने बात शुरू की - ‘मैं आज भी आर्यन के घोड़ों की टाप-टाप सुनता हूँ। आज भी उनके कमान से निकलते तीरों की सर..र..र.. सुनता हूँ। घोड़ों और तीरों की तरह उन्हें सिंधु-गंगा के विशाल मैदानों में फैलता हुआ देखता हूँ। घोड़ों को मुक्त छोड़ो, उनकी रफ़्तार देखो, तीरों को मुक्त करो, उनकी शक्ति देखो।

प्रोफेसर ज़रा हँस दिया। ‘यह शंकर भूतनाथ तो नान आर्यन है, पर तू हेमा! तू तो आर्यन है। तुम और बंधन ?’ (काल इट लव, इफ यू प्लीज़, डैम इट)

शंकर और हेमा ने एक दूसरे को आँख मारी थी। होठों को काटते हुए हँसी रोकी थी। बाहर आते ही शंकर ने कहा - ‘सुना भूतनाथ नान आर्यन है, बचना।’

हेमा ने कहा - ‘तुम्हारी जटाओं से गंगा बहती है, तुम्हारे मस्तिष्क पर चन्द्रमा चमकता है। तुम्हारे डमरू में संगीत है। अंग में नृत्य। तुम ही काल, तुम ही वक़्त, तुम ही अमरता। तुम ही आर्य। सभ्यता के प्रतीक।’

‘और प्रोफेसर’

‘डैम हिम !’

...

‘तुम्हें याद है शंकर ?’

...

और प्रोफेसर का लाइब्रेरी रूम।

किताब, किताब, किताब, किताब, किताब, किताब...

इन दोनों ने किताब, क्लासीफाइड किये थे। विषय और लेखकों के अलग इंडेक्स कार्ड बनाए थे। मिलकर कविता पढ़ते। किताब, पढ़ते, नायक और नायिका जैसे बने थे। ड्रामा के किरदारों के समान नाटकीय ढंग से गुफ़्तगू की थी। जयदेव का ‘गीत-गोविंद’ पढ़ते, राधा-कृष्ण बनकर उन्होंने शरीर के अंग-अंग में समाए हुए रूप पर बात की थी, एक दूसरे से शिकवा-शिकायत की।

शंकर कहता था (जयदेव का ‘गीत-गोविन्द’ पढ़ते हुए) ‘मेरे गले में पड़ी फूल-माला को नाग-राज न समझना, मेरे कंठ में पड़े नील-कमल को विष का नील न समझ। मेरे शरीर पर लगे चंदन लेप को राख-भभूत न समझ, मुझे शिव-शंकर न समझना।

‘ओ कामदेव मदन, मुझे यूँ न सताओ।’

और हेमा, राधा बनकर, उसे और गोपियों के साथ रात गुज़ारने के कारण ताने मारती, ‘गीत-गोविंद’ में से पढ़ती -

‘जाओ रे माधव, जाओ रे केशव, झूठ न बोलो।

रात भर के जागरण ने तुम्हारे नयन लाल कर दिये है, तृष्णा के लाल रंग के समान,

तुम्हारे होंठ काले तुम्हारे होंठ,

तुम्हारे शरीर से भी काले तुम्हारे होंठ,

किसकी आँखों को चूमते हुए,

काजल से काले हो गए हैं।

जाओ रे माधव, जाओ रे केशव, झूठ न बोलो,

तुम्हारे शरीर पर प्रेम युद्ध के निशान,

जो किसी की उँगलियों के नाखूनों से बने हैं,

ऐसे लगते हैं -

जैसे किसी ने अपने प्रेम की घोषणा करने के लिये,

सोने-चांदी में शिला-लेख लिखा हो।

जाओ रे माधव, जाओ रे केशव, झूठ न बोलो,

तुम्हारे होठों पर देख रही हूँ एक और जीत का निशान,

जो किसी के दांतों से बना हुआ है,

जाओ रे माधव, जाओ रे केशव, झूठ न बोलो।’

‘तुम्हें याद है शंकर ?’

‘नहीं, मुझे याद नहीं है, मैंने सब कुछ भुला दिया है।’

‘क्यों ?’

शंकर ने ऐनक उतारकर हाथ में पकड़ रखी थी। उसके नंगे नयन जैसे पत्थर के बन गए थे। हेमा की ओर देखते-देखते वह कुछ पहचानने, याद करने की कोशिश कर रहा था।

हेमा ने फिर पूछा - ‘तुम इतिहास के विद्यार्थी हो, माज़ी को क्या निर्मूल, निरर्थक समझकर तुम भुला सकते हो ?’

शंकर को एक पल में इस सवाल के जवाब में यह विचार आया कि वह हेमा को हाथ से पकड़कर, बाहर निकाल, दरवाज़ा बंद कर दे। पर उसने जवाब दिया - ‘तुम्हारे पास पैसे थे, तुम इंगलैंड चली गई। फिर तुरन्त ही बाबा का देहांत हो गया। सात सदस्यों के पालने का भार मुझ पर, एक आम लेक्चरर पर आन पड़ा। सपने मैंने भी देखे थे। सपनों का टूटना भी देखा था। माज़ी की बात न करो हेमा ! इतिहास का ख़ून, तबाहियाँ, खंडहर हैं मेरे मन में।’

‘शंकर !’

‘यह पल ही सच है। इस पल में मन की चिता जलती रहे, यही सच है।’

‘जीवन कब था, याद नहीं।’

‘..........’

‘एक सवाल तुमसे पूछूँ शंकर ?’

‘हूँ, पूछो।’

‘हम समय में विपरीत यात्रा क्यों नहीं करते ?’

‘मतलब ?’

‘सतयुग से हम कलयुग में यात्रा करके पहुँचे हैं, कलयुग से सतयुग की तरफ़ हमारा सफ़र नहीं हुआ है, क्यों ?’

‘..........’

‘हर युग में इन्सान नीचे, नीचे, नीचे गिरता रहता है, क्यों ?’

‘..........’

‘जवाब दो।’

‘तुम्हारा सवाल अर्थहीन है। जो कुछ भी, जैसा भी है, उसे स्वीकार करने, ग्रहण करने के सिवा जीवन का कोई अर्थ नहीं है।’

‘और भी कोई रास्ता हो सकता है ?’

‘माज़ी की ओर वापस लौटने का ?’

‘इतिहास से संबंध जोड़ने का !’

‘नहीं जानता।’

‘तुम जानते हो !’

नहीं’,

‘झूठ’

‘सच, नहीं’

‘तुम इस पल वर्तमान को ही सच मानते हो।’

‘हाँ’,

‘पर वक़्त की, इस पल की परंपरा क्या झूठ है ?’

‘सपना, धोखा।’

‘वेद-व्यास के राधा कृष्ण थे। युगों के बाद उस परम्परा को जयदेव ने जिन्दा रखा था और सदियों के बाद जयदेव का गीत-गोविंद एक लाइब्रेरी रूम में फिर जाग उठा था। समय से जीवन तक चलते इस पल का जन्म हुआ है। कैसे अलग करोगे इस पल को, इतिहास के पहले पल से, कहो ?’

‘जैसे तुम और मैं अलग हो गए थे, वैसे ?’

‘या जैसे तुम अपने आप से अलग हो गए हो, खुद को खो बैठे हो, वैसे।’

दरवाज़े तक आकर शंकर ने हाथ जोड़े, नमस्कार करके हेमा से विदा ली और दरवाज़ा बंद कर दिया। हेमा ने एक बार दरवाज़े की ओर देखा। दरवाज़े का रंग बरसात और धूप में अपनी असलियत गंवाकर पहचान के बाहर हो गया था। दरवाज़े पर नाम की तख़्ती लगी हुई थी। नाम मिट चुका था। घंटी नहीं थी। कड़ी अन्दर से बंद !

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