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हिंदी में हाइकु (१८) / भारतीय भाषाओं में हाइकु रचनाएं / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की अब एक सौ से अधिक पत्रिकाओं में हाइकु छपने लगे हैं. हिंदी में कम से कम पांच पत्रिकाएं केवल हाइकु लेखन को समर्पित हैं. लगभग हर मास, कभी कभी एक मास में एक से अधिक, हाइकु-संग्रह आ रहे हैं. एक शब्द में कहें तो भारत में हाइकु लेखन ने एक आंदोलन की शक्ल ले ली है. किंतु, जैसा हर विधा के साहित्यिक आंदोलन में होता है, रचनाएं तो बहुत लिखी जाती हैं लेकिन अधिकतर सृजन उच्च कोटि का नहीं होता. फिर भी बेशक बहुतकुछ ऐसा लिखा जाता है जिससे आश्वस्ति होती है.

केवल भाषाओं में ही नहीं, भारत में अनेकानेक बोलियों में भी हाइकु रचनाएं की जा रही हैं. उदाहरण के लिए ब्रज, भोजपुरी, बघेली, मगही, नीमाड़ी, सम्बलपुरी, मालवी, राजस्थानी, अंगिका, कच्छी आदि, बोलियों में भी स्थानीय साहित्यकार हाइकु कविताएं लिख रहे हैं.यदि हम थोड़ी देर के लिए इन बोलियों को नज़र अंदाज़ भी कर दें तो भी लगभग हर राज्य के कवि अपनी मुख्य भाषा में हाइकु लेखन में काफी रुचि लेनें लगे हैं.

भारत को हाइकु साहित्य से परिचय करानेवाले कविवर रवींद्रनाथ ठाकुर थे. लेकिन बांग्ला में हाइकु लेखन अभी तक बहुत ज़ोर नहीं पकड़ पाया है. कुछ कवियों ने बांग्ला में 3-3 पंक्तियों की अच्छी रचनाएं तो की हैं किंतु हाइकु में जो अक्षरों की गिनती, 5-7-5, का अनुशासन है उसे प्रायः अनदेखा किया है. राजीव चटोपाध्याय के कुछ बांग्ला हाइकु काफी काव्य-गुण-युक्त रहे हैं और वे अधिकतर हाइकु छंद का अनुशासन भी पालन करते हैं. उनका एक ऋतु-संकेत-युक्त सुंदर हाइकु इस प्रकार है –

माटिर गंध

आमरे डाक छे जे

जेतई हवे

क्षिप्रा मुखोपाध्याय बांग्ला की एक प्रतिष्ठित महिला हाइकुकार हैं. उन्होंने भी कई प्रकृति- चित्रण हाइकु विधा में किए हैं. उनमें से एक इस प्रकार है –

दीप्त आलोके

जागे शुभ प्रेरणा

शुभ हृदये

कुछ ग़ैर-बांग्ला भाषी कवियों ने भी बांग्ला में हाइकु रचनाओं के लिए अपनी क़लम चलाई है. इनमें से एक दरोग़ा शर्मा शैलशिखर हैं उनका पक्षियों के सौंदर्य और उनकी गतिशीलता को रेखांकित करता एक हाइकु दृष्टव्य है –

ई रुख छेड़े

कोथाय जांवे पांखी

दूर गगने

गोपी कृष्ण भक्त एक जाने माने हिंदी हाइकु रचनाकार हैं लेकिन बांग्ला में भी उन्होंने कुछ रचनाएं की हैं. बांग्ला के हाइकु कवि प्रमुख रूप से प्रकृति चित्रण और ऋतु संकेत को वरीयता देते हैं और इस अर्थ में वे हाइकु काव्य की मूल प्रवृत्ति से जुड़ने की कोशिश करते हैं. किंतु गोपी कृष्ण भक्त का हाइकु-संसार प्रकृति के इतर विचार को भी प्रधानता देता प्रतीत होता है. उनके निम्नलिखित हाइकु में भारतीय दर्शन का आलोक है -

मिथ्या आकाश

मिथ्या ना ही जगोत

मिथ्या तृष्णा है.

इसी प्रकार एक अन्य हाइकु में पुरुषार्थ को प्रणाम करते हुए वे कहते हैं कि मेरे सामने धूल से भरा जो दृश्य है उसे मै पोंछ डालूंगा ‌‌‌-

धुले ते भरा

सामने ते दृश्यो

पुंछे केलवो.

उड़ीसा में बोली जाने वाली ओड़िया भाषा में हाइकु कविताओं के लिए जिन दो महिला रचनाकारों ने अपनी पहचान बनाई है ,वे हैं- सुज्ञानी मंजरी नेमा तथा आनंती शत्पथी बिंदु. ओड़िया बहुत कुछ बांग्ला के क़रीब है. इसमें बांग्ला की सम्वेदनशीलता भी है. इसके अतिरिक्त उड़ीसा एक ऐसा राज्य है जिसमें ग़रीबी अपने चरम पर है. अपने राज्य की दरिद्रता से द्रवित सुज्ञानी मंजरी नेमा कहती हैं कि हाय रे विश्व तूने मुझे केवल ऐसी रेतीली धरती की ही अनुभूति कराई है जो मुझे धीरे धीरे सेंकती है –

हाय रे विश्व

देखाइलु तू मोते

मरु साहारा.

आनंती शत्पथी बिंदु स्त्रियों की दुःखी दशा को देखकर विह्वल हैं. उन्हें अफसोस है कि एक स्त्री अपने सिंदूर के लिए कुछ टकों में अपनी पूरी आयु बिता देती है. –

तुम सिंदूर

युक्ति किच्छी टंकार

ओ आयुष र.

और फिर भी उसे विरह में दिन काटने पड़ते हैं, यह कैसा प्रेम है? –

विच्छेद घांटे

तुम पाखेर थाई

एई की प्रेम

सम्पर्क छूट जाता है, आंखें बरसने लगती हैं और कोख गुमसुम हो जाती है –

संपर्क हुड़े

बरसी जाये आखी

गर्भ गुमुटे

पंजाबी भाषा हिंदी के काफी नजदीक है और इसमें भी हाइकु लेखन खूब हुआ है कश्मीरी लाल चावला अपनी "अदबी परिक्रमा" और "अदबी माला" जैसी पत्रिकाओं में हाइकु लेखन को खूब प्रोत्साहित कर रहे हैं. चावलाजी ने अपनी हाइकु कविताओं में राजनैतिक स्थितियों पर अच्छे कटाक्ष किए हैं. उनका इसी तरह का एक हाइकु है जिसमें वे कहते हैं भारत में चुनाव ख़त्म हो जाने के बाद जिंसों के भाव बढ जाते हैं और इसी का नाम प्रगति है -

चैना खत्म

जिंसा दे भाउ बघे

प्रगति होई.

डॉ ओ पी गुप्ता और सत्यानंद जावा ने भी पंजाबी भाषा में हाइकु के अच्छे नमूने प्रस्तुत किए हैं. रात्रि के समय आकाश देखकर गुप्ता जी के उद्गार कुछ इस प्रकार हैं –

नभ भरिमा

तारिआं दे नाल ही

गल चां दी

इसी प्रकार सत्यानंद जावा भी कहते हैं कि वसंत ऋतु के समय जब आमों पर बौर आ जाता है तो ऐसे में स्त्रियां अनायास ही नाचने लगती है और आंगन जगमगाने लगता है.

नच्चन नारां

अम्मी ते पया बूर

बेडेच नूर

उर्मिला कौल हिंदी की एक जानी-मानी हाइकुकार हैं लेकिन केवल हिंदी में ही नहीं पंजाबी और अंगरेज़ी में भी उन्होंने हाइकु कविताएं रची हैं. उनकी कविताओं में प्रकृति चित्रण तो है ही उनके कई हाइकु ऋतु संकेत से भी युक्त हैं. वे अपने आस-पास के दुःख-दर्द के प्रति भी सम्वेदनशील हैं वे अपनी सखी से कहती हैं आओ हम-तुम मिल-जुलकर रो लें –

आनी अडिए

रल मिल बहिए

हंजू बंडिए

इसी प्रकार अपने एक अन्य हाइकु में वे कामना करती हैं कि फूल खिलते रहें और तवों पर रोटियां नाचती रहे. जीवन हंसता रहे.

फुल्ल खिड़दे

तवे ते नच्चे रोटी

जिंदड़ी हस्से

मराठी भाषा में हाइकु का प्रारम्भ शिरीष पै ने किया. आज वे मराठी की सर्वश्रेष्ठ हाइकुकार मानी जाती हैं. मराठी-हाइकु त्रिपंक्तिक तो बेशक है किंतु अधिकतर उनमें अक्षरों की संख्या आदि, का बंधन स्वीकार नहीं किया गया है. मराठी के प्रथम पंक्ति के कुछ अन्य हाइकुकारों में शिरीष पै के अतिरिक्त पूजा मलुष्टे, मनोहर तोड्णकर, बाल राणे, ऋचा गोडबोले, मेघना साने, वृन्दा लिमये, राजन पोल तथा महमूद सारंग आदि हैं. शीरीष पै और मनोहर तोडकर की हाइकु रचनाओं में एक उदासी का स्वर है किंतु इस दुःखमय संसार से फिर भी उन्हें नैराश्य नहीं है. शिरीष पै सभी प्राणियों को उदास देखती हैं और यह समझ नहीं पातीं कि यह उदासी आखिर क्यों है?

सगले प्राणी

उदास का दिसतात

कोणते दुःख गिलतात

इसी प्रकार मनोहर तोडकर नीले पक्षी को ग्रीष्म में तपता देखते हैं,पर वह गाना गा रहा है –

ग्रीष्म तापल्यावर

ऊन रखर खतंय

तरीही निला पक्षी गातोय

पूजा मलुष्टे ने कुछ बहुत ही सुंदर प्रकृति के चित्र प्रस्तुत किए हैं. उनकी एक रचना है-

चंद्र का बिम्ब

जैसा साफ नभ में

वैसा जल में

श्याम खरे जिन्होंने पूजा मलुष्टे के उपरोक्त हाइकु का हिंदी अनुवाद किया है, स्वयं मराठी भाषी हैं किंतु हिंदी में हाइकु कविताएं लिखते हैं, मराठी में तो खैर लिखते ही हैं. वे हाइकु लिखने के लिए छंद-अनुशासन के पालन को आवश्यक मानते हैं और उनकी सभी रचनाएं हाइकु छंद की अक्षर-गणना में खरी उतरती हैं, बल्कि मराठी हाइकु कविताओं के उनके अनुवाद में भी उन्हों ने ५-७-५ का ख्याल रखा है.

जो रचनाकार गुजराती भाषा में हाइकु लिख रहे हैं उनमें कुछ महत्वपूर्ण नाम इस प्रकार हैं – झीना भाई देसाई, स्नेहरश्मि, कमल पुंजाणी, डॉ. धीरू मोदी, रवींदर यादव, प्रियंका कल्पित और ईश्वरभाई पटेल.

स्नेहरश्मि का एक हाइकु है कि जिसमें वे कहते हैं, फूलों ने तो सारी रात अपनी महक लुटाई और इस प्रकार वे अपनी बात करते रहे किंतु भंवरा चुप रहा.

रजनी आखी

फुलडे की थी बात

भमरो मूंगो

भगवत शरण अग्रवाल ने इसके अनुवाद में “रजनी” के लिए “शर्वरी” शब्द का उपयोग किया है जिससे रात ने एक नायिका का रूप धारणकर लिया है जो मिलन के लिए आतुर है किंतु उसका प्रेमी ध्यान नहीं देता.

सारी शर्वरी

फूल ने तो बात की

भंवरा चुप.

ऐसे में कमल पुंजाणी ठीक ही यह प्रश्न करते हैं कि ये खुशबू के जाम आखिर किसके लिए खुशियां छलका रहे हैं,

कोना नामे आ

खुशियों छलकावे

खुशुबूना जाम?

धीरू मोदी, रवींदर यादव, और प्रियंका कल्पित ने भी प्रकृति को अपना विषय बना कर कुछ सुंदर हाइकु रचे हैं. किंतु ईश्वरभाई पटेल के प्रकृति-चित्रण में एक दार्शनिक और चिंतनपरक आयाम भी जुड़ जाता है –

(1‌) खीलतां पुष्प

भमता पतंगिता

चूसातुं रस

(खिलते पुष्प /मंडराती तितली/ चुसाते रस)

(२) तृषातुर कंठ

अफाट सरोवर

नैने मृगजल

(त्रिशातुर कंठ /अपार सरोवर / दीदे मृगजल)

उर्दू और हिंदी भारत की दो ऐसी जुड़वां भाषा-भगनियां हैं जिनमें कभी कभी अंतर कर पाना कठिन हो जाता है. फिर भी दोनों का अस्तित्व अलग है और उनकी स्वतंत्र अस्मिता भी बचा कर रखी गई है. हिंदी के कई हाइकुकारों ने उर्दू में भी लिखा है और तथाकथित उर्दू हाइकु-रचनाओं की गणना यदि हिंदी में कर ली जाए तो संख्या और भी बढ़ जाएगी.

राधेश्याम हिंदी, अंगरेज़ी और उर्दू . तीनों ही भाषाओ में हाइकु रचते हैं. उनके उर्दू के कुछ हाइकु इतने नफीस हैं कि बिना दाद दिए रहा नहीं जाता.

तेरी बाहों में

सर्द तन्हाई गाती

आतिशी नगमें

किया दीदार,

तो खो गए दीदा ही

डरे दीदा पे *

फिरोजा हुए

जले दिल के दाग

चश्में तर से *

उर्दू की अधिकतर हाइकु रचनाएं प्रेम कविताएं हैं. ये उर्दू साहित्य के मिज़ाज के माफिक है. डॉ. जीवन प्रकाश जोशी की उर्दू रचनाएं भी इसी मुख्य धारा में हैं

उम्र की खिज़ां

बेवफा नहीं, सदा

हम सफर

लेकिन ज़ाहिर है इसमें एक दार्शनिक टिप्पणी भी है.

हरी दिलगीर ने सिंधी-भाषा में कुछ सुंदर हाइकु लिखे हैं. उनकी रचनाओं में हाइकु को एक त्रिपदी के रूप में स्वीकारा गया है किंतु हाइकु छंद के अक्षर अनुशासन 5-7-5 को अनदेखा किया गया है. हरी दिलगीर की रचनाएं बहुत नाज़ुक मिज़ाज और कोमल अनुभूतियों से युक्त होती हैं. आपने एक हाइकु में एक ऐसे पौधे का ज़िक्र किया है जिसके सब पत्ते झर चुके हैं और जो आकाश की ओर शिकायत भरे लहज़े में ताक रहा है

ठोड़हो ठोड़हो वणु

खणी अखियूं आकास डे

करे शिकायत जणु.

दक्षिण भारत में तमिल, तेलगू, मलयालम और कन्नण भाषाएं बोली जाती हैं. किंतु यहां तेलगू में विशेषकर हाइकु रचनाएं हुई हैं. दो नाम उल्लेखनीय हैं, नालि नासर रेड्डि और पिडपर्ति वैंकटराम शास्त्री. नालि नासर रेड्डि अधिकतर हाइकुकारों की तरह अपनी रचनाओं में प्रकृति का सम्वेदनशील चित्रण करते हैं. अपने एक हाइकु में उन्होंने प्रकृति में सागर और आकाश के क्रमशः शोर और मौन का एक सुंदर विरोधाभास प्रस्तुत किया है –

कदलि हूरू

दूरंगा गगननं लो

तारल मौन.

इसका हिंदी अनुवाद हुछ इस प्रकार किया जा सकता है,

सागर घोष

पर दूर गगन

मौन हैं तारे

पिडपर्ति वैंकटराम शास्त्री के हाइकु सामाजिक चेतना से युक्त हैं और उनमें सामाजिक असामानता के विरुद्ध स्वर स्पष्ट है.

वरि वेन्नुलु

पिपस्तायि रैतुनी

अप्पुला ललनी

(पकी बालियाँ / बुलाती किसान को / महाजनों को )

भारत की सभी भाषाओं का उद्गम संस्कृत भाषा में ही माना गया है. आज यद्यपि संस्कृत भाषा किसी भी राज्य में सामान्यजन द्वारा बोली नहीं लाती लेकिन भारत का कोई भी प्रांत ऐसा नहीं है जहां संस्कृत प्रेमी विद्वान न हों. आज संस्कृत में इतना साहित्य रचा जा रहा है जितना शायद भारत में पहले कभी नहीं रचा गया हो. नाटक, कहानियां और कविताएं तो लिखी ही जा रहीं हैं, हाइकु भी रचे जा रहे हैं .डॉ. हर्षदेव माधव तथा पिडपर्ति वैंकटराम शास्त्री कुछेक अच्छे संस्कृत हाइकुकार हैं. इनकी कविताएं चिंतन परक होते हुए भी अत्यंत सम्वेदनशील हैं. –

नग्न पादेन

धावति में विषाद

तप्ते हृदय * (डा. हर्षदेव पाठक)

महादाकाश

अकाल ज़रा शीर्ण

पालित केशा * (डा. पि.वें.शास्त्री)

कुछ मूलतः हिंदी हाइकु कवियों ने संस्कृत में भी हाइकु रचनाएं की हैं. सूर्यदेव पाठक और रामनिवास पंथी ने अपने संस्कृत हाइकुओं का स्वयं ही हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत किया है और दोनो ने ही हाइकु अनुशासन का भी पूरा-पूरा पालन किया है –

चपल चपलया

अहो, विकीर्ण उरो

विस्तृत नभो (रामनिवास पंथी)

(बिजी कौंधी / फट गई छाती / पूरे नभ की )

इसी प्रकार सूर्यदेव प्रकाश के हाइकुओं में सम्वेदना तो है ही, पर उनमें व्यंग्य का स्वर भी देखा जा सकता है,

श्रोतारः काकाः

पराजिता काकेन

अद्य कोकिला

(श्रोता हैं कौवे / कौवे से पराजित / आज कोयल ) -------------------------------------------------------------------------------------------------------------

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०,एच आई जी / १,सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग – surendraverma.blogspot.in

Mail – surendraverma389@gmail.com

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