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हिंदी में हाइकु (१६) वाका / तांका रचनाएं - डा. सुरेन्द्र वर्मा

‘वाका’, या आधुनिक भाषा में, ‘तांका’ एक बहुत प्राचीन काव्य-रूप है. डॉ. अंजलि देवधर ने 100 वाका कवियों की 100 रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया है. यह अनुवाद उन्होंने 2007 में प्रकाशित करवाया. बेशक यह अनुवाद मूल जापानी से न होकर उसके अनुवाद का हिंदी में रूपांतरण है. ये वाका-रचनाएं 7वीं से 13वीं शताब्दी में लिखी गई कविताएं हैं. डॉ. देवधर द्वारा अनुवादित वाका कविताओं के प्राक्कथन में डॉ. जगदीश व्योम, संपादक, ‘हाइकु दर्पण’ ने बहुत ठीक ही कहा है कि वर्तमान समय की अनेकानेक उपलब्धियों में एक मह्त्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि विश्व के तमाम देश एक दूसरे के निकट आ रहे हैं, आपस में एक दूसरे के विचार, सांस्कृतिक मूल्य, परम्पराएं, भाषा, साहित्य आदि, को समझने का प्रयास कर रहे हैं. साहित्य के क्षेत्र में यह परिवर्तन स्पष्ट देखा जा सकता है.

एक समय था जब भारतीय साहित्य की खिड़्की सिर्फ अंगरेज़ी साहित्य की ओर ही खुलती थी. विश्वविद्यालयों में जो रोमेंटिक पोएट्री पढाई जाती थी उसने यहां के साहित्यकारों को ख़ासा प्रभावित किया था. इस प्रभाव को छायावादी-रहस्यवादी काव्य में स्पष्ट देखा जा सकता है. आज़ादी के बाद भारत ने अपनी पड़ोसी संस्कृतियों और साहित्य पर भी ध्यान देना शुरू किया और इस प्रक्रिया में जापानी हाइकु की ओर भी ध्यान गया. अज्ञेय के माध्यम से हाइकु ने हिंदी साहित्य में प्रवेश किया. और आज जैसा कि हम सब देख सकते हैं हिंदी में काव्य की यह हाइकु विधा खूब प्रचलित हो गई है.

जापान की इस काव्य विधा में रुचि लेने के कारण साहित्यकारों ने हाइकु के इतिहास को भी खंगाला. पता चला कि कविता का यह फोर्म एक बहुत प्राचीन काव्य-विधा वाका से निष्पादित हुआ है. वाका का अर्थ ही जापानी कविता या गीत है. “वा”, अर्थात जापानी और “का” अर्थात् गीत. ध्यातव्य है कि वाका पांच पंक्तियों की तेरह अक्षरों वाली कविताएं हैं जो 5-7-5-7-7 में आयोजित की जाती हैं. बाद में इन्हीं कविताओं की प्रथम तीन पंक्तियों के आकार को स्वीकार कर हाइकु कविताओं का रूप विन्यास 5-7-5 प्रतिष्ठित हुआ. आज भारतीय भाषाओं में यह हाइकु विधा खूब प्रचलित है. प्रसन्नता की बात यह है कि अब वाका कलेवर की रचनाएं भी सामने आने लगी हैं.

डॉ. अंजलि देवधर ने जिन जापानी कविताओं (वाका) का अनुवाद हिंदी में किया है उसकी दो बड़ी सीमाएं हैं.एक तो यह कि अनुवाद मूल जापानी से न होकर उसके अंगरेज़ी रूपांतर का अनुवाद है. इसमें मूल कविताओं की कहां तक रक्षा हो सकी है, कुछ कहा नहीं जा सकता. दूसरे इसमें वाका का ढांचागत अनुशासन का अनुपालन नहीं हुआ है. अंगरेज़ी से अनुवादित सामग्री का लगभग शब्दानुवाद-सा हो गया है. मुझे लगता है कि यदि कविता की भावना को ध्यान में रखकर उसे वाका के अक्षर-अनुशासन में रचा जाता तो बेहतर होता. मैं अपनी इस टिप्पणी से डॉ. देवधर के प्रयत्न को कमतर नहीं करना चाहता. उन्होंने वाका विधा का हिंदी से परिचय कराया, यह वंदनीय है.

13वीं शताब्दी से पहले की वाका या तांका रचनाएं मुख्यतः राजदरबार की कविताएं हैं. ये सहज न होकर बहुत कुछ क्रत्रिमता ओढे हुए हैं. किंतु इनमें वे कविताएं जो

वैयक्तिक भावनाओं को सरलता से प्रकटकर जाती हैं बहुत अच्छी बन पड़ी हैं,‌‌-

समुद्र तट

दहाड़ती लहरें

घिरती रात

अनुपस्थित है तू

फिर भी मेरे पास

हर चौखट

भटकता रहा मैं

तुम्हारे लिए

नगर में वन में

आग में,बरफ में

इतना वृद्ध

की छोड़ गए मित्र

सारे के सारे

बरगद पुराना

नहीं देता सांत्वना

वासंती दिन

हर जगह शान्ति

चेरी के फूल

क्यों अशांत होकर

यत्र तत्र बिखरे

(रूपान्तारण –डा. सुरेन्द्र वर्मा)

हिंदी में मौलिक तांका 2002 से ही लिखे जाने लगे थे. इन्हें सर्वप्रथम सम्भवतः डॉ. सुधा गुप्ता ने लिखा. स्वतंत्र तांका संग्रह के रूप में डॉ. उर्मिला अग्रवाल के दो संग्रह 2009 और 2010 में आए. मनोज सोनकर का एक संग्रह 2011 में प्रकाशित हुआ. स्वतंत्र संकलनों के अलावा कई हाइकुकारों के हाइकु-संकलनों में तांका को भी स्थान मिला. कई मासिक पत्रिकाओं में भी वे छपते रहे. इसी वर्ष (2012) में विश्व के 29 कवियों के 500-600 ताकाओं का एक संग्रह रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ और भावना कुंवर के संपादन में प्रकाशित हुआ. इसी वर्ष प्रकाशित होने वाले दो तांका संग्रह इस समय मेरे सामने हैं. डॉ. मिथलेश कुमारी मिश्र का “मुखर हुए शब्द” तथा रमाकांत जी श्रीवास्तव का “जिएं जीने दें”. ये दोनों ही संग्रह जापानी भाव-भूमि को बहुत पीछे छोड़ आए है. और ठेठ भारतीय तेवर और अंदाज में लिखे गए हैं. इनमें वर्तमान सामाजिक और प्राकृतिक परिवेश के लिए जहां चिंता मिलती है वहीं आशा और विश्वास हिम्मत और हौसला भी परिदर्शित है.

डॉ, मिथलेश कुमारी मिश्र की तांका रचनाएं मुख्य्तः वर्तमान हालात पर तीखी टिप्पणियां हैं. किंतु इनमें हौसला भी कम नहीं है. कितनी अजीब बात है कि आज मनुष्य जो बोलता है तो यक़ीन नहीं होता कि वह सच बोल रहा है. जो तथाकथित मित्र हैं, वे ठीक उस समय जब हम उड़ने के लिए तैयार होते हैं हमारे पर काटने से बाज नहीं आते. पहले तो एक ही रावण था आज तो हमारे समाज में हर मोड़ पर अनेक रावण पैदा हो गए हैं राजनीति का हाल बुरा है. ऐसा लगता है मानों मेमने की सुरक्षा के लिए भेड़िए खड़े कर दिए गए हैं.

पता नहीं क्यों

दोस्त की चाल

झूठ लगती यकीन नहीं होता

सच बोलेंगे

छली जा रही

हर मोड़ पर सीता

आजाओ राम

अब एक नही है

अनेक हैं रावण

वे भेडिए हैं

नहीं कर सकते

किसी दशा में

मेमनों की सुरक्षा

झांसे में नहीं आना

ऐसे हालात के बावजूद डॉ. मिथलेशकुमारी मिश्र अपना हौसला नहीं खोतीं. कुछ भी हो जाए, सामने वाला हमारा भरोसा खंडित ही क्यों न कर दे, विश्वास नहीं छोड़ना चाहिए. आंधियां आखिर कबतक चलेंगीं? दीपक जलाए रखना है. यदि हममें साहस है तो हम अपनी राह बना ही लेंगे. बस्ती बसा ही लेंगे. कागज की नावें तक हौसले से तैरती हैं

भले ही बुझे

आंधियों में भी जला

तू दीप सदा

वो तो रुक जावेंगीं

तू न रुकना कभी

पानी की नाव

कागज़ की चलाएं

देख के हम

ये उनके हौसले

हैरां परेशां हुए

विपरीत हालतों में डॉ. मिश्र के हौसले की बेशक प्रशंसा करनी होगी. किंतु कहीं यह न समझ लिया जाए कि मिथलेश जी में स्त्रियोचित कोमल भावनाओं की कोई कमी है. प्रेम उनके लिए केवल शब्द ही नहीं है, यह वह भावना है जो जीवन के हर पड़ाव में शुरू से अंत तक बनी रहनी चाहिए. जरूरी नहीं कि प्यार सदैव व्यक्त ही किया जाए उसे तो बिना कहे भी आंखों में पढा जा सकता है. कितनी ही तरह से तो प्यार स्वयं को अभिव्यक्त करता है –

पढ लिया है

मैंने तेरी आंखों मे

छिपा वह सच

कहा नहीं तूने जो

जुबां से आजतक.

मेरे जाने पे

उसकी आंखें भीगीं

तो यक़ीन आया

उसको भी मुझसे

सचमुच प्यार है

इच्छा यही है

प्यार से शुरू होकर

जिंदगी बीते

प्यार के पड़ावों का

अंत भी प्यार है

डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव एक जाने माने हाइकुकार हैं. आज नव्वे-पार की उम्र में भी उन्होंने तांका रचने की चुनौती स्वीकार की. उन्हें तांका लिखने के लिए सुप्रसिद्ध रचनाकार रामेश्वर कम्बोज हिमांशु ने प्रेरित किया. हिमांशु जी एक तांका-संकलन प्रकाशित करना चाहते थे और उसमें समाविष्ट करने के लिए उन्होंने डा. श्रीवास्तव से १०-१२ तांका चाहे. रमाकांत जी ने कहा, मेरे पास तांका रचनाएं नहीं हैं. तो वे बोले, लिख डालिए. आप लिख सकते हैं. एक सप्ताह में भेज दीजिए. रमाकांत जी ने चुनौती स्वीकार की और कुछ तांका लिख डाले. लिखे तो लिखते ही चले गए. इन्हीं रचनाओं का संकलन, ‘जियें, जीने दें’, नाम से प्रकाश में आया.

डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव स्वयं ही कहते हैं कि इस संग्रह की रचनाएं युगीन सामा-

जिक, राजनैतिक, वैचारिक तथा मानवीय धराअल की स्थितियों-परिस्थितियों के सापेक्ष उद्भूत हैं. ये रचनाएं न केवल मानवीय मूल्यों का सम्मान करती हैं बल्कि समाज में इन्हें अपनाए जाने के लिए प्रेरित भी करती हैं. रमाकांत जी के पथ-प्रदर्शक महात्मा गांधी हैं और गांधीवादी मूल्यों की स्थापना ही उनका साहित्यिक अभीष्ट है,

इस युग में

ईश ने जन्म लिया

गांधी के रूप में

उन्हीं की याद करें

उन्हीं की राह चलें.

इसीलिए डॉ. श्रीवास्तव की अधिकतर रचनाएं निर्देषात्मक हैं. उनमें हिदायतें ख़ासी मात्रा में मिलती हैं – मानव बनें रहें, विदेश न भागो, जागो जगाओ, मां से बढकर देवी कौन कहां है उसको पूजो, समभाव में ढाल जीवन जिएं, ऊर्धगामिता चढो, संतोष करो, पालो मत इच्छाएं, कहां जा रहे हो- माया बड़ी ठगनी, गांव को पूजो वही है अन्नदाता, पेड़ जीव हैं प्यार दो भरपूर, हुतात्माओं की भूलो नहीं क़ुर्बानी, देशको बचाना है, इत्यादि.

सिर्फ हिदायतें ही नहीं. ‘जिए, जीने दें’ की रचनाओं में समाज और परिवेश सम्बंधी गम्भीर चिंताएं भी हैं. राजनीति का विकृत चेहरा भी है –

बन चुका है

राजनीति का क्षेत्र

शरण स्थल

अपराधी रहते

अपराध करते.

हालात कुछ

ऐसे बने हैं कि ,

न तो अर्जुन

नही मधुसूदन

जीवन कुरुक्षेत्र

समाज और राजनीति के अतिरिक्त कई रचनाएं प्रकृति और पर्यावरण सम्बंधी चिंताओं से भी हमें अवगत कराती हैं कि हम इन्हें बचाने के लिए सदा प्रयत्नशील रहें –

क्यों है ख़तरा

आंगन के पंछी को

विलुप्त हो रहा

पंछी को बचाना है

आंगन को सजाना है

कवि कामना करता है,

कृष्ण युग में

वंशी वट बने थे

करील वन

ये कभी न उजड़ें

ये रहें हरे खड़े

और कोयल को आह्वान करता है,

कोकिला आओ

आ, राग सुनाओ

देर क्यों करो

तुम्हीं तो बहार हो

बीन की झंकार हो.

कवि को पूरा विश्वास है,

दिन ढलता

जीवन ज्यों ढलता

झुकती सांझ

रात यदि आएगी

चांदनी भी छाएगी

इतना ही नहीं, वह भ्रष्ट व्यवस्था को ललकारता है और कहता है –

शक्तिशाली हैं

दीन जनों की आहें

ढातीं व्यवस्था

पालो नहीं भ्रांतियां

जन्मती हैं क्रांतियां

डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव शतायु हों और उनकी यह तेजस्वी वाणी हम सबको, इस फैले हुए अंधकार में, प्रकाश दे, यही कामना है.

- डा. सुरेन्द्र वर्मा १०, एच आई जी/ १, सेकुलर रोड इलाहाबाद -211001

- Blog- surendraverma389.blogspot.in

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