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नहीं रहेगी दाह संस्कार की जरूरत - डॉ. दीपक आचार्य

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भयावह और भीषण गर्मी ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर रखा है। धरती पर रहने वालों से लेकर उभयचर, नभचर और छिछले पानी वाले जलचर सारे त्रस्त हो उठे हैं। हों भी क्यों न। जैसी करनी वैसी भरनी।

गर्मी से संतुलन बिठाने वाले सारे कारक समाप्त होते जा रहे हैं। हमने न पानी के धामों को छोड़ा न हरियाली भरे पहाड़ों को। जितना शोषण हम कर सकते थे, खुलेआम किया और पूरी उन्मुक्तता के साथ यह सोचकर कि हम ही हैं, हमारे बाद दुनिया का कोई वजूद नहीं। और इसी कारण जहां से जो लिया जा सकता था हमने लूट लिया।

प्रकृति से छेड़छाड़ ही नहीं बल्कि हमने जो कुछ किया है और कर रहे हैं वह गैंग रेप की श्रेणी में आता है। हम अकेले ही ऎसे नहीं हैं। खूब सारे लोग हैं जिन्हें केवल गांधी छाप ही दिखते हैं और इन्हें पाने के लिए कुछ भी कर सकने को स्वतंत्र-स्वच्छन्द हैं। कोई रोकने-टोकने या पूछने वाला नहीं है। पूछे भी क्यों, और किससे पूछे। जब सारे के सारे बेशर्म और आदतन लूटेरे बने हुए हैं।

एक अकेले सूरज की तपन होती तो बात और थी। आजकल वैश्विक गर्मी का दौर चल रहा है।  पैसों की गर्मी, यौवन और सौंदर्य की गर्मी, जमीन-जायदाद और हराम की कमाई की गर्मी, किसी की दया से प्राप्त हो गए या जबरन हथिया लिए गए पदों की गर्मी, नाते-रिश्तेदारों और ऊँचे रसूखदारों की गर्मी, चाहे-अनचाहे प्राप्त हो गई लोकप्रियता और अहंकार की गर्मी, बड़े और महान होने या उनके साथ रहने, खाने-पीने, उनका संसर्ग पाने, किसी न किसी के आदमी या खास कहे जाने की गर्मी, लाल-पीले-हरे और बहुरंगी कार्ड्स की ऊष्मा, माँसाहार और देशी-विदेशी दारू की गर्मी, चमकदार चमड़ियों की गर्मी, हौदों और जात-जात के ओहदों की गर्मी, लाल-पीली-नीली बत्तियों की गर्मी, मुफतिया माल पर मौज उड़ाने से चढ़ती जारी चर्बी की गर्मी से लेकर जाने कैसी-कैसी गर्मी हम पर चढ़ रही है।

इतनी सारी गर्मियों का एक साथ घालमेल पुराने किसी युग में नहीं रहा,  लेकिन अब ग्लोबल वार्मिंग की धमक है। सारे जीव इस गर्मी से त्रस्त हैं लेकिन उन लोगों की संवेदनाएं कभी नहीं जगती हैं जो कि इसके लिए जिम्मेदार हैं।

पूरी दुनिया दो भागों में बंट गई है। एसी और नोन एसी। कितना अच्छा हो यदि इन एयरकण्डीशण्ड के आदी लोगोंं के एसी, पंखे और कूलर रोजाना कुछ घण्टों या दिनों के लिए बंद कर दिए जाएं । फिर देखियें चमत्कार और चीत्कार। मजा तो तब है कि जब छीन ली जाए इनकी मशीनी शीतलता।

जो लोग पर्यावरण रक्षा और पेड़ लगाने पर भाषण झाड़ते हैं, पेड़ों की बातें करते हैं, उन्हें बंद एसी सभागारों और होटलों की बजाय खुले जंगल में बोलने को कहा जाए। प्रकृति से सब कुछ मुफत में पा रहे हैं लेकिन इसके लिए कुछ करने का मन नहीं है।

दुनिया में इंसान से अधिक कृतघ्न कोई नहीं हो सकता। जंगल से जीवन पाने की बजाय हम सारे के सारे जंगली होते जा रहे हैं, इस तथ्य को स्वीकारें। टूट चुका प्रकृति के धैर्य का बाँध। अब भी समय है हम सब चेत जाएं वरना आने वाला समय ठीक नहीं। सारी गर्मी छंट जाने वाली है। कहीं ऎसा वक्त न आ जाए कि हम लकड़ियों के बिना ही  जल मरें।

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