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कहानी संग्रह - अपने ही घर में / माई बाप : सुगन आहूजा

माई-बाप

सुगन अहूजा

चालीस साल का दुर्बल रामू लड़खड़ाता हुआ पेड़ के नीचे उठ खड़ा हुआ, लाठी के आधार पर वह अपनी झोंपड़ी की तरफ़ सरकने लगा। सामने पेड़ से एक नन्हा पक्षी, फड़कता हुआ उनके सर के ऊपर से गुज़रकर, आसमान की ओर उड़ा। रामू ने गर्दन घुमाकर पक्षी को देखा, पर वह उसे सिर्फ़ एक पल के लिये ही देख पाया, दूसरे पल वह पक्षी आसमान की ऊँचाइयों में ग़ायब हो गया और वह बेमतलब आसमान की ओर देखता रह गया। यकायक, बदन में एक ठंडी सिरहन के साथ, उसे एक ख़याल आया... मौत का! क्या उस पंछी की फड़फड़ाहट में उसके लिये मौत का पैगाम तो नहीं था ! उसके होठों पर फीकी-सी मुस्कराहट आकर ठहर गई। भला, ये भी कोई नई बात होगी क्या? गुज़रे कितने हफ़्तों से मौत, नसीब और भगवान के ख़याल के सिवाय और कोई ख़याल उसके पास फटका भी नहीं है।

हाँ, दूसरा भी एक ख़याल ज़रूर है जो उस अर्से में कभी-कभी उसके छोटे गंवार दिमाग पर भूत की तरह सवार रहा है, मुखिया के गोदाम पर धावा बोलने का। ऐसे ख़्याल के वक़्त शुरू में उसकी नसें ज़्यादा तन जाती थीं, सांस तेज़ और गर्म हो जाती थी। उस वक़्त तसव्वुर ही तसव्वुर में गोदाम के पहरेदारों में से चार-पाँच को अपनी लम्बी और मज़बूत लाठी से घायल करके ज़मीन पर पछाड़ देता था। पर सिर्फ़ चार-पाँच को, ज़्यादा को नहीं। हाँ, एक दो बार तसव्वुर पर ज़ोर देकर उसने छः-सात पहरेदारों को जख़्मी कर दिया, पर फिर बाकी पहरेदारों के हाथों खुद भी लहूलुहान होकर ज़मीन पर गिर पड़ा था और उस दिन के बाद वह मर गया था शायद, जब भनक पड़ते ही उसे जेल भेजा गया। मतलब तो उसकी मज़बूत बाहें अकेले कभी मुखिया के गोदाम पर हमला न कर पाईं, अनाज की एक गोनी भी हासिल न कर पाई थी और आजकल तो उसकी निर्बल बाहों के लिये ऐसा गँवार जांबाज़ तसव्वुर भी संभव नहीं था।

हिन्दुस्तान के गँवार गाँव वाले जब कभी ज़िन्दगी और मौत के बीच में लड़खड़ाते हैं, तब सिर्फ़ क़िस्मत खराब होती है या भगवान उनसे रूठ जाता है। रामू ने एक खुश्क मुस्कराहट के साथ ऊपर आसमान की ओर निहारा और चींटी को कण और हाथी को मन देने वाले जगत-पिता, अन्न-दाता भगवान से मुख़ातिब होकर कहा- ‘भगवान, अगर भूख से बेहाल करके चालीस बरस में मारना था तो मुझे पैदा करने की तकलीफ क्यों की? मेरा बाप इस उम्र में दस रोटियाँ एक ही वक़्त में खाता था, जब उसकी सारी पलकें सफ़ेद हो गईं थी तब भी वह छः रोटियाँ आराम से खाता रहा। क्या मेरे लिये तुम्हारे पास दो रोटियाँ भी नहीं हैं ? मेरे मासूम बच्चों के लिये एक रोटी भी नहीं है ? सारे गाँव के मासूम बच्चे भूख से तड़प रहे हैं, उनपर तुम्हें दया नहीं आती ? गुज़रे हफ़्ते गाँव में दस आदमी मर चुके हैं, अभी तक रहम नहीं आता ?’

पर आसमान या भगवान की ओर से आकाशवाणी के रूप में कोई भी जवाब नहीं आया और धुंधलकी शाम के अंधेरे में दूर-दूर कहीं कुछ सितारे बदस्तूर बेपरवाही से आँखें टिमटिमाते रहे।

लाठी के आधार पर लड़खड़ाता रामू अपनी झोपड़ी के पास पहुँचा तो उसे अजीब लगा। ग़रीबों के झोपड़ों के द्वार भी कभी बंद रहे हैं ? दो हांडियों और एक चटाई को भी कहीं चुराए जाने का खौफ़ रहा है, वह भी शाम के वक़्त। आजकल उसका परिवार भी और परिवारों की तरह मौत के साये में जी रहा था।

दरवाज़ा खड़का और दरवाज़ा खुला, जिसके खुलते ही एक तेज़ ज़ायकेदार खुशबू आकर उसकी नाक से टकराई। रामू ने दो-तीन बार ‘सूं-सूं’ करके तसल्ली की, और उसकी नस-नस में ज़िन्दगी की हसरत दौड़ आई। बीवी को थैला देकर वह जलते हुए चूल्हे और चूल्हे पर रखी कढ़ाई की ओर लपका। पर उसकी खुशी में डूबी हुई आवाज़ ‘रोटी... रोटी...’ हलकी चीख में बदल गई। वह खुद को संभाल न पाया और ज़मीन पर गिर गया। गंगा, जिसने रामू के पीछे दरवाज़ा बंद कर लिया था, एक़दम रामू को ज़मीन से उठाने लगी, पर रामू दुखती-कराहती हड्डियों की परवाह न करते हुए ज़मीन पर बैठा रहा और खुश्क जबान से सवाल किया- ‘यह जीवन-रस किसने दिया है?’

‘सुनाती हूँ आप उठिये तो सही।’

पर रामू खुद ही चूल्हे की तरफ़ सरकता रहा और मैले कपड़े पर पड़ी दो गर्म रोटियों के ऊपर दोनों हाथ रखकर, फिर लेट गया। ज़मीन पर लेटे लेटे रोटियों को हाथों से लपेटते, खोलते, वह शायद भूल गया कि उसने सवाल किया था कि वह जीवन-रस किसने दिया है। या शायद अब उसे उस जवाब की ज़रूरत नहीं रही ? पर गंगा को थी, जिसने सुनाना शुरू किया ‘सुनते हो मुखिया के बेटे गोविंद के पांव में मोच आ गई है।’

‘हूँ ? हाँ... फिर, चलो अच्छा हुआ !’ सर थोड़ा ऊपर उठाकर रामू फिर गरम-गरम रोटियों को लपेटता, खोलता रहा। अब उसने नाक से दो-तीन लंबी सांसें ली।

‘बदरी प्रसाद आया था मुझे बुलाने मालिश के लिये।’

‘शामू ने, गोपू ने रोटी खाई है?’ सुना-अनसुना करते रामू ने पूछा।

‘जी हाँ, बहुत दिनों के बाद रोटी नसीब हुई, इस कारण खाने से ही एक नशा उन्हें घेरे रहा। खाते ही नींद आने लगी, अब सोए हैं।’

‘नहीं, नहीं, बाबा, मैं अभी जाग रहा हूँ, मुझे नींद नहीं आ रही है’ रामू के बड़े बेटे ने कहा।

‘क्यों शामू?’

‘बाबा, मैं सोच रहा हूँ कि कल नहीं तो परसों गोविंद का पैर ठीक हो जाएगा, फिर खाना कहाँ से लाएँगे ? उसके सिवा गाँव के और आदमी कब तक घास पत्तों पर जी सकेंगे ? इस गाँव में तीन दिनों में पाँच आदमी पेट के दर्द के कारण मरे हैं। कहते हैं बिहार के गाँव-गाँव का यही हाल है।’

‘सो जा !’ रामू ने प्यार से झिड़क दिया। उसे शामू की वह बेवक़्त की फिलासफी नहीं भाई। इस वक़्त उसे अपनी ही सोच का अंदाज़ भा रहा था। दो दिनों के लिये ही सही, ज़िन्दगी को या मौत को कुछ खींच तो सकते थे ! सिर्फ़ दो दिन ही क्यों ? दो दिन खाकर, दो हफ़्ते और भी मौत का इन्तज़ार किया जा सकता है। रोटियों को हाथ में दबाते, रामू सोच रहा था और उसी बीच सरकार, माई-बाप ज़रूर कोई न कोई बन्दोबस्त कर लेगी, थानेदार और मुखिया ने तो एक-दो का आसरा दिया है ...। पर वहीं रामू के चेहरे का रंग फीका पड़ गया, अपने आप से कह बैठा ‘पर वो तो यह एक दो दिन का आसरा, दो महीनों से देते रहे हैं और इसी बीच गाँव के दस आदमी जो तीन महीने पहले मुझ जैसे शेर मर्द थे, मर गए हैं। तीन मुझ जैसे शेर मर्द भूख में मर गए !’

‘पर रामू नहीं मरेगा’ उसने खुद से कहा और हाथ में लिपटी हुई रोटियों का एक बड़ा निवाला काटा। ‘हाँ रामू नहीं मरेगा, बस नहीं मरूँगा।’ खुद को भरमाते हुए, मुँह को चलाते हुए, आँखों को मटकाते हुए वह फुसफुसाता रहा।

यहाँ उसे गंगा की हाज़िरी का अहसास हुआ, जो टकटकी बाँधे उसे देख रही थी।

‘तूने भी खाई है न रोटी ?’ रामू ने पूछा।

‘तुम खाओ, मुझे भूख नहीं है। बदरी की बीवी ने ज़ोर करके खिलाया, आधी रोटी से ज़्यादा न खा सकी। डर था कहीं कुछ हो न जाए। बहुत दिनों के बाद ऐसे एक़दम से ज़्यादा खाया जाता है क्या ?’

‘पगली, दो-तीन रोटियाँ खाकर आतीं।’

‘हाँ, माँ खाकर आती ना !’

‘तुम, अभी तक जाग रहे हो ?’

‘हाँ बाबा, मैं अभी तक सोच रहा हूँ...!’

‘बांवले, अभी तक क्या सोच रहे हो ?’ रोटियों से एक और छोटा निवाला काटते रामू ने पूछा।

‘बाबा, सरकार को माई-बाप क्यों बुलाते हैं ?’

‘क्योंकि वह माँ-बाप की तरह सार-संभार लेती है।’

‘पर आपने खुद खाने से पहले अम्मा से हमारे बारे में पूछा, और अम्मा ने तो अभी तक खाया ही नहीं, क्या सरकार...?.’

‘जहन्नुम में जाय तेरी सरकार और उनके साथ तू भी। मैं पूछता हूँ इतनी गहराई से तुम सोचते ही क्यों हो ?’ और उसने तीसरा निवाला रोटी का लिया।

‘पर बाबा, मैं कहाँ जान बूझकर ये सब सोचता हूँ। भूख में खुद ही ऐसी बातें दिमाग़ में चली आती हैं।’

‘बहुत बड़ा दिमाग है न बांवले।’ रामू ने निवाला गले के नीचे उतारते हुए अपने ‘जहन्नुम’ की कही कड़वी बात पर प्यार का हलका रंग चढ़ाते कहा।

सचमुच शामू के साथ रामू का लगाव था, गांव के और गंवार जवानों की तुलना में शामू की समझ लासानी थी। शामू की इसी बात पर रामू को गर्व था। जैसे एक बाप को अपने सहारे पर नाज़ होता है, जिसमें शामू की दो मज़बूत बाहें भी शामिल थीं। उसे शामू के उस प्यार से भी प्यार था जो माँ और छोटे भाइयों पर भी निछावर हो जाता था। प्यार से कुर्बानी उत्पन्न होती है। यही कुर्बानी प्यार की गहराइयों को पार करके कभी-कभी तड़प भी उठती है इज़हार के लिये। रामू और गंगा का इस वक़्त यही हाल था। इज़हार की तड़प जब इन्तहा की ओर बढ़ी तो और कुछ न कहकर फ़क़त बेटे को ‘बावला’ ही पुकार सका। रामू ने गंगा की ओर देखा। उसने सबकुछ सुना था। उसके चेहरे पर गर्व और प्यार झलक रहा था। ‘माँ-बाप’ का गर्व और प्यार।

रामू कुछ सरककर गंगा के साथ सटकर बैठा। फिर ‘अधूरे इज़हार’ ने गंगा के कंधों पर बाहें डालीं, उन बाकी बची रोटियों वाली मुट्ठी उसके मुँह के आगे लाई, मुँह से लगाई और आहिस्ते आहिस्ते दबाता रहा। गंगा के सामने अब अपनी कुर्बानी का सवाल नहीं रहा था। आखिरी निवाला निगलते हुए जाने कितने सालों के बाद, गंगा ने रामू की ऊँगली को हलके से काटा। काटकर वह छलक उठी ! टप, टप, टप...आँसू, और फिर... सिसकियाँ।

शामू ने, पिता को माँ की तरफ़ सरकते देख, करवट बदल ली थी। सिसकियों की आवाज़ पर गर्दन उठाकर देखा, पर माँ को पिता की गोद में देखकर, उसने गर्दन फेर ली... और गर्दन को फेरने के साथ साथ शामू को रोना आ गया।

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