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पल्लव / मेरे लिए कहानी / रचना समय जन.फर. 2016 - कहानी विशेषांक 1

कथा कसौटी (आलोचना)

पल्लव

मेरे लिए कहानी

आलोचक भी सबसे पहले पाठक होता है। पाठक को कहानी अच्छी लगे तब आलोचक का काम शुरू होता है। कहानी का विषय, उसका प्रतुतिकरण और उसका होना मिलकर कहानी के महत्त्व को तय करते हैं। बहुत विस्तार से हिंदी में इस पर बात हुई है लेकिन फिर भी वे बातें दोहराई जानी चाहिए।

असल बात है आप क्यों लिखते हैं? बुजुर्गों ने कहा है लिखना विपक्ष में खड़ा होना है या ऐसे समझें कि कोई लेखक समाज की वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट होकर ही लिखता है। जैसे तुलसीदास जिस रामराज्य का सपना अपनी कविता में बार बार देखते हैं वह उनके युग के हाहाकारी असंतोष के विरुद्ध हुआ कवि का सृजन है। ठीक वैसे ही कोई कहानी लिखी जाती है तो उसका उद्देश्य क्या है? कोई रचना निरुद्देश्य नहीं हो सकती। अगर है तो वह लेखक की निजी संपत्ति है उसका समाज से कोई सम्बन्ध नहीं। लेखक कहानी या कविता लिखकर पाठक तक पहुंचना चाहता है तो इसका मतलब है कि रचना का कोई उद्देश्य है। यदि वह रचना समाज की वर्तमान व्यवस्था पर टिप्पणी है तो जाहिर है कि लेखक सामाजिकता को एक कसौटी मानता है।

आलोचना भी समाज निरपेक्ष नहीं होती। हिन्दी आलोचना का इतिहास सभ्यता समीक्षा से जुड़ा है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने इतिहास की प्रस्तावना में लिखा था - ‘जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही ‘साहित्य का इतिहास’ कहलाता है।’ जनता की चित्तवृत्तियाँ क्या हैं और उन्हें कैसा होना चाहिए बहुधा यह सभ्यता समीक्षा का काम है। आलोचना भले यह दावा न करे लेकिन उसकी अनिवार्य नियति यही है कि उससे यही जाना जाएगा कि उसने समाज के लिए क्या कहा।

मसलन क्यों हिंदी आलोचना ने प्रेमचंद को बड़ा लेखक माना जबकि वे तो राजा राम की जगह फटेहाल हामिद और घीसू-माधव की कहानी सुना रहे थे। राजा राम की कहानी सुनाने वाले अनेक आधुनिक गद्यकार क्यों कथाकार या उपन्यासकार ही नहीं माने गए बावजूद सौ या पचास वजनी किताबों के। तो यह है आलोचना की भूमिका।

अब आज के कहानी परिदृश्य की तरफ चलें। बहुत दिन नहीं हुए जब कालिया जी वागर्थ के संपादक थे और फिर ज्ञानोदय के हुए। उनके नेतृत्व में हिंदी में एक युवा पीढ़ी आई जिसमें अनेक नए लोगों ने कहानी लिखने की शुरुआत की। ये ऐसे कहानीकार थे जो हिंदी के खांटी लेखन समुदाय के स्थान पर अलग अलग क्षेत्रों से आ रहे थे। इस दौर की कहानी ने कहानी के पारम्परिक मिज़ाज को बदला और कहानी में नए परिवर्तन हुए। कहानी के विषय क्षेत्रों में ही विस्तार नहीं हुआ अपितु कहन में भी मौलिक प्रयोग हुए। ध्यान देने की बात है कि यह वह समय था जब देश-दुनिया में संचार क्रान्ति के लाभ-हानि साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे और दुनिया अब एकल ध्रुवीय होती जा रही थी।

अब इस नए समय में कहानी की आलोचना का सवाल आता है। यह जो कहानी का नया संसार है इसे कहानी की ऐतिहासिक निरंतरता में कहाँ -किस तरह रखा जाए -देखा जाए? तो थोड़ा पीछे से बात शुरू की जाए। हिन्दी कहानी का पहला प्रस्थान बिंदु प्रेमचंद हैं। प्रेमचंद ऐसे लेखक हैं जिन्होंने न केवल हिंदी कथा साहित्य का कायदे से निर्माण किया अपितु उसे ऐसे संस्कार दिए कि लाख दुष्प्रयासों के हिन्दी का कथा साहित्य न साम्प्रदायिक हो सकता है और न ही बाजारवादी। इधर नए परिदृश्य की उलझन यही है। आलोचना को हिकारत से देखने वाले और उसे अध्यापकीय कह कर दुरदुराने वाले उपभोक्तावादी लाड़ले लेखकों (?) का कष्ट यही है कि बार बार प्रेमचंद की मिसाल क्यों दी जाती है ? कभी बिक्री के आंकड़े तो कभी विदेशी भाषाओं में अनुवाद की धौंस दिखाकर पूछा जाता है हमें लेखक कैसे नहीं मानोगे? क्या कीजिये कि हिंदी लेखन का गरीबी, साम्प्रदायिकता और बाजारवाद से बैर होना शाश्वत है। आलोचना इस लड़ाई में मनुष्य विरोधी ताकतों के साथ कभी नहीं जा सकती।

तो बात मोहम्मद आरिफ की लू से शुरू होकर दूर तलक जाती है और उसका मर्म वही है।

मेरे लिए कहानी पढ़ना संसार का खुलना - संसार को जानना है। कहानी मुझे और मानवीय बनाती है। कहानी मेरे भीतर बैठे कायर को धिक्कारती है और उसे चुनौती देती है। कहानी मुझे वही नहीं रहने देती जो मैं अब तक था। जाहिर है हर कहानी ऐसी नहीं हो सकती लेकिन मेरी तलाश और मेरी मुराद ऐसी ही कहानी की है। इस कहानी में सब हो करुणा, मनुष्यता, स्मृति में रह जाने वाले अनोखे-मामूली पात्र और कथाकार का कमाल का प्रस्तुतीकरण जो कहानी को भूलने न दे। उदाहरण देकर बात करें तो ज्यादा साफ़ होगी। प्रियदर्शन की कहानी है - ‘बाएं हाथ का खेल’। कहानी सिपाही शिवपाल यादव की है। ठीक है कि वे हवलदार हैं,सरकारी नौकर हैं लेकिन उनकी ड्यूटी झुग्गी के इलाके में है जहां ‘मुश्किल दूसरी है। काम जैसा भी हो, कमाई बिल्कुल नहीं है। झुग्गी-झोंपड़ी से ऐसा कुछ मिलता भी नहीं जिसे घर ले जाएं। नंग-धड़ंग इधर-उधर भागते बच्चे और कोसती-रोती औरतें,कहीं विरोध करते तो कहीं बेबसी में तमाशा देखते मर्द।’ होता यह है कि कोर्ट के आदेश से यह झुग्गी ध्वस्त करने के लिए एक बुलडोजर आ गया है और अफरा-तफरी मची हुई है। शिवपाल जी ‘कानून के पक्के आदमी हैं। कानून जहाँ बोले,वहां खड़े हो जाते हैं। लाठी भांजने लगते हैं।’ यहाँ भी इस ड्यूटी पर वे मुस्तैद हैं और लगे हुए हैं कि अवरोध न आ जाए। तभी एक औरत बच्चे को लेकर बुलडोजर के आगे आ जाती है ,उसका आग्रह है कि ‘बच्चा बीमार है सिपाही जी। धूप बरदास नई करेगा। बोल रहे हैं साम को गिरा देना घर। रात कहीं काट लेंगे।’ लेकिन बुलडोजर वाला तैयार नहीं। शिवपाल जी भी कड़क हैं। आखिर उसे हटना पड़ा। औरत बच्चे को एक पेड़ के नीचे लिटा देती है जिसकी छाया में यादव जी भी हैं। ‘शिवपाल यादव देखना नहीं चाहते हैं लेकिन बच्चा पर नजर पड़ ही जाती है। लाल है बच्चा का चेहरा। लेकिन न बोल रहा है न रो रहा है। कुछ धक्क रह जाता है शिवपाल यादव का कलेजा। न चाहते हुए भी छू लेते हैं बच्चा का माथा -एकदम गरम। भट्ठी जैसा तप रहा है।’ बस यह वही क्षण है जब शिवपाल यादव का जैसे लेखक आविष्कार कर रहा है। देखिए तो - ‘अब शिवपाल यादव को पसीना आ रहा है। यही सब समय उनके लिए सबसे मुश्किल होता है। अपना बच्चा याद आने लगता है । शिवपाल यादव बच्चा के पास बैठ गए हैं। वहीं एक टूटा हुआ पंखा दिख रहा है। लगता है,मां बच्चे के साथ लाई है। शिवपाल यादव पंखा उठा के बच्चा को झलने लगते हैं। बाएं ही हाथ से। साला टीवी वाला न देख ले। नहीं तो फ़िर बीवी मजाक बनाएगी। बोलेगी, बच्चा खेलाने का ड्यूटी लगा है। लेकिन का करें शिवपाल यादव। बच्चा को बचाएं कि कानून को?’ यह ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानना है। जिससे उम्मीद छोड़ चुके हैं उसमें उम्मीद तलाशना है। मीरां के प्रसंग में कहा जाता है कि उसकी सास और ननद उसे बहुत परेशान करती थीं, ताने देती थीं। नारी मुक्ति के सन्दर्भ में सवाल है कि मीरां तो सजग है और समर्थ भी इसलिए अपनी लड़ाई लड़ रही हैं लेकिन इस सास और ननद का क्या करें? क्या इनके ऐसे ही बने रहने और मीरां के लड़ जाने से स्त्री मुक्ति के सवाल हल हो जाएंगे ? नहीं। मुक्ति एक सामूहिक विचार है। अकेले में मुक्ति नहीं मिलती। इसलिए जो दुष्ट है, दुरदुराया जा रहा है उसमें भी मनुष्यता का संधान करना कहानी की चुनौती है। कहते हैं शेक्सपीयर दुष्टता का संधान करते थे (Study of Evil) जबकि हिंदी कहानी भले लोगों की तलाश है। लोगों में भले की तलाश है।

कुतूहल के लिए अगड़म-बगड़म लिखकर ध्यान खींचना भी एक युक्ति हो सकती है लेकिन दुनिया की श्रेष्ठ कहानियाँ ऐसी युक्तियों को नहीं मानतीं। जीवन में यथार्थ को अभिधा के जादू में जितना साफ़ साफ़ देखा जा सकता है उतना और किसी ढंग से नहीं। यह बात ठीक है कि कहानी कला का दर्जा तभी प्राप्त कर सकती है जब उसमें कहन की ताज़गी हो और अंदाजे बयां अलहदा हो। कहना न होगा कि युवा कहानी ऐसा करने की कोशिश में है।

आखिरी बात यह कि साहित्य में इंस्टेंट ग्रेटीफिकेशन नहीं हो सकता। यह फेसबुक का ज़माना है जहाँ तुरंत फल प्राप्ति की कामना को बढ़ावा दिया जाता है लेकिन साहित्य में यह त्वरा इसलिए नहीं चल सकती कि साहित्य का अर्थ जीवन की तरह जटिल और व्यापक है।

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