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नवैयतें कई कई.... / चंद्रकला त्रिपाठी / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

चंद्रकला त्रिपाठी

नवैयतें कई कई....

कुल 18 कहानियों का संदर्भ लेकर मुझे अपनी बात कहनी है, ये कहानियाँ हैं संजीव, महेश कटारे, चंद किशोर जायसवाल, जया जादवानी, हरि भटनागर, पंकज सुबीर, पंकज मित्र, उपासना, तरुण भटनागर, राकेश दुबे, अंजली देशपांडे, तेजेन्द्र शर्मा, एकता सिंह, आशुतोष, जयश्री रॉय, शेखर मल्लिक, मनोज पाण्डेय और प्रज्ञा की। यहाँ से यदि एक सुविधाजनक विभाजन लिया जाए तो कुल मिला करके प्रौढ़, युवा और युवतर कहानीकारों की कहानियाँ हैं। ये यानी कि युवा कहानीकारों की कहानियों की सिफत-बढ़त को समझने का एक परिपक्व और गतिशील परिप्रेक्ष्य भी यहाँ बन रहा है। विशेषांक अमूमन अपनी एक निश्चित डिजाइन लेकर चलते हैं। उनका आग्रह प्रायः समावेशी ढंग पर होता है। मौजूदा मुद्दों की अनुगूंजों, विमर्शों- दलित, स्त्री, आदिवासी, सांप्रदायिकता, लंपट पूंजी से ग्रस्त यथार्थ वगैरह को व्यक्त करने वाली कहानियाँ को लेकर चलने पर ही उनका अपने समय में मौजूद होने का दावा पूरा होता है। अब यह संपादक पर निर्भर करता है कि वह ऐसे बहुरंगी यथार्थ से मुखातिब कहानियों से अपना चयन किस प्रकार करता है। इस विशेषांक में भी यह खासियत मौजूद है। शामिल कहानियों में मुद्दों और विमर्शों के रंग तो हैं मगर वे अपनी तानाशाही के साथ प्रायः नहीं हैं। मुझे किरण सिंह की कहानी ‘पता’ का उल्लेख यहाँ जरूरी लग रहा है। यह कहानी आदिवासी विस्थापन और नक्सलवादी संघर्ष के अनुभवों को थहाती है, उसके भीतर से चरित्र, घटनाक्रम, परिवेश और परिप्रेक्ष्य भी निर्मित करती है और बहुत अनूठे ढंग की विस्तृति और प्रभाव की रचना करती है। किरन सिंह की कहानियाँ लगातार अपने समय के विद्रूत, दमन और अन्याय के अलग-अलग यथार्थ में प्रवेश कर रही हैं और वहाँ यह यथार्थ कतई दूसरे के हिस्से का यथार्थ नहीं लगता। कहने के लिए तो यह कहानी आदिवासी विस्थापन और दमन की सच्चाइयाँ लिख रही है मगर इस दमन का बहुत स्पंदित पका हुआ अनुभव इस कहानी से उभरता है। तीव्र संवेदना गहरी ऐंद्रिकता और विश्वसनीयता भी है। लेखिका में सच्चाइयों का पीछा करने की नहीं बल्कि उनके समूचे ताप समूचे जैविक के भीतर उतर जाने का माद्दा है। इस तरह यह कहानी कतई सतही आदिवासी विमर्श की कहानी नहीं है। इस तरह स्त्री के यथार्थ से जुड़ी कहानियाँ भी बहुत चकित कर देने वाली कहानियाँ हैं और उनमें स्त्री-विमर्श से बाहरी किस्म की रियायतें लेने का जुगाड़ कतई नहीं है, चाहे वे अंजली देशपांडे की ‘घूंघट’ हो, प्रज्ञा की ‘जिंदगी के तार’ हो, उपासना की ‘उदास अगहन’ हो, ममता सिंह की ‘राग मारवा’ हो या आशुतोष की ‘अगिन असनान’ क्यों न हो। इसके अलावा राकेश दुबे, पंकज सुबीर, जयश्री रॉय और जया जादवानी की कहानियाँ भी स्त्री अनुभवों के एकांत और विलक्षण को लिख रही हैं, हालांकि इनका ‘ट्रीटमेंट’ भिन्न है। कहने का अर्थ यह है कि ‘घूंघट', ‘उदास अगहन', ‘अगिन असनान’ जैसी कहानियाँ व्यापक सामाजिक यथार्थ की रगड़ के बीच से अपना कथ्य चुनती हैं और वहाँ एक बेधक ढंग की समाज समीक्षा भी चल रही है जबकि बाकी कहानियों में स्त्री दमन, यातना और टकराव का वस्तुगत परिप्रेक्ष्य उस तरह नहीं उभरता। फिर भी ये कहानियाँ स्त्री का ज्यादा कठिन सामाजिक अलगाव रचने वाले परिप्रेक्ष्य की हैं और इनमें अलग तरह की प्रगाढ़ता है।

यहाँ मौजूद ज्यादातर कहानीकारों ने अपनी गढ़न में यथार्थ की बहुस्तरीयता और जटिल सामाजिक अनुभवों से तनाव भरे गतिशील संबंध को उद्घाटित करने की चुनौती ली है। दरअसल वे ज्यादातर यथार्थ के कठिन-गहन और अछूते हिस्सों को उधेड़ना चाहते हैं। वे अपनी निर्मितियों को एक अछोरता से जूझने देना चाहते हैं तथा अपने समय की सभी हरारतों को छूना चाहते हैं। नई कहानी के दौर में मध्यवर्गीय अनुभवों की भारी खेप अपनी तमाम जटिलताओं और विचित्रताओं के साथ कहानियों में चली आई थी। उस दौर के आलोचकों ने इसे मनुष्य की सामाजिक विच्छिन्नता और बेगानेपन के परिणाम के रूप में देखा था। यह अनुभव किया गया था कि नये सामाजिक संबंधों का परिदृश्य बन रहा है। शहरी, कस्बाई महानगरीय जीवन के अनुभवों पर ‘फोकस’ ज्यादा था। यहाँ से मनुष्य की एक निस्सहाय सी नियति तो परिभाषित हुई मगर उसे रचने वाले वस्तुगत परिप्रेक्ष्य का सन्दर्भ छूटा सा रहा। नई कहानी के दौर के मध्यवर्गीय अनुभवों के बहुरंगी उद्घाटनों के इन रूपों को यदि हम ठहर कर देखें तो दरअसल वहाँ भी चरित्रों से ज्यादा परिवेश की कथा कही जा रही थी। संत्रास था तो बेगानेपन से ग्रस्त आत्मिकताओं के भीतर वस्तुतः बाह्य उचाट और विखंडन की छायाएँ थीं। जिसे हम आधुनिक विश्व कहते हैं, उसके स्वभाव और गतियों की पहचान के प्रसंग कथा साहित्य में मानवीय संबंधों, चरित्रों और उनसे संबंद्ध घटनाओं के जरिए ही प्रवेश करेंगे। यह जानना सचमुच रोचक है कि रचनात्मक साहित्य बड़ी बारीकी से अपने वस्तुगत ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की नब्ज पकड़ता है और खासतौर से विसंगतियों को उधेड़ता है। पूरी दुनिया में साहित्य के संवेदनात्मक पक्ष की पूरी यात्रा को देखा परखा जाए तो एक ऐसा आकलन जरूर मिलेगा कि आर्थिक-सामाजिक बदलावों का गहरा छना हुआ आंतरिक रूप रचनात्मक अनुभवों में शामिल होता रहा है। इस तरह संकट बोध, संक्रांत अनुभव या कि प्रतिरोध और संघर्ष चेतना की डिजाइनों की भी अपनी यात्रा होती है। यहीं से यथार्थ अनुभव अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता या समाज समीक्षा तक के अर्थ पहचाने जा सकते हैं। किसी समय में जीवनानुभव संक्रांत अनुभव हुआ करते थे। अवश्य ही यदि हम उस समय की ऐतिहासिक तफसीलों को पकड़ कर देखें तो बात खुल जाएगी। इसी तरह क्रमशः संकटबोध की अर्थ छायाएँ रची गईं, और जैसे-जैसे कहानी सीमित जीवनानुभवों के घेरे से मुक्त हुई और उसे जीवन की सक्रिय गतिशीलताओं का वृहत्तर क्षेत्र मिला, उसके समक्ष छोटी-बड़ी लड़ाइयों का वह यथार्थ प्रत्यक्ष हो उठा जिसके भीतर ‘टूटना’ एक बेहद रूमानी चुनाव साबित हुआ। बहुत सी मोहाच्छन्नताओं का टूटते जाना, अनुभवों के साथ-साथ भाषा में भी सुचिंतित यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिपक्व होना आज कहानी का अर्जित है। बहुत से नये लिखने वालों ने अपनी रचनात्मक मदद के लिए अपनी पूर्व पीढ़ियों को पढ़ा-गुना हो या न पढ़ा हो मगर वे अपने समय के यथार्थ से बेधक मुकाबले के लिए बड़े नये किस्म की रचनात्मक खूबी के साथ तैयार हैं। वस्तुतः यथार्थवादी होने का अर्थ उनके लिए ‘रोमान’ के कैसे भी धुंधलके से मुक्त होना है। यथार्थवादिता उनके लिए कतई राजनीतिक पैटर्न नहीं है, यथार्थ के गतिशील पक्षों की चिंता उन्हें भले हो मगर उन्हें रचने के लिए वे किसी अतिरिक्त मदद की ओर नहीं जाते।

प्रस्तुत विशेषांक की कहानियों के समग्र आकलन के लिए एक प्रकार का मोटा विभाजन मुझे उपयोगी लगा कि स्त्री आधारित कथ्य की कहानियों को एक तरफ कर दिया जाए और उन पर अलग से बात हो। इस प्रयत्न के बाद जो कहानियाँ बची हैं वे हैं किरन सिंह की ‘पता', तेजेन्द्र शर्मा की ‘बुशी का भूत’ पंकज मित्र की ‘कफन रिमिक्स', शेखर मल्लिक की ‘रेअबुआ बुरु’ महेश कटारे की ‘उलझन के दिन', ‘चंद्रकिशोर जायसवाल की ‘विक्लव', हरि भटनागर की ‘आंच’ और तरुण भटनागर की ‘प्रथम पुरुष'। ‘आँच', ‘उलझन के दिन', ‘कफन रिमिक्स', विम्लव’ और ‘बुशी का भूत’ में चित्रित यथार्थ का ठोस और प्रत्यक्ष संबंध समकालीन यथार्थ से है। इन कहानियों के लेखकों की कोशिश है कि ये कहानियाँ हमारे समय के विसंगत यथार्थ की गुत्थियों से टकरायें और अपनी रचना में ये कतई सपाट न हो। महेश कटारे या कि चंद्रकिशोर जायसवाल यथार्थ की प्रत्यक्ष वर्णनात्मकता की आजमाइश वाले हैं। वे अर्थ की जटिल गुंफित सांकेतिक रचनाओं के मुरीद नहीं है। उनका जोर प्रायः ‘घटित’ को प्रत्यक्ष आवयविक रूप में रचने पर होता है। बहुत दार्शनिक था कि गूढ़ होने की कला के वे कायल नहीं हैं। चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी का शीर्षक बड़ा नया सा है : ‘विक्लव'। कहानी में यह उसके लिए प्रयुक्त होता है जो सदैव आशंकित चिंतातुर हो। इस कहानी का कथ्य इस ‘विम्लव’ को बीज की तरह लेकर विकसित होता है। आम तौर पर यह कहानी सामाजिक असुरक्षा को रेखांकित करने वाली कहानी कही जा सकती है मगर शायद इतना ही नहीं है। अवध बाबू जैसे रिटायर बूढ़े के जीवन के एक अकस्मात् घटित का आश्रय लेकर यह कहानी हमारे समय की नृशंसता, अलगाव मनुष्य की घातक निस्सहायता की रचना करने वाली स्थितियों को उधेड़ती चली जाती है। कहानी के नाटकीय और एक हद तक सुखद से अंत से सामान्य पाठक को यह अपने आस्वाद अभ्यास के भीतर की कहानी लग सकती है, किंतु ठीक वहीं कहानी अवध बाबू के स्वभाव की विचित्रताओं से अलग उस समय की ध्वनि पकड़ने लगती है जिसे भय का समय कहा जायेगा। इस समय में मनुष्य की संबलहीनताओं की स्थिति यह है कि उसे कहीं भी किसी तरह से मार दिया जायेगा। इस कहानी में ही पुलिस को किसी खतरनाक कारण से अवध बाबू की खोज नहीं है, इतना जानकर हम अवध बाबू के लिए निश्चिंत भले हो तो ले किंतु पुलिस, प्रशासन, माफिया और सामाजिक विच्छिन्नता वगैरह के जो हिस्से कहानी में दर्ज है वे मानवीय यातना के बने रहने की स्थितियों की गवाही हैं। कहानी में निम्न आय श्रेणी के परिवार का रोजमर्रा का जीवन है, उस जीवन की अनेक छवियाँ हैं, उन्हें बरतने वाले मनुष्य के स्वभाव वगैरह का चित्रण है। आत्मपर्याप्त किस्म की पारिवारिकता का रूप है, सीमित इच्छाओं और सक्रियताओं के जीवन प्रसंग हैं, इसी में एक जगह यह भी है कि- ‘पिछले तीस वर्षों से उन्हें एक थानेदार का यह कथन डराता रहा है कि हर आदमी अपराधी है और कहीं न कहीं, कभी न कभी, कानून को तोड़ता है। उन्हें मालूम भी तो नहीं कि देश में क्या-क्या कानून हैं और कहाँ-कहाँ थानेदार अपना ढंग चला सकता है।‘

अवध बाबू की बेचैनी की तहों में यह कहीं है- ‘न जाने क्या कानून लेकर पुलिस वाले ढूढ़ रहे हैं मुझे।‘

यहीं से कहानी में आशंकाओं के व्यूह गहरे होते जाते हैं। एक बहुत आम-सी जिन्दगी और भयानकताओं में गर्क कर देने वाले तमाम डर सिर उठाते हैं। कहानी में ये प्रसंग अवध बाबू के भय प्वाइंट का सबसे घातक छोर रच रहे हैं। ये ही वे हिस्से हैं कि जिनका संबंध सिर्फ अवध बाबू से नहीं रह जाता बल्कि बाह्य यथार्थ की गहरी नृशंस गतियों का पता मिलता है। कहानी उन्हें ठीक उसी तरह से छूती है जिस तरह से वे जीवन में हैं, किसी तरह की अतिरंजना को जगह न देते हुए जिंदगी की आम चेष्टाओं के भीतर से यह कहानी अपना वृहत्तर आशय रच रही है। चंदकिरण जायसवाल वैसे भी बेहद पहचाने हुए जीवन संदर्भों और चरित्रों में लेखक हैं। उनके चरित्र ‘टाइप’ होने के अर्थ का अतिक्रमण नहीं करते। उन्हें किसी प्रकार की गूढ़ आतंरिकता में रचने के भी वे कायल नहीं है। इस कहानी के दंपति, मित्र पड़ोसी दुकानदार सब के सब अपनी स्वाभाविक गढ़न के हैं। इनके बीच की परस्परता भी बहुत बरते हुए किस्म की है। सामाजिक अलगाव की बौद्धिक संरचनाओं की गुंजाइशें भी यहाँ नहीं हैं।

क्या इसे केवल एक संयोग माना जाए कि महेश कटारे की कहानी ‘उलझन के दिन’ में ‘पिवना सांप’ का जिक्र आता है। यह भी एक अजूबा अर्थ है। सांप को तो सब जानते हैं मगर ‘पिवना सांप’ को सब नहीं जानते। अंगूरी जानती है।

कहानी में ‘पिवना सांप’ दमन के विरूद्ध प्रतिरोध का अर्थ लेकर ‘गली-गली, घर-घर रेंग जाता है। अंगूरी और कैलास के खेतों पर धोखे से पंडित ने कब्जा कर लिया। सरपंच समेत गाँव के सभी शक्तिशाली पंडित के पक्ष में हैं। आम गाँव वालों में भी अपने हितों को लेकर डर है सो वे भी अन्याय को देख समझ कर भी कुछ नहीं कहते। ग्रामीण विकास के नये मॉडल में पैठे शोषण का यथार्थ इस कहानी के निशाने पर है। ग्रामीण जीवन का यथार्थ कहानी में शामिल होता है और उस परिवेश की शक्ति संरचनाएं भी पहचानी जा सकती हैं। खेती किसानी की तबाही और अभाव की स्थितियों यहाँ दर्ज है। लेखक सरपंच, पटवारी, सचिव वगैरह की अन्यायी फितरत उद्घाटित करता है। ‘पिवना सांप’ प्रसंग की प्रतीकात्मकता रचने के बाद भी कहानी में एक प्रकार से यथार्थ की सपाटता है। चरित्रों या कि स्थितियों के अन्तर्विरोधों की जटिलताएं भी इस सपाटता के भीतर आ गई हैं। जीवनानुभवों की ऊष्मा कुछेक प्रसंगों की तीव्रता के बावजूद कुछ दबी दबी सी है। ऐसा लगता है कि लेखकीय नजरिए की दखल कहानी में तकनीकीपन गढ़ रही है, बावजूद इसके यह कहानी इस विशेषांक के लिए विस्तृत अनुभव क्षेत्र बना रही है।

देखा जाए तो इन दो कहानियों के साथ पंकज मित्र की कहानी ‘कफ़न रिमिक्स’ की एक संगति बन रही है। मिक्सिंग के नाम पर पंकज ने घीसू-माधव और बुधिया की नियति को मौजूदा यथार्थ से मिलाया है। यह नया यथार्थ नये की मौजदूगी का भी है। घीसू माधव के नाम बदले गए हैं। अब वे भी निचार देहाती नहीं हैं बल्कि जी0 राम और एम0 राम है। इस तरह प्रेमचंद की ‘कफन’ यहाँ भारी बदलावों के साथ है किन्तु मूल घटना का स्वरूप वही है यानी कि बुधिया या कि बुधवंती का प्रसव प्रसंग ही कहानी का केन्द्र है। अफसाना प्रेमचंद से क्षमा सहित काफी बदलाव लेखक ने किए हैं। बुधवंती बुधिया के मूल स्वभाव में होने के बावजूद अपने विगत जीवन की तफसीलों के साथ है। कहानी में उसका दारुण प्रसव प्रसंग का जिक्र बहुत छोटा है और उसकी पीड़ा को असह्य यंत्रणा के भीतर समेट दिया गया है, इस जरा से जिक्र के बाद वह ठंडी देह में बदल जाती है मगर उसके जीवन के बाकी तकलीफ भरे हिस्से कहानी में है। बुधवंती बुधिया की तरह ही परिश्रमी और पतिव्रता है। ‘कफन’ में घीसू माधव शोषक बिरादरी के परलोक भय का लाभ उठा उसके कफन के नाम पर जुटे हुए का गुलछर्रा उड़ा देते हैं। प्रेमचंद वहाँ अमानुषीकरण के कई स्तरों को एक साथ लक्ष्य कर रहे थे और एक गहन समाज समीक्षा का स्वर वहाँ था। श्रम के दोहन की परिस्थितियों की तरफ वे बड़ी बारीकी से इशारा कर रहे थे। प्रेमचंद की ‘कफन’ अपनी गढ़न में बड़ी संश्लिष्ट कहानी है। ग्रामीण सामाजिक संरचनाओं की मौजूदा नृशंसता बेशक वहाँ नहीं थी। पंकज मित्र जी. राम और एम. राम को श्रम की मौजूदा मंडी में ले आये हैं। ये शहरी हो चले हैं। किसानी के तबाही के जिक्र भी यहाँ हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नये शिकंजों का उल्लेख भी कहानी में है। आधार कार्ड, वोटर कार्ड, ग्राम समाज, रोजगार हितों की बैठके वगैरह सब यहाँ है। तंत्र की लोकोन्मुखता की समूची आयरनी की उधेड़ के कई सॉलिड प्रसंग कहानी में हैं जैसे कि- ‘मजा यह था कि जनता कोई दिखने वाली चीज तो थी नहीं। ईश्वर की तरह एक अमूर्त कल्पना थी। तो सीधे-सीधे ऐसा नहीं होता था कि जनता नाम का प्राणी आया और उसकी टाँगे दबाने बैठा दिया गया या मालिश या चंपी करनी पड़ गई। जनता उस न दिखने वाली गर्द की तरह थी जो जब जरूरत हुई विरोधी पक्ष की आँखों में झोंकने के काम आती थी।“

इस तरह ज़माने का शातिरपन जी0 राम और एम0 राम को बदल चुका है। ‘टाउन’ के होकर वे अपनी हितों के बारे में इतने मक्कार और नृशंस हो चुके हैं कि बुधवंती के नाम से योजना वाला कुआँ पास होने पर वे उसकी लाश घर के पिछवारे दफना देते हैं। वे उसे कफन देने के दायित्व से भी बाहर आ चुके हैं। प्रेमचंद की ‘कफन’ काफी हद तक सामंती समाज में श्रम के दोहन की नारकीय स्थितियों का खुलासा थी और आर्थिक विषमताओं की परिणतियों की पहचान कर रही थी। ‘कफन रीमिक्स’ में पूंजी के समाज के दुष्चक्र हैं, अमानुषिकता यहाँ नृशंसता में बदल चुकी है। आर्थिक विकास की सरकारी योजनाओं की सच्चाइयाँ भी हैं। ‘कफन’ की ‘आयरनी’ के समिति अर्थ से निकलकर ‘कफन रीमिक्स’ में यथार्थ ‘पतन’ की स्थिति तक पहुँचता है। कुछेक अन्य कहानियों में भी मुआवजे वगैरह की जानिब से जीवित के मृत में बने रहने की कठोर सच्चाइयों के जिक्र आये हैं। एक कहानी की याद आ रही है लेकिन यह नहीं याद आ रहा है कि वह किसकी कहानी थी उसमें बीमार और मृत पिता को जीवित बनाकर कारखाने में पहुँचा दिया जाता है ताकि काम करते हुए उसकी मौत होना दर्शाया जा सके और उसका लाभ लिया जा सके। ‘कफन रिमिक्स’ थोड़े अंतर के साथ सच्चाइयों का यह पतनशील पक्ष उद्घाटित कर रही है। यह कहानी भी पूंजी के समाज में निहित मानवीय क्षरण की स्थितियों को उधड़ेती है। इसके अलावा बड़े नामालूम तरीके से स्त्री दमन के निशान भी कहानी में हैं। वस्तुतः श्रम के शोषण की पूंजीवादी सामंती संरचनाओं का मूर्त-अमूर्त यहाँ उजागर हुआ है और बुधवंती प्रसंग का स्त्री दृष्टि से भी मायने है।

च्आँच’ हरि भटनागर की कहानी है। छोटी-सी कहानी है। इस कहानी में लगभग एक बेऔकात समझे जाने वाले आदमी के भीतर आदमी होने की जिद का बयान है। वाचक अखबारों के कालम लिखता है। यह उसका रोज का मामला है और यही उसकी रोजी भी है। आँखें कमजोर हो चुकी हैं। ट्यूबलाइट की रोशनी में लिखा नहीं जा सकता और लैंप का स्विच खराब है। जगदीश के हाथों में सबकुछ ठीक कर देने का हुनर है। लोहे जैसे हाथों वाला बिजली मजदूर जगदीश पूरा स्विचबोर्ड ही बदल देता है मगर मजदूरी के बदले मिले सिर्फ पचास रुपये के अलावा धिक्कार और मलामत उसे अपने ऐसे शोषण के जबरदस्त विरोध में खड़ा कर देते हैं। जगदीश का किरदार श्रम के स्वाभिमान में रचे कई किरदारों की याद दिलाता है और सबसे ज्यादा केदारनाथ अग्रवाल का वह ‘गोली जैसा चलने वाला’ याद आता है। अपने काम का अपमान जगदीश को असह्य है। उसका पूरा वजूद विरोध में अड़ जाता है, इतना कि उसकी शख्सियत की आंच वाचक के लिए मुश्किल हो जाती है। कहानी संक्षिप्त से घटनाक्रम और तफसीलों से बुनी गई है जिसका फोकस जगदीश पर है। जगदीश शराबी है, वाचक की दृष्टि में नीच कमीना वगरैह किन्तु उसके भीतर अपनी मेहनत से मिली गैरत है जो कतई सफेदपोशों की बपौती नहीं है। दूसरी तरफ अखबारों का कालम लिखने वाले का श्रम निचाट बौद्धिक है तथा अपनी जीवंत मानवीय गतियों से खाली है। हरि भटनागर वस्तुगत यथार्थ की प्रत्यक्षता निर्मित करने वाले कथाकार हैं। यह कहानी भी श्रम के दमन के वस्तुतगत संदर्भों की ठोस पड़ताल करती है। इसके अलावा रोज-ब-रोज की जिंदगी में फंसे श्रम की अवमानना के तमाम अभ्यासों को समझने की एक कौंध कहानी में मौजूद है।

विदेशी कथा भूमि, जीवनानुभवों और सामाजिक संबंधों का एक बड़ा ही अनोखा प्रसंग तेजेन्द्र शर्मा की अपेक्षाकृत छोटी सी कहानी ‘बुशी का भूत’ है। कहानी मूलतः तकनीक के साथ मनुष्य के टकराहट भरे रिश्ते की है। ‘तकनीक’ भी यहाँ अपने सीमित अर्थ से निकलकर तंत्र की संवेदनहीनता का परिचय दे जाती है। बुशी स्टेशन के हर यात्री के लिए फिलिप फिल है और ‘बुशी’ उसके लिए स्टेशन भर नहीं है बल्कि उसका तीव्र आवेगात्मक प्यार है, उसके यात्रियों से भी उसका बड़ा ही निजता भरा संबंध है। उसका यह रिश्ता इतना अनोखा है कि उनकी आत्मा में ‘बुशी’ बसता है। बुशी के यात्री ही उसके रिश्तेदार.....वे उसके ग्राहक मात्र नहीं है। इस तरह फिल की पूरी दुनिया ‘बुशी’ ही है।

कहानी में लंदन है। पूंजी और प्रौद्योगिकी के जरिए बदलने वाली वह जमीन जिसने तकनीकी विकास और मुनाफा उगाही का चौतरफा जाल फेंका और पुरानी दुनिया के मुकाबले एक नई दुनिया, पुरानी सभ्यता के मुकाबले एक नई सभ्यता के आगाज में सबसे पहले कदम बढ़ाया। यह सभ्यता पूंजी की सभ्यता थी जिसमें भावनाएं, हार्दिकताएं वगैरह बेहद पिछड़ी हुई चीजें साबित हुईं। जिसके कदम तेजी से बाजार के नियमों की ओर बढ़े मगर उसी जमीन पर तेजेन्द्र शर्मा को ‘फिल’ मिल गया, वह फिल जिसे निकिल से एलर्जी है। देखा जाए तो निकिल और एलर्जी दोनों ही पूंजी और तकनीक की दुनिया की फितरतें हैं और ये दोनों उस फिल पर भारी पड़ रही है जिसके लिए बुशी से जुड़ा प्रत्येक संबंध बेहद सजीव और हार्दिक है। फिल की विचित्रताएं बखानता हुआ वाचक बार-बार ‘आत्मा’ का जिक्र करता है। इस तरह यह कहानी पूंजी के सर्वग्रासी चरित्र के मुकाबले एक अदद आत्मा का मार्मिक प्रसंग रचती है। ‘बुशी का भूत’ के कथ्य में भी मौजूदा यथार्थ के एक अछूते हिस्से को अर्थवान ढंग से कहने की विशेषता है, जो महत्त्वपूर्ण है।

जीवनानुभवों के अछूते और मानवीय चमक से भरे हिस्सों को रचना के संश्लिष्ट संप्रेषी और कलात्मक अनुभवों में बदलने की तैयारी अनेक कहानीकारों की है और सबका फोकस मौजूदा यथार्थ के ढलान से भरे हिस्सों से मुकाबले की भीतरी गतियों और तीखी टकराहटों को उद्घाटित करना है। बहुत सी कहानियों ने इस क्षतिग्रस्त समय को अनेक छोरों से समझना चाहा है। इस दृष्टि से तरुण भटनागर की कहानी का कथ्य बहुत अलग है। उनकी ‘प्रथम पुरुष’ शीर्षक कहानी को पढ़ते हुए बार-बार मारिया वगीस ल्योसा का उपन्यास ‘द स्टोरी टेलर’ (एल आवला दोर) याद आया। इस उपन्यास में भी पेरू के आदिम समाज के विश्वासों, प्रतिद्वंद्विता, मूल्यबोध और वहीं से उभरते प्रतिरोध और संघर्ष की वे तफसीलें हैं जो इतिहास से ज्यादा ‘स्मृति’ का हिस्सा हैं। ‘स्मृति’ को लेखक पूंजी और प्रौद्योगिकी के सर्वग्रासी विस्तारवाद के विरुद्ध एक बेहद मानवीय और काम्य मूल्य के रूप में विकसित करता है तथा संभवतः यह पूंजी की निरंकुशता, अमानुषीकरण और पतन से जूझने वाला सबसे जरूरी मूल्य है। समूची दुनिया में मनुष्य की स्वाभाविक आजादी को हड़पने वाली उपनिवशेवादी शक्तियों की नृशंसता से जूझने के लिए रचनाकारों ने इस स्मृति के बहुत सचतेन और गतिशील अर्थ को अर्जित किया है। ‘प्रथम पुरुष’ में भी किस्सा है, किस्सा कहने वाला अबूझमाड़ का दण्डामी मांझी आँखें बंद कर के ‘लिंगोपेन’ की कथा सुनाता है। ‘लिंगोपेन’ जो जंगल का देव था। कहानी में जंगल का आदिम अपने पूरे संगीत के साथ है। लिंगोपेन को यही संगीत पकड़ लेता है। उसे शिकार करना नहीं आता। तरुण भटनागर लिंगोपेन की कथा के बहाने आदिम मनुष्य में स्थूलता के विरुद्ध सूक्ष्मता के आकर्षण के स्वभाव को उसकी आरंभिक गतियों से पकड़ना चाहते हैं और उन मासूम विश्वासों की टोह लेते हैं जिसके लिए समूची सृष्टि उस ‘रागपुरुष’ की निर्मिति है। लिंगो जंगल की व्याप्त रागात्कता की गहरी सूक्ष्म विस्तृति है जिसे विकास के इतिहास ने कोरा गप्प मान लिया। तरुण भटनागर दण्डामी माझी के मासूम विश्वासों के जरिए उस विस्मृति में उतरते हैं और उस आदिम प्रकृत में दर्ज लिंगो की दुनिया के अर्थ को समझना चाहते हैं। देखा जाए तो एक अर्थ में तरुण भटनागर ने इस विशेषांक को अद्भुत के पन्ने दिए हैं। इसके मुकाबले शेखर मलिक आदिवासी अंचलों में पहुँची विकास की क्रूरताओं का यथार्थ लेकर आये हैं। कहानी में झारखंड के आदिवासी अंचल के पहाड़ और जंगल मिटाने वाली विकास योजनाओं का हवाला है जिन्होंने उस प्राकृतिक को नष्ट कर वहाँ के निवासियों के कलेजे में भयानक रोगों का जाखीरा उतार दिया है। कहानी स्पष्ट आलोचनात्मकता से कोई गुरेज नहीं करती और बड़ी एकाग्रता के साथ उस बड़े पहाड़ के खत्म हो जाने की मार्मिक कथा कहती है जो उन जनजातियों के जीवन से हिलगा हुआ, उनका पुरखा था। वे सारे पुराने वृक्ष खेत और नैसर्गिक के रंग से रचा हुआ उन सबका जीवन, पहाड़ों को तोड़ने वाले क्रशर के धूल धुएं और अभिशाप से ढकता गया है।

इस तरह इन कहानियों में सिर्फ जल, जंगल और जमीन का एकायामी मसला नहीं है। मनुष्य के राग कला स्मृति और नैसर्गिक समेत उसकी मानवीय आंतरिकता की आकांक्षा इन कहानियों में दर्ज है।

इस विशेषांक की स्त्री विषयों पर केन्दि्रत अधिकांश कहानियाँ नई स्त्री की गढ़न के साथ दिखाई देती हैं।

स्त्री की केन्द्रीयता लेकर चली कहानियों के संबंध में महत्त्वपूर्ण यह है कि वे स्त्री दमन के प्रचलित यथार्थ और स्त्री के प्रतिरोध और संघर्ष के प्रायः अलग रूपों की रचना करती हैं। इन कहानियों में अलग प्रकार की प्रगाढ़ता है और इनमें समय, समाज और पारिवारिकता की ढेरों ओछी और अमानुषिक तफसीलें पकड़ में आई हैं। इन कहानियों में दमन से जूझती हुए नई होती हुई स्त्रियां हैं। स्त्रियों के प्रति निगरानी और दमन की चौकसी से भरी हुई निस्संग पारिवारिकता के प्रसंग यहाँ हैं। कुछेक कहानियाँ जैसे ‘रेपिश्क’ (पंकज सुबीर) या ‘पैर’ (मनोज पाण्डेय) जो स्त्री की आत्मपर्याप्तता और गौरव के नये हिस्सों को उधेड़ती हैं। कई बार अपने ट्रीटमेंट में ये पुरुष मन की अनुरूपता में रची गई स्त्रियाँ भी लगती हैं और उपभोग आधारित सौन्दर्य बोध मूल्य और लालसा समेत कई-कई उद्दामताओं का उभार दिखाती हैं। फिर भी ये एक नई स्त्री की ओर इशारा करती हैं जो अपनी जिंदगी को खुद ‘ड्राइव’ करने के साहस और संघर्ष में दिखाई देती है।

इन कहानियों की स्त्रियाँ अलग-अलग जीवन स्तरों की हैं, अलग-अलग आयु की भी हैं। कुछेक स्त्रियाँ लेखिकाओं की गढ़न हैं तो कुछ आशुतोष, पंकज सुबीर, मनोज पाण्डेय जैसे लेखकों की हैं। इन स्त्रियों के यथार्थ की रचना में स्वाभाविकताओं या अतिशयताओं की भी दखल है। ज्यादातर कहानियों में स्त्री पुरुष संबंधों का यथार्थ दर्ज है। ‘उदास अगहन’ हो, ‘घूघँट’ या कि ‘रेपिश्क’ क्यों न हो, इन कहानियों में एक अर्थ में पीड़ा या यातना की दखल है। देखा जाए तो एक बाहरी दुनिया भी लगभग अनायासता के साथ कहानियों में मौजूद है। इस तरह कहानियाँ वृहत्तर संसार के अर्थ से अपनी अविभाज्यता निर्मित करती हैं।

पंकज सुबीर की कहानी ‘रेपिश्क’ में स्त्री के लिए काफी उत्तेजक ढंग से बदला हुआ समय है, या यह कहें कि स्त्री ने इसे अपने लिए बदल लिया है। काफी हद तक उसने अपने लिए एक आजाद जिंदगी चुन ली है। यह अलग बात है कि इस आजाद ज़िंदगी को भी कई चीजों को छुपाकर रखना पड़ रहा है जैसे कि आशिमा अपने सहकर्मी साहिल के साथ ‘लिवइन रिलेशन’ में है किंतु यह बात उसके परिवार पर प्रकट नहीं है। उसका अधिकतर सामान उसकी दोस्त प्राची के पास है क्योंकि साहिल के साथ उसके रिलेशन में ‘कब तक निभने वाला’ मुद्दा भी है। आशिमा असहज है, खिन्न है, रो-धो भी रही है कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उसे बेहोश करके उसके साथ ‘रेप’ किया है। वह उस बलात्कारी को खोजना चाहती है। लेखक की तरफ से आशिमा की मनोदशा उसके फैसले या उसकी तकलीफ के बारे में जो बातें कही गई हैं, उसकी बिना पर देखा जाये तो धोखे से हुए इस बलात्कार ने उसे दुखी तो किया है मगर वह खत्म नहीं है। स्त्री यौनिकता का स्पष्ट संदर्भ लेकर लेखक स्त्री यौन प्रसंगों के अर्थ को वहाँ तक ले जाना चाहता है, जहाँ यह केवल उद्दाम कायिक अर्थ की स्थूलता तक न रहने दे। इस दृष्टि से वह साहिल की यौन आक्रामकता को ज्यादा समझने लगती है। बलात्कारी ने उसकी देह को मधुर मंदिर संगति की तरह बजाया है इसलिए वह साहिल को छोड़कर उसके साथ जाना चुन लेती है। लेखक ने उसके लिए एक तर्क भी चुना है कि- ‘प्रेम और यातना में एक बड़ा बारीक अंतर होता है। हमें पता ही नहीं चलता है कि जिसे हम प्रेम समझ रहे थे, वह तो वास्तव में यातना था....’ रोचक है यह जानना कि बेहोशी के बावजूद आशिमा बलात्कारी के प्रेम को पहचान लेती है। जाहिर है कि विचित्र ढंग की दैहिकता से जनमते इस प्रेम को पकने या कि बढ़ने के लिए अब किसी अन्य प्रकार की परीक्षा की जरूरत ही नहीं। इस कहानी के बरक्स उपासना की कहानी ‘उदास अगहन’ को देखें तो वहाँ भी एक स्त्री अपनी स्वतंत्रता में है। दुनिया वहाँ पुराने ढंग की है। पितृसत्ता की कठोरता वाली दुनिया। वृंदा वहाँ देवदत्त की दूसरी पत्नी है। पत्नी क्या है, फूलमती के अभियान वगैरह के प्रतिकार के लिए जुटाई गई एक स्त्री योनि भर है। वृंदा अपने लिए दबा-ढका ही सही, एक उन्मुक्त संबंध पा लेती है, जो पुरुष वर्चस्व की जड़ों को भीतर से कुतर देता है। रुग्ण और मरणासन्न पति के यह कहने पर कि- ‘तू तू चरित्रहीन साली....रात भर किससे मिलने जाती थी हमें सब मालूम है।‘

वृंदा कहती हैं- ‘तब तो तुम्हें यह भी मालूम होगा कि उन सबका परिणाम क्या है? कभी सोचा है तुमने कि जिसे तुम अपना बेटा अपना बेटा कहते फिरते हो.....उसका एक भी लच्छन तुम्हारे जैसा क्यों नहीं है?”

देवदत्त सिंह वृंदा के चेहरे पर थूक देते हैं....वृंदा इस सबके प्रति ठंडी, निरावेग है। उसका निर्णीत यह है कि ‘इतने दिन हम घृणा में रहे, पर तुम्हें कभी मना नहीं कर पाए...अब तुम जलो घृणा में.....तुम अब जियो, जो मैंने अब तक जिया है।‘

इस तरह ‘उदास अगहन’ में स्त्री अपने वजूद का सीमित ही सही एक अर्थ पा लेती है। पुरुष वर्चस्व की हिंसा और अन्याय से टकराने का बहुत प्रत्यक्ष न सही, मगर एक रूप यहाँ है मगर ‘रेपिश्क’ में अपने लिए फैसला लेने वाली स्त्री के चयन की स्वतंत्रता में कोई गतिशील अर्थ नहीं है। आशिमा, साहिल वगैरह कारपोरेट संस्कृति द्वारा रचे गए विच्छिन्न समय के किरदार हैं। यदि यह कहा जाए कि उनके मनोजगत और व्यवहार में उपभोग के मूल्यों की गहरी भीतरी दखल है तो अनुचित न होगा। कहानी में यथार्थ की बड़ी सपाट किस्म की बुनावट है और इस अनूठे कथ्य की केन्द्रीयता से विकसित हो सकने वाले जटिल परिप्रेक्ष्य पर लेखक का बयान नहीं है। इसलिए अत्यधिक अत्याधुनिक किस्म की इस स्त्री के संदर्भ अपेक्षित तीक्ष्णता के साथ व्यक्त नहीं हैं।

मनोज पाण्डेय की कहानी ‘पैर’ का वस्तुगत परिप्रेक्ष्य लगभग यही है, यानी मौजूदा पूंजी के समय द्वारा रचे जाते हुए संदर्भों का परिप्रेक्ष्य। वाचक के लिए उस स्त्री के पैर बड़े ‘सेंसुअस’ हैं। उन पैरों की छुअन का जादू बहुत ऐंद्रिक बहुत उन्मादी है। उसी स्पर्श से उसमें अपार वासना जगती है। ‘पैर’ यहाँ देह की भूख का सबसे नग्न सिरा हैं। स्त्री के लिए आरंभ में यह उद्दामता का एक कौतुक है। यहाँ से हमें एक खुद मुख्तार स्त्री का आभास मिलता है। वह पैसिव किस्म की भागीदार नहीं है और इस खेल में एक हद तक हिस्सा भी लेती है मगर जब पुरुष के लिए ‘पैर’ वासना की सिर्फ रुग्णता में धंस जाते हैं तब वह खुद को इस बीमार खेल से निकाल लेती है। जाहिर है कि वह रुग्ण दैहिकता से अपनी देह को ही नहीं बल्कि अपने वजूद को भी अलग करती है। कहानी छोटी सी है, असामान्यताओं की नब्ज पकड़ने की इसकी कला में बारीकियां हैं, साथ ही ‘रैपिश्क’ के कथ्य का सा चौंकाऊपन भी यहाँ है।

स्त्री की सामाजिक गतिशीलता के संदर्भ में बेहद सधी हुई कहानी है अंजलि देशपांडे की ‘घूंघटज्। इस कहानी का कथ्य स्त्री दमन की जटिलताओं में प्रवेश करता है और उसके संघर्ष के बेहद विश्वसनीय यथार्थ का उद्घाटन करता है। कहानी में स्त्री वजूद व स्त्री श्रम का अप्रत्यक्षता वाला शुद्ध सामंती परिवार है। ‘घूंघट’ से वह अपने घर में भी मुक्त नहीं है। पुरुष वर्चस्व वाली पारिवारिकताएं ‘घूंघट’ को स्त्री की लज्जा के रूप में परिभाषित करती हैं। इस स्त्री के परिवार में भी पुरुष उसे उसकी नावजूद सी सलज्जता में टिकाए रखना चाहते हैं। बाहरी दुनिया तो बड़ी दूर की चीज है। ‘घर’ में भी वीणा ढंकी-मुदी रहती है। ससुर जी, पति जी, मेहमान जी वगैरह की उपस्थिति में उसका वजूद तमाम-तमाम तरह से बंद है। कहानी में इसकी कई तफसीलें हैं। इन तफसीलों में एक छुपा हुआ व्यंग्य भी चलता रहता है। लेखिका की खूबी यह है कि वह स्त्री के यथार्थ को उसके समय स्थान घटनाक्रम और अंतरंग में भरपूर पकड़ती है। दैनिक क्रियाकलापों, श्रम और समूचे व्यवहार से यह बात सबसे ज्यादा जाहिर है कि ‘घूंघट’ की अनिवार्यता वीणा पर खुद चुकी है। यह भी कि अपनी स्वतंत्रता के क्षणों में वह इस घूंघट को उतार फेंकती है। यह कतई उसके दिल-दिमाग पर पड़ा हुआ घूंघट नहीं है। इस कथा का आकस्मिक यह है कि वीणा के पति ने अपने ऑफिस की किसी प्रतिद्वंद्विता में पत्नी का इस्तेमाल किया है। अपने बास द्वारा वीणा के प्रति यौन दुर्व्यवहार की शिकायत दर्ज कराया है। इंक्वायरी आती है। वीणा स्तब्ध है, बेहद आहत। यहीं से उसके व्यक्तित्व की गिरहें खुलनी शुरू हो जाती हैं और वह सच बोलती है। वह सच जो कतई पति के हक में नहीं। कहानी का उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इन स्थितियों को किसी सरल सपाट निर्मिति में न खत्म करते हुए लेखिका दूसरी जटिलताओं में जाती है। इस घटना के बाद वीणा निर्वासित महसूस करती है। पति की निर्ल्लजता और पतन उसकी यातना को बढ़ाते चले जाते हैं और वह आत्महत्या करती है। घूंघट, ढकी हुई पारिवारिकता, स्त्री के प्रति शंकालु बेदर्द समाज और निम्न मध्यवर्गीय गृहस्थी का ताना-बाना कहानी का संदर्भ है तो स्त्री निस्सहायता की यातना भरी कठोरताएं भी कहानी में हैं। वीणा जैसी बेहद सीमित जीवन सन्दर्भों से वाकिफ स्त्री बार-बार अपनी इस नियति का सामना करती है और यह लिखकर मरती है कि- ‘मेरा पति यही किया, बलात्कार, इस आदमी के साथ नहीं रह सकती। मेरा पति मेरी मौत का जिम्मेदार है।’ इस तरह ‘घूंघट’ यहाँ स्त्री के उस सामाजिक अलगाव का संकेत भी है कि जीने के लिए व्यापक समाज से उसे कोई संबल नहीं मिलने वाला है, ‘आत्महत्या’ ही उसके लिए अपना एक हल है।

और तब उसने घूंघट उतार दिया था।

स्त्री के ऐसे दमन और यातना से भरे एकांत कई कहानियों में आये हैं। अंजलि देशपांडे ने इसे ज्यादा बारीकी और व्यंजना में पकड़ा है। ‘घूंघट’ की वीणा के किरदार में अनुगता होने के लक्षण कहीं नहीं हैं। पति से संबंध में निहित दमन के अर्थ का पता भी वह पहले नहीं देती मगर खांटी सीमित घरेलूपन के अर्थ में धंसी हुई उस स्त्री की शर्म और इज्जत को बेशर्मी से चौराहे की चीज बना देने वाले पति की पशुता का वह अलग ढंग से सामना करती है। उसके होने में यह अलग ढंग शुरू से मौजूद है और लेखिका ने इसे ठीक से विकसित किया है। इसके अलावा भाषा की स्वाभाविकता का बड़ा ही सचेत ढंग कहानी में है।

च्अगिन असनान’ आशुतोष की कहानी है। स्त्री दमन का सामंती ताना-बाना कहानी में मौजूद है। ‘सती’ बना दी गई सुनैना देवी की कथा का पीछा करते पत्रकार के हिस्से इस सुनैना की असली कहानी है कि दरअसल उसे जलाकर मार डाला गया है। यह भी कि मगरु और सुनैना के दांपत्य प्रेम वगैरह को लेकर स्थिति उतनी अझेल नहीं थी किंतु मामला जमीन पर अधिकार का था। इस कहानी में आशुतोष ने कई सिरे से प्रवेश करने का शिल्प लिया है और पुरुष वर्चस्व की जटिलताओं के साथ-साथ पूंजी की दखल के साथ निरंकुश होते ग्रामीण यथार्थ का अमानुषिक भी यहाँ जाहिर है। पंकज मित्र की ‘कफन रिमिक्स’ की तरह या कि उससे ज्यादा डिटेल्स के साथ यह कहानी गाँव के नये यथार्थ को पकड़ती है और उन शक्ति संरचनाओं को खोलती है जो नितांत बर्बर हैं। इस तरह यह कहानी सिर्फ सुनैना और मंगल की नहीं है बल्कि बशरूद्दीन, लियाकत, रमई और झड़ेला की भी है। उस आतंक की भी है जिसके सामने प्रतिरोध या संघर्ष के लिए गुंजाइशें खत्म हैं। मीडिया तंत्र के ब्यौरे दमनकारी परिप्रेक्ष्य को समूचा उधेड़ते हैं। समाज समीक्षा की अपेक्षाकृत स्पष्ट बढ़त लेते हुए कहानी उत्तर पूंजी की सामंती पतनशील प्रवृत्तियों के जाहिर तरीके के गठजोड़ पर चोट करती है तथा अन्याय और दमन के भीतरी-बाहरी रूपों को उसके छद्म समेत उद्घाटित करती है।

गाँव का यथार्थ राकेश दुबे की कहानी- ‘कउने खोतवा में लुकइलू...’ में भी है। शीर्षक लोकगीत की एक पंक्ति है जो एक बारीक धागे की तरह कहानी में मौजूद है। यह गीत वंशी काका का प्यार है। एक विछोह है जो उन्हें अजब ढंग से कातर बना गया है। युवा लेखकों के लिए प्रेम पर लिखना दरअसल एक बड़ी चुनौती है। ज्यादातर यह एक बहुत बरता गया विषय है। वंशी के पास एक बड़ी तड़पभरी गायकी है। एक चेहरे ने उसे हमेशा के लिए बांध लिया है। इस प्रेम के मिलन और बिछोह के प्रसंग कहानी में हैं मगर बिछोह ही इसकी आखिरी बात है। प्रेम की बेधक अडिगता वंशी को समूचा बदल देती है। अब यह उसकी चिर खोज है। कहानी इसे किसी गहरी मर्मकथा की तरह उजागर करना चाहती है।

लेखकीय दृष्टि यहाँ रागात्मक तरलता से भरपूर है अतः चित्रण या कि वर्णन का हर हिस्सा रस भीने अर्थ का वाहक है। पूरा परिवेश राग की सुंदरता से भरा हुआ है। इस प्रेम के बीच में कहीं कोई खल प्रसंग नहीं है, केवल संयोग है। कहानी का अंत बड़ नाटकीय है। संयोग की इसी युक्ति ने वंशी को मारक परीक्षा में डाल दिया है। ‘उसने कहा था’ नामक गुलेरी जी की कहानी की याद आना स्वाभाविक ही है क्योंकि वंशी ने भी ठकुराइन हो चुकी अपनी प्रेयसी से सांप का जहर उतारा है और वह सारा जहर पीकर अपने चिर विरह को एक अर्थ दे दिया है। लेखक ने इस कहानी के अर्थ को भरपूर प्रगाढ़ता में रचना चाहा है। कहानी के भीतर रोमांस की भाववादी छवियाँ अधिक हैं।

जयश्री रॉय की कहानी ‘संधिज्, में भी ‘प्रेम’ थोड़े भिन्न संदर्भ के साथ आया है। यहाँ मौजूद स्त्री के लिए प्रेम से ज्यादा अपने होने का अर्थ पाने की प्रतीक्षा है। उसकी जिंदगी में सब कुछ जर्द और गमगीन है। यह आधुनिक स्त्री के डिप्रेसिव एकांत की कथा सरीखा है। घर-बाहर की कई चीजें मिलकर उसके जीने के वंचित अर्थ का निर्माण करती हैं। निम्नमध्यवर्गीय पारिवारिकता के स्वार्थ और तनाव के रूप भी यहाँ हैं। इस कहानी में कई अन्य कहानियों के अनुभवों के रंग दिखाई देते हैं, कुछ फिल्मों की भी याद आ सकती है। बाहर भीतर की कई-कई रूकावटों ने उसके जीवन की स्वाभाविकता को सोख लिया है। वह चुप है, कुंद है विरक्ति और करुणा दोनों में झूलती रहती है। उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं। खिड़की खोलना भी उसके लिए संभव नहीं। जीवन में सुंदर नर्म और प्रकृत चीजों से साथ एक खुलापन मिले, ऐसी संभावनाओं से उसका जीवन खाली है। कहानी द्वन्द्व अन्तर्द्वन्द्व त्रास तिरस्कार और निस्सहायता के कई-कई रंग लिखती है। वह कहीं दूर भाग जाना चाहती है। लेखिका ने उसकी आकुलता का छोर पकड़कर भी उसे देखना चाहा है और कई बार ‘आत्मदया’ में गर्क होने नहीं दिया है। डॉ. पार्थ सारथी उसे उसके एकांत का उदात्त समझने लायक बनाना चाहते हैं और एक खुलापन उसे मयस्सर भी होता है। मगर यह सर्वथा अस्थायी साबित होता है। लेखिका ने उसे पिंजरे की सुरक्षा में पहुँचाया है और वह रोने के लिए रात का इंतजार कर रही है। इस तरह स्त्री के दमन और यातना को एक भीतरी चीज की तरह विकसित करते हुए लेखिका पारिवारिक निस्संगता का चित्रण करती है। बहुत सारी रुकी हुई चीजों के अर्थ कहानी में महिमामण्डित होने के हश्र तक हैं।

प्रज्ञा की कहानी ‘जिंदगी के तार’ और ममता सिंह की कहानी ‘राग मारवा’ में स्त्री की वंचित स्थितियों का यथार्थ है। ‘जिंदगी के तार’ में लवली अपनी मेहनत से अपनी जिंदगी को पटरी पर ले आती है। स्त्री का सहना तो इस कहानी में भी है मगर इस दमन से निकलने की जद्दोजहद भी। स्त्री के उसके दमन और दुख में अकेले छूट जाने की तफसीलें भी कहानी में हैं। कहानी बड़ी प्रत्यक्षता के साथ स्त्री के मजबूत कंधे से संवरती गृहस्थी का रूप लिखती है जबकि ‘राग मारवा’ (ममता सिंह) में अपने संघर्षों से कामयाब हुई गायिका की विडंबना उकेरी गई है।

इस विडंबना का एक गहरा कारण गायिका का स्त्री होना है। कुसुम अब पारुल की अनवरत कमाई बन चुकी है। उपभोग के चमचमाते हुए समय में कुसुम पीड़ा की गहरी चीत्कार है। कुसुम के संघर्ष को लेखिका ने शिद्दत से व्यक्त किया है।

इन कहानियों के साथ जया जादवानी की कहानी, उनके अपने लेखकीय मिजाज के अनुरूप एक अलग स्त्री लेकर आई है। जया जादवानी ने अक्सर एक सूफियाने आंतरिक प्रेम को ऐसे लिखा है जैसे वह स्त्री या कि पुरुष को रूपांतरित कर देने वाली भावदशा हो जिसकी तीव्रता, संघनन तनाव या कि दीप्ति को वे कई तरीके से खोलती हैं। कहानी है- ‘क्या आपने हमें देखा है।’ अंधेरा, खामोशी, स्तब्धता अकेलापन और कांपती आत्मा यहाँ भी हैं किन्तु इस कहानी की स्त्री जयश्री राय की ‘संधि’ की स्त्री से ज्यादा चौकस है। उसमें अपनी जिंदगी को नया करने की सक्रियताएँ हैं। अलग बात है कि यह सब कुछ उसी तरह आतंरिक और गाढ़ा है। स्त्री डायवोर्सी है। इस कहानी का खास यह है कि यह अपना फोकस बदलती है। इस स्त्री के बरक्स एक युवा पुरुष भी लिखा गया है जो स्त्री के जिस्म की पुकार समझ लेता है। उसे औरतों का आखेट आता है। उसके लिए यह हुनर है। जया इस स्त्री पुरुष को उनके सारे आदिम की निर्बंधता में रचकर नाभि के ऊपर के ज्वार में बहा ले जाती हैं। यह स्त्री भी साबित कर लेती है कि वह नाभि से नीचे नहीं, ऊपर है। लेखिका ने इस कहानी में जिंदा औरतों की शिनाख्त भी दी है कि वह घरों में नहीं रहतीं, ये अपने अंदर छिपकर बैठी रहती हैं। इस तरह जया जादवानी ने आजाद स्त्री से ज्यादा मुक्त स्त्री की छवि को खोलना तय किया है उसके दिल दिमाग और देह के भीतर से उसे खोजा है। यहाँ उल्लेखनीय है कि स्त्री कतई विदेह होने पावनतामूलक अर्थ में नहीं है मगर कामुकता में भी नहीं है।

स्त्री विषयक कथ्य वाली कहानियाँ स्त्री दमन के कई-कई रूपों को दर्ज कराती हैं। इनमें से कई कहानियाँ नये यथार्थ की जटिलताओं के बरक्स उसके संघर्ष का पता देती हैं तो कुछ पुरानी बंदिश भरी पारिवारिकता और समाज के मुकाबले उसके साहस और टकराव को लिख रही हैं। कहीं-कहीं उसके अवरुद्ध एकांत का पता भी है। महत्त्वपूर्ण यह है कि स्त्री का यथार्थ यहाँ प्रत्याशित तरीके के अनुभवों का दुहराव नहीं है। यह अलग बात है कि कहानी के भीतर चीजें अपनी स्वाभाविकता का कितना निर्वाह करती हैं अथवा लेखकीय सायासता की दखल का क्या स्वरूप है?

कुल मिलाकर ये कहानियाँ विस्तृत और जटिल यथार्थ की तहबंदियों में प्रवेश करती हैं। चंद किशोर जायसवाल की कहानी ‘विक्लव’ भी कठिन समय की असामान्यता को सामान्य निम्न मध्यवर्गीय गृहस्थ के जरिए भेदती है और ऐसी मनोदशा को परिभाषित करने के लिए एक शब्द लाती है ‘विक्लवज्। यह शब्द अवधबाबू की पत्नी के परिचय क्षेत्र का है। इस भारी भरकम तत्सम शब्द का अर्थ है ‘क्षोभ'। इसमें ‘वि’ उपसर्ग ‘क्ल’ धातु ‘अच’ प्रत्यय हैं। अपनी निर्मिति में यह प्रायः एक दुर्लभ शब्द है। नितांत अप्रचलित। चंद किशोर जायसवाल यथार्थ की स्वाभाविक गतिशील रचना के लेखक है। इस कहानी में वे दमन और अन्याय के लगभग पचाए जा चुके दबावों को किसी प्रकार की अतिशयताओं न लिखते हुए मनुष्य की बेदखली रचने वाले समय को उधेड़ते हैं। जाहिर है इस शीर्षक के अलावा उनके ‘अतिविशिष्ट’ के प्रति रूझान का कोई पता नहीं मिलता।

'पता’ से फिर मुझे ‘पता’ कहानी याद आयी। किरन सिंह की कहानियाँ जटिलतम और विस्तृत्व अनुभवों तक लेखिका के विस्तार का पता देती हैं। यह असाधारण है। अमूमन लेखिकाओं की पहुँच सीमित पारिवारिक यथार्थ या प्रेम-विवाह वगैरह तक मानी जाती थी। उत्तर पूंजी की गहन पतनशीलताओं के तमाम निहितार्थों को भेद कर परिवेश, घटनाक्रम और चरित्र को इस तरह खड़ा कर देना कि उसमें यातनाओं का सारा ऐंद्रिक संवेदित हो रहा हो, वाकई मुश्किल काम है मगर इस कहानी ने अपनी तफसीलों में आदिवासियों के हाशियाकरण के यथार्थ को उसके संघर्षशील हिस्से से पकड़ा है। हरि भटनागर की कहानी वंचित जन के यथार्थ को स्वार्थ और अवसरवाद की निस्संगता के छोर से पकड़ती है तो तेजेन्द्र शर्मा पूंजी के समय की दानवी विकरालता के भीतर कुछ मासूम कुछ मानवीय को बचा ले जाने के हिस्से खोजते हैं। ये सारे पाठ अपनी-अपनी पहुँच में मौजूदा खतरनाक यथास्थिति की गहन आलोचना तो हैं ही साथ कई तरह से नये अनुभव क्षेत्रों, किरदारों और नई नैतिकताओं का आगाज भी हैं।

और अब संजीव की कहानी के कोकिला प्रसंग पर। संजीव के लिए यथार्थ अपने समय से विच्छिन्न टुकड़ा नहीं है। पूंजी का चाकचिक्य परिदृश्य अपनी तमाम दुष्ट इच्छाओं के साथ कहानी में मौजूद है। संजीव कुछ बेदखल चीजों की कौतुक भरी खोज का प्रसंग रचते हैं और कहानी आधुनिक उत्तर आधुनिक समय के जीवन के खाली निचाट और मनहूस की तहों में उतरने लगती है। कोयल की बोली मुंबई जैसे कांक्रीट वन में भला कैसे बचती। क्रमशः यह ‘कोकिला बैन’ किसी भाववादी नास्टेल्जिया में गर्क होने के बजाय पूंजीवादी विकास के अमानुषिक अर्थ का पूरा प्रहसन उधेड़ने में जुट जाता है। लेखक की सर्तक दृष्टि शहरी जीवन में समाप्त होती मानवीय गतिशीलता को गहरे व्यंग्य के साथ उघेड़ती है। इस व्यंग्य के निशाने पर सभी हैं, पूंजी के विकास की निर्ममताएं सबसे ज्यादा।

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