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समकालीन दलित कहानी: कुछ वैचारिक बिन्दु / टेकचंद / रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

रचना समय - मार्च 2016 / कहानी विशेषांक 2

टेकचंद

समकालीन दलित कहानी: कुछ वैचारिक बिन्दु

वैसे तो सम्पूर्ण दलित साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है, लेकिन कहानी विधा में विरोध प्रतिरोध का तेवर अपेक्षाकृत ज्यादा मुखर और धारदार होता है। इसका कारण यह है कि आत्मकथा जो कि दलित साहित्य की प्रतिनिधि विधा है, व्यक्ति विशेष की संघर्ष गाथा बन जाती है, कविता कवि का आक्रोश, नाटक स्थितियों का बयान। परन्तु कहानी लेखक, पात्रों, घटनाओं, परिवेश आदि का ऐसा समग्र बिम्ब प्रस्तुत कर देती है कि पाठक के चेतन अवचेतन का हिस्सा बन जाती है। पाठक के रूप में कहानी एक मुहिम और उसका एक पैरोकार तैयार करती है।

इस अर्थ में समकालीन दलित कहानी एक उम्मीद जगाती है, एक भाव-संवेदन का वितान रचती है।

दलित कहानी के विकास पर गौर करते हैं तो एक भरी पूरी पीढ़ी दिखाई पड़ती है। पिछली पीढ़ी में ओमप्रकाश वाल्मीकि से शुरू करें तो जयप्रकाश कर्दम, मोहनदास नैमिशराय, सूरजपाल चौहान, अनीता भारती, रजनी सिसोदिया, कैलाश वानखेड़े और संदीप मील जैसे कथाकार विरोध-प्रतिरोध का एक विमर्श रचते दिखाई देते हैं। ये कहानियाँ एकरेखीय न होकर बहुअर्थी संवेदना के सूत्र हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। इस लेख का उद्देश्य उन्हीं सूत्रों को पकड़ना है। जहाँ कहानी प्रचलित और प्रसिद्ध पाठ के बाहर कुछ अन्य अर्थों को पकड़ सके। और कहीं-कहीं कहानी बहुत चर्चित न पर जरूरी लगे, पुष्पा भारती की ‘जूता’ ऐसी ही कहानी हैं राजेन्द्र बड़गूजर की ‘इनाम’ हरियाणवी समाज में जाटों की अवसरवादिता और दलितों के प्रति उनके ‘यूज़ एण्ड थ्रो’ वाले दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती है। समकालीन दलित कहानी में एक नहीं अनेक स्वर हैं। आज की दलित कहानी में चेतना के धरातल इकहरे नहीं हैं। दलित कहानी जाति के अलावा, सामाजिक न्याय, साम्प्रदायिक विसंगतियों, प्रशासनिक घालमेल और शोषण के बारीक तंतुओं को भी पकड़ती है। मायने कि दलित कहानी की कथ्य भूमि पहले से ज्यादा विस्तृत और आन्दोलनधर्मी हुई है।

सत्यापन में बताया गया है कि सरकारी दफ्तरों में जो लोग फोटो व प्रपत्र सत्यापन करवाने जाते हैं, उनकी जाति का पता लगते ही एक तयशुदा सा सत्यापन उनकी अस्मिता के साथ चस्पा कर दिया जाता है। फिर उनके प्रति सरकारी तंत्र का नज़रिया ही बदल जाता है।

‘सत्यापन’ अपने मूल रूप में प्रशासनिक व्यवस्था पर व्यंग्य है। यह व्यंग्य और ज्यादा मारक इस अर्थ में है कि इसमें अनुभव दग्ध प्रामाणिकता है। इस कहानी को मानक आधार पर भी देखा जाना चाहिये। छोटे-छोटे से वाक्य वातावरण के प्रभाव और व्यवस्था के चरित्र को बखूबी पेश करते हैं, जैसे ‘बेफि़क्र आदमी अच्छा नहीं लगता, परेशान दिखने वाले को ज्यादा परेशान किया जाता है, दूसरों का हँसता चेहरा खुशी नहीं देता, हर बार यातना के दर्दनाक अनुभव से गुजरता हूँ दफ्तरों में, जो हमें नहीं जानता, नहीं पहचानता, वही हमें सत्यापित करता है, अब टेम हमारे पास भी नहीं है।’ ये वाक्य स्वाभाविक रूप से व्यवस्था के रूप और चरित्र को पाठकों के समक्ष ला पाते हैं। सत्यापन के अलावा कैलाश वानखेड़े की अन्य कहानियाँ ‘स्कॉलरशिप’ तथा ‘कितने बुश कितने मनु’ को भी इन्हीं सन्दर्भों में पढ़ा जाना चाहिये। समकालीन कहानी में कैलाश वानखेड़े की कहानियाँ इसीलिये विशिष्ट मानी जा सकती हैं कि वे एक ऐसे क्षेत्र को कहानी का विषय बनाते हैं जहाँ अन्य कथाकार नहीं जा पाते- दफ्तरी व प्रशासनिक कार्यशैली के क्षेत्र।

वरिष्ठ लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘सलाम’ जाति व्यवस्था के कुछ अलग स्तरों को दिखाती है। यहाँ परम्परागत जाति विरोध न होकर एक विखंडित अर्थ मिलता है। कमल उपाध्याय अपने परममित्र हरीश की बारात में जाता है। हरीश दलित है, उसकी उपजाति वाल्मीकि है। कमल गाँव की एक दुकान पर चाय पीने जाता है। वहां उसे बारात में आया दलित जानकर गाँव वाले उसका घोर अपमान करते हैं। दूधर उसका मित्र और दूल्हा हरीश सवर्णों के दरवाजे पर ‘सलाम’ के लिये जाने से इन्कार कर देता है। दूसरी तरफ एक दलित किशोर रोटी खाने से इसलिए इंकार कर देता है कि वह रोटी (नान) एक मुसलमान कारीगर ने बनाई है।

‘सलाम’ एक साथ जाति-व्यवस्था के कई स्तरों को छूती है। कमल उपाध्याय जातिगत उत्पीड़न को झेलता है। एक झटके में ही वह दलित समाज की पीड़ा और दमन का भोक्ता बन जाता है। हरीश पढ़ा लिखा होने के कारण ‘सलाम’ का विरोध करता है। मात्र दलित ही जाति की पीड़ा को समझ सकता है, सवर्ण नहीं।

ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘सलाम’ के माध्यम से इस मान्यता को बदलते हैं। कमल उपाध्याय की स्थिति को वाल्मीकि जी की एक कविता के द्वारा भी समझा जा सकता है, जहाँ वे सवर्ण को आह्वान करते हैं कि-‘‘तू भी दलित बन के देख/अपने सिर पर/मैले का टोकरा उठा के देख!’’ इस कहानी में कमल उपाध्याय ऐसी ही अनुभूति से गुजरता है। तथाकथित सवर्णों को भी यह अनुभव करना चाहिये कि हज़ारों वर्षों से एक बड़ा मानव समूह इस शोषण और प्रताड़ना से किस तरह गुजरता रहा है। दूसरी तरफ आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का कथन कि ‘हिन्दू धर्म में नीची से नीची समझी जाने वाली जाति भी अपने से नीचे दो-चार जातियाँ ढूंढ लेती हैं।’’ यहाँ सच होता जान पड़ता है जहाँ एक दलित किशोर रोटी इसलिये नहीं खाना चाहता कि उसे गाड़ा (मुसलमान) बना रहा है। यहाँ जाति से सवर्णों के साथ-साथ दलितों की मुक्ति ज़रूरी मानी गई है। आज दलित समाज ही नहीं साहित्यकारों तक में भी जाति, उपजाति के आधार पर खेमेबाजी हो रही है। इसीलिये दलित साहित्य कम रचा जा रहा है, विमर्श ज्यादा हो रहा है, चिंतन ज्यादा है, चेतना मंद पड़ती जा रही है, कमल उपाध्याय और हरीश की संगत एक उम्मीद जगाती है और ‘सलाम’ की प्रथा को टाटा-बॉय-बॉय (जोर का धक्का मारने) करने का साहस पैदा करती है।

जयप्रकाश कर्दम के नाम हिन्दी दलित साहित्य का प्रारंभिक उपन्यास ‘छप्पर’ है। यह उपन्यास काफी चर्चित भी रहा है। इनकी कहानियाँ भी खासी चर्चित व सार्थक रही हैं। ‘नो बार’ एक ऐसी ही कहानी है। एक पढ़ा-लिखा, नौकरी-पेशा दलित युवक अखबार में वैवाहिक विज्ञापन देखता है। शादी के लिये उसे एक ही विज्ञापन में दिया गया रिश्ता पसन्द आ जाता है। विज्ञापन के इस रिश्ते की खासियत यह थी कि ‘हाईली एजूकेटेड फेमिली, नो बार।’ अर्थात् जाति का कोई बंधन नहीं व राजेश पत्र लिख देता है। बुलावा आता है। उस परिवार तथा लड़की अनिता से मेल मिलाप और बात शादी तक पहुंच जाती है, सब घुल-मिल जाते हैं। बातचीत से लड़की के पिता को शक होता है। पर्दे के पीछे जाकर पिता बेटी से राजेश की जाति के विषय में पूछता है। लड़की अनभिज्ञ है। वह अपनी बेटी को समझाता है। बेटी प्रतिवाद करती है ‘पर क्यों पापा, जब हम जाति-पांति को मानते ही नहीं तो...’ पिता का जवाब ‘नो बार’ का यह मतलब तो नहीं कि किसी चमार-चूहड़े के साथ...।’

कहानी यहाँ समाप्त होती है और शुरू होती है भारतीय हिन्दू समाज की महागाथा। तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद यह समाज जाति को नहीं छोड़ना चाहता। यदि वह ‘इंटरकास्ट मैरिज’ की बात करता है तो अपने समान तथाकथित उच्च जाति में ही। ‘नो बार’ में दलित या अछूत जातियाँ नहीं आतीं। उनके लिये तो आज भी बार ही बार ;बाधा ही बाधाद्ध हैं। यह कहानी सवर्णों की छद्म प्रगतिशीलता और बनावटी व नकली आधुनिकता पर तीखा व्यंग्य करती है। इस कहानी को पढ़कर लगता है कि तथाकथित सवर्ण और प्रगतिशील तबका मानसिक रोगी है। क्योंकि जब तक राजेश की जाति नहीं पता थी सब उस पर प्यार लुटा रहे थे लेकिन जाति का पता (सन्देह) होते ही लड़की के पिता का दिमाग फिर गया। ध्यान देने की बात यह है कि-‘अनिता वहीं खड़ी रह गई थी।’ क्योंकि बाप (परिवार व समाज) द्वारा लगाई गई जाति की बार (बाधा) को वह भी पार नहीं कर सकती। या संभवतः पार करना नहीं चाहती। इतने दिनों की मुलाकातों में अनिता की राजेश से प्यार जैसा कुछ ही चला था। कहते हैं कि प्यार अंधा होता है, पर लगता है कि तमाम अंधेपन के बावजूद प्यार जाति तो देख ही लेता होगा। यह इस कहानी से प्रमाणित होता है। एक पाठ और है जो इस कहानी की समाप्ति के बाद पढ़ा-समझा जा पाया होगा? क्या उसका हाल वाल्मीकि जी की कहानी ‘सलाम’ के कमल उपाध्याय जैसा नहीं हुआ होगा? क्या एक ऐसा समाज बन पायेगा जहाँ वाकई ‘नो बार’ हो? क्या प्रगतिशीलता या आधुनिकता मात्र कपड़ों की तरह बदली, पहनी व फेंकी जा सकने वाली अवधारणाएँ हैं?

यह कहानी ऐसे अनेक सवाल उठाती है और बनाती है कि तमाम भौतिक तरक्की के बावजूद हम आज भी पिछड़े, दकियानूस और पोंगा-पंथी ही हैं। ‘जाति क्यों नहीं जाती?’ में एक पद और जोड़ लिया जाए ‘जाति क्यों नहीं जाती सवर्णों के दिमाग से?’

समकालीन कहानीकारों में कैलाश वानखेड़े का नाम महत्त्वपूर्ण है। कैलाश वानखेड़े चूंकि प्रशासनिक सेवा से जुड़े हैं अतः शासन-प्रशासन में व्याप्त जातिगत भेदभाव को वो बेहतर ढंग से चित्रित करते हैं। ‘सत्यापन’ उनकी प्रतिनिधि कहानी है। इसी शीर्षक से उनका कहानी संग्रह है। ‘सत्यापन’ करने वाली कहानी है। एक दलित युवक किसी सरकारी दफ्तर में अपना फोटो ‘सत्यापन’ (अटेस्टेड) करवाने जाता है। यहाँ उसकी कालोनी का नाम सुनकर ही क्लर्क उसे रोक देता है, घंटों खड़ा रखता है। इसी उपक्रम में वह ‘भाऊ साहेब इंगले’ से मिलता है। उसकी भी शिकायत है। अस्पताल में पत्नी की डिलीवरी करवाने के दौरान वह तमाम उत्पीड़न झेल गया लेकिन उसकी शिकायत है कि अस्पताल के काग़जों में पते के तौर पर वह ‘बौद्धवाड़ा’ लिखवाना चाहता है लेकिन नर्स ‘महारवाड़ा’ ही क्यों लिखती है। और फिर दोनों मिलकर सरकारी दफ्तर की बाबूशाही को चुनौती दे देते हैं।

अनीता भारती एक सक्रिय कार्यकर्ता और चर्चित लेखिका हैं। ‘एक भी कोटे-वाली’ उनका कहानी संग्रह है। यों उनके कविता संग्रह तथा संपादित पुस्तकों की संख्या भी अच्छी खासी है। ‘एक थी कोटेवाली’ उनकी चर्चित, संक्षिप्त और असरदार कहानी है। दलित शिक्षिका गीता का चयन एक विद्यालय में होता है। यहाँ शिक्षिकाओं का पूरा स्टॉफ ‘कोटेवालियों’ और ‘गैर कोटेवालियों’ में बंटा रहता है। गीता सुबह पहले पीरियड से ज्वॉइन करती है और हर पीरियड की घंटी के साथ इन दोनों समूहों में उसकी जाति को लेकर कयास, पूर्वाग्रह और तनाव बढ़ता चला जाता है। गीता की मैरिट और आकर्षक व्यक्तित्व भी कोई धारणा कायम करने में बाधा बनते हैं। कहानी और उसका तनाव आठवें तथा अंतिम पीरियड तक चरम पर पहुंच जाते हैं। गीता अम्बेडकरवादी है, यह जानते ही सवर्ण शिक्षिकाओं का पारा चढ़ जाता है। गीता का साथ पाकर ‘कोटेवाली शिक्षिका’ उनका कड़ा और तार्किक जवाब देती हैं। और सबकी जाति बताती हैं। यह कहानी दर्शाती है कि कार्यस्थल पर यौन-उत्पीड़न रोकने वाले नियम व समितियाँ तो बनी हैं किन्तु जातिगत भेदभाव को रोका जा सके ऐसा कोई मैकेनिज़्म भी तो होना चाहिये। सवर्ण समाज किसी व्यक्ति की जाति जानते ही निर्मम और पक्षपाती हो जाता है। सवर्ण वर्ग, शहरी परिवेश में उत्पीड़न की गंवई हरकत तो नहीं करता किन्तु संकेतों, कटाक्षों, शब्दों और शारीरिक भाषा के द्वारा वह ऐसा माहौल बना देता है कि बर्दाश्त नहीं होता। तब जाति व्यवस्था और इसके पैरोकारों के प्रति आक्रोश पनपना स्वाभाविक ही है। अनीता और श्रीमती सागर का गुस्सा जायज ही लगता है।

अनीता भारती दलित स्त्रीवाद की मुहिम चलाए हुए हैं। वे दलित स्त्री के प्रश्न को अपने ढंग से उठाती हैं। प्रस्तुत कहानी दलित स्त्री के कार्यस्थल यानी स्कूल में व्याप्त जातिगत विसंगतियों को बेनकाब करती है। दलित पुरुष चूंकि इस जगह नहीं पहुंच सकता अतः दलित स्त्री को यह भूमिका निभानी पड़ी। इसी अर्थ में दलित स्त्रीवाद उभरकर आता है, क्योंकि दलित साहित्य का पुरुष साहित्यकार यहाँ तक पैठ नहीं बना सका है।

रजनी सिसोदिया ने कम परन्तु सार्थक कहानियाँ लिखी हैं। उनके ‘चारपाई’ कहानी-संग्रह में से ‘ताड़का वध’ कहानी पर बात करना चाहूंगा। कथावाचक कॉलेज शिक्षक है। उसके घर (फ्लैट) के सामने सौमित्र रहता है जो सेना में अधिकारी है। उसके पिता की मौत नक्सलवादियों के द्वारा किये गये बारूदी सुरंग विस्फोट में हुई थी। अब सौमित्र की पोस्टिंग भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में हो जाती है। कथावाचक तथा सौमित्र के परिवार में तनाव का वातावरण है। हर फोन, हर आवाज़ पर कुछ अनिष्ट की आशंका होती है। जल-जंगल-जमीन का विमर्श भी चलता रहता है। पक्ष-विपक्ष के विचार भी कौंधते हैं। कथावाचक की कालोनी में चल रही रामलीला में ‘ताड़का वध’ के संवाद सुनाई पड़ते हैं। आदिवासी, नक्सल, पुलिस, राजनीति, मुख्यधारा और हाशिये का ऐसा कोलाज बनता है कि ‘ताड़का वध’ तो हो जाता है लेकिन सवाल खड़ा रह जाता है-‘हाय चाची ताड़का रोटी कौन पकाएगा? हाय चाची ताड़का रोटी कौन खिलाएगा? मुख्य-धारा के लिये कानूनी, न्यायिक और नैतिक जीत ‘ताड़का वध’ की तरह है लेकिन आदिवासियों के लिये अस्तित्व और अस्मिता का प्रश्न, रोटी का सवाल है।

मैं कहना चाहता हूं कि दलित कहानी मात्र व्यक्तिगत या जातिगत दुख दर्द को ही बयान नहीं करती। वहाँ कुछ वृहद सरोकारों, समान संघर्ष और अस्मिता के विस्तार की भरपूर संभावनाएँ नज़र आती हैं। दलित कहानी मात्र शहरी-ग्रामीण परिवेश में जातिगत उत्पीड़न तक सीमित न रहकर आदिवासियों, मानवतावादियों के संघर्ष में सहभागी होकर उसे मज़बूती और विस्तार देती है। मिथकों का रचनात्मक उपयोग यहाँ दिखाई देता है। ध्यान देने की बात यह है कि दलित कहानीकार मिथकों का उपयोग अपने ढंग से कर रहे हैं। मिथक मूल निवासियों की संवेदना से जुड़े हैं। इसके कारण प्राचीन देव-न्याय आज अन्याय की श्रेणी में आ गया है। यह एक प्रकार से ब्राह्मणवादी वैचारिकी को पलट देने का उपक्रम है।

स्वराज प्रकाश से ‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’ 2011, खंड एक में पुष्पा भारती की कहानी ‘जूता’ छपी है। छोटी सी किन्तु सारगर्भित इस कहानी में मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद का रचनात्मक तालमेल दिखाई पड़ता है। मोची रामखिलावन जूते-चप्पल गांठकर इतने पैसे कमाना चाहता है कि अपने भाई की शादी में जाने के लिए अच्छे कपड़े और जूते खरीद सके। वह बाज़ार से जूते खरीद सके इतना तो नहीं कमा पाता लेकिन जो कमाता है उससे चमड़ा, रंग और जूता बनाने का सामान ले आता है, और रातभर खटकर उसने बहुत अच्छा जोड़ा जूता तैयार किया। जूता इतना शानदार था कि एक ग्राहक ने मिन्नतें कर बारह सौ रुपये में खरीद लिया। बारह सौ में घर भर की ज़रूरतें पूरी हो जायेंगी, यह सोचकर उसने जूता बेचा था। अगले दिन जब किसी सस्ते जूते की तलाश में वह कनॉट प्लेस गया तो एक बड़े शोरूम के शोकेस में अपने जूते को दुगुने रेट की चेपी लगे देख हैरान रह गया। यह कहानी एक दलित स्त्री द्वारा, दलित पुरुष श्रमिक के श्रम और बेशी मूल्य को हड़प लेने की साजिश का पर्दाफाश करती है। मुझे नहीं लगता कि ऐसा विलक्षण कथा-प्रयोग मुख्यधारा में भी मिल पायेगा कि नहीं।

यह दुखद है कि श्रम सौन्दर्य और श्रम के शोषण की इतनी अच्छी कहानी की लेखिका अब हमारे बीच नहीं है, नहीं तो अम्बेडकरवादी समाज को मार्क्सवादी दृष्टिकोण से जानने समझने के कुछ और कथा प्रयोग मिलते। यह कहानी संकेत करती है कि हाशिये पर के समाज, उसकी कला-संस्कृति और धरोहर को किस प्रकार बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और कॉरपोरेट घराने लूट रहे हैं। दिल्ली और अन्यम महानगरों में लगने वाले ‘हाट और हस्तशिल्प मेले’ लोक कलाकारों, श्रमिकों और कारीगरों को कितना मेहनताना और श्रम का लाभ दे पाते होंगे? यह एक बड़ा विचारणीय प्रश्न है। पुष्पा भारती इस संक्षिप्त सी कहानी में श्रम के शोषण का बड़ा प्रश्न उठाती हैं। इस परिवेश की आलोचनात्मक पृष्ठभूमि के निर्माण में तेज सिंह की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। तेज सिंह मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद के संयोजन पर लगातार जोर देते रहे थे।

संदीप मील उस तरह से दलित रचनाकार नहीं हैं लेकिन जाति का सवाल जिस तरह से उन्होंने उइाया है उसका सरोकार दलित कहानी से जुड़ता है। राजस्थान की पृष्ठभूमि के संदीप मील का हिन्दी में एक कहानी संग्रह आया है ‘दूजी मीरा’। इस संग्रह की एक खास कहानी पर बात करना चाहूंगा, जो फॉरवर्ड प्रैस पत्रिका में छपी थी, ‘एक प्रजाति हुआ करती थी-जाट’। यह कहानी जाति व्यवस्था की पोषक खाप-पंचायतों और उनकी कार्यप्रणालियों पर बहुत तीखा और मारक व्यंग्य करती है।

कहानी पैरोडी के ढंग से शुरू होती है। नाटकीय ढंग से संवाद बोले जाते हैं। ‘प्रेम को फांसी दे दो’, ‘प्रेम करने वालों को फांसी दे दो’, ‘युवा को फांसी दे दो’, ‘शादी को फांसी दे दो’ मतलब यह कि जो भी खाप पंचायत की समझ में न अटे उसे फांसी दे दो। खाप पंचायतों का यह रवैया मात्र सजातीय के प्रति ही नहीं विजातीय के प्रति भी होता है, कई बार इसका रूप भयंकर होता है। संदीप मील ने चुटीले संवादों द्वारा खाप पंचायतों की कूढ़-मगज़ी, मूर्खता और तुगलकी मानसिकता को उघाड़कर रख दिया है।

हम सब दुलीना, झज्जर, मुर्चपुर, हिसार और भगाणा के कांड देख चुके हैं, जानते हैं कि इन बड़े-बड़े जघन्य कांडों को अंजाम देने में खाप पंचायतों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में खाप पंचायत पर ऐसा पक्ष आना दलित वैचारिकी के लिये ऊर्जा का स्रोत हैं

खाप पंचायतों और सामंती मानसिकता का ऐसा रूप विमर्श का तो विषय बना है लेकिन कहानी का कम। इस विषय पर अभी और कहानियाँ आनी चाहिये।

खाप पंचायतों और गाँव में दलितों पर होने वाले अत्याचारों की कहानी है मुकेश मानस की ‘अभिशप्त प्रेम’। यह कहानी अपेक्षा के अप्रैल-जून 2007 के ‘अम्बेडकरवादी कहानी विशेषांक’ में तेज सिंह के सम्पादन में छपी थी। कथावाचक जब बालक था तो दिल्ली की जे.जे. कालोनी में रहता था। गर्मियों में जब स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जातीं तो वह उत्तर प्रदेश में अपने गाँव जाता था। वहाँ रिश्ते में लगते राघौ भइया से मेल मुलाकात होती है। बालक यह देख लेता है कि राघौ भइया का प्रेम गाँव के ठाकुर की लड़की से चल रहा है। राघौ जाटव है। कथावाचक बालक मल्ला छुट्टियाँ बिताकर दिल्ली आ जाता है। कालांतर में राघौ उस लड़की को दिल्ली ले आता है। दोनों को एक लड़का भी होता है। काफी तनाव के बाद ठाकुर शांत होते हैं और आकर इन्हें गाँव लिवा ले जाते हैं। बाद में कथावाचक को पता लगता है कि पहले राघौ भइया की पत्नी और बेटे की लाश खेत की मेड़ पर मिलती है और उसके बाद ‘उसी बरगद के नीचे... टुकड़ों-टुकड़ों में राघौ भइया की लाख मिली। ...हिन्दुस्तान के अभिशप्त प्रेम की लाश।’’

मुकेश मानस की यह कहानी खाप-पंचायतों और उनकी दकियानूसी सोच को उजागर करती है, उनके अमानवीय तथा असंवैधानिक कृत्यों को सामने लाती है तो संदीप मील की कहानी ‘एक प्रजाति हुआ करती थी-जाट’, इन खाप पंचायतों की अंदरूनी स्थिति और बेवकूफाना हरकतों पर करारा व्यंग्य करती है।

दलित कहानी शोषण ओर गैर बराबरी के सभी गढ़-मठों पर प्रहार करती है।

गाँव हो या शहर दलित कहानी शोषण की परतों को उधेड़ती है। कुछ वर्षों पूर्व इसी प्रकार का मामला दिल्ली के नरेला क्षेत्र में देखा गया था। जहाँ लड़की घर से भागकर अन्तर्जातीय प्रेम-विवाह कर लेती है। बच्चा होने के कई वर्षों बाद उसके माँ-बाप तीनों को मनाकर ;बहकाकरद्ध घर ले जाते हैं और बाद में उनकी हत्या कर देते हैं। मुकेश मानस की कहानी और उपर्युक्त घटना बताती है कि जब संविधान, व्यवस्था और सूचना तंत्र के बावजूद सवर्ण समाज इतने बड़े हत्याकांड को अंजाम दे सकता है तो पुराने हिन्दू-समाज ने हज़ारों वर्षों तक दलितों के साथ क्या-कुछ नहीं किया होगा? परन्तु समय बदला है तो चेतना में भी बदलाव आया है। सवर्ण तो बदले नहीं दलित समाज ने अपनी सोच बदली है।

राजेन्द्र बड़गूजर की ‘इनाम’ इस बदलाव की सूचक है। गाँवों में पंच-सरपंच किस प्रकार दलित वर्ग को ठगते हैं इसका उदाहरण ‘राजेन्द्र बड़गूजर’ की कहानी ‘इनाम’ प्रस्तुत करती है। यह हरियाणा के गाँवों की कहानी है। पंचायत में बी.डी.ओ. साहब आते हैं तो जाट सरपंच ताव-ताव में घोषणा कर देता है कि गाँव में आठवीं कक्षा में पहले नंबर पर जो बालक आयेगा उसे एक जहार रुपये इनाम देगा। इस घोषणा से उत्साहित दलित बालक चन्द्रशेखर मन लगाकर पढ़ता है और प्रथम आता है। चन्द्रशेखर पिता के साथ इनाम लेने सरपंच के घर जाता है तो सरपंच उन्हें दुत्कार देता है। बाप-बेटा मायूस होकर लौट आते हैं। चन्द्रशेखर का पिता शाम को जब काम पर से लौटता है तो खुश होता है वह बताता है कि- उसका बिरादरी भाई रग्घू चन्द्रशेखर के प्रथम आने की खुशी में लड्डू बाँट रहा था। बापू वही लड्डू चन्द्रशेखर को देता है और कहता है-‘‘मैंने उस समय यह महसूस किया कि सरपंच के एक हज़ार रुपये से रग्घू का एक लड्डू लाख गुणा बेहतर है।“ और रग्घू का यह कथन कि- ”तेरा बेटा फस्ट आए या मेरा, है तो हमारा ही।“ और प्रतिउत्तर में चन्द्रशेखर के पिता का रग्घू से यह कहना कि- ”लड्डू पाने के पीछे तेरी जिस भावना ने काम किया है वही तो मेरे बेटे के लिए असली इनाम है।“

वास्तव में यही भावना इस कहानी का भी इनाम है। ‘तेरे’ ‘मेरे’ की जगह ‘हमारा’ का भाव दलित समाज की बनती एकता को प्रदर्शित करता है। आज जब सरमायेदार और शोषक दृढ़ से दृढ़तर होते जा रहे हैं तब समान हितों वाले लोगों में सामूहिकता और एकजुटता का होना उनके अस्तित्व व अस्मिता के लिये बेहद ज़रूरी हो जाता है। यह कहानी हरियाणवी बोली-बाणी में बड़े स्वाभाविक ढंग से अस्मिता निर्माण की प्रक्रिया को कथा-सूत्र में पिरोकर पेश करती है। यह एक छोटी कहानी है जो एक बड़ी भाव-भूमि का निर्माण करती है। यह चेतना के बदलाव की कहानी है।

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